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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 592 में से

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पृष्ठ 16

२ [ ऐतरेय-ब्राह्मण
कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जब यज्ञ रचे गये और
उनमें पढ़ने के लिये मंत्र छांटे गये तो वह मंत्र छांटे गये जिनके
शब्दों से उस क्रिया का लगभग वर्णन प्रकट होता हो ।
विनियोग में जितने मंत्र पढ़े जाते हैं उन सब में रूप-समृद्धता
नहीं होती। परन्तु रूप-समृद्धता अच्छी समझी जाती है। इससे
स्पष्ट है कि याज्ञिक लोगों ने यज्ञ में मंत्रों का विनियोग किया ।
अर्थात् उन्होंने यह निश्चय किया कि अमुक अमुक मंत्र अमुक
अमुक स्थान पर बोले जायेंगे। ब्राह्मण ग्रन्थों में इन्हीं मंत्रों का
वर्णन आता है।
यहाँ प्रश्न उठतां है कि विनियोग के अनुसार मन्त्र बनाये
गये या मन्त्र पहले बने हुये थे उनको पीछे से यज्ञ में विनियुक्त
कर लिया गया। ऐतरेय, शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों को देखने
से कभी-कभी यह धारणा हो जाती है कि मन्त्रों के निर्माण का
प्रयोजन केवल उनका यज्ञ-सम्बन्धी विनियोग ही था, अर्थात्
उन क्रियाओं से बाहर मन्त्रों का कोई प्रयोजन है ही नहीं।
मध्यकालीन वेदभाष्यकारों ने वेदों का भाष्य इसी धारणा से
किया है। वहाँ विनियोग मुख्य है और अर्थ गौण। परन्तु ऐसा
कथन युक्ति-संगत प्रतीत नहीं होता। हमारे पक्ष में ब्राह्मण ग्रन्थों
में बहुत से प्रमाण मिलेंगे। यहाँ केवल एक को ही उद्धृत किया
जाता है :—
तदाहुरुदुत्यं जातवेदसमिति सौर्याणि प्रतिपद्येतेति ।
तत्तन्नाऽऽदृत्यं यथैव गत्वा काष्ठामपराध्नुयात् तादृक् तत् ।
(ऐतरेय ब्रा० ४।२।६)
“कुछ लोगों का मत है कि इस स्थल पर “उदुत्यं जातवेदसं”
(ऋ० १।५०।१) सूर्य का मन्त्र पढ़ कर आरम्भ करे। परन्तु
यह ठीक नहीं है। मानो दौड़ने में उद्दिष्ट सीमा को ही भूल
जाय।”