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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 592 में से

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पृष्ठ 217

तीसरा अध्याय ] २०३
उसी पेट से जन्मती है और स्त्री दूसरे पेट से, इसलिये स्त्री को
पहले भोजन देना चाहिये ।
अब वह राका का मंत्र पढ़ता है । राका ही पुरुष की इन्द्रिय
की सीवन को सिया करती है । जो इस रहस्य को समझता है
उसके पुत्र ( पुमान् सन्तान ) उत्पन्न होते हैं ।
अब पावीरवी मंत्र को पढ़ता है । वाणी ही सरस्वती
पावीरवी है । इसको पढ़कर वह यजमान में वाणी धारण
कराता है । इस पर प्रश्न होता है कि पहले यम का मंत्र पढ़ें
या पितरों का । पहले यम का पढ़ाना चाहिये :—
इमं यम प्रस्तर मा हि सीदाऽङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः । आ त्वा
मंत्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषा मादयस्व । ( ऋ० १०।१४।४ )
राजा को पहले पीने का अधिकार है । इसलिये यम का मंत्र
ही पहले पढ़े ।
इसके बाद ही काव्यों का मंत्र पढ़े :—
मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पति र्ऋक्वभिर्वावृधानः । यांश्चदेवा
वावृधुर्यं च देवान् त्स्वाहान्ये स्वधयान्येमदन्ति ॥ ( ऋ० १०।१४।३ )
काव्य देवों से छोटे और पितरों से बड़े हैं । इसलिये काव्यों
का मंत्र पढ़ने के बाद पितरों के तीन मंत्र पढ़ता है :—
( १ ) उदीरतामवर उत्परास उन् मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं
य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु । ( ऋ० १०।१५।१ )
( २ ) आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च
विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ।
( ऋ० १०।१५।३ )
( ३ ) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ।
( ऋ० १०।१५।२ )