ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
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यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां
लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य
द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
वह [ गर्भभूत पतिके आत्माका ] पालन करनेवाली [ गर्भिणी स्त्री
अपने पतिद्वारा ] पालनीया होती है। गर्भिणी स्त्री उस गर्भका पोषण
करती है। तथा वह ( पिता ) गर्भरूपसे उत्पन्न हुए उस कुमारको
प्रसवके अनन्तर पहले [ जातकर्मार्दि संस्कारोंसे ] ही संस्कृत करता
है। वह जो जन्मके अनन्तर कुमारका संस्कार करता है सो इस
प्रकार इन लोकों ( पुत्र-पौत्रादि ) की वृद्धिसे वह अपना ही संस्कार
करता है, क्योंकि इसी प्रकार इन लोकोंकी वृद्धि होती है—यही इसका
दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥
सा भावयित्री वर्धयित्री भर्तु- | गर्भभूत पतिके आत्माकी वृद्धि
रात्मनो गर्भभूतस्य भावयितव्या | करनेवाली वह स्त्री अपने स्वामीद्वारा
वर्धयितव्या रक्षयितव्या च | वर्द्धयितव्या—पालनीया होती है,
भर्त्रा भवति । न ह्युपकार- | क्योंकि लोकमें उपकार-प्रत्युपकारके
प्रत्युपकारमन्तरेण लोके कस्य- | बिना किसीके साथ किसीका सम्बन्ध
चित्केनचित्सम्बन्ध उपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है। जन्म होनेसे
तं गर्भं स्त्री यथोक्तेन गर्भधारण- | पूर्व उस गर्भको वह स्त्री गर्भधारणकी
विधानेन बिभर्ति धारयत्यग्रे | यथोक्त विधिसे धारण-पोषण करती
प्राग्जन्मनः । स पिता अग्र एव | है। तथा वह पिता [जन्म होनेके बाद]
पूर्वमेव जातमात्रं जन्मनोऽध्यूर्ध्वं | पहले ही जन्म लेते ही उस कुमारका
जन्मनो जातं कुमारं जातकमां- | जन्मके अनन्तर जातकर्मादिद्वारा
दिना पिता भावयति । स | संस्कार करता है। वह पिता जो जन्म-
पिता यद्यस्मात्कुमारं जन्मनो- | के अनन्तर उस सद्योजात कुमारका