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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages
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उपशम ३७७
वैश्य (विधिप्राप्त), स्त्री-पुरुष कोई क्यों न हो, मेरी शरण आकर परमगति को
प्राप्त होता है। अतः इस कल्याण-पथ में स्त्रियों का वही स्थान है, जो एक
पुरुष का है।
भौतिक समृद्धि- गीता परमकल्याण तो देती है, साथ ही मनुष्यों के
लिये आवश्यक भौतिक वस्तुओं का भी विधान करती है। अध्याय ९/२०-२२
में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि बहुत से लोग निर्धारित विधि से मुझे पूजकर
बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं। उन्हें विशाल स्वर्गलोक मिलता है, मैं देता
हूँ। जो माँगोगे, वह मुझसे मिलेगा; किन्तु उपभोग के पश्चात् समाप्त हो
जायेगा, क्योंकि स्वर्ग के भोग भी नश्वर हैं। उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ेगा। हाँ,
मुझसे सम्बन्धित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते; क्योंकि मैं कल्याणस्वरूप
हूँ। मैं उन्हें भोग देता हूँ और शनैः-शनैः निवृत्त कराकर पुनः उन्हें कल्याण में
लगा देता हूँ।
क्षेत्र- जिन परमात्मा के श्रीमुख की वाणी यह गीता है उन्होंने स्वयं
परिचय दिया, ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’- अर्जुन ! यह शरीर
ही क्षेत्र (खेत) है, जिसमें बोया गया भला और बुरा कर्मबीज संस्काररूप में
जमता है और कालान्तर में सुख-दुःख का रूप लेकर भोग के रूप में मिलता
है। आसुरी सम्पद् अधम योनियों में ले जाने के लिये है, जबकि दैवी सम्पद्
परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलाती है। सद्गुरु के सान्निध्य में इनमें निर्णायक
युद्ध का आरंभ होता है, यही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है।
कुछेक टीकाकार कहते हैं- एक कुरुक्षेत्र बाहर है और दूसरा मन के
भीतर है। गीता का एक अर्थ बाहरी है, दूसरा भीतरी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं
है। वक्ता एक बात कहता है; किन्तु श्रोता अपनी बुद्धि के अनुरूप ही उसे
पकड़ पाते हैं, इसीलिये अनेक अर्थ प्रतीत होते हैं। साधन-पथ पर क्रमशः
चलकर जो भी पुरुष श्रीकृष्ण के स्तर पर खड़ा हो जायेगा, तो जो दृश्य
श्रीकृष्ण के सामने था, वही उसके सामने भी होगा। वही महापुरुष उनके
मनोगत भावों को, गीता के संकेतों को समझ सकता है, समझा सकता है।
गीता का एक भी श्लोक बाहर का चित्रण नहीं करता। खाना, पहनना,
रहना आप जानते ही हैं। रहन-सहन, मान्यता, लोकरीति-नीति में देश-काल

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३७८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
और परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तन प्रकृति की देन है। इसमें श्रीकृष्ण
आपको कौन-सी व्यवस्था दें? कहीं लड़कियों का बाहुल्य है, बहु विवाह होते
हैं, तो कहीं उनकी संख्या कम है। कहीं कई भाइयों के बीच एक पत्नी रह लेती
है- इसमें श्रीकृष्ण कौन-सी व्यवस्था दें। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान
में जनसंख्या की कमी समस्या बन गयी तो तीस बच्चों को जन्म देने वाली
एक महिला को मदरलैंड (देश की माता) की उपाधि से सम्मानित किया
गया। वैदिककालीन भारत में पहले दस सन्तान उत्पन्न करने का विधान था,
अब 'एक या दो बच्चे, होते हैं घर में अच्छे' का नारा लग रहा है। कदाचित्
वे न रहें तो देश के लिए चिन्ता का विषय नहीं, समस्या का हल ही होता है।
श्रीकृष्ण इसमें कौन-सी व्यवस्था दें?
श्रेय- काम, क्रोध, लोभ, मोह के कहीं स्कूल नहीं खुले हैं, फिर भी
इन विकारों में लड़के बड़े तथा सयानों से कहीं अधिक प्रवीण निकलते हैं।
इसमें श्रीकृष्ण क्या शिक्षा दें? यह सब तो प्रकृति द्वारा स्वचालित हैं। कभी वेद
पढ़ाये जाते थे, धनुर्वेद-गदायुद्ध सिखाया जाता था, आज इन्हें कौन सीखता
है? आज तो पिस्टल चला रहे हैं। स्वचालित यन्त्रों का युग है। कभी रथ-
संचालन सीखना पड़ता था, घोड़ों की लीद फेंकनी पड़ती थी; आज मोटरों का
तेल साफ किया जाता है। इसमें श्रीकृष्ण क्या बतायें? कह दें कि घोड़ों को ऐसे
मत मलो ! बाहर आपको कैसी व्यवस्था दें? पहले स्वाहा बोलने से वर्षा होती
थी, आज मनचाही फसल लेने लगे हैं। योगेश्वर कहते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न
गुणों द्वारा परवश होकर मनुष्य परिस्थिति के अनुसार ढलता ही रहता है। गुण
स्वतः उन्हें ढालने में सक्षम हैं। भौतिकशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, अर्थशास्त्र,
तर्कशास्त्र वह गढ़ता ही रहता है। एक ही वस्तु ऐसी है जो मनुष्य नहीं जानता,
नहीं पहचानता। जो है तो उसी के पास किन्तु उसे विस्मृत है। गीता सुनकर
अर्जुन की वही स्मृति लौट आयी थी। वह स्मृति है परमात्मा की, जो हृदय-
देश में होकर भी उससे बहुत दूर है। उसी को मनुष्य पाना चाहता है; किन्तु
रास्ता नहीं पाता। केवल कल्याण-पथ से ही मनुष्य अनभिज्ञ है। मोह का
आवरण इतना घना है कि उधर सोचने का समय ही नहीं मिलता। उन
महापुरुष ने आपके लिये समय दिया है, उस कर्म को स्पष्ट किया है, जिसे

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उपशम ३७९
करने का निर्देश गीता में है। गीता मुख्यतः यही देती है। भौतिक वस्तुएँ भी
उससे मिलती हैं; किन्तु श्रेय की तुलना में प्रेय नगण्य हैं।
योग-प्रदाता- योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार कल्याण-पथ की जानकारी,
उसका साधन और उसकी प्राप्ति सद्गुरु से होती है। इधर-उधर तीर्थों में बहुत
भटकने या बहुत परिश्रम से यह तब तक नहीं मिलता, जब तक किसी सन्त
द्वारा न प्राप्त किया जाय। अध्याय ४/३४ में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू
किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर, भली प्रकार दण्ड-प्रणाम कर,
निष्कपट भाव से सेवा करके, प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त कर। प्राप्ति का
एकमात्र उपाय है, किसी महापुरुष का सान्निध्य और उनकी सेवा। उनके
अनुसार चलकर योग की संसिद्धिकाल में पायेगा। अध्याय १८/१८ में उन्होंने
बताया कि परिज्ञाता अर्थात् तत्त्वदर्शी महापुरुष, ज्ञान अर्थात् जानने की विधि
और ज्ञेय परमात्मा- तीनों कर्म के प्रेरक हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार महापुरुष
ही कर्म के माध्यम हैं, न कि केवल पुस्तक। किताब तो एक नुस्खा है। नुस्खा
रटने से कोई नीरोग नहीं होता बल्कि उसे अमल में लाना है।
नरक- अध्याय १६/१६ में आसुरी सम्पद् का वर्णन करते हुए योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि अनेक प्रकार से भ्रमित चित्तवाले, मोह में फँसे आसुरी
स्वभाववाले मनुष्य अपवित्र नरक में गिरते हैं। प्रश्न स्वाभाविक है कि नरक
है कैसा और किसे कहते हैं? इसी क्रम में स्पष्ट करते हैं कि मुझसे द्वेष
रखनेवाले नराधमों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ, अजस्र
आसुरी योनियों में गिराता हूँ। यही नरक है। इस नरक का द्वार क्या है? उन्होंने
बताया कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं, जिनमें आसुरी सम्पद्
गठित होती है। अतः बारम्बार कीट-पतंग, पशु इत्यादि योनियों में आना ही
नरक है।
पिण्डदान- प्रथम अध्याय में विषादग्रस्त अर्जुन को आशंका थी कि
युद्धजनित नरसंहार से पितर लोग पिण्डदान और तर्पण से वंचित हो जायेंगे,
पितर गिर जायेंगे। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तुझे यह अज्ञान
कहाँ से हो गया? पिण्डोदक क्रिया को योगेश्वर ने अज्ञान कहा और बताया कि
जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को त्यागकर मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता

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३८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
है, ठीक इसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर तत्काल शरीररूपी
नवीन वस्त्र को ग्रहण कर लेता है। यहाँ शरीर मात्र एक वस्त्र है और जब
आत्मा ने केवल वस्त्र बदला, वह मरा नहीं, नश्वर शरीर को ही बदला है,
उसकी व्यवस्थाएँ पूर्ववत् हैं तो इस भोजन (पिण्डदान), आसन, शय्या,
सवारी, आवास या जल इत्यादि से किसे तृप्त किया जाता है? यही कारण है
कि योगेश्वर ने इसे अज्ञान कहा। अध्याय १५/७ में इसी पर बल देते हुए
कहते हैं कि यह आत्मा मेरा सनातन अंश है, स्वरूप है और मन तथा पाँचों
इन्द्रियों के कार्य-कलापजन्य संस्कार को लेकर दूसरे शरीर को धारण कर
लेता है और मनसहित षट् इन्द्रियों के द्वारा अगले शरीर में विषय-भोगों को
भोगता है। आत्मा ने जिस शरीर को धारण किया, वहाँ भी भोग-सामग्री
उपलब्ध है, फिर पिण्डदान क्यों दिया जाता है?
इधर एक शरीर को छोड़ा, उधर दूसरे शरीर को धारण किया। वह
सीधा उस शरीर में जाता है। बीच में कोई विराम नहीं, कोई स्थान नहीं तो
हजारों पीढ़ियों के पितरों का अनादिकाल से पड़े रहना और उनकी जीविका
वंश-परम्परा के हाथ निर्धारित करना तथा पिंजड़े के पक्षी की तरह उनका
रुदन, पतन एक अज्ञान मात्र है। इसीलिये श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान कहा।
पाप और पुण्य- इस प्रश्न पर समाज में अनेक भ्रान्तियाँ हैं; किन्तु
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार रजोगुण से उत्पन्न यह काम और क्रोध भोगों से
कभी तृप्त न होनेवाले महान् पापी हैं। अर्थात् काम ही एकमात्र पापी है। पाप
का उद्गम काम है, कामनाएँ हैं। ये कामनाएँ रहती कहाँ हैं? श्रीकृष्ण ने
बताया कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। जब विकार
तन में नहीं, मन में ही होते हैं तो शरीर धोने से क्या होगा?
श्रीकृष्ण के अनुसार इस मन की शुद्धि होती है नाम-जप से, ध्यान से,
समकालीन किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की सेवा से, उनके प्रति समर्पण से,
जिसके लिये वे ४/३४ में प्रोत्साहित करते हैं कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन'-सेवा
और प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त करो, जिससे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अध्याय ३/१३ में उन्होंने कहा कि यज्ञ से शेष बचे अन्न को खानेवाले
सन्तजन सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं और जो शरीर के लिये कामना करते हैं,

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उपशम ३८१
वे पापी पाप ही खाते हैं। यहाँ यज्ञ चिन्तन की एक निश्चित क्रिया है, जिससे
मन में निहित चराचर जगत् के संस्कार जल जाते हैं। शेष केवल ब्रह्म ही
बचता है। अतः शरीर के जन्म का जो कारण है, वही पाप है और जो उस
अमृत-तत्त्व को दिलानेवाला है, जिसके पश्चात् कभी शरीर धारण न करना
पड़े, वही पुण्य है।
अध्याय ७/२९ में वे कहते हैं- मेरी शरण होकर जरा-मरण और दोषों
से छूटने के लिये यत्न करनेवाले पुण्यकर्मी जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया
है, वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण कर्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को तथा भली प्रकार
मुझे जानते हैं और मुझे जानकर मुझमें ही स्थित रहते हैं। अतः पुण्यकर्म वह
है जो जरा, मरण और दोषों से ऊपर उठाकर शाश्वत की जानकारी और उसी
में सदा के लिये स्थिति दिलाता है। और जो जन्म-मृत्यु, जरा-मरण, दुःख-
दोषों की परिधि में घुमाकर रखता है, वही पापकर्म है।
अध्याय १०/३ में कहते हैं- जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त
से रहित सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है,
वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों
से मुक्त हो जाता है। अतः साक्षात्कार के साथ ही सम्पूर्ण पापों से निवृत्ति
मिलती है।
सारांशतः बार-बार जन्म-मृत्यु का कारण ही पाप है और जो उससे
बचाकर शाश्वत परमात्मा की ओर घुमा दे, परमशान्ति की प्राप्ति करा दे, वही
पुण्यकर्म है। सच बोलना, केवल अपने परिश्रम का खाना, स्त्रियों में मातृ-
भाव, ईमानदारी इत्यादि भी इस पुण्यकर्म के सहायक अंग हैं; किन्तु सर्वोत्कृष्ट
पुण्य है परमात्मा की प्राप्ति। जो मात्र एक परमात्मा की श्रद्धा को तोड़ता है,
वह पाप है।
सन्त सब एक- गीता, अध्याय ४/१ में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया-
इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में मैंने सूर्य के प्रति कहा था। किन्तु
श्रीकृष्ण के पूर्वकालीन इतिहास अथवा अन्य किसी भी शास्त्र में कृष्ण-नाम
का उल्लेख नहीं मिलता।

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३८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वास्तव में श्रीकृष्ण एक पूर्ण योगेश्वर हैं। वे एक अव्यक्त और अविनाशी
भाव की स्थिति के हैं। जब कभी परमात्मा से मिलानेवाली क्रिया अर्थात् योग
का सूत्रपात किया गया तो इसी स्थितिवाले किसी महापुरुष ने किया, चाहे वह
राम हों या ऋषि जरथुस्त्र ही क्यों न रहे हों। परवर्तीकाल में यही उपदेश ईसा,
मुहम्मद, गुरुनानक इत्यादि जिस किसी के द्वारा निकला, कहा श्रीकृष्ण ने ही।
अतः सभी महापुरुष एक ही हैं। सब-के-सब एक ही बिन्दु का स्पर्श
कर एक ही स्वरूप को पाते हैं। यह पद एक इकाई है। अनेक पुरुष इस पथ
पर चलेंगे; लेकिन जब पायेंगे, एक ही पद को पायेंगे। ऐसी अवस्था को प्राप्त
सन्त का शरीर एक मकान मात्र रह जाता है। वे शुद्ध आत्मस्वरूप हैं। ऐसी
स्थितिवालों ने कभी कुछ कहा, तो एक योगेश्वर ने ही कहा।
सन्त कहीं-न-कहीं तो जन्म लेता ही है। पूरब अथवा पश्चिम में,
श्याम अथवा श्वेत परिवार में, पूर्वप्रचलित किन्हीं धर्मावलम्बियों के बीच
अथवा अबोध कबीलों में, सामान्य जीवन जीनेवाले गरीब अथवा अमीरों में
जन्म लेकर भी सन्त उनकी परम्परावाला नहीं होता। वह तो अपने लक्ष्य
परमात्मा को पकड़कर स्वरूप की ओर अग्रसर हो जाता है, वही हो जाता है।
उसके उपदेशों में जाति-पाँति, वर्गभेद और अमीर-गरीब की दीवारें नहीं रहती
हैं। यहाँ तक कि उसकी दृष्टि में नर-मादा का भेद भी नहीं रह जाता (देखें,
गीता, १५/१६- द्वाविमौ पुरुषौ लोके)।
महापुरुषों के पश्चात् उनके अनुयायी अपना सम्प्रदाय बनाकर संकुचित
हो जाते हैं। किसी महापुरुष के पीछे चलनेवाले यहूदी हो जाते हैं, तो किसी के
अनुयायी ईसाई, मुसलमान, सनातनी इत्यादि हो जाते हैं; किन्तु इन दीवारों से
सन्त का सम्बन्ध कदापि नहीं होता। सन्त न तो कोई साम्प्रदायिक है और न
कोई जाति। सन्त सन्त हैं, उन्हें किसी सामाजिक संगठन में न समेटें।
अतः संसार भर के सन्तों की, चाहे किसी कबीले में उनका जन्म हुआ
है, चाहे किसी मज़हब सम्प्रदाय वाले उनका पूजन अधिक करते हों, किसी
साम्प्रदायिक प्रभाव में आकर ऐसे सन्तों की आलोचना नहीं करनी चाहिये;
क्योंकि वे निरपेक्ष हैं। संसार के किसी भी स्थान में उत्पन्न सन्त निन्दा के योग्य

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उपशम ३८३
नहीं होता। यदि कोई ऐसा करता है तो वह अपने अन्दर स्थित अन्तर्यामी
परमात्मा को दुर्बल करता है, अपने परमात्मा से दूरी पैदा कर लेता है, स्वयं
अपनी क्षति करता है। संसार में जन्म लेनेवालों में यदि आपका कोई सच्चा
हितैषी है तो सन्त ही। अतः उनके प्रति सहृदय रहना संसार भर के लोगों का
मूल कर्त्तव्य है। इससे वंचित होना अपने को धोखा देना है।
वेद- गीता में वेद का वर्णन बहुत आया है; किन्तु कुल मिलाकर वेद
मार्ग-निर्देशक (Mile Stone) चिह्न मात्र हैं। मंजिल तक पहुँच जाने पर उस
व्यक्ति के लिये उनका उपयोग समाप्त हो जाता है। अध्याय २/४५ में श्रीकृष्ण
ने कहा- अर्जुन! वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश कर पाते हैं, तू वेदों के
कार्यक्षेत्र से ऊपर उठ। अध्याय २/४६ में कहा- सब ओर से परिपूर्ण स्वच्छ
जलाशय प्राप्त होने पर छोटे जलाशय से मनुष्य का जितना प्रयोजन रह जाता
है, अच्छी प्रकार ब्रह्म के ज्ञाता महापुरुष अर्थात् ब्राह्मण का वेदों से उतना ही
प्रयोजन रह जाता है; किन्तु दूसरों के लिये तो उनका उपयोग है ही। अध्याय
८/२८ में कहा- अर्जुन! मुझे तत्त्व से भलीभाँति जान लेने पर योगी वेद, यज्ञ,
तप, दान इत्यादि के पुण्यफलों को पार कर सनातन पद को प्राप्त हो जाता है।
अर्थात् जब तक वेद जीवित हैं, यज्ञ करना शेष है, तब तक सनातन पद की
प्राप्ति नहीं है। अध्याय १५/१ में बताया- ऊपर परमात्मा ही जिसका मूल है,
नीचे कीट-पतंगपर्यन्त प्रकृति जिसकी शाखा-प्रशाखा है, संसार ऐसा पीपल
का एक अविनाशी वृक्ष है। जो इसे मूलसहित जानता है, वह वेद का ज्ञाता है।
इस जानकारी का स्रोत महापुरुष हैं, उनके द्वारा निर्दिष्ट भजन है। पुस्तक या
पाठशाला भी उन्हीं की ओर प्रेरित करते हैं।
ओम्- श्रीकृष्ण के निर्देशन में ॐ के जप का विधान पाया जाता है।
अध्याय ७/८- ओंकार मैं हूँ। ८/१३- ॐ का जप कर और मेरा चिन्तन कर।
अध्याय ९/१७- जानने योग्य पवित्र ओंकार मैं हूँ। अध्याय १०/३३- अक्षरों
में 'अकार' हूँ। १०/२५- वचनों में एक अक्षर मैं हूँ। अध्याय १७/२३- ॐ,
तत् और सत् ब्रह्म का परिचायक है। १७/२४- यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ
ॐ से ही प्रारम्भ होती हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार ॐ का जप नितान्त
आवश्यक है, जिसकी विधि किसी अनुभवी महापुरुष से सीखें।

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३८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति- गीता आदिमानव महाराज
मनु से भी पूर्व प्रकट हुई है- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।'
(४/१) अर्जुन ! इस अविनाशी योग को मैंने कल्प के आदि में सूर्य से कहा
तथा सूर्य ने मनु से कहा। मनु ने उसे श्रवण कर अपनी याददाश्त में धारण
किया; क्योंकि श्रवण की गयी वस्तु मन की स्मृति में ही रखी जा सकती है।
इसी को मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा। इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना और इस
महत्त्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इसी पृथ्वी में लुप्त हो गया। आरम्भ
में कहने और श्रवण करने की परम्परा थी। लिखा भी जा सकता है- ऐसी
कल्पना नहीं थी। मनु महाराज ने इसे मानसिक स्मृति में धारण किया तथा
स्मृति की परम्परा दी। इसलिये यह गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति है।
भगवान ने यह ज्ञान मनु से भी पूर्व सूर्य से कहा तो इसे 'सूर्यस्मृति' क्यों
नहीं कहते? वस्तुतः सूर्य ज्योतिर्मय परमात्मा का वह अंश है जिससे इस
मानव सृष्टि का सृजन हुआ। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं ही परम चेतन
बीजरूप से पिता हूँ, प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माँ है।" वह बीजरूप पिता
सूर्य है। सूर्य परमात्मा की वह प्रशक्ति है जिसने मानव की संरचना की। वह
कोई व्यक्ति नहीं और जहाँ परमात्मा के उस ज्योतिर्मय तेज से मानव की
उत्पत्ति हुई, उस तेज में वह गीतोक्त ज्ञान भी प्रसारित किया अर्थात् सूर्य से
कहा। सूर्य ने आदि मनु से कहा इसलिये यह अविनाशी योग ही 'मनुस्मृति' है।
सूर्य कोई व्यक्ति नहीं, बीज है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! वही पुरातन योग मैं तेरे लिये कहने
जा रहा हूँ। तू प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है। अर्जुन मेधावी थे, सच्चे अधिकारी
थे। उन्होंने प्रश्न-परिप्रश्नों की श्रृंखला खड़ी कर दी कि- आपका जन्म तो
अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पहले हुआ है। इसे आपने ही सूर्य से
कहा, यह मैं कैसे मान लूँ? इस प्रकार बीस-पच्चीस प्रश्न उन्होंने किये। गीता
के समापन तक उनके सम्पूर्ण प्रश्न समाप्त हो गये, तब भगवान ने, जो प्रश्न
अर्जुन नहीं कर सकते थे, जो उनके हित में थे, उन्हें स्वयं उठाया और
समाधान दिया। अन्ततः भगवान ने कहा- अर्जुन ! क्या तुमने मेरे उपदेश को

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उपशम ३८५
एकाग्रचित्त हो श्रवण किया? क्या मोह से उत्पन्न तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ?
अर्जुन ने कहा-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। ( १८/७३ )
भगवन्! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ। केवल सुना
भर नहीं अपितु स्मृति में धारण कर लिया है। मैं आपके आदेश का पालन
करूँगा, युद्ध करूँगा। उन्होंने धनुष उठा लिया, युद्ध हुआ, विजय प्राप्त की,
एक विशुद्ध धर्म-साम्राज्य की स्थापना हुई और एक धर्मशास्त्र के रूप में वही
आदि धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गयी।
गीता आपका आदि धर्मशास्त्र है। यही मनुस्मृति है, जिसे अर्जुन ने
अपनी स्मृति में धारण किया था। मनु के समक्ष दो कृतियों का उल्लेख है-
एक तो सूर्य से उपलब्ध गीता, दूसरे वेद मनु के समक्ष उतरे। तीसरी कोई कृति
मनु के समय में प्रकट नहीं हुई थी। उस समय लिखने-लिखाने का प्रचलन
नहीं था, कागज-कलम का प्रचलन नहीं था इसलिये ज्ञान को श्रुत अर्थात्
सुनने और स्मृति-पटल पर धारण करने की परम्परा थी। जिनसे मानवों का
प्रादुर्भाव हुआ, सृष्टि के प्रथम मानव उन मनु महाराज ने वेद को श्रुति तथा
गीता को स्मृति का सम्मान दिया।
वेद मनु के समक्ष उतरे थे, इन्हें सुनें, यह सुनने योग्य हैं; किन्तु गीता
स्मृति है, सदा स्मरण रखें। यह हर मानव को सदा रहनेवाला जीवन, सदा
रहनेवाली शान्ति और सदा रहनेवाली समृद्धि, ऐश्वर्यसम्पन्न जीवन प्राप्त
करानेवाला ईश्वरीय गायन है।
भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तू अहंकारवश मेरे उपदेश को नहीं
सुनेगा तो विनष्ट हो जायेगा अर्थात् गीता के उपदेशों की अवहेलना करनेवाला
नष्ट हो जाता है। अध्याय पन्द्रह के अन्तिम श्लोक (१५/२०) में भगवान ने
कहा, ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’- यह गोपनीय से भी अति
गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर तू समस्त ज्ञान और
परमश्रेय की प्राप्ति कर लेगा। अध्याय सोलह के अन्तिम दो श्लोकों में कहा-

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३८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।’ इस शास्त्रविधि को त्यागकर,
कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न
सुख है, न समृद्धि है और न परमगति ही है।
‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’ इसलिये अर्जुन!
तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। इसको
भली प्रकार अध्ययन कर, तत्पश्चात् आचरण कर। तुम मुझमें निवास करोगे,
अविनाशी पद प्राप्त कर लोगे। सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति
और समृद्धि पा लोगे।
गीता मनुस्मृति है और भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार गीता ही धर्मशास्त्र
है। अन्य कोई शास्त्र नहीं, कोई अन्य स्मृति नहीं है। समाज में प्रचलित
अनेकानेक स्मृतियाँ गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम हैं। स्मृतियाँ
कतिपय राजाओं के संरक्षण में प्रशासन चलाने के लिये लिखी गयीं, जिनसे
समाज में ऊँच-नीच की दीवारें सृजित हो गयीं। मनु के नाम पर प्रचारित तथा
कथित मनुस्मृति में मनुकालीन वातावरण का चित्रण नहीं है। मूल मनुस्मृति
गीता एक परमात्मा को ही सत्य मानती है, उसमें विलय दिलाती है; किन्तु
वर्तमान काल में प्रचलित लगभग १६४ स्मृतियाँ परमात्मा का नाम तक नहीं
लेतीं, न परमात्मा की प्राप्ति के उपायों पर प्रकाश डालती हैं। वे केवल स्वर्ग
के आरक्षण तक ही सीमित रहकर ‘न अस्ति’- जो है नहीं, उन्हीं को ही
प्रोत्साहन देती हैं। मोक्ष का उनमें उल्लेख तक नहीं है।
महापुरुष- महापुरुष बाह्य तथा आन्तरिक, व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक,
लोक-रीति और यथार्थ वेद-रीति दोनों की जानकारी रखता है। यही कारण है
कि समस्त समाज को महापुरुषों ने रहन-सहन का विधान बताया और एक
मर्यादित व्यवस्था दी। वशिष्ठ, विश्वामित्र, स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण, महावीर
स्वामी, महात्मा बुद्ध, मूसा, ईसा, मुहम्मद, रामदास, दयानन्द, गुरु गोविन्द
सिंह इत्यादि सहस्रों महापुरुषों ने ऐसा किया; किन्तु व्यवस्थाएँ सामयिक होती
हैं। पीड़ित समाज को भौतिक वस्तु प्रदान करना यथार्थ नहीं है। भौतिक
उलझनें क्षणिक हैं शाश्वत नहीं, इसलिये उनका हल भी तत्सामयिक होता है।
उन्हें चिरंतन व्यवस्था के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता।

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उपशम ३८७
व्यवस्थाकार- सामाजिक विकृतियों को महापुरुष सुलझाया करते हैं।
यदि इन्हें न सुलझाया जाय तो ज्ञान-वैराग्यजनित परम की साधना कौन
सुनेगा? व्यक्ति जिस वातावरण मे फँसा है, उसे वहाँ से हटाकर यथार्थ को
जानने की स्थिति में लाने के लिये अनेकानेक प्रलोभन दिये जाते हैं। एतदर्थ
महापुरुष जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, कोई व्यवस्था देते हैं, वह धर्म नहीं
है। उससे सौ-दो सौ साल की व्यवस्था मिलती है, चार-छः सौ साल के लिये
उदाहरण बन जाता है और हजार दो हजार वर्ष में वह सामाजिक आविष्कार
नवीन परिस्थितियों के साथ-साथ निष्प्राण हो जाता है। गुरु गोविन्द सिंह की
सामाजिक व्यवस्था में शस्त्र अनिवार्य था। क्या अब उस तलवार का शस्त्र के
स्थान पर औचित्य है? ईसा गदहे पर बैठते थे। (मत्ती, २१) गदहे के सम्बन्ध
में उनकी दी हुई व्यवस्थाओं का आज क्या उपयोग है? कहा- किसी का गधा
मत चुराओ। आज गधा कौन पालता है? इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उस
समय के समाज को सम्यक् व्यवस्थित किया, जिसका उल्लेख महाभारत,
भागवत इत्यादि ग्रन्थों में है, साथ ही इन ग्रन्थों में उन्होंने यथार्थ का भी यत्र-
तत्र चित्रण किया। परमकल्याणकारी साधना और भौतिक व्यवस्थाओं के
निर्देश को एक में मिला देने से समाज तत्त्वनिर्णायक क्रम को पूरा-पूरा नहीं
समझ पाता। भौतिक व्यवस्थाओं को वह ज्यों-का-त्यों नहीं बल्कि बढ़ा-
चढ़ाकर ग्रहण करता है; क्योंकि वह भौतिक है। “महापुरुष ने कहा”- ऐसा
कहकर इन व्यवस्थाओं के लिये महापुरुषों की दुहाई भी देते हैं। वे महापुरुष
की वास्तविक क्रिया को तोड़-मरोड़कर उसे भ्रामक बना देते हैं। वेद, रामायण,
महाभारत, बाइबिल, कुरान सबके प्रति पूर्वाग्रहयुक्त धूमिल धारणाएँ शेष हैं।
बाह्य धरातल पर जीवनयापन करनेवाला समाज उनके कथन का स्थूल आशय
ही ग्रहण कर पाता है। इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण ने शाश्वत धाम, अनन्त
जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति प्रदायिनी गीता शास्त्र को भौतिक व्यवस्थाओं से
पृथक् किया। महाभारत भारत का बृहत् इतिहास तथा गौरवशाली संस्कृति
शास्त्र है। उन्होंने इस विशाल इतिहास के मध्य इसका गायन किया, जिससे
भविष्य में आनेवाली समस्त पीढ़ियाँ इस धर्मशास्त्र को धार्मिक धरातल पर
यथावत समझ सकें। कालान्तर में महर्षि पतञ्जलि इत्यादि अनेक महापुरुषों ने

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३८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भी परमश्रेय की यथार्थ विधि को सामाजिक व्यवस्था से हटाकर अलग
प्रस्तुत किया।
गीता मनुष्य मात्र के लिये- भगवान ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश
‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ (गीता, १/२०)- ठीक शस्त्र-सञ्चालन के समय
किया क्योंकि वह भली प्रकार जानते थे कि भौतिक संसार में कभी शान्ति
और सुख होता ही नहीं। अरबों लोगों की आहुति के उपरान्त भी जो विजेता
होंगे, वह भी विफल मनोरथ और अन्ततः उदास ही होंगे, इसलिये उन्होंने ऐसे
शाश्वत युद्ध का परिचय गीता के माध्यम से दिया, जिसमें एक बार विजय हो
जाने पर सदा रहनेवाली विजय, अनन्त विजय और अक्षय धाम है जो मानव
मात्र के लिये सदैव सुलभ है, जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष
का संघर्ष है, अन्तःकरण में अशुभ का अन्त और शुभ परमात्मस्वरूप की
प्राप्ति का साधन है।
उत्तम अधिकारी के प्रति ही उन्होंने उसे व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने बार-
बार कहा कि तुझ अतिशय प्रीति रखनेवाले भक्त के प्रति हित की इच्छा से
कहता हूँ। यह अति गोपनीय है। अन्त में उन्होंने कहा- जो भक्त नहीं हो तो
प्रतीक्षा करो, उसको रास्ते पर लाओ, फिर उसी के लिये कहो। यही मनुष्य
मात्र के लिये यथार्थ कल्याण का एकमात्र साधन है, जिसका क्रमबद्ध वर्णन
श्रीकृष्णोक्त गीता है।
प्रस्तुत टीका- योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रसारित श्रीमद्भगवद्गीता के
आशय का यथावत् अनुवाद करने के कारण प्रस्तुत टीका का नाम ‘यथार्थ
गीता’ है। यह भगवान् की अन्तस्प्रेरणा पर आधारित है। गीता अपने में पूर्ण
साधन-ग्रन्थ है। सम्पूर्ण गीता में सन्देह का एक भी स्थल नहीं है। जहाँ कहीं
सन्देह है, वह बौद्धिक स्तर पर इसे जाना नहीं जा सकता है, इसलिये प्रतीत
होता है। अतः कहीं समझ में न आये तो किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य
में समझने का प्रयास करें।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

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निवेदन
'यथार्थ गीता' योगेश्वर श्रीकृष्ण की परम पुनीत
वाणी श्रीमद्भगवद्गीता का ही अर्थ है। इसमें आपके हृदय
में स्थित परमात्मा की प्राप्ति के विधान का प्राप्ति के
पश्चात् किया गया चित्रण है। अवहेलना की दृष्टि से
इसका उपयोग वर्जित है, अन्यथा हम अपने लक्ष्य की
जानकारी से वंचित रह जायेंगे। इसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन
से मानव अपने कल्याण के साधन से भरपूर हो जाता है
और यत्किंचित् भी ग्रहण करेगा तो परमश्रेय को प्राप्त
कर लेगा; क्योंकि इस ईश्वर-पथ में आरम्भ का कभी
नाश नहीं होता।
– स्वामी अड़गड़ानन्द

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कैसेट प्रसारण में अध्यायों के पूर्व की भूमिका
१. केवल एक परमात्मा में श्रद्धा और समर्पण का सन्देश देनेवाली गीता सबको
पवित्र करने का खुला आमन्त्रण देती है। सृष्टि में कहीं भी रहनेवाले अमीर
अथवा गरीब, कुलीन तथा आदिवासी, पुण्यात्मा और पापी, स्त्री और पुरुष,
सदाचारी एवं अत्यन्त दुराचारी- सबका उसमें प्रवेश है। विशेषकर गीता
पापियों के ही उद्धार का सुगम पथ बताती है, पुण्यात्मा तो भजते ही हैं।
प्रस्तुत है उसी गीता की अद्वितीय व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का कैसेट प्रसारण।
२. शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से की जाती है- एक तो सामाजिक व्यवस्था और
संस्कृति को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुकरण
कर सकें तथा दूसरा यह कि वे शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें। रामचरितमानस,
बाइबिल, कुरान इत्यादि में दोनों पक्षों का समावेश है; किन्तु भौतिक दृष्टि-
प्रधान होने के कारण मनुष्य समाजोपयोगी व्यवस्था को ही पकड़ पाता है।
आध्यात्मिक सूक्तियों को भी वह सामाजिक व्यवस्था के ही सन्दर्भ में देखने
लगता है। कहता है कि ऐसा तो शास्त्र में लिखा है। इसलिये वेदव्यास ने
दोनों के लिये एक ही ग्रन्थ महाभारत लिखते हुए भी आध्यात्मिक क्रिया का
संकलन गीता के रूप में अलग से किया, जिससे कि लोग इस मूल कल्याण-
पथ में भ्रान्ति का मिश्रण न कर सकें। उन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ
प्रस्तुत है गीता का दिव्य सन्देश।
३. गीता किसी विशेष व्यक्ति, किसी जाति, वर्ग, पन्थ, देश-काल या किसी
रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक तथा सार्वकालिक
धर्मशास्त्र है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति, प्रत्येक आयु के प्रत्येक स्त्री-
पुरुष के लिये, सबके लिये है। सचमुच गीता सम्पूर्ण मानव जाति का
धर्मशास्त्र है। और कितने गौरव की बात है कि गीता आपका धर्मशास्त्र है।
४. पूज्य भगवान महावीर, तथागत भगवान बुद्ध विज्ञ होते हुए भी लोकभाषाओं
में गीता के ही सन्देशवाहक हैं। आत्मा सत्य है और पूर्ण संयम से आत्मस्थिति
का विधान है- यह गीता का ही विचार है। बुद्ध ने उसी तत्त्व को सर्वज्ञ तथा
अविनाशी पद कहकर गीता के ही विचार को पुष्ट किया है। इतना ही नहीं

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अपितु विश्व वाङ्मय में धर्म के नाम पर जो कुछ भी सार-सर्वस्व है,
जैसे- एक ईश्वर, प्रार्थना, पश्चाताप, तप इत्यादि गीता के ही उपदेश हैं।
वही उपदेश स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी के मुखाब्ज से निःसृत यथार्थ गीता
कैसेट रूप में मानव की मुक्ति का दिव्य सन्देश बनकर उपस्थित है।
५. भारत की लोकगाथाओं में है कि सुकरात की शिष्य-परम्परा के मनीषी
अरस्तू ने अपने शिष्य सिकन्दर को भारत से गीताज्ञानी गुरु लाने का निर्देश
दिया था। गीता के ही एकेश्वरवाद को विश्व की विविध भाषाओं में मूसा,
ईसा तथा अनेक सूफी महात्माओं ने फैलाया। भाषान्तर होने से ये पृथक्-
पृथक् प्रतीत होते हैं, किन्तु सिद्धान्त गीता के ही हैं। अतः गीता मानव मात्र
का अतर्क्य धर्मशास्त्र है। गीता का आशय ‘यथार्थ गीता’ के रूप में प्रस्तुत
कर स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने मानवमात्र को एक अमूल्य
निधि दी है, जिसका कैसेट रूपान्तरण श्री जीतेन भाई के सौजन्य से हुआ
है। गीता के दसियों हजार अनुवादों के बीच देदीप्यमान इस व्याख्या के
आलोक में आप सब परमश्रेय के साधक बनें।
६. संसार में प्रचलित सभी धर्म गीता की दूरस्थ प्रतिध्वनि मात्र हैं। स्वामी श्री
अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा इसकी व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ को सुनकर
जैन कुलोत्पन्न श्री जीतेन भाई जी ने व्रत ही ले लिया कि कैसेटों के माध्यम
से इसका प्रसारण करूँ; क्योंकि भगवान महावीर, भगवान गौतम बुद्ध, गुरु
नानक, कबीर इत्यादि के श्रद्धापूरित तप-सिद्धान्तों की उच्चतम अभिव्यक्ति
गीता है। गीता के वे ही कैसेट सुमन आप सबके समक्ष आत्म-दर्शनार्थ
प्रस्तुत हैं।
७. गीता के दो हजार वर्ष बाद तक धर्म के नाम पर सम्प्रदाय नहीं बने थे,
इसीलिये गीता मज़हबमुक्त है। उस समय विश्व-मनीषा में एक ही शास्त्र
गूँज रहा था- उपनिषद्-सार गीता ! मोक्ष और समृद्धि की स्रोत गीता ! !
शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा उसका श्रवण अधिक लाभदायक है; क्योंकि उच्चारण
की शुद्धता इत्यादि में एकाग्रता बँट जाती है। इसीलिये सरल भाषा में
रूपान्तरित यथार्थ गीता के ये कैसेट आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। इनके श्रवण

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से बच्चे-बच्चे में, पास-पड़ोस में परमात्मा के शुभ संस्कारों का संचार
होगा, आपके घर-आँगन का वायुमण्डल भी तपोभूमि-सा सुरभित हो
उठेगा।
८. वह घर श्मशान है जिसमें प्रभु-चर्चा न हो। आज का मानव इतना व्यस्त है
कि चाहकर भी भजन के लिये समय नहीं निकाल पाता। ऐसी परिस्थिति में
गीता का सन्देश कर्ण-कुहरों तक पहुँच भर जाय तो परमश्रेय और समृद्धि के
संस्कारों का बीजारोपण हो जाता है। भगवान की वाणी के इन कैसेटों से दिन
भर उस परम प्रभु का स्मरण बना रहेगा और यही भजन की आधारशिला है।
९. अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाते हैं कि वह अच्छे संस्कारों का अर्जन
करें। अच्छे संस्कारों का आशय लोग लेते हैं कि वह अपनी रोजी-रोटी,
आवास-विकास की समस्याओं को हल कर ले। ईश्वर की ओर किसी का
ध्यान ही नहीं है। किसी-किसी के पास इतना कुछ है कि प्रभु को पुकारने
की आवश्यकता ही नहीं समझता। किन्तु यह सब कुछ पार्थिव ही तो है। न
चाहते हुए भी सारा वैभव यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में
ईश्वर की पहचान ही एकमात्र सम्बल है, जिसे प्रदान कर रहा है यथार्थ
गीता का यह कैसेट प्रसारण।
१०. संसार में जितने भी धार्मिक मत-मतान्तर हैं, वे सब-के-सब किसी महापुरुष
के पीछे श्रद्धालुओं का संगठित समाज है। महापुरुष की एकान्त भजनस्थली
ही कालान्तर में तीर्थ, आश्रम, मठ और मन्दिरों का रूप ले लेते हैं, जहाँ
महापुरुष के नाम पर जीविकोपार्जन से लेकर विलासिता तक के साधन
जुटाये जाते हैं। गद्दियाँ महापुरुष के बाद बनती हैं, गद्दियों से कोई महापुरुष
नहीं बनता। इसीलिये धर्म सदा से ही प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष के क्षेत्र की वस्तु
रहा है। गीता ऐसे ही निर्विवाद महापुरुष योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की
वाणी है, जिसके चिरन्तन सत्यों से आपका साक्षात् करा रहा है 'यथार्थ
गीता' का यह कैसेट प्रसारण।

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गीता आपका
धर्मशास्त्र है।
विश्व में प्रचलित सम्पूर्ण
धार्मिक विचारों के आदि
उद्गम स्थल भारत के समस्त
अध्यात्म और आत्मस्थिति
दिलानेवाले सम्पूर्ण शोध के
साधन-क्रम का स्पष्ट वर्णन इस
गीता में है, जिसमें ईश्वर एक,
पाने की क्रिया एक, पथ में
अनुकम्पा एक तथा परिणाम
एक है - वह है प्रभु का दर्शन,
भगवत्स्वरूप की प्राप्ति और
काल से अतीत अनन्त जीवन।
देखें - 'यथार्थ गीता'।

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शास्त्र
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाले क्रियात्मक
अनुशासन के नियमों का संकलन ही शास्त्र है।
इस दृष्टि से भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता सनातन,
शाश्वत धर्म का शुद्ध शास्त्र है; जो चारों वेद,
उपनिषद, समस्त योगशास्त्र, रामचरित मानस
तथा विश्व के सभी दर्शनशास्त्रों का अकेले ही
प्रतिनिधित्व करती है। गीता मानव मात्र के लिए
धर्म का अतर्क्य शास्त्र है।
परमात्मा का निवास
वह सर्वसमर्थ, सदा रहनेवाला परमात्मा मानव
के हृदय में स्थित है। सम्पूर्ण भावों से उसकी
शरण जाने का विधान है, जिससे शाश्वत धाम,
सदा रहनेवाली शान्ति तथा अनन्त जीवन
की प्राप्ति होती है।
सन्देश
सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है और
असत्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है। परमात्मा ही
तीनों कालों में सत्य है, शाश्वत है, सनातन है।

  • स्वामी अड़गड़ानन्द
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    वर्षों के लम्बे
    अन्तराल के बाद
    श्रीमद्भगवद्गीता की
    शाश्वत व्याख्या
    ॥ श्रीमद् भगवद् गीता ॥
    ॥ यथार्थ गीता ॥
    मानव धर्मशास्त्र
    ॐ
    श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट
    न्यू अपोलो एस्टेट, गाला नं 5, मोगरा लेन (रेलवे सबवे के पास), अंधेरी (पूर्व), मुम्बई – 400069
    फोन - (022) 28255300 • ई-मेल - [email protected] • वेबसाइट - www.yatharthgeeta.com