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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

३५४ [ पाँचवीं पञ्चिका
( भूः । इन्द्र वाले होकर स्तुति करो । )
दोपहर के सवन में कहे :—
“भुवः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्”
तीसरे सवन में कहे :—
“स्वः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्”
ऊक्थ्य या अतिरात्र में कहे :—
“भूर्भुवः स्वः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्”
अगर ब्रह्मा कहे, “इन्द्रवंतः स्तुध्वम्”, इसका अर्थ है कि
इन्द्र का यज्ञ है। इंद्र यज्ञ का देवता है। 'इन्द्रवन्त' कह कर
ब्रह्मा उद्गीथ को इन्द्रवाला करता है। अर्थात् “इन्द्र से
मत अलग हो । इन्द्रवाले होकर स्तुति करो”। वह ऐसा
कहता है। (९)
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवी पञ्चिका समाप्त हुई।

छठी पञ्चिका

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

पहला अध्याय
१—देवता गण सर्वचरु में सत्र करने बैठे । वे पाप के फल
को दूर न कर सके । उनसे कद्रु का पुत्र, सर्प ऋषि, मंत्रों का कर्त्ता
अर्बुद बोला, "होता से की जाने वाली एक क्रिया तुम से
छूट गई । उसे मैं कर दूँ । तब तुम पाप के फल से छूट
जाओगे ।" उन्होंने कहा, "अच्छा" । हर मध्य दिन के सवन
में वह आया । उनके पास बैठा और पत्थरों पर सोम को
निचोड़ा । उसी के अनुकरण में मध्यदिन के सवन में पत्थरों
पर सोम निचोड़ते हैं, जिस मार्ग से वह आता था उसे
"अर्बुदोदा सर्पणी" कहते हैं ।
सोम राजा ने उन देवों को मद-युक्त कर दिया । उन्होंने
कहा, "विषवाला साँप हमारे राजा की ओर देखता है । उसकी
आँखों से पट्टी बाँध दें," इसी के अनुकरण में अब भी पट्टी बाँध
कर पत्थरों पर सोम निचोड़ते हैं ।
सोम राजा ने उनको मद-युक्त कर दिया । उन्होंने कहा,
"यह पत्थर पर सोम निचोड़ने के समय अपने ही मंत्र पढ़ता
( ३५७ )

३५८ [ छठी पञ्चिका
है। हम दूसरी ऋचायें इसमें जोड़ दें।" बस उन्होंने उसके
मंत्रों में अन्य ऋचायें जोड़ दीं। अब राजा सोम उनको मद-
युक्त न कर सका। उसके मंत्र में और ऋचायें शान्ति के लिये
मिलाने से वह पाप के फल को निवृत्त कर सके।
उन्हीं के अनुकरण में साँप अपने पापों को निवृत्त कर
सके। और पुरानी केंचुल को छोड़कर नई ले सके। जो इस
रहस्य को समझता है वह पाप को निवृत्त करता है। (१)
२-प्रश्न है कि कितनी ऋचाओं से पत्थर पर सोम
निचोड़े। सौ से। पुरुष शतायुः, शतवीर्य और शत-इन्द्रिय
होता है। ऐसा करने से पुरुष शतायु, शतवीर्य और शत-इंद्रिय
होता है।
कुछ कहते हैं कि तेतीस ऋचायें बोले। क्योंकि तैंतीस
देवताओं का पाप निवृत्त किया। देव तैंतीस हैं।
कुछ कहते हैं कि अपरिमित ऋचायें बोले। क्योंकि
प्रजापति अपरिमित है और पत्थर पर सोम निचोड़ने का कृत्य
प्रजापति का है। इससे सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। जो
ऐसा करता है वह सब इच्छाओं को पूरी करता है। इसलिये
अपरिमित मंत्र बोलना चाहिये।
अब प्रश्न यह है कि कैसे मंत्र बोले ? अक्षर अक्षर या चार
चार अक्षर या पद पद, या आधे आधे मंत्र या मंत्र मंत्र।
मंत्र मंत्र तो पढ़े नहीं जाते। न पद पद पढ़े जाते हैं।
यदि अक्षर अक्षर करके या चार चार अक्षर करके पढ़ें तो
छन्द लुप्त हो जाते हैं। क्योंकि बहुत से अक्षर छूट जाते हैं।
इस लिये आधे आधे मंत्र कह कर पढ़े। प्रतिष्ठा के लिये मनुष्य
दोपाया है और पशु चौपाया। इस प्रकार वह चौपायों
में यजमान को स्थापित करता है। इसलिये आधे आधे मंत्र
करके पढ़ना चाहिये। इस पर शंका उठाते हैं कि जब मध्यदिन

पहला अध्याय ] ३५९
के सवन में ही ग्रावस्तुत किया जाता है तो दूसरे दो सवनों
में ग्रावस्तुति कैसे होती है । इसका उत्तर यह है कि प्रातः
सवन का सम्बन्ध गायत्री से है । इस लिये प्रातः सवन में
गायत्री से स्तुति की जाती है । तीसरे सवन का संबन्ध
जगती से है इसलिये तीसरे सवन में जगती से स्तुति की जाती
है । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझ कर मध्यदिन के सवन
में ग्रावस्तुति करता है वह प्रातः और सायं सवनों को भी स्तुति-
संपन्न कर देता है ।
इस पर प्रश्न करते हैं कि जब अध्वर्यु अन्य ऋत्विजों
को सब अन्य कामों के लिये आदेश करता है तो ग्रावस्तुति
में बिना आदेश के ही क्यों पाठ होता है ?
इसका उत्तर यह है कि ग्रावः स्तोत्रीय का संबंध मन से है ।
मन को आदेश नहीं दिया जाता । इस लिये बिना आदेश के
ही ग्रावःस्तुति की जाती है ।(२)
३—वाक् ही सुब्रह्मण्या है । सोम राजा उसका बेटा है ।
सोम राजा को खरीद के समय सुब्रह्मण्या को बुलाते हैं जैसे
किसी गाय को बुलावें ।
इसी बेटे के द्वारा यजमान के लिये सब कामनायें दुही
जाती हैं । जो इस रहस्य को समझता है वाणी उसकी सभी
कामनाओं को पूरा कर देती है ।
इस पर प्रश्न करते हैं कि सुब्रह्मण्या का सुब्रह्मण्यात्व
क्या है ?
इसका उत्तर है कि वाक् ही सुब्रह्मण्या है । वाक् ही ब्रह्म
है । वाक् सुब्रह्म है ।
इस पर शका है कि सुब्रह्मण्या ऋत्विज् पुरुष है । उसको
स्त्री कहकर क्यों पुकारते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वाक् ही
सुब्रह्मण्या है । इसी से ।

३६० [ छठी पञ्चिका
अब प्रश्न है कि जब अन्य ऋत्विज् सब कृत्य वेदी के भीतर
करते हैं और सुब्रह्मण्या वेदी के बाहर । तो उसका किया हुआ
वेदी के भीतर किया हुआ कैसे समझा जाता है ? इसका उत्तर
यह है कि वेदी में एक उत्कर ( outlet, बाहर फेंकने का मार्ग )
होता है, उसमें होकर ( अनावश्यक चीजें ) बाहर फेंकी जाती
हैं। उस उत्कर में खड़े होकर जो आह्वान किया जाता है वह
( वेदी के भीतर किया हुआ ही समझा जाता है )।
इस पर शंका है कि उत्कर में खड़े होकर सुब्रह्मण्या क्यों
पढ़ी जाती है। ( इस पर एक गाथा है ) :—
ऋषियों ने एक सत्र किया था। उनमें जो सबसे बूढ़ा था
उस से वे बोले, “सुब्रह्मण्या को बुला । हम में से तू देवतों के
निकटतम होकर बुलायेगा ( बूढ़ा होने से तू देवों के निकट है )
इस लिये सब से बूढ़े को सुब्रह्मण्या बनाते हैं। इस प्रकार वह
सब वेदी को प्रसन्न करता है।
इस पर पूछते हैं कि उसको दक्षिणा में बैल क्यों दिया
जाता है ? बैल नर होता है और सुब्रह्मण्या स्त्री होती है।' इस
प्रकार मिथुन हो जाता है। मिथुन से संतान उत्पन्न करने के
लिये ।
अग्नीध्र पात्नीवत ग्रह के लिये याज्य मंत्र धीरे धीरे पढ़ता
है। पात्नीवत वीर्य ( रेत ) है। और वीर्य सिंचन धीरे धीरे
होता है। वह अनुवषट्कार नहीं करता । अनुवषट्कार विराम
( संस्था ) है। वह अनुवषट्कार इसलिये नहीं करता कि वीर्य-
सिंचन में विराम न हो। वही वीर्य उत्पत्ति करता है जिसके
सिंचन में विराम न हो।
नेष्टा के पास बैठकर खाता है। नेष्टा पत्नियों का भाजन
होता है। अग्नि पत्नियों में सन्तानोत्पत्ति के लिये वीर्य डालता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह अग्नि के द्वारा अपनी

पहला अध्याय ] ३६१
स्त्रियों में वीर्य धारण कराता है और प्रजा और पशु से युक्त
होता है ।
दक्षिणा के बाद सुब्रह्मण्या समाप्त हो जाती है। वाक् ही
सुब्रह्मण्या है। दक्षिणा अन्न है। इस प्रकार यज्ञ को अन्त में
अन्न अर्थात् वाणी में स्थापित करते हैं। (३)
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।

दूसरा अध्याय
४—देवों ने यज्ञ ताना। जब यज्ञ की तैयारी कर रहे थे
तब असुर आये कि इस में विघ्न डालें। उन्होंने उनके ऊपर
दक्षिण की ओर से आक्रमण किया। उसको सबसे कमज़ोर
समझकर। देव जग पड़े और अपने में से दो अर्थात् मित्रावरुण
को दक्षिण की ओर नियत कर दिया।
इन दो मित्र-वरुण के द्वारा उन्होंने दक्षिण से प्रातः सवन
में असुरों को हटा दिया। ऐसे ही यजमान भी मित्रावरुण
के द्वारा दक्षिण से प्रातः सवन में असुरों को भगा देते हैं।
इसलिये मैत्रावरुण ऋत्विज् प्रातः सवन में मैत्रावरुण शस्त्र
पढ़ता है।
असुरों ने दक्षिण की ओर हार कर यज्ञ के मध्य भाग में
आक्रमण किया। देवों ने सजग होकर मध्य में इन्द्र को नियत
किया। उन्होंने इन्द्र के द्वारा मध्य में प्रातः सवन में असुरों को
भगा दिया, इसी प्रकार यजमान भी इन्द्र के द्वारा मध्य से
( ६२ )

दूसरा अध्याय ] ३६३
प्रातः सवन में असुर राक्षसों को भगा देते हैं। इसलिये ब्राह्मणा-
च्छंसी प्रातः सवन में इन्द्र-शस्त्र पढ़ता है।
बीच से हार कर असुरों ने यज्ञ के उत्तरी भाग पर आक्रमण
किया। देवों ने सजग होकर इन्द्र और अग्नि को उत्तर भाग
में नियत किया। उन्होंने इन्द्राग्नि की सहायता से प्रातः सवन
में उत्तर की ओर से असुरों को भगा दिया। इसी प्रकार यज-
मान भी इन्द्राग्नि की मदद से उत्तर की ओर से प्रातः सवन में
राक्षसों को भगा देते हैं। इसलिये अच्छावाक् इन्द्राग्नि शस्त्र
को प्रातः सवन में पढ़ता है। चूँकि इन्द्राग्नि के द्वारा ही देवों ने
प्रातः सवन में उत्तर की ओर से असुरों को भगाया।
असुर उत्तर की ओर हार कर एक लाइन में पूर्व की ओर
आ डटे। देवों ने सजग होकर अग्नि को प्रातः सवन में पूर्व
की ओर नियत कर दिया। उन्होंने अग्नि की सहायता से
प्रातः सवन में पूर्व की ओर से असुरों को निकाल दिया। इसी
प्रकार यजमान भी प्रातः सवन में पूर्व की ओर से अग्नि की
मदद से असुरों को भगा देता है। इसलिये प्रातः सवन अग्नि
का होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट
जाता है।
ये असुर पूर्व से हार कर पश्चिम की ओर यज्ञ पर आक्र-
मण करने लगे। देव जग उठे और स्वयं विश्वेदेवों को पश्चिम
की ओर तीसरे संवन में नियत किया। और विश्वेदेवों की
मदद से उन्होंने पश्चिम की ओर से तीसरे सवन में असुरों को
भगा दिया। यजमान भी विश्वेदेवों की मदद से तीसरे सवन
में पश्चिम की ओर से असुरों को निकाल देते हैं। इसलिये
तीसरे सवन विश्वेदेवों का है। जो इस रहस्य को समझता है
उसका पाप छूट जाता है।

३६४ [ छठी पञ्चिका
इस प्रकार देवों ने समस्त यज्ञ से असुरों को अगा दिया ।
इस प्रकार देव असुरों के अधिपति हो गये। जो इस रहस्य
को समझता है वह स्वयं ही शत्रुओं पर विजय पा जाता है
और पाप से छूट जाता है।
इस प्रकार यज्ञ करके देवों ने असुरों को हरा दिया और
पापों से छूट कर स्वर्ग को प्राप्त हुये। जो इस रहस्य को
समझता है वह इस प्रकार यज्ञ को तान कर अपने शत्रु
को हरा देता है, पाप से छूट जाता है और स्वर्ग को प्राप्त
होता है। (१)
५-प्रातः सवन में (अगले दिन के) स्तोत्रिय को (पिछले
दिन के) अनुरूप करते हैं। इस प्रकार एक दिन को दूसरे दिन
का अनुरूप करते हैं। पहले दिन के कृत्य के अनुकूल पिछले
दिन के कृत्य को आरंभ करते हैं। मध्य दिन में ऐसा नहीं
करते। (मध्यदिन के) पृष्ठ श्री हैं। (मध्यदिन के पृष्ठों का)
उसके लिये वह स्थान नहीं है (जो प्रातः सवन का है) कि
स्तोत्रिय उनको पहले दिन का अनुरूप करे। इसी प्रकार तीसरे
सवन में भी एक स्तोत्रिय को दूसरे का अनुरूप नहीं करते। (२)
६-अब आरंभ करते हैं :-
ऋजुनीती नो वरुणो……( ऋ० १।६०।१ ) से मित्रा वरुण
शस्त्र का आरंभ होता है। इसके दूसरे पद में आया है “मित्रो
नयतु विद्वान्” (विद्वान् मित्र हमारा नेता हो)। मैत्रावरुण
होत्रकों का प्रणेतृ है। इसलिये यही ऋचा प्रणेतृ है।
इन्द्रं वो विश्वतस्परि……(ऋ० १।७।१० )
इससे 'ब्राह्मणाच्छंसि' का आरंभ होता है। इसमें आया
है “हवामहे जनेभ्यः” (हम इन्द्र को लोगों के लिये बुलाते हैं)।
इस प्रकार वे इन्द्र को हर रोज बुलाते हैं।

दूसरा अध्याय ] ३६५
यदि इस प्रकार समझकर 'ब्राह्मणाच्छंसी' हर रोज़ इन्द्र का
आह्वान करता है तो कोई अन्य इन्द्र को ले नहीं जा सकता ।
'यत् सोम आसुते नर' ( ऋ० ७।६४।१० )
यह अच्छावाक् का मंत्र है । इसमें "इंद्राग्नी अजोहवुः"
( इन्द्राग्नी को उन्होंने बुलाया ) ऐसा पद आया है । इस प्रकार
इन्द्राग्नी को उन्होंने हर रोज़ बुलाया । जब अच्छावाक् रोज़
इसको बुलाता है तो कोई और इन्द्राग्नी को ले नहीं जा
सकता ।
यह ऋचायें नावें हैं जो स्वर्गलोक के किनारे तक पहुँचा
देती हैं। इन से यजमान इन लोकों को तरके स्वर्ग लोक को
पहुँच जाते हैं । (३)
७—अब इन के अन्त के मंत्र कहते हैं :—
ते स्याम देव वरुण...( ऋ० ७।६६।६ )
यह मैत्रावरुण का परिधानीय या अन्त का मंत्र है।
इसमें एक पद आया है "इषं स्वश्चधीमहि", ( हम अन्न और
प्रकाश धारण करें ) । इससे वे दोनों लोकों को प्राप्त करते हैं ।
अन्न से यह लोक और प्रकाश ( स्वः ) से दूसरा लोक ।
“व्यंतरिक्षमतिरद्” ( ऋ० ८।१४।७-६ )
यह तीन ऋचायें विवृत हैं । इन से ब्राह्मणाच्छंसी स्वर्ग
के द्वार खोल देता है ।
“अत्यंतरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना ।
इंद्रो यदभिनद्वलम्” (ऋ० ८।१४।७ )
( इंद्र ने सोम के मद में सूराख को खोल दिया और प्रकाश
आने दिया ) इससे दीक्षित लोगों का जोश प्रकट होता है।
इसीलिये इस ऋचा को बलवती ( बलवाली । इस मंत्र में 'वल'
शब्द है 'बल' नहीं ) कहते हैं ।

३६६ [छठी पञ्चिका
उद्गा आजदंगिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहासतीः ।
अर्वाञ्चं नुन्नु दे वलम् । (ऋ० ८।१४।८)
( गायों को निकाल लाया और अंगिराओं के लिये उन
को जो अब तक छिपी थीं प्रकट कर दिया । और वल को
निकाल कर फेंक दिया ) । इस मंत्र में अंगिरों के लिये भेंट
का उल्लेख है ।
"इन्द्रेण रोचना दिवि” (ऋ० ८।१४।३) से स्वर्ग लोक की ओर
संकेत है ।
दृ॒ढानि दृ॑हि तानि च । स्थिराणि न पराणुदे । (८।१४।६)
( इन्द्र ने स्वर्ग के प्रकाशों को दृढ़ किया है । वह स्थिरों
को नहीं फेंकता ) ।
इस मंत्र से यजमान रोज स्वर्ग को जाते और वहाँ चलते
फिरते हैं ।
आहं सरस्वती वतोः (ऋ० ८।३८।१०)
अच्छावाक् का मंत्र है, वाक् ही सरस्वती है ।
"वतोः" द्विवचन में है 'इन्द्र और अग्नि का" ।
“इन्द्राग्न्योरवोवृधे”
यह जो वाक् है वह इन्द्र और अग्नि का प्रिय धाम है ।
इस प्रिय धाम से समृद्धि को प्राप्त होता है । जो इस रहस्य को
समझता है वह अपने प्रिय धाम के द्वारा समृद्ध होता है । (४)
८—होत्रकों के प्रातः सवन और मध्य सवन के परिधानीय
( अन्त के ) मंत्र दो तरह के होते हैं:—
अहीन और एकाहिक । मैत्रावरुण एकाहिक से अन्त करते
हैं । जिससे यजमान इस लोक से च्युत न हो । अच्छावाक्
"अहीनों" से स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । ब्राह्मणाच्छंसी
दोनों से । इससे दोनों लोकों को जोड़ता है और उनमें चलता
है । इस प्रकार मैत्रावरुण और अच्छावाक् को तथा अहीनों

दूसरा अध्याय ] ३६७
को और एकाहिकों को, अग्निष्टोम को और संवत्सर को
दोनों को थामे हुये चलता है ।
तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र “एकाहिक”
ही होते हैं । “एकाहः” प्रतिष्ठा हैं, इस प्रकार अन्त को यज्ञ को
प्रतिष्ठावान् करता है ।
प्रातः सवन में याज्य मंत्रों को लगातार ( अनवानं )
पढ़े । एक या दो स्तोम अधिक न पढ़े । यह ऐसा ही है जैसे
किसी भूखे प्यासे को झट खाना पानी दे देवे । यह सोचकर
कि मैं देवों को जल्दी से भोजन दे दूँ गा वह इस लोक में
प्रतिष्ठित हो जाता है ।
पिछले दो सवनों में अपरिमित मंत्र पढ़े । स्वर्ग लोक
अपरिमित है । स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । जो मंत्र होत्रकों
ने पहले दिन पढ़े उन्हीं को यदि चाहे तो पढ़े । या जिनको
होता ने पढ़ा उन्हीं को होत्रक पढ़े । होता प्राण है । होत्र का
अंग हैं । एक ही प्राण का अंगों में संचार है । इसलिये चाहे
तो होता वही मंत्र पढ़े जो होत्रकों ने पहले दिन पढ़े थे । या
जो होता ने पढ़े उनको होत्रक पढ़े ।
तृतीय सवनों में होत्रक जो परिधानीय मंत्र पढ़ते हैं उन्हीं
सूक्त के अन्तिम मंत्रों से होता समाप्त करता है । होता आत्मा
है । होत्रक अंग हैं । अंगों के अन्त समान होते हैं । इसीलिये
तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र समान ही होते हैं ॥५॥
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

तीसरा अध्याय
१—आत्वा वहंतु हरय......( ऋ० १।१६।१ )
इस सूक्त को मैत्रावरुण प्रातः सवन में पढ़ता है । जब सोम
के प्यालों को उठाते हैं । इस सूक्त के मंत्रों में वृषन्, पीत,
सुत, मद, शब्द आते हैं । इसलिये इनमें रूपसमृद्धता है । यह
इन्द्र के मंत्र हैं । यज्ञ इन्द्र का है । गायत्री पढ़ता है । प्रातः
सवन गायत्री का है । प्रातः सवन में नौ मंत्र ( "न्यून" दस से
एक कम ) पढ़े जाते हैं । वीर्य भी 'न्यून' अर्थात् तंग अवकाश
में सींचा जाता है । मध्य दिन में दस मंत्र पढ़ता है । क्योंकि
जो वीर्य 'न्यून' स्थान में सींचा गया था वह स्त्री के मध्य भाग
में पहुँच कर बड़ा हो जाता है । तीसरे सवन में नौ ( "न्यून",
दस से एक कम ) मंत्र पढ़ता है । क्योंकि 'न्यून' अर्थात् तंग
जगह से ही बच्चे पैदा होते हैं । जब पूरे २ सूक्त पढ़े जायँ
तो यजमान को यज्ञ की योनि से गर्भ रूप में उत्पन्न करता है ।
कुछ लोग सात सात मंत्र पढ़ते हैं । सात प्रातःसवन में,
सात मध्यसवन में और सात तीसरे सवन में । जितने पुरोनु-
( ३६८ )

तीसरा अध्याय ] ३६९
वाक्य हों उतने ही याज्य हों। सात होता सामने मुख करके
याज्य पढ़ते और वषट् करते हैं। वे कहते हैं कि वे सात मंत्र
इन सात याज्यों के पुरोनुवाक्य हैं। लेकिन होता ऐसा न करे,
क्योंकि इससे यजमान का वीर्य लुप्त हो जाता है और यजमान
भी। यजमान सूक्त है।
मैत्रावरुण नौ मंत्रों से यजमान को इस लोक से अन्तरिक्ष
को ले जाता है और दसवें मंत्र से अन्तरिक्ष से भी ऊपर।
क्योंकि अन्तरिक्ष लोक ज्येष्ठ है। उस लोक से नौ मंत्रों द्वारा
स्वर्गलोक को ले जाता है। जो सात ही मंत्र पढ़ते हैं वे यजमान
को स्वर्ग लोक में ले जाना नहीं चाहते। इसलिये पूरे पूरे सूक्त
पढ़ने चाहियें। (१)
१०—इस पर प्रश्न करते हैं। जब यज्ञ इन्द्र का ही है तो
केवल होता और ब्राह्मणाच्छंसी ही प्रातःसवन में प्रस्थित सोम
के लिये ऐसे याज्य क्यों पढ़ते हैं जिनमें प्रत्यक्ष रूप से इन्द्र का
वर्णन हो। होता का याज्य है :—
इदं ते सौम्यं मधु (ऋ० ८।६५।८ )
और ब्राह्मणाच्छंसी का :—
इन्द्र त्वा वृषभं वयम् (ऋ० ३।४०।१ )
जो इतर ऋत्विज् नाना देवतों के लिये पढ़ते हैं वह इन्द्र के
मंत्र कैसे हो जाते हैं ? (प्रश्न का आशय यह है कि 'इन्द्र'
अन्य याज्यों में क्यों नहीं ? केवल दो याज्यों में ही क्यों है ?
इसका उत्तर देते हैं ) ।
मैत्रावरुण का याज्य है :—
मित्रं वयं हवामहे (ऋ० १।२३।४ )
परन्तु इसी में एक पद है "वरुणं सोम पीतये"। जहाँ
किसी पद में 'पीत' शब्द आता है वहाँ इन्द्र की ओर संकेत
होता है क्योंकि इस पद से इन्द्र को प्रसन्न करते हैं।
२४

३७० [ छठी पञ्चिका
पोता का याज्य मंत्र यह है :—
मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६।१ )
इसमें एक पद है “स सुगोपातमो जन” यह इन्द्र की ओर
संकेत है क्योंकि इन्द्र गोपातम अर्थात् सबसे अच्छा रक्षक है।
इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है।
नेष्टा का याज्य यह है :—
अग्ने पत्नीरिहा वह......( ऋ० १।२२।६ )
इस मंत्र में 'त्वष्टारं सोमपीतये' आया है। यहाँ इन्द्र का
वर्णन है। क्योंकि इन्द्र 'त्वष्टा' है। यह इन्द्र का रूप है। इस
प्रकार वह उसको प्रसन्न करता है।
अग्नीध्र का याज्य मंत्र यह है :—
उक्षानाय वशानाय ( ऋ० ८।४३।११ )
इसमें 'सोमपृष्ठाय वेधसे' आया है। 'वेधस्' इन्द्र है। यह
इन्द्र का रूप है। इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है।
अच्छावाक_के मत्र में तो अन्त में इन्द्राग्नी साक्षात् ही है
इस लिये यह मंत्र स्वयंसमृद्ध है अर्थात् :—
प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जेन्यावसू। इन्द्राग्नी सोमपीतये ॥
( ऋ० ८।३८।७ )
इस प्रकार यह सब मंत्र इन्द्र के हो जाते हैं। जिनमें नाना
देवतों का वर्णन है उनसे अन्य देवताओं को ही प्रसन्न नहीं
करता। यह मंत्र गायत्री छन्द में हैं। यह अग्नि के हैं। इस
प्रकार तीनों की प्राप्ति होती है अर्थात् इन्द्र, अन्य देवते और
अग्नि। (२)
११—मध्य सवन में सोम के उठाने पर होता यह सूक्त
पढ़ता है :—
असावि देवं गो ऋजीकमंध......(ऋ० ७।२१।१)

तीसरा अध्याय ] ३७१
इन मंत्रों में वृषन्, पीत, सुत, मद् आते हैं। इस लिये
इनमें रूप-समृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं। (यज्ञ इन्द्र का है।
छन्द त्रिष्टुभ् है। त्रिष्टुभ् मध्यसवन का छन्द है।
इस पर प्रश्न करते हैं कि 'मद्' तो तीसरे सवन का रूप
हैं'फिर मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में ऐसे मन्त्र
क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि मध्य सवन में देवते
मद युक्त हो जाते हैं और सायंकाल तक और अधिक मद हो
जाता है। इस लिये मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में
ऐसे मंत्र बोले जाते हैं।
सब लोग मध्य सवन में प्रस्थित सोम के लिये प्रत्यक्ष रूप
से ऐसे याज्य मंत्र बोलते हैं जो इन्द्र के हों। कुछ लोग ( होता,
मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) ऐसे मंत्र बोलते हैं जिनमें
'अभितृण्' शब्द भी होते हैं। होता का याज्य मंत्र है :-
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द......( ऋ० ६।१७।१ )
मैत्रावरुण का :-
स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो......( ऋ० ६।१७।२ )
और ब्राह्मणाच्छंसी का...
एवा पाहि प्रत्नथा मंदतु त्वा......( ऋ० ६।१७।३ )
पोता का याज्य यह है :-
अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहूः ( ऋ० १।१०४।६ )
नेष्टा का याज्य यह है :-
तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् । ( ऋ० ३।३५।६ )
अच्छावाक् का याज्य यह है :-
इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना......( ऋ० ३।३६।२ )
अग्नीध्र का है :-
आपूणो अस्य कलशः स्वाहा......( ऋ० ३।३२।१५ )

३७२ [छठी पञ्चिका
इनमें 'अभितृण्ण' वाले मंत्र हैं। इन्द्र ने पहले प्रातःसवन में
विजय पाई थी। परन्तु इन मंत्रों द्वारा मध्यसवन में भेदन
किया (अभितृण्यात्) इस लिये 'अभितृण्ण' वाले मंत्र बोले जाते
हैं। (३)
१२-तृतीय सवन में सोम के उठाने पर होता यह मंत्र
बोलता है:--
इहोप यात शवसो नपातः (ऋ० ४।३५।१)
इनमें वृषन्, पीत, सुत, मद् शब्द आये हैं। इस लिये इनमें
रूपसमृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं और ऋभुओं के हैं।
इस पर प्रश्न है कि जब ऋभुओं की स्तुति नहीं की जाती
तो यह तीसरे सवन के पवमान मंत्र ऋभुओं के क्यों कहलाते
हैं ? (इसका उत्तर यह है) कि पिता प्रजापति ने मर्त्य ऋभुओं
को अमर्त्य करके तीसरे सवन में भाग दिया। इसलिये ऋभुओं
के मन्त्र तो नहीं बोलते किन्तु पवमान स्तोत्रों को आर्भव
कहते हैं।
एक ऋषि का प्रश्न है कि तीसरे सवन में त्रिष्टुप् छन्द
क्यों लाते हैं ? प्रातः सवन का छन्द गायत्री है। मध्य सवन
का त्रिष्टुभ और तीसरे सवन का जगती। इसका उत्तर यह
देना चाहिये कि तीसरे सवन में सोमरस समाप्त हो जाता है
(धीतरसं)। अगर तीसरे सवन में ऐसा छन्द बोला जाय
जिसका रस अभी समाप्त नहीं हुआ (अधीतरस) जैसे त्रिष्टुम््
तो ऐसा करने से तृतीय सवन रस वाला हो जाता है।
इस सवन में इन्द्र को भी भाग मिलता है।
इस पर प्रश्न यह होता है कि जब तीसरा सवन इन्द्र और
ऋभुओं का है, और उपस्थित सोम के लिये होता इन्द्र और
ऋभुओं का ही याज्य मन्त्र बोलता है तो फिर इतर ऋत्विज
नाना देवतों के याज्य क्यों बोलते हैं ?

ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—

तीसरा अध्याय ] ३७३
होता के याज्य में :—
ऋतुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितम् ।
ऋभुओं का स्पष्ट लेख है। लेकिन दूसरों में स्पष्ट लेख
नहीं।
मैत्रावरुण का याज्य यह है :—
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतम् । ( ऋ० ६।६८।१० )
इसमें एक पद है :—युवोरथो अध्वरं देववीतये । इसमें
बहुवचन है । यह ऋभुओं का रूप है ।
ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते...( ऋ० ४।५०।१० )
इसमें 'विशंत्विंदवः स्वाभुवः' पद आया है । यह बहुवचन
है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
पोता का याज्य मंत्र है :—
आ वो वहंतु सप्तयो रघुष्यदो...( ऋ० १।८५।६ )
इसमें "रघु पत्वानः प्रजिगात बाहुभिः' आया है । यह बहु-
वचन है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
नेष्टा का याज्य मंत्र यह है :—
अमेव नः सुहवा आ हि गंतन...( ऋ० २।३६।३ )
इसमें 'गंतन' बहुवचन है । यह बहुवचन ऋभुओं का रूप
है ।
अच्छावाक् का याज्य यह है :—
इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वोऽस्य...( ऋ० ६।६९।७ )
इसमें "आवामंधांसि मदिराय्यग्मन्"...बहुवचन है । बहु-
वचन ऋभुओं का रूप है ।
अग्नीध्र का याज्य यह है :—
इमं स्तोममहं ते जातवेदसे ( ऋ० १।९४।१ )