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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 592 में से

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पृष्ठ 208

१९४ [ तीसरी पञ्चिका
में 'मद्'। इस प्रकार वह प्रातः और सायं दोनों सवनों में
सविता का भाग देता है।
प्रातः और सायं सवन में वायु के मंत्र बोले जाते हैं। प्रातः
सवन में कई। और सायं सवन में केवल एक। क्योंकि शरीर के
ऊपरी भाग में प्राण बहुत हैं और नीचे के भाग में कम।
द्यावापृथिवी का मंत्र पढ़ता है। द्यावापृथिवी ही प्रतिष्ठा
हैं। यहाँ पृथिवी प्रतिष्ठा है, वहाँ द्यौ। इस प्रकार द्यावापृथिवी
के मंत्र बोल कर वह यजमान की द्यौ और पृथिवी दोनों में
प्रतिष्ठा कर देता है। (५)
३०-वह ऋभु-सूक्त (ऋ० १-१११) को पढ़ता है।
तक्षन् रथं सुवृतं—इत्यादि।
देवों में ऋभुओं ने तप करके सोमपान का अधिकार पा
लिया। उनके लिये देवों ने प्रातः सवन में स्थान देना चाहा।
लेकिन अग्नि ने वसुओं की सहायता से उनको वहाँ से निकाल
दिया। अब देवों ने दोपहर के सवन में उनको स्थान देना
चाहा। तब इन्द्र ने रुद्रों से मिल कर उनको वहाँ से निकाल
दिया। अब उन्होंने उनको सायंकाल के सवन में स्थान देना
चाहा। विश्वेदेवों ने कोशिश की कि उनको वहाँ से निकाल दें
और कहा, "यह यहाँ सोमपान नहीं कर सकते, नहीं कर
सकते।" प्रजापति ने सविता से कहा, "यह तेरे शिष्य हैं, तू
इनके साथ पीले।" वह मान गया और बोला, "तू भी ऋभुओं
के दोनों ओर खड़ा हो कर पी।" प्रजापति ने उनके दोनों
ओर खड़े होकर पान किया। इसीलिये ऋभु सूक्त के बाद दो
धाय्य जो अनिरुक्त हैं (अर्थात् जिनमें विशेष देवों का उल्लेख
नहीं है) और जो प्रजापति की हैं, एक के बाद दूसरी पढ़ी
जाती हैं:—