आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)
Aditya Hridaya Stotram with Hindi Meaning
महर्षि वाल्मीकि (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १०
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८ ॥
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९ ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १० ॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥ ११ ॥
आदित्यहृदय स्तोत्र मूल श्लोक एवं सान्वय हिन्दी अर्थ (श्लोक १-३१)
आदित्यहृदयस्तोत्रम् ११
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहस्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥१२॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः॥१३॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥१४॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१५॥
'भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणोंसे सुशोभित (रश्मिमान्)
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १२
हैं। ये नित्य उदय होनेवाले (समुद्यन्), देवता और असुरोंसे नमस्कृत,
विवस्वान् नामसे प्रसिद्ध, प्रभाका विस्तार करनेवाले (भास्कर) और
संसारके स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका [रश्मिमते नमः, समुद्यते
नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय
नमः—इन नाम-मन्त्रोंके द्वारा] पूजन करो। ‘सम्पूर्ण देवता इन्हींके
स्वरूप हैं। ये तेजकी राशि तथा अपनी किरणोंसे जगत्को सत्ता एवं
स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही अपनी रश्मियोंका प्रसार करके
देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं। ये ही
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा,
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १३
वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि,
प्रजा, प्राण, ऋतुओंको प्रकट करनेवाले तथा प्रभाके पुंज हैं। इन्हींके
नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), सूर्य
(सर्वव्यापक), खग (आकाशमें विचरनेवाले), पूषा (पोषण करनेवाले),
गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता
(ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके बीज), दिवाकर (रात्रिका अन्धकार दूर करके
दिनका प्रकाश फैलानेवाले), हरिदश्व (दिशाओंमें व्यापक अथवा हरे
रंगके घोड़ेवाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणोंसे सुशोभित), सप्तसप्ति
(सात घोड़ोंवाले), मरीचिमान् (किरणोंसे सुशोभित), तिमिरोन्मथन
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १४
(अन्धकारका नाश करनेवाले), शम्भु (कल्याणके उद्गम स्थान), त्वष्टा
(भक्तोंका दुःख दूर करने अथवा जगत्का संहार करनेवाले),
मार्तण्डक (ब्रह्माण्डको जीवन प्रदान करनेवाले), अंशुमान् (किरण
धारण करनेवाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभावसे ही सुख
देनेवाले), तपन (गर्मी पैदा करनेवाले), अहस्कर (दिनकर), रवि
(सबकी स्तुतिके पात्र), अग्निगर्भ (अग्निको गर्भमें धारण करनेवाले),
अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन
(शीतका नाश करनेवाले), व्योमनाथ (आकाशके स्वामी), तमोभेदी
(अन्धकारको नष्ट करनेवाले), ऋग्, यजुः और सामवेदके पारगामी,
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १५
घनवृष्टि (घनी वृष्टिके कारण), अपां मित्र (जलको उत्पन्न करनेवाले),
विन्ध्यवीथीप्लवंगम (आकाशमें तीव्र वेगसे चलनेवाले), आतपी (घाम
उत्पन्न करनेवाले), मण्डली (किरणसमूहको धारण करनेवाले), मृत्यु
(मौतके कारण), पिंगल (भूरे रंगवाले), सर्वतापन (सबको ताप
देनेवाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त
(लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्तिके कारण), नक्षत्र, ग्रह
और तारोंके स्वामी, विश्वभावन (जगत्की रक्षा करनेवाले), तेजस्वियोंमें
भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त) हैं।
[इन सभी नामोंसे प्रसिद्ध सूर्यदेव!] आपको नमस्कार है'॥ ६—१५॥
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १६
‘Worship (you) the sun-god, the ruler of the worlds, who is
crowned with rays, (nay) who appears at the horizon (every
day without fail), who is greeted by gods and demons (alike)
and brings light (to the world). Indeed, he is the embodiment of
all gods and full of glory and creates and sustains the gods
and the demons as well as their worlds, by his rays. Indeed’ he
is the same as Brahmā (the creator) as well as Viṣṇu (the
Protector of the universe), Lord Śiva (the god of destruction),
Skanda (son of Lord Śiva), Prajāpati (the lord of creation),
the mighty Indra (the ruler of gods), Kubera (the bestower of
riches), Kāla (the Time-spirit), Yama (the god of retribution),
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १७
Soma (the moon-god), Varuṇa (the ruler of the waters), the
Pitṛs (manes), the (eight) Vasus, the (twelve) Sādhyas, the (two)
Aśvīs (the physicians of gods), the (forty-nine) Maruts (wind-
gods), Manu (a Progenitor of the human race), Vāyu (the wind-
god) and the god of fire. He constitutes (all) created beings, he
is the life-breath (of the universe), the source of the seasons,
the store-house of light, an offspring of Aditi, the progenitor
(of all), the sun-god, the courser in the heavens, the nourisher
(of all), the possessor of rays, the golden, the brilliant, the one
whose energy constitutes the seed of the universe and the maker
of day. He has seven green horses (yoked to his chariot), is
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १८
myriad-rayed, full of rays, the destroyer of darkness, the source
of happiness, the mitigator of the suffering of his devotees, the
infuser of life in the lifeless cosmic egg, all-pervading and the
cause of the creation, preservation and destruction of the
universe. He is blissful by nature, the ruler of all, the bringer of
day and the Teacher. As a son of Aditi, he bears the fire of
dissolution in his womb, is bliss personified and all-enveloping
(like space), the destroyer of cold, the lord of the heavens, the
disperser of darkness, a master of the three Vedas (Ṛk, Sāma
and Yajuṣ), the sender of thick showers and the friend (giver)
आदित्यहृदयस्तोत्रम् १९
of water. He courses swiftly along his own orbit, carries in
him the resolve to evolve the universe and is adorned with
a circle of rays. He is death (itself)’ tawny (of hue) and the
destroyer of all. He is omniscient, all-formed, endowed with
extraordinary brilliance, coppery, the source of all evolutes,
the controller of (all) lunar mansions, planets and stars, the
creator of all, the resplendent among the splendid. O god
appearing in twelve forms (in the shape of twelve months of the
year), hail to you !’ (6—15)
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २०
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते॥ १८॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २१
'पूर्वगिरि—उदयाचल तथा पश्चिमगिरि—अस्ताचलके रूपमें
आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों)-के स्वामी
तथा दिनके अधिपति आपको प्रणाम है। आप जयस्वरूप तथा
विजय और कल्याणके दाता हैं। आपके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते
रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणोंसे सुशोभित
भगवान् सूर्य! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदितिके पुत्र होनेके
कारण आदित्यनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। उग्र
(अभक्तोंके लिये भयंकर), वीर (शक्ति-सम्पन्न) और सारंग
(शीघ्रगामी) सूर्यदेवको नमस्कार है। कमलोंको विकसित करनेवाले
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २२
प्रचण्ड तेजधारी मार्तण्डको प्रणाम है। (परात्पर-रूपमें) आप
ब्रह्मा, शिव और विष्णुके भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा है, यह
सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाशसे परिपूर्ण हैं, सबको
स्वाहा कर देनेवाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण
करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। आप अज्ञान और अन्धकारके
नाशक, जडता एवं शीतके निवारक तथा शत्रुका नाश करनेवाले
हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नोंका नाश करनेवाले,
सम्पूर्ण ज्योतियोंके स्वामी और देवस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है।
आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्णके समान है, आप हरि (अज्ञानका हरण
फलश्रुति, सूर्य अष्टोत्तरशतनामावली एवं सूर्य नमस्कार विधि
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २३
करनेवाले) और विश्वकर्मा (संसारकी सृष्टि करनेवाले) हैं; तमके
नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत्के साक्षी हैं; आपको नमस्कार
है' ॥ १६-२१॥
'Hail to (you in the form of) the eastern mountain and hail to
the western mountain. Hail to the Lord of hosts of luminaries, the
lord of the day. Hail to (you), the giver of victory, hail to (you), the
joy born of victory! Hail to (you), the god having green horses
(yoked to your chariot). Hail, hail to you with thousands of rays!
Hail, hail to you, son of Aditi ! Hail to (you), the subduer of the senses,
the valiant one! Hail to you as denoted by the mystic syllable OṀ!
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २४
Hail to (you), the awakener of the lotus ! Hail to you, the
fierce one ! Hail (to you), ruler of Brahmā, Lord Śiva and
Lord Viṣṇu (the infallible)! Hail to (you), the sun-god,
the (spiritual) light indwelling the solar orb, the resplendent
one, the devourer of all, appearing in the form of Rudra (who
drives away ignorance). Hail to (you), the dispeller of darkness,
the destroyer of cold, the exterminator of foes, the one
whose extent is immeasurable, the destroyer of the ungrateful,
the god who are the ruler of (all) lights ! Hail to you, possessing
the lustre of refined gold, the dispeller of ignorance, the architect
of the universe, the uprooter of darkness, splendour incarnate,
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २५
the onlooker of the world !’ (16—21)
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२ ॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३ ॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः ॥ २४ ॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५ ॥
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २६
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यति ॥ २६ ॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥ २७ ॥
'रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतोंका संहार, सृष्टि और
पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणोंसे गर्मी पहुँचाते और वर्षा
करते हैं। ये सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर उनके सो
जानेपर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री
पुरुषोंको मिलनेवाले फल हैं। (यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले) देवता,
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २७
यज्ञ और यज्ञोंके फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें जितनी
क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देनेमें ये ही पूर्ण समर्थ हैं। राघव !
विपत्तिमें, कष्टमें, दुर्गम मार्गमें तथा और किसी भयके अवसरपर
जो कोई पुरुष इन सूर्यदेवका कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं
भोगना पड़ता। इसलिये तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव
जगदीश्वरकी पूजा करो। इस आदित्यहृदयका तीन बार जप करनेसे
कोई भी युद्धमें विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी
क्षण रावणका वध कर सकोगे।' यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये
थे, उसी प्रकार चले गये॥ २२—२७॥
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २८
'The aforesaid Lord alone actually destroys, brings into
existence and sustains (all) that has come into being. He
(alone) radiates heat by his rays and sends showers. Planted
in (all) created beings (as their Inner Controller), he remains
awake when they have fallen asleep. Nay, he himself is the
act of pouring oblations into the sacred fire as well as the
fruit attained by those who pour such oblations. Nay, he
comprises (all) the gods as well as the sarifices as also the
fruit of sacrifices. Again, he is the Supreme Controller of (all)
activities which are found in all living beings. No individual
celebrating the aforesaid Lord (through the foregoing
आदित्यहृदयस्तोत्रम् २९
encomium) in straits, in difficulties, in the woods as well as
in times of peril' comes to grief, O scion of Raghu! Worship
the aforesaid Lord of the universe, the adored of (all) gods,
with a concentrated mind. Muttering this praise (as many
as) three times, one will come out victorious in combats.
You will (be able to) make short work of Rāvaṇa this
(very) moment, O mighty armed one!' Saying so, the
celebrated Sage Agastya thereupon left in the same way as
he had come. (22—27)
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥