ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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कृत्यों के लिये नहीं रचे गये थे जिनका ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख
हैं । केवल उनका विनियोग हुआ है ।
कहीं-कहीं तो स्पष्टरीत्या प्रकट हो जाता है कि विनियोग
में मन्त्रों का अर्थ संकुचित या विकृत भी हो गया है । यहाँ केवल
एक उदाहरण पर्याप्त होगा :—
ऐतरेय ब्राह्मण के छठे अध्याय ( पंचिका २, अध्याय १ ) के
१०वें खण्ड में ऐसा दिया गया है :—
मनोतायै हविषोऽवदीयमान स्यान्वब्रू हीत्याहाध्वर्युः । इति
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतेति सूक्तमन्वाह इति ।
इस पर सायणाचार्य लिखते हैं :—
तदर्थं हृदयाद्येकादशाङ्गरूपं हविरवदीयते । तस्य हविषोऽनुकूला
ऋचोऽनु ब्रूहीत्यध्वर्युः प्रैषमंत्रं पठेत् ।
अर्थात् अध्वर्यु कहता है कि मनोता के लिये आहुति देने के
लिये जो हृदयादि ११ अंग काटे जाते हैं, उनके प्रसंग के मन्त्र
पढ़ो । इस पर ऋग्वेद मंडल ६, सूक्त १ के "त्वं ह्यग्ने प्रथमो
मनोता" आदि मन्त्र पढ़े जाते हैं ।
हमने अनुवाद में पूरे मन्त्र देकर उनका अर्थ दे दिया है ।
पाठकगण देख लें । उन मन्त्रों में कहीं भी अंगों के काटने का
संकेत तक नहीं है । अर्थ उत्तम और शुद्ध हैं । कोई घातक
क्रिया करने का आदेश नहीं है । फिर भी पशु-बलि के साथ
उनका विनियोग करके उनके अर्थों को विकृत कर दिया गया ।
जो कोई यज्ञ में वध-क्रिया और मन्त्र पाठ को देखेगा यही
समझेगा कि मन्त्रों में पशुबध का आदेश होगा तभी तो पढ़े
जाते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है ।
वैदिक साहित्य के विद्वानों में प्रायः इस बात पर मतभेद है
कि ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना वेदों में है या नहीं । हमने ऊपर
जो कुछ लिखा है उससे यह गन्ध आती है कि ब्राह्मण ग्रन्थों