आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)

आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)
Aditya Hridaya Stotram with Hindi Meaning
महर्षि वाल्मीकि (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished32 पृष्ठ
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आदित्यहृदयस्तोत्रम् २६
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यति ॥ २६ ॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥ २७ ॥
'रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतोंका संहार, सृष्टि और
पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणोंसे गर्मी पहुँचाते और वर्षा
करते हैं। ये सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर उनके सो
जानेपर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री
पुरुषोंको मिलनेवाले फल हैं। (यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले) देवता,