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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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उपशम ३७९
करने का निर्देश गीता में है। गीता मुख्यतः यही देती है। भौतिक वस्तुएँ भी
उससे मिलती हैं; किन्तु श्रेय की तुलना में प्रेय नगण्य हैं।
योग-प्रदाता- योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार कल्याण-पथ की जानकारी,
उसका साधन और उसकी प्राप्ति सद्गुरु से होती है। इधर-उधर तीर्थों में बहुत
भटकने या बहुत परिश्रम से यह तब तक नहीं मिलता, जब तक किसी सन्त
द्वारा न प्राप्त किया जाय। अध्याय ४/३४ में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू
किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर, भली प्रकार दण्ड-प्रणाम कर,
निष्कपट भाव से सेवा करके, प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त कर। प्राप्ति का
एकमात्र उपाय है, किसी महापुरुष का सान्निध्य और उनकी सेवा। उनके
अनुसार चलकर योग की संसिद्धिकाल में पायेगा। अध्याय १८/१८ में उन्होंने
बताया कि परिज्ञाता अर्थात् तत्त्वदर्शी महापुरुष, ज्ञान अर्थात् जानने की विधि
और ज्ञेय परमात्मा- तीनों कर्म के प्रेरक हैं। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार महापुरुष
ही कर्म के माध्यम हैं, न कि केवल पुस्तक। किताब तो एक नुस्खा है। नुस्खा
रटने से कोई नीरोग नहीं होता बल्कि उसे अमल में लाना है।
नरक- अध्याय १६/१६ में आसुरी सम्पद् का वर्णन करते हुए योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि अनेक प्रकार से भ्रमित चित्तवाले, मोह में फँसे आसुरी
स्वभाववाले मनुष्य अपवित्र नरक में गिरते हैं। प्रश्न स्वाभाविक है कि नरक
है कैसा और किसे कहते हैं? इसी क्रम में स्पष्ट करते हैं कि मुझसे द्वेष
रखनेवाले नराधमों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ, अजस्र
आसुरी योनियों में गिराता हूँ। यही नरक है। इस नरक का द्वार क्या है? उन्होंने
बताया कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं, जिनमें आसुरी सम्पद्
गठित होती है। अतः बारम्बार कीट-पतंग, पशु इत्यादि योनियों में आना ही
नरक है।
पिण्डदान- प्रथम अध्याय में विषादग्रस्त अर्जुन को आशंका थी कि
युद्धजनित नरसंहार से पितर लोग पिण्डदान और तर्पण से वंचित हो जायेंगे,
पितर गिर जायेंगे। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तुझे यह अज्ञान
कहाँ से हो गया? पिण्डोदक क्रिया को योगेश्वर ने अज्ञान कहा और बताया कि
जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को त्यागकर मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता