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सर्वकोश
आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)

आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)

Aditya Hridaya Stotram with Hindi Meaning

महर्षि वाल्मीकि (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished32 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

आदित्यहृदयस्तोत्रम् २७
यज्ञ और यज्ञोंके फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें जितनी
क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देनेमें ये ही पूर्ण समर्थ हैं। राघव !
विपत्तिमें, कष्टमें, दुर्गम मार्गमें तथा और किसी भयके अवसरपर
जो कोई पुरुष इन सूर्यदेवका कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं
भोगना पड़ता। इसलिये तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव
जगदीश्वरकी पूजा करो। इस आदित्यहृदयका तीन बार जप करनेसे
कोई भी युद्धमें विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी
क्षण रावणका वध कर सकोगे।' यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये
थे, उसी प्रकार चले गये॥ २२—२७॥