ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] २०१
बोलने में भूल न हो जाय इससे उसको चाहिये कि किसी दूसरे
आदमी को शोधने के लिये नियत कर दे । मानो वह इस
संशोधक को पुल के तौर पर मान कर अग्नि को पार करता
है। इसमें कोई भूल होनी न चाहिये इसलिए जब होता मंत्र
बोले तो कोई उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने वाला होना चाहिये ।
जो वीर्य बहा वह मरुत है। उसको हिला कर इन्होंने बहाया ।
इसलिये वह मरुतों का सूक्त पढ़ता है ।
बीच में योनि (स्तोत्रिय) और अनुरूप प्रगाथ का पाठ
करे ।
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियं धियं वो देवया उ दधिध्वे ।
आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥
वत्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रि-
यासो अपां नोर्मय आस्रा गावो वन्धासो नोक्षणः ॥
( ऋ० १।१६८।१-२ )
यह योनि हुई ।
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद् वा सिञ्चध्वमुप
पृणध्वमादिद्धो देव ओहते ॥
तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं
विधते सुवीर्यंमग्निर्जनाय दाशुषे ॥ ( ऋ० ७।१६।११-१२ )
यह अनुरूप हुआ ।
बीच में योनि कहने का कारण यह है कि स्त्रियों की योनि
बीच में होती है । (वैश्वानरीय और अग्नि-मारुतीय) दो
सूक्तों को पढ़ने के बाद योनि इसलिये पढ़ी जाती है कि उसमें
पुरुष इन्द्रिय को स्थापित करता है, जिससे प्रजा उत्पन्न हो ।
जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला
होता है । (११)
३६—जातवेद के सूक्त को पढ़ता है। जब प्रजापति ने