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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 592 में से

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पृष्ठ 213

तीसरा अध्याय ] १९९
काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण
हो गया। प्रजापति का जो वीर्य बहा वह एक सरोवर बन
गया। देवों ने कहा, "प्रजापति का यह वीर्य्य दूषित न हो
( "मादुषत्" )। देवों ने 'मादुषत्' जो कहा तो "मादुषम्" हो
गया। यह "मादुष" का "मादुषत्व" है । यह जो मादुषम् था
यही मानुषम् हुआ । "मानुष" इसलिये कहते हैं कि वह दोष
के योग्य नहीं है अर्थात् उसमें दोष नहीं आने चाहिये ।
"मादुष" परोक्ष शब्द है। देव लोग परोक्षप्रिय होते हैं। (९)
३४-देवों ने इस वीर्य को अग्नि से घेर दिया । मरुतों ने
उसे हिलाया । परन्तु अग्नि ने उसको चलाया नहीं। उन्होंने
उसको वैश्वानर अग्नि से घेर दिया। मरुतों ने उसे हिलाया,
वैश्वानर अग्नि ने उसे चलाया । प्रजापति के वीर्य से जो
पहली चिनगारी उठी उसका आदित्य बना। जो दूसरी उठी
उसका भृगु बना। वरुण ने भृगु को लड़का मान लिया ।
इसीलिये भृगु को वारुणि कहते हैं । तीसरी जो चिनगारी उठी
उसके आदित्य हो गये । जो अंगारे थे उनका आङ्गिरस हुआ ।
जो अंगारे पहले न शांत होकर फिर उदीप्त हो गये। वे बृह-
स्पति हो गये। जो काली-काली अधजली राख रह गई वह
काले पशु बन गई। जो भूमि का भाग लाल हो गया था उसके
लाल पशु बन गये। जो भस्म रह गई उसका एक ऐसा व्यक्ति
बना जो इधर उधर फिरा और बारहसिंगा, भैंसा, हिरन, ऊँट,
गधा और जंगली जानवर बन गये ।
भूतवान ने इन पशुओं से कहा, "यह मेरा है। यह जो
इस जगह छूटा हुआ है मेरा है।" उन्होंने इस रुद्र सम्बन्धी
ऋचा को पढ़ कर उससे उसका भाग छुड़ा लिया :-
आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्य्यस्य सन्दृशो युयोथाः। अभि
नो वीरो अर्व्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः। (ऋ० २।३३।१)