ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
( ३ )
विराट् । चतुर्विंश कृत्य । रथंतर और
बृहत् यज्ञ । महाव्रत और सत्र । २३५-२४६
३रा अध्याय—षडह । गवामयन कृत्य । विषुवान्
दिन । स्वरसामकृत्य । दूरोहण जाप ।
हंस-मंत्र । विषुवान् सत्र । २४७-२५७
४था अध्याय—द्वादशाह यज्ञ । विधि । कृत्य । २५८-२६६
५वाँ अध्याय—द्वादशाह यज्ञ । पहले दिन का कृत्य ।
दूसरे दिन का कृत्य । २६७-२८०
पंचम पञ्चिका—
१ला अध्याय—द्वादशाह के तृतीय और चतुर्थ दिन के
कृत्य और शस्त्र । २८१-२९६
२रा अध्याय—द्वादशाह के पंचम और षष्ठ दिन के
कृत्य, शस्त्र, और विशेषतायें । २९७-३१४
३रा अध्याय—द्वादशाह के सप्तम और अष्टम दिन के
कृत्य, शस्त्र और विशेषतायें । ३१५-३२८
४था अध्याय—द्वादशाह का नवम और दशम दिन ।
यज्ञ की पूर्ति । ३२९-३४२
५वाँ अध्याय—अग्निहोत्र । गाय संबंधी प्रायश्चित्त ।
आहवनीय और सूर्य्य । प्रजापति का
तप । ब्रह्मा के कर्म । ३४३-३५४
षष्ठ पञ्चिका—
१ला अध्याय—सोम राजा द्वारा मद-युक्त करना ।
ग्रावस्तोत्रीय । सुब्रह्मण्या । ३५७-३६१
२रा अध्याय—प्रातः सवन और असुर । मध्य सवन ।
होत्रकों के इन सवनों के परिधानीय
( ४ )
मंत्र-अहीन और एकाहिक। तृतीय
सवन। ३६२-३६७
३रा अध्याय—तीनों सवनों के मंत्र। मध्य सवन के
सोम के मंत्र। तृतीय सवन के मंत्र।
होता, मैत्रावरुण, होता, ब्राह्मणाच्छंसी,
नेष्टा, अच्छावाक् और अग्नीध्र के
याज्य मंत्र। ३६८-३७८
४था अध्याय—संपात सूक्त। कद्वत् मंत्र। अहीन-
यज्ञ की युक्ति-विमुक्ति। वालखिल्य।
दूरोहण ... ३७९-३९३
५वाँ अध्याय—शिल्प सूक्त-नाभानेदिष्ट, नाराशंस,
वालखिल्य, सुकीर्ति, एवयामरुत्, वृषा-
कपि। विश्वजित यज्ञ। ऐतशप्रलाप
मंत्र। प्रतिराध। अतिवाद। देवनीथ।
दधिक्रावन, पावमान्य ... ३९४-४०८
सप्तम पञ्चिका—
१ला अध्याय—पशुओं के अंगों की विभक्ति ... ४११-४१२
२रा अध्याय—अग्निहोत्री के लिए विभिन्न प्रायश्चित्त ४१३-४२७
३रा अध्याय—पुत्र से लाभ। हरिश्चन्द्र का पुत्र,
रोहित। अजीगर्त और शुनः शेप की
कथा ... ४२८-४३९
४था अध्याय—प्रजापति का यज्ञ। ब्रह्म-क्षत्र। राज-
सूय यज्ञ के प्रारम्भिक कृत्य ... ४४०-४४६
५वाँ अध्याय—यज्ञ का अधिकार और श्यापर्णा।
राम मार्गवेय और सोमपान का प्रश्न।
चातुर्वर्ण्यों का भक्ष्य। उदुम्बर,
( ५ )
अश्वत्थ और न्यग्रोध आदि के रस-
पान की विधि। ... ४४७-४५४
अष्टम पञ्चिका—
१ला अध्याय—राजसूय यज्ञ के प्रातः, मध्यम और
तृतीय सवन के स्तोत्र और शस्त्र। ... ४५७-४६१
२रा अध्याय—इष्ट की समाप्ति पर पुनरभिषेक।
इसकी सामग्री। अरिष्टों पर विजय
और प्रपद् रीति से पाठ ... ४६२-४७२
३रा अध्याय—इन्द्र का महाभिषेक। सम्राट्, भोज,
स्वराट्, विराट् और राजा। ... ४७३-४७७
४था अध्याय—इन्द्र के महाभिषेक की विधि से
क्षत्रिय राजा का महाभिषेक। जिन
जिन ऋषियों ने जिन जिन राजाओं
का अभिषेक किया उनका नाम। ... ४७८-४८६
५वाँ अध्याय—पुरोहित और उससे राष्ट्र की रक्षा।
पुरोहित के गुण-धर्म। ब्रह्मपरिमर
क्रिया ... ४८७-४९३
परिशिष्ट—
( क ) ऐतरेय ब्राह्मण के पारिभाषिक
शब्द और व्युत्पत्तियाँ ४९४
( ख ) ऐतिहासिक व्यक्ति ५०२
( ग ) मंत्र सूची ५०६
( घ ) अनुक्रमणिका ... ५४३-५७३
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प्राक्कथन
बचपन में मैंने सुन रक्खा था कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों की
व्याख्या ( Commentaries ) हैं। व्याख्या का स्वरूप भी मेरे
मस्तिष्क में वही था जो विद्यार्थी के मस्तिष्क में हुआ करता है।
मैंने शेक्सपियर पर डाइटन्, वैरिटी आदि के नोट्स और कालि-
दास पर मल्लिनाथ की टीकायें पढ़ी थीं। मैं समझता था कि
इसी प्रकार की सहायता ब्राह्मण ग्रन्थ भी वेदों के सम्बन्ध में
देते हैं। परन्तु जब मैंने ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण और
यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण को पढ़ना आरम्भ किया तो मुझको
बड़ा आश्चर्य हुआ। यह कैसी व्याख्यायें हैं, जिनसे मंत्रों का
अर्थ समझने में कुछ भी सहायता नहीं मिलती : वस्तुतः व्याख्या
पद के अर्थों में भेद है। आद्योपान्त पढ़ने और उन पर विचार
करने के पश्चात् मैं इस परिणाम पर पहुँचा कि ब्राह्मण ग्रन्थ
व्याख्या नहीं अपितु यज्ञ सम्बन्धी व्याख्या हैं। अर्थात् यदि
आप चाहें कि उनके द्वारा वेद मंत्रों का अर्थ ज्ञात हो सके जैसे
सायण, दयानन्द आदि आचार्यों के भाष्यों से होता है, तो
आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती। परन्तु यह पता चल सकता
है कि किस किस मंत्र का किस प्रकार किस किस इष्टि या यज्ञ
में विनियोग हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में स्थान स्थान पर मंत्रों
की रूप-समृद्धता का उल्लेख आता है—
“एतद् वै यज्ञस्य समृद्धं यद् रूपसमृद्धं यत् कर्म क्रियमाणमृगभिवदति”
(ऐ० १।१।४)
अर्थात् यदि ऐसा मंत्र बोला जाय जिसमें उसी क्रिया का
वर्णन हो जो यज्ञ में की जाने वाली हो तो इसको रूप-समृद्धता
२ [ ऐतरेय-ब्राह्मण
कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जब यज्ञ रचे गये और
उनमें पढ़ने के लिये मंत्र छांटे गये तो वह मंत्र छांटे गये जिनके
शब्दों से उस क्रिया का लगभग वर्णन प्रकट होता हो ।
विनियोग में जितने मंत्र पढ़े जाते हैं उन सब में रूप-समृद्धता
नहीं होती। परन्तु रूप-समृद्धता अच्छी समझी जाती है। इससे
स्पष्ट है कि याज्ञिक लोगों ने यज्ञ में मंत्रों का विनियोग किया ।
अर्थात् उन्होंने यह निश्चय किया कि अमुक अमुक मंत्र अमुक
अमुक स्थान पर बोले जायेंगे। ब्राह्मण ग्रन्थों में इन्हीं मंत्रों का
वर्णन आता है।
यहाँ प्रश्न उठतां है कि विनियोग के अनुसार मन्त्र बनाये
गये या मन्त्र पहले बने हुये थे उनको पीछे से यज्ञ में विनियुक्त
कर लिया गया। ऐतरेय, शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों को देखने
से कभी-कभी यह धारणा हो जाती है कि मन्त्रों के निर्माण का
प्रयोजन केवल उनका यज्ञ-सम्बन्धी विनियोग ही था, अर्थात्
उन क्रियाओं से बाहर मन्त्रों का कोई प्रयोजन है ही नहीं।
मध्यकालीन वेदभाष्यकारों ने वेदों का भाष्य इसी धारणा से
किया है। वहाँ विनियोग मुख्य है और अर्थ गौण। परन्तु ऐसा
कथन युक्ति-संगत प्रतीत नहीं होता। हमारे पक्ष में ब्राह्मण ग्रन्थों
में बहुत से प्रमाण मिलेंगे। यहाँ केवल एक को ही उद्धृत किया
जाता है :—
तदाहुरुदुत्यं जातवेदसमिति सौर्याणि प्रतिपद्येतेति ।
तत्तन्नाऽऽदृत्यं यथैव गत्वा काष्ठामपराध्नुयात् तादृक् तत् ।
(ऐतरेय ब्रा० ४।२।६)
“कुछ लोगों का मत है कि इस स्थल पर “उदुत्यं जातवेदसं”
(ऋ० १।५०।१) सूर्य का मन्त्र पढ़ कर आरम्भ करे। परन्तु
यह ठीक नहीं है। मानो दौड़ने में उद्दिष्ट सीमा को ही भूल
जाय।”
प्राक्कथन ] ३
इससे सिद्ध होता है कि भिन्न-भिन्न लोग एक ही अवसर
पर भिन्न-भिन्न मन्त्रों को पढ़ना पसन्द करते थे। यहाँ एक पक्ष
का तिरस्कार और दूसरे का आदर किया गया है। अर्थात् कुछ
लोग 'उदुत्यं' आदि मन्त्र पढ़ते हैं। परन्तु ऐसा नहीं करना
चाहिये। इससे सिद्ध हुआ कि वेद मन्त्र पहले उपस्थित थे।
यज्ञ के आचार्यों ने यज्ञ-कर्म में अवसरोचित मन्त्रों का विनियोग
किया। किसी को कोई पसन्द आया और किसी को कोई। सब
ने अपने पक्ष का मंडन और दूसरे के पक्ष का खण्डन किया।
यदि मन्त्रों का निर्माण उन नियत अवसरों के लिये ही होता तो
इस विषय में भिन्न-भिन्न मत न होते। वेद और ब्राह्मण के
परस्पर सम्बन्ध को जानने और वेद मंत्रों का अर्थ समझने के
लिये यह बात बड़े महत्व की है। यदि यज्ञ की क्रियाओं के विनि-
योग के लिये ही वेद मंत्रों का निर्माण हुआ हो तो वेदमंत्रों का
अर्थ उन यज्ञ की क्रियाओं को दृष्टि में रखकर ही करना पड़ेगा।
और यदि वेद मंत्र स्वतंत्र थे और यज्ञ की क्रियाओं में उनका
विनियोग यज्ञ के आचार्यों ने पीछे से किया तो वेदमंत्रों का
स्वतंत्र रूप से अर्थ करना होगा और वेदमंत्रों का यज्ञ के साथ
गौण सम्बन्ध समझा जायगा। एक मोटा उदाहरण लीजिये।
एक श्रुति है :—
तनूपा अग्नेसि तन्वं में पाहि, आयुर्दा अग्नेसि आयुर्मे देहि, वर्चोदा
अग्नेसि वर्चो मे देहि। अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृण।
( पारस्कर गृह्यसूत्र २।४ )
इसमें ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे शरीर की रक्षा कर, आयु
और वर्चस प्रदान कर। और शरीर में जो कमी हो उसको
पूर्ण कर।
यदि मैं रोगी हूँ या चोट लग गई हो तो इस श्रुति से प्रार्थना
करना बहुत उपयुक्त प्रतीत होता है। इसमें रूपसमृद्धता है।
[ ऐतरेय-ब्राह्मण
४
ईश्वर भक्त सैनिक युद्ध में घाव पाते समय इसको पढ़कर अपने
को ढाढस दे सकते हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि इस
श्रुति का निर्माण इस अवसर के लिये किया गया हो। एक और
प्रमाण लीजिये :-
अन्धस्वत्यः पीतवत्यो मदत्यस्त्रिष्टुभो याज्या भवन्त्यभिरूपा यद्यज्ञेऽ-
भिरूपं तत् समृद्धम् । ( ऐतरेय० ४।१६ )
यहां प्रश्न था कि पर्यायों के याज्यों में कौन कौन मंत्र पढ़ने
चाहिये। उत्तर दिया कि वह मंत्र जिनमें अंधस्, पीत और मद्
शब्द आये हों। ये पाँच मंत्र इस प्रकार हैं, ऋग्वेद २।१४।१,
६।४४।१४, १०।१०४।२, ६।४०।१ और २।१९।१।
यह मंत्र न तो यज्ञ की क्रियाओं के क्रम से हैं। न वेद में
एक स्थल या एक प्रपाठक के हैं। केवल इसलिये छांटे गये कि
इनमें 'अंधस्' 'पीत' और 'मद' शब्द आ गये। इसलिये इन
मंत्रों का अर्थ समझने के लिये ऐतरेय के इस विनियोग की
आवश्यकता नहीं।
इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों के भाष्य
नहीं हैं। परन्तु उक्त विनियोग से कहीं-कहीं वेद मंत्रों के अर्थों
पर प्रकाश पड़ता है।
पाँचवीं पंचिका के प्रायः सभी अध्यायों में भिन्न-भिन्न दिनों
में पढ़े जाने वाले मन्त्रों का उल्लेख है। उन मन्त्रों को किस
प्रकार छाँटा गया है किसी विशेष अर्थ के विचार से नहीं,
अपितु कुछ शब्दों के विचार से। जैसे जिनमें 'रथ' शब्द
आया हो या जिनमें 'आ' या 'प्र' आया हो इत्यादि।
यः प्रथमस्याह्नो रूपमेतानि वै सप्तमस्याह्नो रूपाणि इत्यादि
( ऐतरेय ५।३।१ )
इससे भी यही बात सिद्ध होती है कि वेद के मन्त्र उन
· प्राक्कथन ] ५
कृत्यों के लिये नहीं रचे गये थे जिनका ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख
हैं । केवल उनका विनियोग हुआ है ।
कहीं-कहीं तो स्पष्टरीत्या प्रकट हो जाता है कि विनियोग
में मन्त्रों का अर्थ संकुचित या विकृत भी हो गया है । यहाँ केवल
एक उदाहरण पर्याप्त होगा :—
ऐतरेय ब्राह्मण के छठे अध्याय ( पंचिका २, अध्याय १ ) के
१०वें खण्ड में ऐसा दिया गया है :—
मनोतायै हविषोऽवदीयमान स्यान्वब्रू हीत्याहाध्वर्युः । इति
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतेति सूक्तमन्वाह इति ।
इस पर सायणाचार्य लिखते हैं :—
तदर्थं हृदयाद्येकादशाङ्गरूपं हविरवदीयते । तस्य हविषोऽनुकूला
ऋचोऽनु ब्रूहीत्यध्वर्युः प्रैषमंत्रं पठेत् ।
अर्थात् अध्वर्यु कहता है कि मनोता के लिये आहुति देने के
लिये जो हृदयादि ११ अंग काटे जाते हैं, उनके प्रसंग के मन्त्र
पढ़ो । इस पर ऋग्वेद मंडल ६, सूक्त १ के "त्वं ह्यग्ने प्रथमो
मनोता" आदि मन्त्र पढ़े जाते हैं ।
हमने अनुवाद में पूरे मन्त्र देकर उनका अर्थ दे दिया है ।
पाठकगण देख लें । उन मन्त्रों में कहीं भी अंगों के काटने का
संकेत तक नहीं है । अर्थ उत्तम और शुद्ध हैं । कोई घातक
क्रिया करने का आदेश नहीं है । फिर भी पशु-बलि के साथ
उनका विनियोग करके उनके अर्थों को विकृत कर दिया गया ।
जो कोई यज्ञ में वध-क्रिया और मन्त्र पाठ को देखेगा यही
समझेगा कि मन्त्रों में पशुबध का आदेश होगा तभी तो पढ़े
जाते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है ।
वैदिक साहित्य के विद्वानों में प्रायः इस बात पर मतभेद है
कि ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना वेदों में है या नहीं । हमने ऊपर
जो कुछ लिखा है उससे यह गन्ध आती है कि ब्राह्मण ग्रन्थों
६ [ ऐतरेय-ब्राह्मण
की गणना वेदों में नहीं है। इस विषय पर पूर्वकाल में ही बहुत
शास्त्रार्थ हुये हैं और अब भी होते रहते हैं। मेरी राय में तो
यह झगड़ा 'वेद' शब्द के अर्थों से सम्बन्ध रखता है। यदि वेद
का अर्थ सामान्य ज्ञान है तो ब्राह्मण ग्रन्थ क्या अन्य शास्त्र
और वैज्ञानिक पुस्तकें भी वेद माननी पड़ेंगी। परन्तु यदि वेद
वह अपौरुषेय ज्ञान है जो आदि सृष्टि में ईश्वर की ओर से
अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा के हृदयों में आविर्भूत
हुआ और जिसको वैदिक साहित्य में स्वतः प्रमाण माना गया
है तो ऋग्, यजुः, साम और अथर्व मन्त्र संहिताओं को ही वेद
माना जा सकता है अन्य ग्रन्थों को नहीं। इसके लिये बाल की
खाल निकालने की आवश्यकता नहीं। केवल ब्राह्मणों के पाठ
मात्र से ही सिद्ध हो जाता है कि यह वेद नहीं। यदि कोई
अपने किसी विशेष ग्रन्थ में परिभाषा के रूप में यह मान ले तो
वह मान सकता है। जैसे कानून की पुस्तकों में उल्लेख होता है
कि जहाँ कहीं 'नर' शब्द आया हो तो वहाँ उससे 'नारी' का
भी तात्पर्य है। जब कहते हैं कि मनुष्य को सच बोलना चाहिये
तो स्त्री और पुरुष दोनों से तात्पर्य है, एक से नहीं। “जो कोई
चोरी करेगा वह दण्डनीय होगा” का अर्थ यह भी है कि 'जो
कोई स्त्री चोरी करेगी वह दण्डनीय होगी।" इसका अर्थ नहीं
कि पुरुष का अर्थ स्त्री है या स्त्री का पुरुष। न हर स्थान पर
यह परिभाषा काम आ सकती है। पुरुष पच्चीस वर्ष की आयु
में विवाह करे। यहाँ 'पुरुष' में स्त्री की गणना नहीं होती। इसी
प्रकार यदि आपस्तम्ब और कात्यायन ने अपने ग्रन्थों में विशेष
परिभाषा बनाने के लिये यह कह दिया कि
मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनाम धेयम् ( आप० २४।१।३१, कात्यायन १।१ ),
तो इतना कहने से ब्राह्मण वेद नहीं हो गये। इसका केवल
यह अर्थ हुआ कि उन विशेष ग्रन्थों में यह परिभाषा प्रयुक्त हुई
ब्राह्मणों की आन्तरिक साक्षी स्पष्टतया उनको उस अर्थ में वेद
. प्राक्कथन ] ७
है। कात्यायन का यह सूत्र बनाना ही प्रकट करता है कि इससे
पहले ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना 'वेद' में नहीं थी। संक्षेप के हेतु
यह परिभाषा बना ली गई। यदि वेद और ब्राह्मण एक होते तो
यह परिभाषा न बनाई जाती। जैसे यदि सामान्यतया पुरुष का
अर्थ स्त्री होता तो कानून में उपर्युक्त परिभाषा न बनाई जाती।
यतः स्त्री पुरुष नहीं है, अतः यह परिभाषा बनाई गई कि जहाँ-
जहाँ पुरुष का उल्लेख हो वहाँ स्त्री का भी समावेश समझा
जाय। कभी-कभी वेद शब्द शास्त्र मात्र के अर्थ में भी आया है,
जैसे धनुर्वेद, गन्धर्व वेद इत्यादि। परन्तु यह वेद नहीं है। जब
ब्राह्मणों की आन्तरिक साक्षी स्पष्टतया उनको उस अर्थ में वेद
नहीं दर्शाती जिसमें ऋग्, यजुः आदि अपौरुषेय माने गये हैं तो
यदि एक सहस्र पुस्तकों में वेद और ब्राह्मण को एक माना हो
तो भी यही कहना पड़ेगा कि यह उल्लेख परिभाषा के लिये ही
है। प्रत्येक ग्रन्थकार को परिभाषा बनाने का अधिकार है। परन्तु
उससे किसी शब्द के वास्तविक अर्थों में भेद नहीं पड़ता।
कुछ लोग ब्राह्मणों को वेद सिद्ध करने के लिये वेदों को भी
खटाई में डाल देते हैं। कोई कहता है कि वेद अनन्त हैं, इसलिये
ब्राह्मण वेद हैं। कोई कहता है कि बहुत से ब्राह्मण ग्रन्थ लुप्त
हो गये। कोई 'वेद' की व्युत्पत्ति करके ब्राह्मणों को वेद सिद्ध
करना चाहता है। वह यह नहीं समझते कि इससे ब्राह्मणों का
गौरव तो नहीं होता परन्तु वेदों का लाघव हो जाता है। क्योंकि
ब्राह्मण ग्रन्थ की आन्तरिक साक्षी ( Internal Evidence ) ही
उनको अन्यथा सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है। मुद्दई सुस्त गवाह
चुस्त।
अब एक प्रश्न रह जाता है। क्या ब्राह्मण ग्रन्थों में कोई
बात वेद विरुद्ध भी है ? ब्राह्मण ग्रन्थ जैसे इस समय मिलते हैं
उनसे तो कई बातों में वेद-विरोध स्पष्ट ही है। जैसे यज्ञों में पशु-
८ [ ऐतरेय-ब्राह्मण
बध । पशु-बध न तो वेदों में विहित ही है और न उन मंत्रों में
उनका उल्लेख है जो ब्राह्मण ग्रन्थों में पशु-बध में विनियुक्त हैं ।
कुछ लोगों का ऐसा कहना है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में भी पशु-
बध नहीं है केवल टीकाकारों ने 'आलभन' शब्द का भूल से
'बध' अर्थ लेकर ऐसा भ्रम उत्पन्न कर दिया है । यह ठीक है
कि 'लभ' धातु का अर्थ 'प्राप्ति' है और 'आ' उपसर्ग लगने से
'आलभ' का अर्थ बध नहीं हो सकता । पारस्कर गृह्य सूत्र में
विवाह के सम्बन्ध में यह वाक्य आता है :—
अथास्यै दक्षिणा ꣳ समधि हृदयमालभते ममव्रते इत्यादि
( प्रथम-काण्ड अष्टमी कण्डिका )
अर्थात् वर वधू के हृदय पर हाथ रख कर 'आलभन' करे ।
यहाँ 'आलभते' का अर्थ है स्पर्श, न कि काटना या बध करना ।
परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों में पूर्वापर के देखने से ऐसा प्रतीत होता
है कि अत्यन्त खींचातानी करके भी ब्राह्मण ग्रन्थों के माथे से
पशु-बध के कलंक का टीका मिटाया नहीं जा सकता । यदि एक
स्थान पर 'आलभन' शब्द आता तो इसकी कुछ व्याख्या की
जा सकती थी । परन्तु कई स्थलों पर पशु के काटने का इतना
स्पष्ट विधान है कि 'आलभन' का अर्थ भी वही लेना पड़ता है ।
कहीं कहीं 'आ + लभ' का प्रयोग न करके 'हन्' धातु का प्रयोग
किया गया है जैसे
'तं यत्र निहनिष्यन्तो भवन्ति' ( ऐतरेय २।२।१ )
“अर्थात् जहाँ पशु का बध करने वाले हैं” इत्यादि ।
इससे हम तो यह मानने पर मजबूर हो जाते हैं कि वेद के
अध्वर नाम हिंसा-रहित यज्ञों में किसी ने किसी अवस्था में कहीं
पर किसी प्रकार पशुबध की प्रथा प्रविष्ट कर दी । सम्भव है,
तांत्रिक काल में इसका आरम्भ हुआ हो । आश्चर्य की बात यह
है कि समस्त आर्य जाति में आरम्भ काल से ही गौओं को
प्राक्कथन ] ६
पूज्या मानते हुये भी यज्ञों में पशुवध का उल्लेख मिलता है।
इस बात को मध्यकालीन आर्य्य विद्वानों ने भी इतनी घृणा से
देखा कि स्मृतिकारों ने घोषित कर दिया कि यज्ञ में गोवध
कलिकाल में निषिद्ध है। यह महारोग की एक क्षणिक और
अस्थायी चिकित्सा थी। क्योंकि वेद तो सनातन हैं अर्थात्
उनका मानना और उनके अनुकूल आचरण सब देशों और
सब कालों के लिये है। वह देश और काल के प्रभाव से अतीत
हैं। यह एक ऐसा विषय है जिसका विवेचन इस भूमिका में नहीं
हो सकता। इसके लिये बड़े ग्रन्थ की आवश्यकता है। प्रतीत
होता है कि 'आ' उपसृष्ट 'लभ' धातु का मौलिक अर्थ 'प्राप्ति'
ही था। पीछे से स्पर्श और उसके बहुत पीछे वध हुआ। यह
ठीक है कि उपसर्ग धातु के अर्थों को बदल देते हैं। यदि न
बदलते तो उपसर्गों से लाभ ही क्या था। परन्तु बदले हुये अर्थों
में भी धातु का आत्मा (Spirit) उपस्थित रहता है। धात्वर्थ
उन सब अर्थों की नाभि है। उपसर्ग 'अरा' हैं जिनके सहारे
अर्थों का चक्र घूमता है। जैसे 'गम्' में 'आ' लगाने से 'आगम'
का अर्थ उलट गया। परन्तु यहाँ अर्थ नहीं उलटा, गति तो
आगम में भी ओत प्रोत है। केवल गति का आरम्भ का और
अन्त का प्रदेश बदल गया। 'जयपुरं गच्छामि' और 'जयपुर-
द्दागच्छामि' दोनों में 'गच्छ' का अर्थ है गति। केवल स्थान भेद
हो गया है। एक दूसरे धातु को लीजिये। 'ग्रह'। इस धातु के
अर्थ उपसर्ग लगाने से बहुत बदल जाते हैं जैसे :-
प्रख्याताननुजग्राह विजग्राह कुलद्विषः।
आपन्नान् परिजग्राह निजग्राहास्थितान्पथि॥
(सौन्दरानन्द महाकाव्य सर्ग २।१०)
यहाँ 'अनुग्रह' का अर्थ है 'कृपा'। 'विग्रह' का अर्थ है
लड़ाई। 'परिग्रह' का अर्थ है 'पालन' और 'निग्रह' का अर्थ है
१० [ ऐतरेय-ब्राह्मण
'रोकना'। परन्तु इन सब में 'ग्रह' धातु का 'पकड़ना' अर्थ
ओत प्रोत है। जब तक एक मनुष्य दूसरे का संपर्क नहीं करता
उसके साथ न दया कर सकता है, न लड़ाई; न पालन, न रोकना।
इसी प्रकार पशु को मारने के लिये उसकी प्राप्ति पहले होगी
और वध पीछे। इस प्रकार 'आलभ्य हन्ति' के अर्थ में केवल
'आलभते' का प्रयोग किया गया। और जब यह प्रयोग दीर्घ-
काल के प्रयोग से परिचित सा हो गया तो 'आलभन' 'हनन'
के अर्थ में रूढ़ि हो गया। और जहाँ कहीं 'आलभन' प्राप्ति के
अर्थ में था वहाँ भी 'हनन' के अर्थ में ले लिया गया। जब यज्ञ
में पशु-वध सामान्य हो गया तो पशु-वध सम्बन्धी अन्य शब्दों
का ताना बाना भी 'आलभन' के चारों ओर इस प्रकार बुन दिया
गया कि उसके वास्तविक अर्थ का तिरोभाव हो गया।
ऐतरेय ब्राह्मण के बहुत से स्थलों के देखने से ज्ञात होता है
कि यज्ञों को हिंसा-शून्य बनाया जा सकता है। हिंसक-वृत्ति के
हस्तक्षेप से पहले यज्ञों का यही रूप था। कहीं-कहीं तो यज्ञ
की रूपकालंकार में पशु से उपमा देकर यज्ञ के सिर, यज्ञ के
पैर, यज्ञ के उदर, यज्ञ के हृदय आदि का उल्लेख किया गया
है। परन्तु पशु की उपमा इसलिये नहीं दी गई कि पशु को काटा
जाय या यज्ञ को काटा जाय। अपितु इस लिये कि जैसे पशु के
सब अङ्ग एक दूसरे से घनिष्ठतम सम्बन्ध रखते हैं उसी प्रकार
यज्ञ की भिन्न-भिन्न क्रियायें भी परस्पर सम्बन्धित हैं। यदि
किसी पशु का सिर काट लिया जाय तो न सिर सिर रहता है, न
पशु पशु। पशु तभी तक पशु है जब तक उसके अङ्ग बने हुये
हैं और अङ्ग तभी तक अंग हैं जब तक अङ्गों के साथ उनका
सम्बन्ध है। इसी प्रकार अङ्गभङ्ग होने से यज्ञ यज्ञ नहीं रहता।
'यज्' धातु का एक अर्थ संगतिकरण है। 'संगति' की सब से
अच्छी उपमा जीवित पशु का शरीर है। मृत का नहीं। अंगरेजी
प्राक्कथन ] ११
का शब्द 'Body Politic' जीवित शरीर की उपमा से समन्वित
है। इसी प्रकार Organisation जो सभा के अर्थों में आता है
शरीर के अवयवों या गोलकों ( Organs ) से सम्बन्ध रखता
है। Corporation, in corporate आदि अनेकों शब्द लैटिन
के Corpus ( शरीर ) से सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु वहाँ काटने
का अर्थ न है, न उसकी ओर दूरस्थ संकेत ही है।
हमारा विचार था कि ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण
की गाथाओं की सुसङ्गत व्याख्या की जाय और इनको प्रक्षिप्त
स्थलों से मुक्त करके शुद्ध कर दिया जाय। परन्तु यह काम
बहुत छानबीन और बहुत समय चाहता है। जल बहुत गदला
हो तो उसको साधारण छन्ने से छान नहीं सकते। उसके लिये
बाष्पीकरण (Evaporation) चाहिये। विषाक्त अन्न का विष दूर
करना कठिन है। हमें खेद है कि हम इस कठिन कार्य का सम्पा-
दन नहीं कर सके। हममें योग्यता और समय दोनों की ही कमी
है। अतः हमने शाब्दिक अनुवाद पर ही सन्तोष किया है।
कुछ मित्रों का आग्रह था कि या तो हम ब्राह्मण ग्रन्थों को
मनुस्मृति के समान सर्वथा शोध कर और क्षेपकों को
निकाल कर छापें या हर कठिन स्थल की पूरी विवेचना और
व्याख्या करें या न छापें। पहली दो बातें इस समय असम्भव
सी प्रतीत हुईं। मनु में जो क्षेपक हैं वह समस्त शास्त्र में विषाक्त
अन्न के समान ओत प्रोत नहीं है अपितु दूध में मक्खी के
समान हैं जो जल्दी से निकाल कर फेंकी जा सकती है। ब्राह्मण
ग्रन्थों में क्षेपक भी हैं और रहस्यमय गाथायें भी हैं और कुछ
विशिष्ट परिभाषायें भी हैं। यह तीनों चीजें इस प्रकार मिली
जुली हैं कि इनको छान कर शुद्ध करना अत्यन्त कठिन है। एक
दो स्थलों को लेकर विभिन्न विद्वान विभिन्न पक्षों को सिद्ध कर के
अपने पाण्डित्य का परिचय दे सकते हैं और उलझनें ज्यों की
१२ [ ऐतरेय-ब्राह्मण .
त्यों बनी रहती हैं। हमें यह अभीष्ट नहीं है। अब अन्त की
बात रह जाती है अर्थात् फिर अनुवाद ही क्यों किया जाय।
इसका एक मात्र उत्तर यह है कि हिन्दी भाषा भाषियों के पास
कोई ऐसी चीज़ अवश्य होनी चाहिये जिससे वह संस्कृत
साहित्य की झलक देख सकें और पेचदार स्थलों पर अपनी
बुद्धि लगा सकें। ऐतरेय ब्राह्मण में ऐसी उलझनों का बाहुल्य
है। क्या गाथायें, क्या यज्ञ की क्रियाओं के पक्ष में युक्तियाँ,
शंकाओं का समाधान सभी विचित्र हैं और गुत्थियाँ सुलझाने
में चतुर लोगों के लिये पर्याप्त सामग्री उपस्थित करते हैं। कम
से कम लोगों को यह तो पता लग ही जायगा कि यज्ञ की
क्रियायें कितनी जटिल, कितनी महत्त्वपूर्ण और कितनी उपयोगी
हैं। हमने उन मन्त्रों को प्रायः पूरा-पूरा दिया है जिनकी मूल
ग्रन्थ या भाष्य में केवल प्रतीकें ही दी गई हैं। बहुत बड़े सूक्त
छोड़ दिये हैं अन्यथा पुस्तक का कलेवर बहुत बढ़ जाता। कहीं-
कहीं मन्त्रों के अर्थ भी दे दिये हैं। हमारे इस अनुवाद में
त्रुटियाँ बहुत मिलेंगी। हमको स्वयं अपनी कृति सन्तोषजनक
प्रतीत नहीं होती। परन्तु आशा है कि हमारे पश्चात् कार्य करने
वाले सज्जन उत्तरोत्तर विशदता का समावेश कर सकेंगे।
ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय ( महीदास ) ऋषि का बना हुआ
बताया जाता है। ग्रन्थ में कोई ऐसी साक्षी नहीं है जिससे
'ऐतरेय' मुनि के विषय में कुछ ज्ञात हो सके। कहते हैं कि
'इतरा' एक नीच कुल की स्त्री थी। उसी से उत्पन्न होने के कारण
माता के नाम पर इनका ऐतरेय नाम पड़ा। जैसे 'जाबाल' का।
हमारा इन गाथाओं पर विश्वास नहीं। यह ठीक है कि किसी
पुरुष का बड़ा होना उसके कुल के आश्रित नहीं है। अच्छे कुल में
बुरे और बुरे कुल में अच्छे उत्पन्न हुआ ही करते हैं। परन्तु एक
बात हमको बहुत खटकती है। वैदिक साहित्य में जिन-जिन बड़े
ब्राह्मण । इन ब्राह्मणों में ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय आदि की भेदक-
प्राक्कथन ] १३
और गौरवान्वित पुरुषों का उल्लेख आता है उनमें से प्रायः बहुतों
के जन्म के साथ ऐसी गाथायें क्यों जोड़ दी गईं ? क्या वैदिक
साहित्य में उच्चकुल के पुरुषों का कुछ भी भाग नहीं या अत्यन्त
न्यून भाग है ? सम्भव है कि बहुत सी गाथाओं का आधार वेद
विरोधी मत हुये हों । निश्चयात्मक होना कठिन है ।
ऐतरेय ऋग्वेदी ब्राह्मण है । 'ब्राह्मण' का क्या अर्थ है ? यह
शब्द 'ब्रह्म' में 'अण्' प्रत्यय करने से बनता है । ब्रह्म का अर्थ यहाँ
यज्ञ समझना चाहिये । यज्ञ के ऋत्विजों में ब्रह्मा का पद मुख्य है
क्योंकि वह यज्ञ के सब कृत्यों को जानता और होता, अध्वर्यु
तथा उद्गाता आदि का पथ प्रदर्शन करता है । इसलिये यज्ञ के
विशेषज्ञ यज्ञ के सम्बन्ध में जो विवेचना करते हैं उनका नाम है
ब्राह्मण । इन ब्राह्मणों में ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय आदि की भेदक-
भित्ति कैसे खड़ी हुई यह कहना कठिन है । ऐसा भेद उपनिषदों
के सम्बन्ध में भी पाया जाता है । आदि काल में ऐसा भेद न
था । लोगों को चारों वेद पढ़ने पढ़ाने की प्रथा थी । वेद यदि
जीवन से सम्बन्ध रखते हैं तो यह भेद क्यों हो ? यज्ञों में भी
यह भेद क्यों हो ? ऐसा प्रतीत होता है कि आगे चल कर किसी
कारण से वेदज्ञ ब्राह्मणों ने एक एक वेद अपने परिवार के लिये
चुन लिया । कोई ऋग्वेदी हो गये, कोई यजुर्वेदी और कोई
सामवेदी । पीछे से यह सामान्य भेद गहरा भेद हो गया ।
उनकी शाखायें अलग-अलग हो गईं । यज्ञ करने की प्रणाली भी
अलग अलग हो गई । आदि में सुसंगठित आर्यों की आगे
आने वाली भयानक विभिन्नता का यह एक सूत्रपात था । आज
कल भिन्न-भिन्न प्रकार के भेद मनुष्य जाति को विभक्त कर रहे
हैं । एक वेद मत के अनुयायी और वेद को ही अपना धर्म ग्रन्थ
मानने वाले लोगों में तो यह भेद होना दुर्भाग्य की ही बात है।
अस्तु । ऐतरेय ऋग्वेदीय ब्राह्मण है । इसमें होता द्वारा पढ़े जाने
१४ [ ऐतरेय ब्राह्मण
वाले ऋग्वेदीय मंत्रों का ही वाहुल्य है । इसमें ४० अध्याय हैं ।
पाँच पाँच अध्यायों की एक पंचिका कहलाती है । इस प्रकार
ऐतरेय ब्राह्मण में आठ पंचिकायें ( ८ × ५ = ४० ) हैं ।
पहली पंचिका
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