ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
१८२ [ तीसरी पञ्चिका
वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयोनाधमानाः । अप
ध्वान्तमूर्णु हि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् ॥
( ऋ० १०।७३।११ )
प्रिय विचार वाले ऋषि लोग सुन्दर परों वाले पक्षियों के
समान इन्द्र के पास गये । और प्रार्थना की कि जो अन्धकार में
छिपा है उसे खोल दे । आँख को ( प्रकाश से ) भर दे । और
रस्सी से बँधे हुये जैसे हमको मुक्त कर दे ।”
जब कहे "अप ध्वान्तमूर्णु हि" ( अँधेरे से हटा ) उस समय
मन में विचार करे कि अँधेरे से हट रहा हूँ । इस प्रकार वह
अँधेरे से हट जायगा । जब कहे “पूर्धि चक्षुः” (आँख को प्रकाश
से भर दे ) तो दोनों आँखें मले । जो इस रहस्य को समझता
है उसकी आँखें बुढापे तक ठीक रहती हैं । "मुमुग्ध्यस्मान्
निधयेव बद्धान्” में निधि का अर्थ है पाश या रस्सी । रस्सी से
बँधे हुओं के समान । (८)
२०—इन्द्र जब वृत्र को मारने लगा तो उसने सब देवताओं
से कहा, "मेरे पास रहो । मेरी मदद करो ।” उन्होंने ऐसा ही
किया । वे उसे मारने को दौड़े । उसने समझा कि यह मुझे
मारने आते हैं । उसने सोचा, "मैं इनको डरा दूँ ।” उसने उनकी
ओर फुसकार मार दी । वह फुसकार से डर कर भाग गये ।
मरुतों ने उस ( इन्द्र ) को न छोड़ा । उन्होंने उससे कहा,
“भगवन् मारो ! मारो !! अपने वीर्य का परिचय दो ।” एक
ऋषि ने इसको देखा और इस मंत्र को पढ़ा :—
"वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः ।
मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि ।”
( ऋ० ८।६६।७ )
“वृत्र के फुसकार मारने पर सब देवते जो तेरे साथ थे और
दूसरा अध्याय ] १८३
तेरे मित्र थे भाग गये । हे इन्द्र, अगर तुझे मरुतों की दोस्ती
मिल जाय तो तू इन सब युद्धों में जीत जाये ।”
इन्द्र ने सोचा, “सचमुच मरुत् मेरे सचिव हैं। ये मुझे प्यार
करते हैं। मैं इनको अपने उक्थ में साझी बना लूं ।” उसने
उनको इस उक्थ में साझी बनाया । पहले निष्केवल्य उक्थ में
इन्द्र और मरुत दोनों साझी थे। अब मरुतों के लिये मरुत्वतीय
शस्त्र अलग बना दिया गया । मरुतों का भाग यह है कि अध्वर्यु
मरुत्वतीय ग्रह को ले, होता मरुत्वतीय प्रगाथ, मरुत्वतीय सूक्त
और मरुत्वतीय निविद् को पढ़े । मरुत्वतीय शस्त्र को पढ़ कर
मरुत्वती याज्य को पढ़े। इस प्रकार इन मरुतों की भक्ति करता
है। और देवतों को उनके भागों के अनुकूल प्रसन्न करता है।
मरुत्वतीय याज्य यह है :—
“ये त्वा हि हत्ये मघवन्नवर्धन् ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ ।
ये त्वा नूतमनुमदन्ति विप्राः पिवेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः”
( ऋ० ३।४७।४ )
“हे मघवन्, जिन मरुतों ने तुझे अहि ( वृत्र ) के मारने में
सहायता दी; हे हरि अर्थात् घोड़ों वाले इन्द्र, जिन मरुतों ने
तुझे शम्बर के युद्ध में सहायता दी, और जो विप्र तुझे अब
प्रसन्न करते हैं उन मरुतों के साथ गणयुक्त होकर तू सोम पी ।”
जिस जिस युद्ध में इन्द्र ने विजय पाई और अपने वीर्य का
परिचय दिया वहीं वहीं उसने मरुतों को अपना साथी बताया
और उनके साथ सोमपान किया । (९)
२१—जब इन्द्र ने वृत्र को मार डाला और सब युद्धों को
जीत लिया तो वह प्रजापति के पास गया और बोला, “मैं तुझ
जैसा होना चाहता हूँ। मैं बड़ा होना चाहता हूँ ।” प्रजापति ने
कहा, “कः अहम्, मैं कौन हूँ ?” इन्द्र ने कहा, “वही है जो तूने
कहा ( प्रजापति ने कहा “कः”, इन्द्र ने कहा तू “कः” है) ।
१८४ [ तीसरी पञ्चिका
तभी से प्रजापति का ‘कः’ नाम हो गया। प्रजापति “कः” है।
इन्द्र का नाम महेन्द्र है क्योंकि वह बड़ा हो गया।
इन्द्र ने महान् होकर देवतों से कहा, “मेरा स्वागत करो,
ऐसा जैसा वह लोग चाहते हैं, जो वैभवशील हैं या जो महान्
हो जाते हैं”। उन्होंने कहा, “तुम्हीं बताओ कि किस प्रकार
किया जाय अर्थात् तुम क्या चाहते हो?” उसने कहा, सोम
का माहेन्द्र ग्रह दो, सबनों में दोपहर का सबन दो। उक्थों में
निष्केवल्य दो, छन्दों में त्रिष्टुभू दो। सामों में पृष्ठ दो”।
( सामवेद के दो तृच् मिलकर पृष्ठ होते हैं)। उन्होंने यह सब
दे दिये। जो इस रहस्य को समझता है उसको भी देवते यही
देते हैं। देवों ने उससे कहा, “तुमने सब कुछ ले लिया। कुछ
हमको भी दो”। उसने कहा, “नहीं, तुमको क्यों दें?” देवों ने
कहा, “हे मघवन् हमको भी दो”। उसने उनकी ओर आँख
मार दी (देखा)। (१०)
२२—देव बोले, “इंद्र की प्रासहा नाम की वावाता स्त्री
बहुत प्यारी है, उसी से पूछें।” (राजा की बड़ी स्त्री महिषी
कहलाती है। उससे निचली वावाता। उससे निचली परिवृक्ति)।
उन्होंने उससे पूछा। उसने कहा, “कल सबेरे बताऊँगी”।
क्योंकि स्त्रियां जो पतियों से पूछना होता है रात को पूछती
हैं। प्रातःकाल को देव उसके पास गये। उसने इनसे नीचे का
मंत्र पढ़ा :—
यद्वांवान पुरुतमं पुराषालावृत्रहेन्द्रो नामान्यप्राः । अचेति प्रास-
हस्पतिस्तुविष्मान्यदीमुशमसि कर्तवे करत्तत् ॥ (ऋ० १०।७४।६)
“अपने यश से संसार को भरने वाले, युद्धों में जीतने वाले,
वृत्र को मारने वाले इन्द्र ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसके
द्वारा वह प्रासह का पति और बलवान हुआ उसीसे हम इच्छा
दूसरा अध्याय ] १८५
करते हैं। वह हमारी याचना को पूरी करे" । ( 'प्रासहस्पति'
का अर्थ है 'प्रासहा' का पति और शक्ति का पति ) ।
"यदीमुशमसि कर्तवे करत् तत्" का अर्थ है कि जो कुछ हम
कहेंगे वह करेगा।
ऐसा उसने कहा। देवों ने कहा, "इसमें उस रानी को भी
भाग दो जिसे अब तक कोई भाग नहीं मिला"। उन्होंने ऐसा
ही किया और एक भाग दिया। इस लिये ऊपर की ऋचा
निष्केवल्य शस्त्र का भाग है।
प्रासहा नाम की इन्द्र की वावाता प्यारी रानी सेना है।
'कः' नाम प्रजापति उस (स्त्री) का ससुर है। इसलिये यदि कोई
चाहे कि उसकी सेना विजयी हो जाय तो युद्ध की सीमा के
पार जाकर एक कुश ले और दोनों सिरे तोड़ कर शत्रु की ओर
फेंक दे और यह कहे "प्रासहे कस्त्वा पश्यति" ( हे प्रासहा,
तुझे कौन देखता है या तुझे प्रजापति देखता है। जो इस रहस्य
को समझता है वह यदि अपनी सेना को जिताना चाहे तो एक
तृण लेकर दोनों सिरे तोड़कर शत्रु पर फेंक दे और कहे "प्रासहे
कस्त्वा पश्यति"। तो वह सेना छिन्न भिन्न हो जायगी जैसे
ससुर के सामने आते ही पुत्र-वधू शरमा जाती है।
इन्द्र ने उन देवों से कहा, "इस शस्त्र में आपको भी भाग
मिलेगा'। देवों ने कहा "निष्केवल्यशस्त्र में विराट् छंद में आज्य
शस्त्र हमारा भाग हो"। विराट् में तैंतीस अक्षर होते हैं। देव
भी तैंतीस होते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा-
पति और वषट्कार। देवता अक्षर अक्षर बाँट लेते हैं और
अक्षर अक्षर करके देवपात्र से पीते और संतुष्ट होते हैं।
यदि कोई होता चाहे कि यजमान को घर से वंचित कर दे
तो विराट् छंद में आज्य न पढ़े, किसी और छंद अर्थात् गायत्री
१८६ [ तीसरी पञ्चिका
या त्रिष्टुभ् में पढ़े। और यजमान घर आदि से वंचित रह
जायगा।
यदि होता यजमान को घर से मुक्त करना चाहे तो विराट्
छन्द के नीचे के मंत्र से याज्य पढ़े और उसे अवश्य घर की
प्राप्ति हो जायगी :—
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्य्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां
सुयतो नार्वा ॥ (११) ( ऋ० ७।२२।१ )
२३—पहले ऋक् और साम अलग अलग थे। 'सा' ऋक्
था “अमः” साम था। 'सा' जो ऋक् थी उसने 'अमः' नाम के
साम से कहा “हम दोनों एक दूसरे के साथ प्रसंग करें कि
सन्तान हो जाय।” साम ने कहा, “नहीं, मेरी महिमा बड़ी है।”
तब ऋक् दो हो गईं और उन्होंने साम से वही बात कही।
उसने नहीं माना। तब ऋक् तीन हो गईं। तीनों वही बोलीं।
इस प्रकार साम तीनों ऋचाओं से मिल गया। इसलिये तीन
ऋचाओं को पढ़ते हैं, और तीन ऋचाओं से आरंभ करते हैं।
इसीलिये एक आदमी के कई स्त्रियां होती हैं और एक स्त्री के
कई पति नहीं होते। 'सा' और 'अमः' से मिलकर साम बन
गया। जो इस रहस्य को समझता है वह सामन या न्यायवाला
हो जाता है। जो बड़े पद को प्राप्त होता है उसे साम कहते हैं
और जो न्याय-शून्य होता है उसे असामन्य कहते हैं। यह निंदा
वाचक है।
वे दोनों अर्थात् साम और ऋक् पाँच पाँच भाग करके
बनाये गये। (१) आहव और हिंकार, (२) प्रस्ताव और पहली
ऋचा, (३) उद्गीथ और दूसरी ऋचा, (४) प्रतिहार और
तीसरी ऋचा (५) निधन और वषट्कार। यह हुये पांच भाग।
इसीलिये कहते हैं कि यज्ञ पांच भाग वाला है। पशु पांच भाग
वाले हैं (४ पैर और एक मुँह)।
दूसरा अध्याय ] १८७
ऋक् और साम दोनों में पांच पांच भाग हैं। यह विराट्
के अन्तर्गत हैं) क्योंकि विराट् के दश भाग होते हैं। इसलिये
कहते हैं कि यज्ञ दस भाग वाले विराट् में स्थापित है। स्तोत्रिय
आत्मा है। अनुरूप प्रजा है, धय्या पत्नी है। पशु प्रगाथ हैं।
और सूक्त घर हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इस लोक
और परलोक दोनों में प्रजा और पशुओं के साथ अपने घरों में
रहता है। (१२)
२४—वह स्तोत्रिय को कहता है। स्तोत्रिय आत्मा है। वह
मध्यम आवाज से कहता है। इससे वह अपने लिये आत्मा को
बना लेता है।
वह अनुरूप को कहता है। अनुरूप प्रजा है। उसको उच्च
स्वर से पढ़ना चाहिये। उससे वह अपनी सन्तान को अपनी
अपेक्षा अधिक सुखी बनाता है।
वह धाय्या को पढ़ता है। धाय्या स्त्री है। धाय्या को बहुत
नीचे स्वर से पढ़ना चाहिये। जो उस रहस्य को समझकर धाय्या
को बहुत नीचे स्वर से पढ़ता है उसकी स्त्री घर में उससे अप्रिय
नहीं बोलती।
वह प्रगाथ को बोलता है। इसको स्वर सहित पढ़ना
चाहिये। पशु ही स्वर हैं। पशु ही प्रगाथ हैं। वह पशुओं की
प्राप्ति के लिये है।
अब वह इस सूक्त को पढ़ता है :—
इन्द्रस्य नु वीर्याणि—इत्यादि (ऋ० १।३२।१-१५)
यह निष्केवल्य शस्त्र का सूक्त इन्द्र को प्रिय है। इसका
ऋषि हिरण्यस्तूप है। इस सूक्त से आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ने
इन्द्र को प्रसन्न किया और परम धाम को पाया जो इस रहस्य
को समझता है वह इन्द्र को प्रसन्न करता और परमधाम को
प्राप्त होता है।
१८८ [ तीसरी पञ्चिका
गृह ही प्रतिष्ठा हैं। यह सूक्त प्रतिष्ठा है इसलिये बड़ी प्रतिष्ठा-
युक्त वाणी से सूक्त को पढ़ना चाहिये। यदि किसी के पशु दूर-
दूर चर रहे हों तो वह उनको घर लाना चाहता है। घर ही
पशुओं की प्रतिष्ठा अर्थात् ठहराने की जगह है। (१३)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ
तीसरा अध्याय
२५—सोम राजा दूसरे लोक में था। देवों और ऋषियों
दोनों ने सोचा कि सोम राजा कैसे हम तक आवे। उन्होंने कहा,
"छन्दो, तुम सोम राजा को हम तक लाओ।" वह मान गये
और सुपर्ण ( पक्षी ) बन कर उड़े। चूंकि वह सुपर्ण बन कर
उड़े इसलिये इस घटना को आख्यान के जानने वाले सौपर्ण-
आख्यान कहते हैं। जो छन्द सोम राजा को लेने उड़े थे वह चार
अक्षर के थे। क्योंकि तब चार अक्षर के ही छन्द थे। जगती
अपने चार अक्षरों से सबसे पहले उठी। वह आधी दूर उड़कर
ही थक गई, उसके तीन अक्षर जाते रहे। वह एक अक्षर की
रह गई तब उसने ( स्वर्ग से ) दीक्षा और तप लिये और इस
लोक को लौट आई। जिसके पशु होते हैं वह दीक्षा और तप
वाला होता है। पशु जगती के हैं। जगती उनको अपने साथ
लाई थी।
अब त्रिष्टुभ् उड़ा। वह आधी से अधिक दूर जाकर थक
गया और उसका एक अक्षर जाता रहा। उसके तीन अक्षर रह
गये। और ( स्वर्ग से ) दक्षिणा को लेकर लौट आया। इसलिये
( १८९ )
१९० [ तीसरी पञ्चिका
दक्षिणा दोपहर के सवन में होती हैं जो त्रिष्टुभ् का सदन है।
क्योंकि त्रिष्टुभ् ही तो उसे लाई थी। (१)
२५—तब देवों ने कहा, "गायत्री, तू इस सोम राजा को
ला।" उसने कहा, "अच्छा, लेकिन तुम सब मेरे जाने और
लौट आने के लिये स्वस्ति बोलते रहना।" उन्होंने कहा,
"अच्छा"। वह उड़ी और ये सब "प्र च च" स्वस्ति कहते रहे।
इसलिये यदि कोई अपना प्यारा यात्रा करने जाये तो उसके
आराम से जाने और आराम से लौटने के लिये 'प्र च च' ऐसा
स्वस्ति वचन बोलना चाहिये। तो वह आराम से जायगा और
आराम से लौट आवेगा।
गायत्री ने ऊपर जाकर सोम के संरक्षकों को डरा दिया
और सोम को अपने पैरों और चोंच से पकड़ लिया। और उन
अक्षरों को भी जो दो पहले छन्द छोड़ आये थे। सोम के
पालक कृशानु ने एक तीर छोड़ा और उस के बाँयें पैर का
नाखून गिर गया। वह नाखून शल्यक् (सेही) हो गया।
नाखून से जो वशा या चर्बी गिरी वह वशा (बकरी) हो
गई। इसलिये वशा हवि के तुल्य है।
तीर की जो नौक थी वह न काटने वाला सर्प (निर्दंशी)
हो गयी। और जिस बल से तीर छोड़ा गया उससे स्वज नामी
सर्प हुआ। जो पंख थे उनसे (अश्वत्थ की) हिलनेवाली
शाखायें। स्नायु अर्थात् नसों से गंडूपद (केंचुए) कीड़े। तीर
के तेज से अंधाहि (अंधा सांप) उत्पन्न हुआ (कृशानु के)
तीर का यह हाल हुआ। (२)
३६—गायत्री ने जिस भाग को सीधे पैर से पकड़ा वह
प्रातः सवन हुआ। गायत्री ने उसको अपना स्थान बना लिया।
तभी से प्रातः सवन सब से अच्छा समझा जाता है। और
तीसरा अध्याय ] १९१
सब सवनों में यह पहला और मुख्य होता है। जो इस रहस्य
को समझता है उसे श्रेष्ठता मिलती है।
जो बायें पैर से पकड़ा था वह दोपहर का सवन् हुआ।
यह फिसल पड़ा और फिसलने के कारण यह प्रातःसवन के
°पद को न पा सका। देवों को मालूम हो गया। उन्होंने चाहा
कि यह व्यर्थ न जाये। इसलिये उन्होंने छन्दों में से त्रिष्टुभ्
को इस में रख दिया। और देवों में से इन्द्र को। इसलिये उसमें
भी उतना ही बल आ गया जितना पहले सवन में था। जो इस
रहस्य को समझता है वह दोनों सवनों से सुख लाभ करता है
क्योंकि वह समान वीर्य वाले और गुण वाले हैं।
जिसको गायत्री मुख में लाई थी वह तीसरा सवन हुआ।
नीचे को उड़ते हुये मार्ग में गायत्री ने इस भाग का रस चूस
लिया। इसलिये यह पहले दोनों सवनों की अपेक्षा नीरस हो
गया। देवों को ज्ञात हो गया और उन्होंने चाहा कि वह नष्ट
न हो। तब उन्होंने ढूँढा, तब उसको पशुओं में पाया। इसलिये
ऋत्विज् लोग शाम के सवन में दूध की आहुति देते हैं, और
पशु का याज्य देते हैं। इससे वह सवन पहले सवनों के बराबर
हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब सवनों
द्वारा सुखी होता है जो तुल्य गुण वाले और तुल्य शक्ति
वाले है। (३)
२८—दोनों छन्दों ने गायत्री से कहा, “तू जो हमारे अक्षर
ले आई है उनको दे दे।” गायत्री बोली, “नहीं।” उन्होंने कहा,
“वे हमारी सम्पत्ति हैं।” उन्होंने देवों से पूछा। देवों ने कहा,
“हां, वे तुम्हारी सम्पत्ति हैं।” इसी के अनुकरण में लोग कहते
हैं, “यह चीज़ हमारी सम्पत्ति है।”
इस प्रकार गायत्री के आठ अक्षर हो गये। त्रिष्टुभ् के तीन
और जगती के एक !
१९२ [ तीसरी पञ्चिका
आठ अक्षर की गायत्री ने पहले सवन को देवों तक
उठाया। तीन अक्षर का त्रिष्टुभ् दोपहर के सवन को न उठा
सका। गायत्री ने उससे कहा, "मैं ऊपर जाती हूँ। तू मेरा भी
भाग दे।" त्रिष्टुभ् ने कहा, "अच्छा। तू उन पर अपने आठ
अक्षर रख दे।" गायत्री राजी हो गई और अपने आठ अक्षर
रख दिये। यही कारण है कि दोपहर के सवन में मरुत्वतीय
शस्त्र के तृच की अन्तिम दो ऋचायें और इसके पीछे की ऋचा
गायत्री की होती हैं। ग्यारह अक्षर पाकर त्रिष्टुभ् ने दोपहर
के सवन को ऊपर उठा लिया। एक अक्षर की जगती तीसरे
सवन को देवों तक न ले जा सकी। गायत्री ने कहा, "मैं ऊपर
जाती हूँ। तू मुझे भाग दे।" जगती ने कहा, "अच्छा, मेरे ऊपर
वे ग्यारह अक्षर रख दे।" गायत्री ने कहा, "अच्छा।" और
वे ग्यारह अक्षर जगती पर रख दिये। इसीलिये तीसरे सवन में
वैश्वदेव शस्त्र के तृच् की पिछली दो ऋचायें और उनकी
अगली ऋचा गायत्री की हैं। १२ अक्षर पाकर जगती ने तीसरे
सवन को देवों तक उठाया। इस प्रकार गायत्री के आठ,
त्रिष्टुभ के ग्यारह और जगती के बारह अक्षर हुये।
जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों द्वारा सुखी
होता है। क्योंकि उनकी बराबर शक्ति और बराबर गुण हैं।
जो एक था वह तीन हो गया। इसीलिये कहते हैं कि जो इस
रहस्य को समझता है कि एक के तीन कैसे हो गये उसी को
भेंट मिलनी चाहिये। (४)
२९—देवों ने आदित्यों से कहा, "तुम्हारे द्वारा इस
(तीसरे) सवन को उठावें।" उन्होंने स्वीकार कर लिया।
इसलिये तीसरे सवन के आरंभ में आदित्य ग्रह होता है। इसका
याज्य मंत्र यह है:—
तीसरा अध्याय ] १९३
आदित्यासो अदितिर्मादयन्तां मित्रो अर्यमा वरुणो रजिष्ठाः ।
अस्माकं सन्तु भुवनस्य गोपाः पिबन्तु सोममवसे नो अद्य ॥
( ऋ० ७।५१।२ )
इसमें 'मद्' शब्द है, इससे मंत्र की समृद्धता है । तृतीय
सवन का रूप ही मद्वाला होता है । न अनुवषट्कार किया
जाता है, न सोम का पान होता है । क्योंकि अनुवषट्कार
समाप्ति का सूचक है और सोमपान भी । प्राण आदित्य हैं ।
इससे वह यजमान के प्राणों का अन्त नहीं करना चाहता ।
आदित्यों ने सविता से कहा कि तेरी सहायता से हम इस
तीसरे सवन को ऊपर उठावें । वह राजी हो गया । इसलिये
तीसरे सवन के वैश्वदेव शस्त्र का प्रतिपद् सविता का तृच है ।
सवितृ ग्रह वैश्वदेवशस्त्र का है । इसका याज्य मंत्र है :—
ॐ दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद् रत्ना दक्षं पितृभ्य आयुनि ।
पिबात्सोमं ममदन्नेन मिष्ट्यः परिज्माचिद् रमते अस्य धर्मणि ॥
( आश्व० श्रौत सूत्र ५।१८ )
'मद्' शब्द से इस मंत्र की रूपसमृद्धता है । तीसरे सवन
की विशेषता मद्वाला होना है । न अनुवषट्कार कहता है
न सोमपान करता है । क्योंकि अनुवषट्कार समाप्ति का सूचक
है और सोमपान भी । प्राण सविता है । उसे ऐसा नहीं करना
चाहिये कि कहीं यजमान के जीवन को समाप्त कर दे ।
सविता अधिकतर प्रातः और सायं सवन से पीता है । तृतीय
सवन में सावित्री निविद् में 'पिब' शब्द आया है । और अन्त
ॐ अथर्ववेद में पाठ भेद है :—
दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद् रत्नं दक्षं पितृभ्य आयूंषि ।
पिबात् सोमं ममददेनमिष्टये परिज्माचिद् क्रमते अस्य धर्मणि ॥
( अथर्व० ७।१४।४ )
१३
१९४ [ तीसरी पञ्चिका
में 'मद्'। इस प्रकार वह प्रातः और सायं दोनों सवनों में
सविता का भाग देता है।
प्रातः और सायं सवन में वायु के मंत्र बोले जाते हैं। प्रातः
सवन में कई। और सायं सवन में केवल एक। क्योंकि शरीर के
ऊपरी भाग में प्राण बहुत हैं और नीचे के भाग में कम।
द्यावापृथिवी का मंत्र पढ़ता है। द्यावापृथिवी ही प्रतिष्ठा
हैं। यहाँ पृथिवी प्रतिष्ठा है, वहाँ द्यौ। इस प्रकार द्यावापृथिवी
के मंत्र बोल कर वह यजमान की द्यौ और पृथिवी दोनों में
प्रतिष्ठा कर देता है। (५)
३०-वह ऋभु-सूक्त (ऋ० १-१११) को पढ़ता है।
तक्षन् रथं सुवृतं—इत्यादि।
देवों में ऋभुओं ने तप करके सोमपान का अधिकार पा
लिया। उनके लिये देवों ने प्रातः सवन में स्थान देना चाहा।
लेकिन अग्नि ने वसुओं की सहायता से उनको वहाँ से निकाल
दिया। अब देवों ने दोपहर के सवन में उनको स्थान देना
चाहा। तब इन्द्र ने रुद्रों से मिल कर उनको वहाँ से निकाल
दिया। अब उन्होंने उनको सायंकाल के सवन में स्थान देना
चाहा। विश्वेदेवों ने कोशिश की कि उनको वहाँ से निकाल दें
और कहा, "यह यहाँ सोमपान नहीं कर सकते, नहीं कर
सकते।" प्रजापति ने सविता से कहा, "यह तेरे शिष्य हैं, तू
इनके साथ पीले।" वह मान गया और बोला, "तू भी ऋभुओं
के दोनों ओर खड़ा हो कर पी।" प्रजापति ने उनके दोनों
ओर खड़े होकर पान किया। इसीलिये ऋभु सूक्त के बाद दो
धाय्य जो अनिरुक्त हैं (अर्थात् जिनमें विशेष देवों का उल्लेख
नहीं है) और जो प्रजापति की हैं, एक के बाद दूसरी पढ़ी
जाती हैं:—
तीसरा अध्याय ] १९५
(१) सुरूप कृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यवि द्यवि ॥
( ऋ० १।४।१ )
(२) अयँ वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने ।
इममपां सङ्गमे सूर्य्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥
( ऋ० १०।१२३।१ )
इस प्रकार प्रजापति ने दोनों ओर खड़े होकर पिया ।
इसलिये श्रेष्ठी जिसको चाहता है पिला सकता है ।
देवों ने उन ऋभुओं से घृणा की क्योंकि उनमें मनुष्य की
गंध आती थी । उन्होंने अपने और ऋभुओं के बीच में दो
धाय्य और रख लीं :—
(१) येभ्यो माता मधुमत् पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः ।
उक्थ शुष्मान् वृषभराम् त्सवप्न सस्तॉँ आदित्याँ अनुमदा स्वस्तये ॥
( ऋ० १०।६३।३ )
(२) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः ।
बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ (ऋ० ४।५०।६) (६)
३१—अब वह वैश्वदेव सूक्त को पढ़ता है ( ऋ० ५।८९ )
वैश्वदेव शस्त्र प्रजा का संबन्ध बताने के लिये है । जैसे राज्य
के अन्तर्गत जनता होती है उसी प्रकार शस्त्र के सूक्त हैं ।
धाय्य अरण्य पशुओं के समान हैं । इसलिये हर धाय्य के पहले
और पीछे 'शोंसावोम्' कहना चाहिये । इस पर कुछ लोग
कहते हैं कि धाय्य में जीवन है, वह अरण्य के समान कैसे हुई ?
ऋषि ऐतरेय उत्तर देते हैं कि यह अरण्य भी अनरण्य के
समान है क्योंकि अरण्य में हिरन और पक्षी पाये जाते हैं ।
वैश्वदेव शस्त्र पुरुष के समान है । इसके सूक्त उनके अंग
हैं । जो धाय्य हैं वे पर्व या जोड़ हैं । इसीलिये होता हर धाय्य
के पहले और पीछे 'शोंसावोम्' कहता है । क्योंकि पुरुष के
जोड़ शिथिल होते हैं । ब्रह्म उनको दृढ़ करता है ।
१९६ [ तीसरी पञ्चिका
ये जो धाय्य और याज्य हैं वह यज्ञ की मूल हैं। अगर
अन्य धाय्य और अन्य याज्य पढ़े जायं तो यज्ञ निर्मूल हो
जाय । इसलिये वे समान होनी चाहिये ।
यह जो वैश्वदेव शस्त्र है वह पांचजन्य है । अर्थात् यह
पाँचों का है, देव, मनुष्य, गंधर्व, अप्सरा, सर्पों तथा पितरों
का । वैश्वदेव शस्त्र इन पाँचों में से सब का है । इन पाँचों में
से सभी (वैश्वदेव शस्त्र के होता को ) जानते हैं । जो इस
रहस्य को समझता है उसके पास इन पाँचों में से सभी हवी
लोग (हवन करने में कुशल ) आते हैं ।
जो होता वैश्वदेव शस्त्र को पढ़ता है वह सब देवताओं का
होता है । जब वह शस्त्र को पढ़ने लगे तो उसे सब दिशाओं का
चिन्तन कर लेना चाहिये । इस प्रकार वह सब दिशाओं को रस
युक्त कर देता है । परन्तु जिस दिशा में उसका शत्रु हो उसका
चिन्तन न करें । ऐसा करने से वह उसे निर्बल देता है ।
इस मंत्र से समाप्त करता है :-
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वेदेवा
अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ ( ऋ० १।८६।१० )
“अदिति द्यौ है, अंदिति अन्तरिक्ष है । अदिति माता है,
वह पिता है । वह पुत्र है । यह मां है, बाप है, बेटा है। अदिति
विश्वेदेव है । अदिति पांचजन्य है । इसी में विश्वेदेव है ।
इसी में पंचजन हैं। पैदा हुई वस्तु अदिति है । पैदा होनेवाली
भी अदिति है ।” वह अन्तिम मंत्र को दो बार पढ़ता है, पादों
पर ठहर-ठहर कर । पशुओं की प्राप्ति के लिये । क्योंकि पशु
चार पैर के होते हैं । पहली बार वह आधे मंत्र पर ठहरता है,
प्रतिष्ठा के लिये । मनुष्य के दो पैर होते हैं और पशु के चार ।
दो बार फिर दुहराने से मानों, दुपाये को चौपायों में स्थान
देता है ।
तीसरा अध्याय ] १९७
वैश्वदेव शस्त्र की समाप्ति पर पांचजन्य मंत्र (१।८९।१०
के समान ) बोलना चाहिये और फिर भूमि का स्पर्श करना
चाहिये । इस प्रकार वह जहाँ यज्ञ को रखना चाहता है वहाँ
उसकी स्थापना कर देता है ।
वैश्वदेव-उक्थ को पढ़ने के उपरान्त वैश्वदेव याज्य मंत्र
पढ़ता है ।
विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षं य उप द्यविष्ठ । ये
अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम् ॥
( ऋ० ६।५२।१३)
इस प्रकार वह देवों को उनके भाग के अनुसार प्रसन्न
करता है । (७)
३२—पहला घृत का याज्य मंत्र अग्नि का है । दूसरा सोम
का ( चरु का ) याज्य सोम का । एक घृत का याज्य विष्णु
का है ।
सोम का याज्य यह है :—
त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ । तस्मै त
इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ( ऋ० ८।४८।१३)
इस में पितर शब्द पड़ा है । जब सोम को निचोड़ते हैं तो
इसका अर्थ यह है कि उसका हनन करते हैं । यह चरु ( भात
का पिण्ड ) अनुस्तरणी ( वह गौ जो मृत यजमान को चिता
पर रखने के बाद दी जाती है ) है । यह चरु सोम के लिये वही
अर्थ रखता है जो अनुस्तरणी पितरों के लिये । इसी लिये होता
'पितर' शब्दों वाला याज्य मंत्र पढ़ता है । जिन्होंने सोम
निचोड़ा उन्होंने उसका हनन कर दिया । अब वह उसको पुन-
र्जीवित करते हैं, अब उस सोम को बढ़ाते हैं ( आप्यायन्ति )
उपसदों के रूप में । यह जो अग्नि, सोम और विष्णु देवता हैं
वे उपसद् रूप हैं ।
१९८ [ तीसरी पञ्चिका
होता सोम के चरु को लेकर पहले अपनी ओर देखे, फिर
सामगों की ओर। कुछ होता लोग पहले इस चरु को सामगों
को अर्पण करते हैं। लेकिन ऐसा न करे। क्योंकि जो होता
‘वौषट्’ कहता है वह सब भत्तों का भक्षण करता है। ऐसा
ऐतरेय ऋषि का कथन है। इसलिये “वौषट्” कहने वाले होता
को पहले अपनी ओर देख लेना चाहिये। फिर वह उसे सामगों
को अर्पण कर दे। (८)
३३—प्रजापति ने अपनी दुहिता से भोग करना चाहा।
इसको कुछ 'द्यौ' कहते हैं और कुछ 'उषा' बताते हैं। उसने स्वयं
रिश्य ( एक हिरन ) का रूप रख लिया। और दुहिता रोहित
( हिरनी ) बन गई। वह उसके पास गया। उसको देवों ने देखा
और कहा, “अरे प्रजापति ‘-अकृत” काम करता है।” उन्होंने
पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो इस दोष की निवृत्ति कर दे।
अपने लोगों में उनको इस काम के योग्य कोई न मिला। उनमें
जो घोरतम अंश था उसको उन्होंने इकट्ठा किया। उनके इकट्ठा
करने से एक देव पैदा हुआ जिसका नाम “भूतवान्” हुआ।
जो इसके इस नाम को जानता है वही उत्पन्न होता है। देवों ने
उससे कहा, “प्रजापति ने जो यह न करने योग्य काम किया है
उस काम को बींध दे।” उसने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा,
“मैं एक वर माँगता हूं।” उन्होंने कहा, “माँग।” उसने पशुओं
का आधिपत्य मांगा। इस लिये उसका नाम पशुमान पड़ा।
जो उसके इस नाम को जानता है वह पशु वाला होता है।
उस “भूतवान” ने प्रजापति के दुष्कर्म पर आक्रमण किया
और उसको बींध दिया। वह बिंधा हुआ ऊपर उड़ गया।
उसको मृग ( नक्षत्र ) कहते हैं। और जिसने मारा उसको मृग-
व्याध। वह जो रोहित हिरनी ( प्रजापति की दुहिता ) थी
वह रोहिणी हुई। यह जो बाण था जिसमें तीन फल (त्रि
काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण
तीसरा अध्याय ] १९९
काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण
हो गया। प्रजापति का जो वीर्य बहा वह एक सरोवर बन
गया। देवों ने कहा, "प्रजापति का यह वीर्य्य दूषित न हो
( "मादुषत्" )। देवों ने 'मादुषत्' जो कहा तो "मादुषम्" हो
गया। यह "मादुष" का "मादुषत्व" है । यह जो मादुषम् था
यही मानुषम् हुआ । "मानुष" इसलिये कहते हैं कि वह दोष
के योग्य नहीं है अर्थात् उसमें दोष नहीं आने चाहिये ।
"मादुष" परोक्ष शब्द है। देव लोग परोक्षप्रिय होते हैं। (९)
३४-देवों ने इस वीर्य को अग्नि से घेर दिया । मरुतों ने
उसे हिलाया । परन्तु अग्नि ने उसको चलाया नहीं। उन्होंने
उसको वैश्वानर अग्नि से घेर दिया। मरुतों ने उसे हिलाया,
वैश्वानर अग्नि ने उसे चलाया । प्रजापति के वीर्य से जो
पहली चिनगारी उठी उसका आदित्य बना। जो दूसरी उठी
उसका भृगु बना। वरुण ने भृगु को लड़का मान लिया ।
इसीलिये भृगु को वारुणि कहते हैं । तीसरी जो चिनगारी उठी
उसके आदित्य हो गये । जो अंगारे थे उनका आङ्गिरस हुआ ।
जो अंगारे पहले न शांत होकर फिर उदीप्त हो गये। वे बृह-
स्पति हो गये। जो काली-काली अधजली राख रह गई वह
काले पशु बन गई। जो भूमि का भाग लाल हो गया था उसके
लाल पशु बन गये। जो भस्म रह गई उसका एक ऐसा व्यक्ति
बना जो इधर उधर फिरा और बारहसिंगा, भैंसा, हिरन, ऊँट,
गधा और जंगली जानवर बन गये ।
भूतवान ने इन पशुओं से कहा, "यह मेरा है। यह जो
इस जगह छूटा हुआ है मेरा है।" उन्होंने इस रुद्र सम्बन्धी
ऋचा को पढ़ कर उससे उसका भाग छुड़ा लिया :-
आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्य्यस्य सन्दृशो युयोथाः। अभि
नो वीरो अर्व्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः। (ऋ० २।३३।१)
२०० [ तीसरी पञ्चिका
“हे मरुतों के पिता, ऐसा न हो कि हम सूर्य के दर्शन
न कर सकें। हे वीर रुद्र, ऐसा कर कि हम प्रजाओं से युक्त हो
जायें अर्थात् हमारे सन्तान उत्पन्न हों।”
“अभि नो वीरो अर्वति क्षमेत” के स्थान में “त्वं नो वीरो
अर्वति क्षमेथा” पढ़ना चाहिये। यदि “अभि” न कहेगा तो
यह देवता प्रजा के विरुद्ध (अभि) न होगा। “रुद्र” के स्थान
में 'रुद्रिय' कहना चाहिये जिससे इस नाम का भयानकपन न
रहे। यदि इसको हानिकारक समझे तो केवल नीचे का मन्त्र
पढ़ दे :—
शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥
(ऋ० १।४३।६)
यह मंत्र 'शं' से आरम्भ होता है और कल्याणकारक है।
'नृभ्यो' का अर्थ है “पुरुषों के लिये” “नारिभ्यो” से स्त्रियों से
तात्पर्य है। यह सब के कल्याण के लिये हैं।
यह रुद्र का मंत्र है परन्तु अनिरुक्त है अर्थात् इसमें रुद्र
का नाम नहीं आया। इसलिये यह सौ वर्ष की आयु का दाता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह सौ वर्ष की आयु प्राप्त
करता है।
यह मंत्र गायत्री छन्द में है। गायत्री ब्राह्मण है। इस
प्रकार वह ब्राह्मण द्वारा रुद्र की उपासना करता है (जिससे
रुद्र का वीभत्सपन दूर हो जाय) । (१०)
३५—अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ
करता है। यह जो वीर्य बहा वह वैश्वानर है। इसलिये होता
अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है।
पहली ऋचा को बिना ठहरे हुये पढ़े। जो अग्नि-मारुत शस्त्र
को पढ़ता है वह आग की भयानक लपटों को शांत कर देता
है। सांस साध कर अग्नि को पार करे। कहीं कुछ शब्द
तीसरा अध्याय ] २०१
बोलने में भूल न हो जाय इससे उसको चाहिये कि किसी दूसरे
आदमी को शोधने के लिये नियत कर दे । मानो वह इस
संशोधक को पुल के तौर पर मान कर अग्नि को पार करता
है। इसमें कोई भूल होनी न चाहिये इसलिए जब होता मंत्र
बोले तो कोई उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने वाला होना चाहिये ।
जो वीर्य बहा वह मरुत है। उसको हिला कर इन्होंने बहाया ।
इसलिये वह मरुतों का सूक्त पढ़ता है ।
बीच में योनि (स्तोत्रिय) और अनुरूप प्रगाथ का पाठ
करे ।
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियं धियं वो देवया उ दधिध्वे ।
आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥
वत्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रि-
यासो अपां नोर्मय आस्रा गावो वन्धासो नोक्षणः ॥
( ऋ० १।१६८।१-२ )
यह योनि हुई ।
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद् वा सिञ्चध्वमुप
पृणध्वमादिद्धो देव ओहते ॥
तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं
विधते सुवीर्यंमग्निर्जनाय दाशुषे ॥ ( ऋ० ७।१६।११-१२ )
यह अनुरूप हुआ ।
बीच में योनि कहने का कारण यह है कि स्त्रियों की योनि
बीच में होती है । (वैश्वानरीय और अग्नि-मारुतीय) दो
सूक्तों को पढ़ने के बाद योनि इसलिये पढ़ी जाती है कि उसमें
पुरुष इन्द्रिय को स्थापित करता है, जिससे प्रजा उत्पन्न हो ।
जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला
होता है । (११)
३६—जातवेद के सूक्त को पढ़ता है। जब प्रजापति ने