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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वास्तव में श्रीकृष्ण एक पूर्ण योगेश्वर हैं। वे एक अव्यक्त और अविनाशी
भाव की स्थिति के हैं। जब कभी परमात्मा से मिलानेवाली क्रिया अर्थात् योग
का सूत्रपात किया गया तो इसी स्थितिवाले किसी महापुरुष ने किया, चाहे वह
राम हों या ऋषि जरथुस्त्र ही क्यों न रहे हों। परवर्तीकाल में यही उपदेश ईसा,
मुहम्मद, गुरुनानक इत्यादि जिस किसी के द्वारा निकला, कहा श्रीकृष्ण ने ही।
अतः सभी महापुरुष एक ही हैं। सब-के-सब एक ही बिन्दु का स्पर्श
कर एक ही स्वरूप को पाते हैं। यह पद एक इकाई है। अनेक पुरुष इस पथ
पर चलेंगे; लेकिन जब पायेंगे, एक ही पद को पायेंगे। ऐसी अवस्था को प्राप्त
सन्त का शरीर एक मकान मात्र रह जाता है। वे शुद्ध आत्मस्वरूप हैं। ऐसी
स्थितिवालों ने कभी कुछ कहा, तो एक योगेश्वर ने ही कहा।
सन्त कहीं-न-कहीं तो जन्म लेता ही है। पूरब अथवा पश्चिम में,
श्याम अथवा श्वेत परिवार में, पूर्वप्रचलित किन्हीं धर्मावलम्बियों के बीच
अथवा अबोध कबीलों में, सामान्य जीवन जीनेवाले गरीब अथवा अमीरों में
जन्म लेकर भी सन्त उनकी परम्परावाला नहीं होता। वह तो अपने लक्ष्य
परमात्मा को पकड़कर स्वरूप की ओर अग्रसर हो जाता है, वही हो जाता है।
उसके उपदेशों में जाति-पाँति, वर्गभेद और अमीर-गरीब की दीवारें नहीं रहती
हैं। यहाँ तक कि उसकी दृष्टि में नर-मादा का भेद भी नहीं रह जाता (देखें,
गीता, १५/१६- द्वाविमौ पुरुषौ लोके)।
महापुरुषों के पश्चात् उनके अनुयायी अपना सम्प्रदाय बनाकर संकुचित
हो जाते हैं। किसी महापुरुष के पीछे चलनेवाले यहूदी हो जाते हैं, तो किसी के
अनुयायी ईसाई, मुसलमान, सनातनी इत्यादि हो जाते हैं; किन्तु इन दीवारों से
सन्त का सम्बन्ध कदापि नहीं होता। सन्त न तो कोई साम्प्रदायिक है और न
कोई जाति। सन्त सन्त हैं, उन्हें किसी सामाजिक संगठन में न समेटें।
अतः संसार भर के सन्तों की, चाहे किसी कबीले में उनका जन्म हुआ
है, चाहे किसी मज़हब सम्प्रदाय वाले उनका पूजन अधिक करते हों, किसी
साम्प्रदायिक प्रभाव में आकर ऐसे सन्तों की आलोचना नहीं करनी चाहिये;
क्योंकि वे निरपेक्ष हैं। संसार के किसी भी स्थान में उत्पन्न सन्त निन्दा के योग्य