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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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उपशम ३८१
वे पापी पाप ही खाते हैं। यहाँ यज्ञ चिन्तन की एक निश्चित क्रिया है, जिससे
मन में निहित चराचर जगत् के संस्कार जल जाते हैं। शेष केवल ब्रह्म ही
बचता है। अतः शरीर के जन्म का जो कारण है, वही पाप है और जो उस
अमृत-तत्त्व को दिलानेवाला है, जिसके पश्चात् कभी शरीर धारण न करना
पड़े, वही पुण्य है।
अध्याय ७/२९ में वे कहते हैं- मेरी शरण होकर जरा-मरण और दोषों
से छूटने के लिये यत्न करनेवाले पुण्यकर्मी जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया
है, वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण कर्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को तथा भली प्रकार
मुझे जानते हैं और मुझे जानकर मुझमें ही स्थित रहते हैं। अतः पुण्यकर्म वह
है जो जरा, मरण और दोषों से ऊपर उठाकर शाश्वत की जानकारी और उसी
में सदा के लिये स्थिति दिलाता है। और जो जन्म-मृत्यु, जरा-मरण, दुःख-
दोषों की परिधि में घुमाकर रखता है, वही पापकर्म है।
अध्याय १०/३ में कहते हैं- जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त
से रहित सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है,
वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों
से मुक्त हो जाता है। अतः साक्षात्कार के साथ ही सम्पूर्ण पापों से निवृत्ति
मिलती है।
सारांशतः बार-बार जन्म-मृत्यु का कारण ही पाप है और जो उससे
बचाकर शाश्वत परमात्मा की ओर घुमा दे, परमशान्ति की प्राप्ति करा दे, वही
पुण्यकर्म है। सच बोलना, केवल अपने परिश्रम का खाना, स्त्रियों में मातृ-
भाव, ईमानदारी इत्यादि भी इस पुण्यकर्म के सहायक अंग हैं; किन्तु सर्वोत्कृष्ट
पुण्य है परमात्मा की प्राप्ति। जो मात्र एक परमात्मा की श्रद्धा को तोड़ता है,
वह पाप है।
सन्त सब एक- गीता, अध्याय ४/१ में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया-
इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में मैंने सूर्य के प्रति कहा था। किन्तु
श्रीकृष्ण के पूर्वकालीन इतिहास अथवा अन्य किसी भी शास्त्र में कृष्ण-नाम
का उल्लेख नहीं मिलता।