यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअपितु विश्व वाङ्मय में धर्म के नाम पर जो कुछ भी सार-सर्वस्व है,
जैसे- एक ईश्वर, प्रार्थना, पश्चाताप, तप इत्यादि गीता के ही उपदेश हैं।
वही उपदेश स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी के मुखाब्ज से निःसृत यथार्थ गीता
कैसेट रूप में मानव की मुक्ति का दिव्य सन्देश बनकर उपस्थित है।
५. भारत की लोकगाथाओं में है कि सुकरात की शिष्य-परम्परा के मनीषी
अरस्तू ने अपने शिष्य सिकन्दर को भारत से गीताज्ञानी गुरु लाने का निर्देश
दिया था। गीता के ही एकेश्वरवाद को विश्व की विविध भाषाओं में मूसा,
ईसा तथा अनेक सूफी महात्माओं ने फैलाया। भाषान्तर होने से ये पृथक्-
पृथक् प्रतीत होते हैं, किन्तु सिद्धान्त गीता के ही हैं। अतः गीता मानव मात्र
का अतर्क्य धर्मशास्त्र है। गीता का आशय ‘यथार्थ गीता’ के रूप में प्रस्तुत
कर स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने मानवमात्र को एक अमूल्य
निधि दी है, जिसका कैसेट रूपान्तरण श्री जीतेन भाई के सौजन्य से हुआ
है। गीता के दसियों हजार अनुवादों के बीच देदीप्यमान इस व्याख्या के
आलोक में आप सब परमश्रेय के साधक बनें।
६. संसार में प्रचलित सभी धर्म गीता की दूरस्थ प्रतिध्वनि मात्र हैं। स्वामी श्री
अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा इसकी व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ को सुनकर
जैन कुलोत्पन्न श्री जीतेन भाई जी ने व्रत ही ले लिया कि कैसेटों के माध्यम
से इसका प्रसारण करूँ; क्योंकि भगवान महावीर, भगवान गौतम बुद्ध, गुरु
नानक, कबीर इत्यादि के श्रद्धापूरित तप-सिद्धान्तों की उच्चतम अभिव्यक्ति
गीता है। गीता के वे ही कैसेट सुमन आप सबके समक्ष आत्म-दर्शनार्थ
प्रस्तुत हैं।
७. गीता के दो हजार वर्ष बाद तक धर्म के नाम पर सम्प्रदाय नहीं बने थे,
इसीलिये गीता मज़हबमुक्त है। उस समय विश्व-मनीषा में एक ही शास्त्र
गूँज रहा था- उपनिषद्-सार गीता ! मोक्ष और समृद्धि की स्रोत गीता ! !
शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा उसका श्रवण अधिक लाभदायक है; क्योंकि उच्चारण
की शुद्धता इत्यादि में एकाग्रता बँट जाती है। इसीलिये सरल भाषा में
रूपान्तरित यथार्थ गीता के ये कैसेट आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। इनके श्रवण