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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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उपशम ३८३
नहीं होता। यदि कोई ऐसा करता है तो वह अपने अन्दर स्थित अन्तर्यामी
परमात्मा को दुर्बल करता है, अपने परमात्मा से दूरी पैदा कर लेता है, स्वयं
अपनी क्षति करता है। संसार में जन्म लेनेवालों में यदि आपका कोई सच्चा
हितैषी है तो सन्त ही। अतः उनके प्रति सहृदय रहना संसार भर के लोगों का
मूल कर्त्तव्य है। इससे वंचित होना अपने को धोखा देना है।
वेद- गीता में वेद का वर्णन बहुत आया है; किन्तु कुल मिलाकर वेद
मार्ग-निर्देशक (Mile Stone) चिह्न मात्र हैं। मंजिल तक पहुँच जाने पर उस
व्यक्ति के लिये उनका उपयोग समाप्त हो जाता है। अध्याय २/४५ में श्रीकृष्ण
ने कहा- अर्जुन! वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश कर पाते हैं, तू वेदों के
कार्यक्षेत्र से ऊपर उठ। अध्याय २/४६ में कहा- सब ओर से परिपूर्ण स्वच्छ
जलाशय प्राप्त होने पर छोटे जलाशय से मनुष्य का जितना प्रयोजन रह जाता
है, अच्छी प्रकार ब्रह्म के ज्ञाता महापुरुष अर्थात् ब्राह्मण का वेदों से उतना ही
प्रयोजन रह जाता है; किन्तु दूसरों के लिये तो उनका उपयोग है ही। अध्याय
८/२८ में कहा- अर्जुन! मुझे तत्त्व से भलीभाँति जान लेने पर योगी वेद, यज्ञ,
तप, दान इत्यादि के पुण्यफलों को पार कर सनातन पद को प्राप्त हो जाता है।
अर्थात् जब तक वेद जीवित हैं, यज्ञ करना शेष है, तब तक सनातन पद की
प्राप्ति नहीं है। अध्याय १५/१ में बताया- ऊपर परमात्मा ही जिसका मूल है,
नीचे कीट-पतंगपर्यन्त प्रकृति जिसकी शाखा-प्रशाखा है, संसार ऐसा पीपल
का एक अविनाशी वृक्ष है। जो इसे मूलसहित जानता है, वह वेद का ज्ञाता है।
इस जानकारी का स्रोत महापुरुष हैं, उनके द्वारा निर्दिष्ट भजन है। पुस्तक या
पाठशाला भी उन्हीं की ओर प्रेरित करते हैं।
ओम्- श्रीकृष्ण के निर्देशन में ॐ के जप का विधान पाया जाता है।
अध्याय ७/८- ओंकार मैं हूँ। ८/१३- ॐ का जप कर और मेरा चिन्तन कर।
अध्याय ९/१७- जानने योग्य पवित्र ओंकार मैं हूँ। अध्याय १०/३३- अक्षरों
में 'अकार' हूँ। १०/२५- वचनों में एक अक्षर मैं हूँ। अध्याय १७/२३- ॐ,
तत् और सत् ब्रह्म का परिचायक है। १७/२४- यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ
ॐ से ही प्रारम्भ होती हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार ॐ का जप नितान्त
आवश्यक है, जिसकी विधि किसी अनुभवी महापुरुष से सीखें।