यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 427 of 429
Read in contextसे बच्चे-बच्चे में, पास-पड़ोस में परमात्मा के शुभ संस्कारों का संचार
होगा, आपके घर-आँगन का वायुमण्डल भी तपोभूमि-सा सुरभित हो
उठेगा।
८. वह घर श्मशान है जिसमें प्रभु-चर्चा न हो। आज का मानव इतना व्यस्त है
कि चाहकर भी भजन के लिये समय नहीं निकाल पाता। ऐसी परिस्थिति में
गीता का सन्देश कर्ण-कुहरों तक पहुँच भर जाय तो परमश्रेय और समृद्धि के
संस्कारों का बीजारोपण हो जाता है। भगवान की वाणी के इन कैसेटों से दिन
भर उस परम प्रभु का स्मरण बना रहेगा और यही भजन की आधारशिला है।
९. अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाते हैं कि वह अच्छे संस्कारों का अर्जन
करें। अच्छे संस्कारों का आशय लोग लेते हैं कि वह अपनी रोजी-रोटी,
आवास-विकास की समस्याओं को हल कर ले। ईश्वर की ओर किसी का
ध्यान ही नहीं है। किसी-किसी के पास इतना कुछ है कि प्रभु को पुकारने
की आवश्यकता ही नहीं समझता। किन्तु यह सब कुछ पार्थिव ही तो है। न
चाहते हुए भी सारा वैभव यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में
ईश्वर की पहचान ही एकमात्र सम्बल है, जिसे प्रदान कर रहा है यथार्थ
गीता का यह कैसेट प्रसारण।
१०. संसार में जितने भी धार्मिक मत-मतान्तर हैं, वे सब-के-सब किसी महापुरुष
के पीछे श्रद्धालुओं का संगठित समाज है। महापुरुष की एकान्त भजनस्थली
ही कालान्तर में तीर्थ, आश्रम, मठ और मन्दिरों का रूप ले लेते हैं, जहाँ
महापुरुष के नाम पर जीविकोपार्जन से लेकर विलासिता तक के साधन
जुटाये जाते हैं। गद्दियाँ महापुरुष के बाद बनती हैं, गद्दियों से कोई महापुरुष
नहीं बनता। इसीलिये धर्म सदा से ही प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष के क्षेत्र की वस्तु
रहा है। गीता ऐसे ही निर्विवाद महापुरुष योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की
वाणी है, जिसके चिरन्तन सत्यों से आपका साक्षात् करा रहा है 'यथार्थ
गीता' का यह कैसेट प्रसारण।