यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Yajurveda (यजुर्वेद) is the second of the four Vedas and the Veda of sacrificial ritual. Its formulas are largely in prose, and it was compiled as a manual for priests conducting the sacrifices; most mantras used in household rites and fire rituals today still come from it.
This edition by Dr. Rekha Vyas gives the mantras with a simple Hindi rendering of their sense. It was published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi (copyright 1979); the scanned copy is the 2015 edition. In her foreword the author notes that 663 mantras of the Rigveda reappear unchanged in the Yajurveda, yet the two differ, since the Rigveda is in verse and the Yajurveda in prose. She also mentions the tradition of 101 branches of the Yajurveda, of which two are the most widely followed.
The translation runs chapter by chapter after a table of contents, offering readers the plain meaning of the mantras without a dense commentary.
सातवां अध्याय
सातवां अध्याय
वाचस्पतये पवस्व वृष्णो ऽ अ १४ꣳ शुभ्यां गभस्तिपूतः.
देवो देवेभ्यः पवस्व येषां भागोसि.. (१)
हे सोम! आप वाचस्पति के लिए पवित्र होइए. आप शक्तिशाली, शुभ एवं गर्भ
से ही पवित्र हैं. आप जिन देवताओं का भाग हैं, उन के लिए प्रवाहित होइए. (१)
मधुमतीर्न ऽ इषस्कृधि यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा
स्वाहोर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. (२)
हे सोम! आप मधुर धाराओं वाले हैं. आप हमारा इष्ट कीजिए. आप हमें जाग्रत
कीजिए. जाग्रत सोम के लिए स्वाहा. सोम से सोम के लिए स्वाहा. यह आहुति
अंतरिक्ष में विस्तार पाने की कृपा करे. (२)
स्वाङ्कृतोसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा त्वा
सुभव सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यो देवा १४ꣳशो यस्मै त्वेडे तत्सत्यमुपरिप्लुता भङ्गेन
हतो ऽ सौ फट् प्राणाय त्वा व्यानाय त्वा.. (३)
आप स्वयंभू हैं. आप सभी देवों के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप इंद्रियों
के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप स्वर्गलोक के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप
पृथ्वी के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. पवित्र मन वाले आप के लिए स्वाहा. अच्छी
तरह उत्पन्न होने वाले सूर्य के लिए स्वाहा. मरीचि देवों के लिए स्वाहा. मर्यादा भंग
करने वालों का नाश कीजिए. आप सत्य से ओतप्रोत हैं. हम प्राण और व्यान से
आप की उपासना करते हैं. (३)
उपयामगृहीतोस्यन्तर्यच्छमघवन् पाहि सोमम्. उरुष्य राय ऽ एषो यजस्व.. (४)
हे इंद्र! सोम को कलश में ग्रहण कर लिया है. आप इस की रक्षा कीजिए. आप
यजमानों को भरपूर वैभव दीजिए एवं उन की शत्रुओं से रक्षा कीजिए. (४)
अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधाम्यन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम्.
सजूर्देवैर्भवैरैः परैश्चान्तर्यामे मघवन् मादयस्व.. (५)
हे इंद्र देव! स्वर्गलोक में, पृथ्वीलोक पर एवं अंतरिक्षलोक में आप का ही
यजुर्वेद - ८३
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
विस्तार है. अंतरिक्षलोक में आप देवताओं सहित अन्यों को ( मनुष्यों को ) मदमस्त
बनाने की कृपा कीजिए. ( ५ )
स्वाङ्कृतोसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा त्वा
सुभव सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्य ऽ उदानाय त्वा.. ( ६ )
हे श्रेष्ठ जन्म वाले! आप सभी के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप इंद्रियों के
लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप देवताओं और मनुष्यों के मन के संतोष के लिए
स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप को सूर्य के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है.
आप को मरीचि के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है. आप को उदान
( देवता ) के लिए ( उपयाम में ) ग्रहण किया जाता है. ( ६ )
आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार.
उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा.. (७)
हे वायु! आप पवित्रता के रक्षक हैं. आप हजारों गुणों के आधार हैं. हम सोमरस
से आप को आनंदित बनाते हैं. आप इस पेय को पहले भी पी चुके हैं. हम वायु के
लिए इस पेय को धारण करते हैं. ( ७ )
इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम्.
इन्दवो वामुशन्ति हि.
उपयामगृहीतोसि वायव ऽ इन्द्रवायुभ्यां त्वैष ते योनिः सजोषोभ्यां त्वा.. (८)
हे इंद्र देव! हे वायु! आप दोनों के प्रयोग में लाने के लिए यह सोमरस आया
है ( लाया गया है ). आप इस का सेवन कीजिए. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए
कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. आप को वायु के लिए कलश
में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. हम उन्हीं दोनों की प्रसन्नता के लिए
आप को ग्रहण करते हैं. ( ८ )
अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा.
ममेदिह श्रुत १४ हवम्.
उपयामगृहीतो ऽ सि मित्रावरुणाभ्यां त्वा.. (९)
हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप सत्य की वृद्धि करते हैं. हम आप के पुत्र आप
दोनों के लिए इस सोमरस कलश में ग्रहण करते हैं. आप सोमरस का सेवन करने
की कृपा कीजिए. ( ९ )
राया वय १४ ससवा १४ सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः.
तां धेनुं मित्रावरुणा युवँ नो विश्वाहा धत्तममपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां
त्वा.. (१०)
८४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप हमें ऐसा धन दीजिए जो वापस हम से न जाए.
उस धन को पा कर हम आनंदित हों. हमें ऐसी गाएं प्रदान कीजिए, जो हमें छोड़
कर कहीं नहीं जाएं. आप की इस कृपा से हम वैसे ही प्रसन्न होंगे, जैसे देवगण
हवि पा कर प्रसन्न होते हैं, गाय आहार पा कर प्रसन्न होती है. ऋत (सत्य) व यज्ञ
की आयु की बढ़ोतरी के लिए आप दोनों यज्ञशाला में अपने लिए निश्चित आसन
पर विराजिए. (१०)
या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावति.
तया यज्ञं मिमिक्षतम्. उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वैष ते योनिर्माध्वीभ्यां त्वा.. (११)
हे अश्विनी देवो! आप मधुर वाणी से हमारे यज्ञ को सींचने की कृपा कीजिए.
मधुर वाणी से हम ने भी यज्ञ को सींचा है. हम ने आप दोनों के लिए हवि को कलश
में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. यज्ञ में आप अपने निर्धारित आसन
पर विराजने की कृपा कीजिए. (११)
तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद छं स्वर्विदम्.
प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे.
उपयामगृहीतोसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाह्यपमृष्टः षण्डो देवास्त्वा शुक्रपाः
प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१२)
इंद्र देव बारबार सोमरस को पीते हैं. सोमरस पोषक व आनंददायी है. इंद्र
देव आत्मज्ञाता, ज्येष्ठ, कुश के आसन पर विराजते हैं. वे यजमानों के लिए धन
का दोहन करते हैं और यजमानों के लिए धन की बढ़ोतरी करते हैं. वे वीर्यरक्षक
हैं. उन के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. वही उस की मूल
योनि है. वे हमें दुष्टों से दूर करें तथा अपने लिए निर्धारित आसन पर विराजने
की कृपा करें. (१२)
सुवीरो वीरान् प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्.
सज्जमानो दिवा पृथिव्या शुक्रः शुक्रशोचिषा निरस्तः
षण्डः शुक्रस्याधिष्ठानमसि.. (१३)
आप सुवीर हैं. आप वीरों को पैदा कीजिए. आप यजमान को धन से पोषित
कीजिए. आप स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को चमकाने वाले हैं. आप सर्वत्र प्रकाश से
चमकाइए. आप प्रकाश के निवास स्थान हैं. आप उजड्डपन को नष्ट करने वाले
हैं. (१३)
अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम.
सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१४)
हे सोम! आप अनंत शक्तिमान, श्रेष्ठ वीर्यवान व धन के पोषक हैं. हम आप
यजुर्वेद - ८५
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
के लिए सदा हवि देने वाले हैं. विश्व पर वारने योग्य यह हमारी आद्य (पहली)
संस्कृति हैं. वरुण, मित्र व अग्नि प्रथम देव हैं. (१४)
स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमा जुहोत स्वाहा.
तृम्पन्तु होत्रा मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहायाऽग्नीत्.. (१५)
बृहस्पति देव प्रथम देवता हैं. ज्ञाता लोग इंद्र देव के लिए यज्ञ करें. स्वाहापूर्वक
उन के लिए हवि प्रदान करने की कृपा करें. यजमान होता मधुर आहुति से उन्हें तृप्त
करने की कृपा करें. होता सुप्रीतिकर आहुति से उन्हें तृप्त करें. यजमान उन के लिए
अच्छी तरह आहुति अग्नि के पास पहुंचाने की कृपा करें. (१५)
अयं वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने.
इममपा १४ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति.
उपयामगृहीतोसि मर्काय त्वा.. (१६)
ये वेन देव बादलों के गर्भ में स्थित जल को बरसने के लिए प्रेरित करते हैं.
चिरायु ज्योति वाले सूर्य का वंदन करते हैं. जल को पा कर यजमान ऐसे प्रसन्न होते
हैं, जैसे लोग पुत्र को पा कर प्रसन्न होते हैं. विद्वान् बुद्धिपूर्वक सूर्य की उपासना
करते हैं. आप को मर्क (राक्षस-विनाश) के लिए कलश में ग्रहण किया गया
है. (१६)
मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता.
आ यः शर्याभिस्तुविनृम्णो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तावेष ते योनिः प्रजाः पाह्यपमृष्टो
मर्को देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१७)
यजमान हवनों में मन से भाग लेते हैं. द्रवित होने वाले सोमरस का मन से पान
करते हैं. हम सोम से अनुरोध करते हैं कि हम संतानसहित शत्रुओं का विनाश करने
में समर्थ हो सकें. हम मथानी की तरह उन्हें मथ दें. हम निर्भय हो कर देवत्व प्राप्त
करें. देवगण हमें संरक्षण प्रदान करने की कृपा करें. (१७)
सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्.
सञ्ग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा निरस्तो मर्को मन्थिनोधिष्ठानमसि.. (१८)
हे देवगण! यजमान की संतान श्रेष्ठ हो. आप यजमान को श्रेष्ठ धन से पोसने
की कृपा कीजिए. जैसे सूर्य स्वर्गलोक से पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं. वैसे ही
देवगण हमारे जीवन को प्रकाशित करने की कृपा करें. इन की कृपा से हम शत्रुओं
को मथानी से मथने की तरह मथ दें. मर्क नामक असुर दुःख का घर है. आप की
कृपा से (तेज से) वह भी पलायन कर जाए. (१८)
ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ.
अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्.. (१९)
८६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
पृथ्वी और आकाश के बीच जो ग्यारह दिव्य देव स्थित हैं, वे सभी देव
महिमावान हैं. वे ग्यारह ही देव इस यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराने की कृपा
करें. (१९)
उपयामगृहीतोस्याग्रयणोसि स्वाग्रयणः.
पाहिह्यज्ञं पाहि यज्ञपतिं विष्णुस्त्वामिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाह्यभि सवनानि
पाहि.. (२०)
हे देवगण! आप के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. आप यज्ञ
में सर्वप्रथम ग्रहण किए जाने वाले हैं. आप यज्ञ में सर्वप्रथम बुलाए जाने वाले हैं. आप
यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप यज्ञपति को संरक्षण दीजिए. आप विष्णु की रक्षा कीजिए.
उन की रक्षा करें. आप तीनों संध्याओं की रक्षा करने की कृपा कीजिए. (२०)
सोमः पवते सोमः पवतेस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्रायास्मै सुन्वते यजमानाय पवत ऽ इष ऽ ऊर्जे
पवतेद्भ्य ऽ ओषधीभ्यः पवते द्यावापृथिवीभ्यां पवते सुभूताय पवते विश्वेभ्यस्त्वा
देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (२१)
सोमरस प्रवाहित होता है. पवित्र सोम इस में प्रवाहित होता है. ब्राह्मणों के लिए
यह सोम प्रवाहित होता है. क्षत्रियों के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ऊर्जादायी के
लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ओषध के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. स्वर्गलोक
और पृथ्वीलोक के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. अच्छे भरणपोषणकर्ता हेतु यह
सोम प्रवाहित होता है. विश्व के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. यह विश्व के लिए
मूल स्थान है. सभी देव यज्ञशाला में अपने लिए निर्धारित स्थान पर विराजें. (२१)
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वत ऽ उक्थाव्यं गृह्णामि.
यत्त ऽ इन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वैष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा देवेभ्यस्त्वा देवाव्यं
यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२२)
हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को
बृहद् देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप उपयाम (कलश) हैं. हम
उक्त मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. यह उपयाम इंद्र देव का मूल स्थान है. यह
उपयाम ब्रह्म देव व विष्णु का मूल स्थान है. हम यज्ञ में उक्त मंत्र से आप सब देवों
की उपासना करते हैं. हम यज्ञ में श्रेष्ठ दीर्घ जीवन की कामना से आप को ग्रहण
करते हैं. (२२)
मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे
गृह्णामीन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं
यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राबृहस्पतिभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राविष्णुभ्यां त्वा
देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२३)
यजुर्वेद - ८७
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
हे सोम! मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. दीर्घ आयु
हेतु मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! इंद्र देव
के लिए आप को ग्रहण किया है. हम ने इंद्र देव और अग्नि के लिए आप को ग्रहण
किया है. वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! बृहस्पति देव
के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! विष्णु के लिए आप को ग्रहण
किया गया है. ( २३ )
मूर्धानं दिवो ऽ अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आ जातमग्निम्.
कवि १४ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नापात्रं जनयन्त देवा:.. ( २४)
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक के सर्वोच्च स्थान पर चमकते हैं. आप पृथ्वी पर सूर्य
की भांति चमकते हैं. आप वैश्वानर ( आग ) व सर्वज्ञ हैं. यजमान लोगों ने अग्नि
को अरणिमंथन ( लकड़ियों की रगड़ ) से प्रकट किया है. अग्नि देव हमारे अतिथि
सम्राट् हैं. ( २४ )
उपयामगृहीतोसि ध्रुवोस ध्रुवक्षितिर्ध्रुवाणां ध्रुवतमोच्युतानामच्युत क्षित्तम ऽ एष ते
योनिर्वैश्वानराय त्वा.
ध्रुवं ध्रुवेण मनसा वाचा सोममवनयामि.
अथा न ऽ इन्द्र इद्विशोसपत्नला: समनसस्करत्.. ( २५ )
हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) और पृथ्वी पर ध्रुव रहने वालों में अग्रगण्य हैं. आप
ध्रुवतम के नाम से प्रसिद्ध हैं. आप सब का मूल स्थान व आश्रय स्थान हैं. ध्रुव मन
वाले यजमान हम ध्रुव मन से वाणीपूर्वक आप को नमन करते हैं. इंद्र देव हम पत्नी
और संतान सहित अच्छे मन से आप को नमन करते हैं. ( २५ )
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते ऽ अ १४ शुग्रावच्युतो धिषणयोरुपस्थात्.
अध्वर्योर्वा परि वा यः पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृत १४ स्वाहा
देवानामुत्क्रमणमसि.. ( २६ )
हे सोम! आप का जो अंश पत्थरों से टूटते समय, निचोड़ते और छानते समय
इधरउधर गिर जाता है, जो यज्ञ में आहुति डालने के बाद अध्वर्यु के पास बच जाता
है, हम उस पवित्र भाग को मन से इकट्ठा करते हैं. एकत्रित किए हुए इस अंश
को अग्नि को समर्पित करते हैं. सोम को संकल्पपूर्वक स्वाहा. आप देवताओं को
ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाले हैं. ( २६ )
प्राणाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व व्यानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वोदानाय मे वर्चोदा
वर्चसे पवस्व वाचे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व क्रतूक्षाभ्यां मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व
श्रोत्राय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व चक्षुर्भ्यां मे वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २७)
आप हमारे प्राणों के लिए वर्चस्व ( तेज ) प्रदान कीजिए. आप हमारे व्यान के
८८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे अपान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप
हमारे उदान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे मन में वर्चस्व दीजिए. आप
हमारी वाणी में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कर्म में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे नेत्र में
वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कानों को वर्चस्व दीजिए. ( २७ )
आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चोदा वर्चसे
पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २८ )
आप हमारी आत्मा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे ओज में वर्चस्व दीजिए. आप
हमारी आयु में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी सारी प्रजा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी
पृथ्वी के सभी साधनों को वर्चस्व दीजिए. ( २८ )
कोसि कतमोसि कस्यासि को नामासि.
यस्य ते नामामन्महि यं त्वा सोमेनातीत्पाम.
भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्या ७ष सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.. ( २९)
हे सोम! आप कौन हैं ? आप कहां से हैं ? आप किस के हैं ? आप का क्या
नाम है, जिसे जान कर हम आप को सोमरस से तृप्त कर सकें. आप सर्वत्र व्याप्त
हैं. आप की कृपा से हम अच्छी संतान वाले, वीरों वालें हों एवं अच्छे पोषण से
पुष्ट हों. ( २९ )
उपयामगृहीतोसि मधवे त्वोपयामगृहीतोसि माधवाय त्वोपयामगृहीतोसि शुक्राय
त्वोपयामगृहीतोसि शुचये त्वोपयामगृहीतोसि नभसे त्वोपयामगृहीतोसि नभस्याय
त्वोपयामगृहीतोसीषे त्वोपयामगृहीतोस्यूर्जे त्वोपयामगृहीतोसि सहसे
त्वोपयामगृहीतोसि सहस्याय त्वोपयामगृहीतोसि तपसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याय
त्वोपयामगृहीतोस्य ७ष हसस्पतये त्वा.. ( ३० )
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मधु के लिए कलश
से ग्रहण किया गया है. आप को माधव हेतु ग्रहण किया गया है. आप को शुक्र के
लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को पवित्रता के लिए ग्रहण किया गया है.
आप को नभ हेतु ग्रहण किया गया है. आप को ऊर्जा हेतु ग्रहण किया गया है. हे सोम!
आप को साहस के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस से ग्रहण किया
गया है. हे सोम! आप को तप के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को मर्यादा
के लिए ग्रहण किया गया है. ( ३० )
इन्द्राग्नी ऽ आ गत ७ष सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्.
अस्य पातं धियेषिता.
उपयामगृहीतोसीन्द्राग्निभ्यां त्वैष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा.. ( ३१ )
हे सोम! आप को इंद्र देव हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि हेतु
यजुर्वेद - ८९
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
उपयाम में ग्रहण किया है. आप को इंद्र देव की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया
है. आप को अग्नि की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है, कलश आप दोनों का
मूल स्थान है. आप यज्ञशाला में निर्धारित स्थान पर विराजने की कृपा कीजिए.
हम श्रेष्ठ वाणियों से आप की उपासना करते हैं. आप यज्ञ में अपना भाग
स्वीकार कीजिए. ( ३१ )
आ घा ये ऽ अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्.
येषामिन्द्रो युवा सखा.
उपयामगृहीतोस्यग्नीन्द्राभ्यां त्वैष ते योनिरग्नीन्द्राभ्यां त्वा.. (३२)
हे सोम! आप को इंद्र देव व अग्नि की तृप्ति हेतु विधिवत ग्रहण किया गया
है. यज्ञस्थल में आप दोनों देवों का कुश का आसन निर्धारित है. इंद्र आप के मित्र
हैं. वे युवा हैं. सोम को इंद्र देव और अग्नि दोनों के लिए कलश में ग्रहण किया
गया है. आप ही इंद्र और अग्नि दोनों का मूल स्थान हैं. ( ३२ )
ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास ऽ आगत.
दाश्वां ᳵ सो दाशुषः सुतम्.
उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३३)
विश्व देव यज्ञ में पधारने की कृपा करें. वे यजमानों के संरक्षक व यजमानों
के पालक हैं. वे हम सब के अनुरोध पर यज्ञशाला में सोमरस का पान करने के
लिए पधारने की कृपा करें. सोमरस को विश्व देव की वृत्ति के लिए कलश में
ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप सभी देवताओं के लिए यहां
स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३३ )
विश्वे देवास ऽ आगत शृणुता म इम ᳵ हवम्.
एदं बर्हिनिषीदत.
उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३४)
हे विश्व देव! आप हमारी प्रार्थनाएं सुनिए. आप पधारने की कृपा कीजिए. हम
आप से यहां कुश के आसन पर बैठने का अनुरोध करते हैं. आप उस आसन पर
विराजने की कृपा कीजिए. आप को सभी देवताओं के लिए कलश में ग्रहण किया
गया है. यही आप का और देवताओं का मूल स्थान है. ( ३४ )
इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः सुतस्य.
तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. (३५)
हे इंद्र देव! हे मरुद् देव! आप सोम की रक्षा कीजिए. जैसे आप ने शर्याति के
यज्ञ में सोमरस पीने की कृपा की, वैसे ही आप इस यज्ञ में पधारिए और सोमरस
९० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
पीने की कृपा कीजिए. आप शूरवीर, सुखदाता, श्रेष्ठ यज्ञ वाले एवं अच्छे कवि हैं.
आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मरुद्गण देव के
लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. आप मरुद्गण के
साथ यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३५ )
मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्य १४ँ शासमिन्द्रम्.
विश्वासाहमवसे नूतनायोग १४ँ सहोदामिह त १४ँ हुवेम.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.
उपयामगृहीतोसि मरुतां त्वौजसे.. ( ३६ )
हे इंद्र! आप हम यजमानों की विनती पर मरुद्वान हो कर पधारिए. मरुद्गण
जल की वर्षा करने वाले एवं दिव्य हैं. आप को विश्वासपूर्वक आमंत्रित करते हैं.
आप नूतन और उग्र हैं. आप साथसाथ रहते हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के
लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है.
ओज पाने के लिए आप को कलश में ग्रहण किया गया है. ( ३६ )
सजोषा ऽ इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्.
जहि शत्रूँ २ ऽ रप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः.
उपयाम गृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३७ )
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक, शूरवीर, विद्वान् हैं. मरुद्गणों के साथ इस
यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुओं को दूर एवं उन का नाश कीजिए.
आप हमें सब ओर से सुरक्षा प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव व
मरुद् देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल
स्थान है. ( ३७ )
मरुत्वाँ २ ऽ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय.
आसिञ्चस्व जठरे मध्व ऽ ऊर्मिं त्व १४ँ राजासि प्रतिपत्सुतानाम्.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३८ )
हे मरुद्गण! आप यजमानों के लिए जल, धन व अन्न बरसाते हैं. आप सोमरस
पी कर आनंदित होइए. आप शत्रुओं से युद्ध कीजिए. सोमरस लहरदार व मीठा है.
आप छक कर इस को पीजिए. आप तो सोमरस के राजा हैं. आप को इंद्र देव व
मरुद्गण के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव व मरुद्गण का मूल
स्थान है. ( ३८ )
महाँ २ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः सहोभिः.
अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.
उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. ( ३९ )
यजुर्वेद - ९१
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
हे इंद्र! आप महान्, व्यापक, सर्वज्ञ, मनोकामना पूरक हैं. आप अपने सहयोगी
देवों के साथ यज्ञ में पधारने व हमारा द्रव्य व पराक्रम बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप
हमारे कर्म विशाल बनाने की कृपा कीजिए. आप कर्मों के पोषक हैं. आप को महान्
इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ३९ )
मँहाँ २ ऽ इन्द्रो य ऽ ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमां २ ऽ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे.
उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. (४०)
हे इंद्र देव! आप महान् और जल वर्षक हैं. आप हम पर ओज बरसाइए. आप
उपासक यजमानों की बढ़ोतरी करते हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए उपयाम में
ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ४० )
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः.
दृशे विश्वाय सूर्य ४ स्वाहा.. (४१)
सूर्य सर्वज्ञ और दिव्य किरणें वहन करते हैं. वे अपनी किरणों की पताका
फहराते हैं. वे प्राणीमात्र को दुनिया दिखाते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ४१ )
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १५ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा.. (४२)
मित्र देव वरुण देव और अग्नि देवता के नेत्र हैं. स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा
अंतरिक्षलोक में सूर्य प्रकाश फैलाते हैं. सूर्य जगत् की आत्मा हैं. इन सब देवों के
लिए स्वाहा. सूर्य मित्र देव के नेत्र हैं. वे वरुण देव के नेत्र हैं. वे अग्नि के नेत्र हैं. वे
देवताओं के नेत्र हैं. वे स्वर्गलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं.
वे पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे अंतरिक्ष को अपने
प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे जगत् की आत्मा हैं. उन सूर्य के लिए
स्वाहा. ( ४२ )
अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्.
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा.. (४३)
हे अग्नि! आप हमें अच्छे पथ की ओर ले जाइए और धन प्रदान कीजिए. आप
हमें अच्छा विद्वान् बनाइए. आप हम से बुराइयों को दूर कीजिए. हम बारबार आप
को नमन करते हैं. हम बारबार आप के लिए प्रार्थना करते हैं. आप के लिए स्वाहा.
आप हमें सुपथ पर ले चलिए. आप हमें धन दीजिए. ( ४३ )
अयं नो ऽ अग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्.
अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय १४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. (४४)
हे अग्नि! हमारे दुश्मनों का भेद दीजिए व उन को हरा दीजिए. हमारे दुश्मनों के
९२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय
नगर भेद दीजिए. हमारे दुश्मनों की जमा पूंजी हमें दे दीजिए. शत्रुओं को पराजित
करने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. ( ४४ )
रूपेण वो रूपमभ्यागां तुथो वो विश्ववेदा विभजतु.
ऋतस्य पथा प्रेत चन्द्रदक्षिणा वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं यतस्व सदस्यैः... ( ४५)
हम अपने रूप से आप के रूप की ओर गमन करना चाहते हैं. देवगण सर्वज्ञ
हैं. वे देवगण सभी के लिए सुख बांटने की कृपा करें. उन की कृपा से हम सत्य
के पथ के पथिक बनें. जैसे चंद्र देव अंतरिक्ष से देखते हैं, वैसे ही हम भी दूर
दृष्टिवान हों. ( ४५ )
ब्राह्मणमद्य विदेयं पितृमन्तं पैतृमत्यमृषिमार्येय ४७ सुधातुदक्षिणम्.
अस्मद्राता देवत्रा गच्छत प्रदातारमाविशत.. (४६)
देवताओं की कृपा से हम आज ब्राह्मणों, पिता, पितामह, ऋषि व आर्षगण से
युक्त हों. आप दक्षिणा अच्छी तरह धारण करें. देवगण हमारे त्राता हैं. श्रेष्ठ दानदाता
याजकों को श्रेष्ठ फल प्रदान करने की कृपा करें. ( ४६ )
अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीयायुर्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे रुद्राय
त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे बृहस्पतये
त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे यमाय त्वा
मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय हयो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे.. (४७)
हे अग्नि! आप हमें वरुण देव को देने की कृपा कीजिए. हम अमृत पान करें.
आप आयुदाता हैं. आप की कृपा से हम दीर्घायु पाएं. आप हमें रुद्र देव को देने की
कृपा कीजिए. आप हमें बृहस्पति देव को देने की कृपा कीजिए. आप हमें यम देव
को देने की कृपा कीजिए. ( ४७ )
कोदात्कस्मा ऽ अदात्कामोदात्कामायादात्.
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते.. (४८)
कौन देता है ? किस को देता है ? कामना से ही कोई किसी को देता है. कामना
से ही दान दिया और लिया जाता है. ( संसार में ) कामनाएं ही सब कुछ हैं. ( ४८ )
यजुर्वेद - ९३
आठवां अध्याय
आठवां अध्याय
उपयामगृहीतोस्यादित्येभ्यस्त्वा.
विष्ण ऽ उरुगायैष ते सोमस्त र्थ् रक्षस्व मा त्वा दभन्.. ( १ )
हे सोम देव! आदित्य देव की तरह आप को कलश में ग्रहण करते हैं. हे विष्णु!
हम आप के लिए स्तोत्र गाते हैं. आप सोमरस व हमारी रक्षा कीजिए. कोई भी आप
का दमन न कर सके. ( १ )
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे.
उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्नु ते दानन्देवेस्य पृच्यत ऽ आदित्येभ्यस्त्वा.. ( २ )
हे इंद्र देव! आप अहिंसक हैं. आप हमारे पास पधारिए. आप हवि को ग्रहण
कीजिए. आप धनवान हैं. आप अपने दान से हमें भी धनवान बनाइए. हम आदित्यों
जैसा स्नेह पाने के लिए इंद्र देव की उपासना करते हैं. ( २ )
कदा चन प्र युच्छस्युभे नि पासि जन्मनी.
तुरीयादित्य सवनं त ऽ इन्द्रियमातस्थावमृतन्दिव्यादित्येभ्यस्त्वा.. ( ३ )
हे पात्र! हम आदित्य देव की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं. आदित्य
देव शांतचित्त, आनंददाता तथा देवों और मनुष्यों का कल्याण करने वाले हैं. ( ३ )
यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नमादित्यासो भवता मृडयन्तः.
आ वोर्वाची सुमतिर्ववृत्याद र्थ् होशचिद्वा वरिवोवित्तरासदादित्येभ्यस्त्वा.. ( ४ )
यज्ञ देवों के प्रति ( लिए ) हैं. हे अच्छे मन वाले आदित्यगण! आप हम सब के
लिए सुखकारी हों. आप की प्राचीन और श्रेष्ठ मति हमें प्राप्त हो. इस से विपरीत
बुद्धि वाले भी यज्ञ भाव में रुचि लें. आदित्य देव की प्रसन्नता के लिए सोम को
ग्रहण करते हैं. ( ४ )
विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन् मत्स्व.
श्रदस्मै नरो वचसे दधातन यदाशीर्दा दम्पती वाममश्नुतः.
पुमान् पुत्रो जायते विन्दते वस्वधा विश्वाहारप ऽ एधते गृहे.. ( ५ )
हे आदित्य! आप सोमरस पी कर प्रसन्न होइए. जो यजमान दंपती श्रेष्ठ वचनों
९४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
से इन की उपासना करते हैं, श्रद्धा रखते हैं उन के पुरुषार्थी पुत्र पैदा होते हैं.
धनधान्य भरपूर रहते हैं. घर में सुखशांति रहती है. ( ५ )
वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवे दिवे वाममस्मभ्य ँ४ सावीः.
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम.. (६)
हे सविता देव! हमारा आज सुखदायी हो. हमारा कल सुखदायी हो. हमारा
प्रतिदिन सुखदायी हो. हम सुखदायी घर में रहें. हमारी बुद्धि सुखदायी हो. हम सदा
सुख भोगने योग्य रहें. ( ६ )
उपयामगृहीतोसि सावित्रोसि चनोधाश्चनोधा ऽ असि चनो मयि धेहि.
जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय देवाय त्वा सवित्रे.. (७)
हम ने कलश ग्रहण कर लिया है. सविता देव अन्नदाता हैं. वह हमें अन्न प्रदान
करने की कृपा करें. आप हमारे लिए अन्न धारिए व यज्ञपति का यज्ञ पूरा कराइए.
हम अपने सौभाग्य के लिए सविता देव की उपासना करते हैं. ( ७ )
उपयामगृहीतोसि सुशर्मासि सुप्रतिष्ठानो बृहदुक्षाय नमः.
विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (८)
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण कर लिया है. आप सुखदाता, सुप्रतिष्ठित,
विशाल व कर्तव्य पालक हैं. हम आप को नमन करते हैं. सभी देवों के लिए आप
की स्थापना की जाती है. आप देवों के मूल स्थान हैं. ( ८ )
उपयामगृहीतोसि बृहस्पतिसुतस्य देव सोम त ऽ इन्दोरिन्द्रियावतः पत्नीवतो ग्रहाँ २
ऋध्यासम्.
अहं परस्तादहमवस्ताद्यदन्तरिक्षं तदु मे पिताभूत्.
अह ँ४ सूर्यमुभयतो ददर्शाहं देवानां परमं गुहा यत्.. (९)
हे सोम! आप बृहस्पति के पुत्र हैं. हम ने आप को उपयाम में ग्रहण कर लिया
है. हम सोम को पत्नी के साथ ग्रहण करते हैं. हम उन की बढ़ोतरी करते हैं. अंतरिक्ष
पिता तुल्य हैं. हम सब ओर से उन का संरक्षण पाए हुए हैं. हम दोनों ओर से सूर्य के
दर्शन करें. हम देवताओं की परम गुहा के दर्शन करें. ( ९ )
अग्ना ३ इ पत्नीवान्त्सजूर्देवेन त्वष्ट्रा सोमं पिब स्वाहा.
प्रजापतिर्वृषासि रेतोधा रेतो मयि धेहि प्रजापतेस्ते वृष्णो रेतोधसो रेतोधामशीय.. (१०)
हे अग्नि! आप पत्नी सहित त्वष्टा देव की भांति सोमपान कीजिए. हम आप
के लिए आहुति समर्पित करते हैं. हे प्रजापति! आप वीर्य धारक हैं. आप हमें
वीर्यवान बनाइए. आप पराक्रमी हैं. आप हमारे लिए पराक्रम धारिए. हम वीर्यवान
व शक्तिशाली हों. ( १० )
यजुर्वेद - ९५
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
उपयामगृहीतोसि हरिरसि हारियोजनो हरिभ्यां त्वा.
हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय.. (११)
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप हरे रंग के हैं. आप योजन
दूर से अपने घोड़ों की सहायता से पधारिए. आप इंद्र देव के साथ हरे रंग के घोड़ों
वाले रथ पर पधारिए. (११)
यस्ते अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिस्तस्य त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य
शस्तोक्थस्योपहूतस्योपहूतो भक्षयामि.. (१२)
हे सोम! आप उपासना योग्य हैं. हम बारबार आप को आमंत्रित करते हैं. हम
उक्त मंत्र से आप की उपासना करते हैं. आप घोड़ों व गायों के प्रेरक हैं. हम यजुर्वेद
के मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. हम अपने अभीष्ट की पूर्ति चाहते हैं. (१२)
देवकृतस्यैनसोवयजनमसि मनुष्यकृतस्यैनसोवयजनमसि पितृकृतस्यैनसो-
वयजनमस्यात्मकृतस्यैनसोवयजनमस्येनस ऽ एनसोवयजनमसि.
यच्चाहमेनो विद्वाँश्चकार यच्चाविद्वाँस्तस्य सर्वस्यैनसोवयजनमसि.. (१३)
आप देवताओं के प्रति यज्ञ आदि से संबंधित पापों को दूर करने वाले हैं. आप
यज्ञ आदि से संबंधित मनुष्य के पापों को दूर करने वाले हैं. पितरों के प्रति किए
गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप अपनेआप के प्रति किए गए पापों को दूर
करने वाले हैं. आप जानेअनजाने में किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप हमें
सभी पापों से मुक्त करने की कृपा कीजिए. (१३)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१४)
हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले और मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा
देव हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन देने व कष्ट विहीन करने की कृपा
कीजिए. (१४)
समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः स ँ४ सूरिभिर्मघवन्तस् ँ४ स्वस्त्या.
सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति सं देवाना ँ४ सुमतौ यज्ञियाना ँ४ स्वाहा.. (१५)
हे इंद्र देव! आप हमें अच्छा मन, इष्ट गाएं व वीरता वाली भावना दीजिए. आप
हमें कल्याणकारी भावनाओं से भरिए. आप ब्राह्मणों द्वारा देवताओं के लिए किए
गए कार्यों के प्रति श्रेष्ठ बुद्धि से जोड़िए. यजमानों की ओर से भेंट की गई आहुति
स्वीकार कीजिए. (१५)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१६)
९६ - यजुर्वेद 632/6
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव!
हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन दीजिए. आप हमें कष्ट विहीन करने की कृपा
कीजिए. ( १६ )
धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो अग्निः.
त्वष्टा विष्णुः प्रजया स १४ रराणा यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा.. (१७)
हे सविता देव! आप धन धारणकर्ता हैं. हम आप के लिए यज्ञ करते हैं. प्रजापति
निधिवान व पालक हैं. अग्नि, त्वष्टा देव विष्णु यजमान के लिए श्रेष्ठ संतान व धन
धारने की कृपा करें. हम इन सब देवताओं के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. ( १७ )
सुगा वो देवाः सदना ऽ अकर्म य ऽ आजग्मेद १४ सवनं जुषाणाः.
भरमाणा वहमाना हवी १४ ष्यस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा.. (१८)
हे देवो! यज्ञ सदन आप के लिए सुगम बना दिए हैं. आप आसानी से यज्ञ-
सेवन करने का काम कर सकते हैं. आप के लिए पात्र हवि से भरे हैं. आप के लिए
हवि वहन कर रहे हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. ये सभी आहुतियां धन के लिए
अर्पित हैं. ( १८ )
याँ २ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे.
जक्षिवा १४ सः पपिवा १४ सश्च विश्वेसुं घर्म १४ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा.. (१९)
हे अग्नि! आप ने जिन का आह्वान किया है, उन देवों को अपनेअपने स्थान पर
प्रतिष्ठित करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ में दी गई हवि सारे यज्ञ की आहुतियां
ग्रहण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए आहुतियां अर्पित करते हैं. ( १९ )
वय १४ हि त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह.
ऋधगया ऽ ऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्स्वाहा.. (२०)
हे अग्नि! जिस यज्ञ के लिए आप को यहां आमंत्रित किया गया है, उसे आप
ने अच्छी तरह पूरा किया. इसलिए अब ज्ञान संपन्न आप अपने स्थान की ओर
प्रस्थान करते हुए यह आहुति स्वीकार करें. ( २० )
देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित.
मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ १४ स्वाहा वाते धाः.. (२१)
हे देवतागण! आप यज्ञ के ज्ञाता हैं. आप अपने ज्ञात स्थान की ओर गमन
कीजिए. आप मन के स्वामी हैं. इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं.
आप हमारे लिए शुद्ध वायु धारिए. ( २१ )
यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहा.
एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा.. (२२)
यजुर्वेद - ९७
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
हे यज्ञ देव! आप यज्ञ की ओर जाइए. आप यज्ञपति को प्राप्त होइए. आप अपने
मूल स्थान को जाइए. यह आप का यज्ञ है. आप यज्ञपति के पास जाइए. हम आप
को आहुति भेंट करते हैं. हम हजारों वाणियों से आप की स्तुति करते हैं. आप
सर्वाधिक वीर हैं. हम इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २२ )
माहिर्भूर्मा पृदाकुः. उरु १७ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ.
अपदे पादा प्रतिधातवेकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्.
नमो वरुणायाधिष्ठितो वरुणस्य पाशः.. ( २३)
आप पृथ्वी पर अजगर के समान खतरनाक मत बनिए. सूर्य के प्रस्थान के लिए
वरुण देव मार्ग को सुगम बनाने की कृपा करें. वरुण देव जहां पैर न रखे जा सकते
हैं, वहां भी मार्ग बना देते हैं, प्रतिघात कर देते हैं. हृदय के कष्ट दूर करते हैं. उन
के पाश दुष्टनाशी हैं. वे प्रतिष्ठित देव हैं. हमारा उन्हें नमन. ( २३ )
अग्नेरनीकमप ऽ आ विवेशापां नपात् प्रतिरक्षन्नसुर्यम्.
दमेदमे समिधं यक्ष्यग्ने प्रति ते जिह्वा घृतमुच्चरण्यत् स्वाहा.. (२४)
हे अग्नि! आप जल में प्रवेश कीजिए. ताकि जलधार नीचे न गिर पाए. आप
असुरों से यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप समिधा को ग्रहण करने की कृपा कीजिए.
आप की जिह्वा यज्ञ का घी धारण करने के लिए प्रेरित हो. हम अग्नि के लिए
आहुति अर्पित करते हैं. ( २४ )
समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुपताः.
यज्ञस्य त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा.. (२५)
हे सोम! आप का हृदय समुद्र व जलमय हैं. आप को हम वहां स्थापित करते
हैं. आप की ओषधियां और जल हमारे लिए प्रवाहित होते रहें. हे यज्ञपति! हम आप
के लिए सूक्त उच्चारते हैं. विधिविधानपूर्वक आहुति अर्पित करते हैं. आप के लिए
नमन. ( २५ )
देवीराप ऽ एष वो गर्भस्त १७ सुप्रीत १७ सुभृतं बिभृत.
देव सोमैष ते लोकस्तस्मिञ्छं च वक्ष्व परि च वक्ष्व.. (२६)
हे दिव्य जल! यह सोमपात्र आप का गर्भ है. आप प्रेम से व इस का पोषण
करते हुए ग्रहण करें. हे सोम! जल आप का लोक है. आप उस की इच्छा करिए.
आप भी सुखी रहिए. हमें भी सुखी रखिए. संरक्षण दीजिए. ( २६ )
अवभृथ निचम्पुण निचेरुरसि निचम्पुणः.
अव देवैर्देवकृतमेनोयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि.
देवाना १७ समिदसि.. (२७)
९८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
हे अवभृथ ( स्नान यज्ञ ) ! आप निचोड़ने व निरंतर बहने वाले हैं. आप दैवकृपा
से देवों के प्रति हमारे पाप दूर करने की कृपा कीजिए. आप मनुष्यों के प्रति किए
गए हमारे पापों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप परेशान करने वाले शत्रुओं
को दूर करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से देवत्व बढ़ता है. ( २७ )
एजतु दशमास्यो गर्भो जरायुणा सह.
यथायं वायुरेजाति यथा समुद्र ऽ एजति.
एवायं दशमास्यो अस्रज्जरायुणा सह.. ( २८)
दस माह के गर्भ के जरायु के साथ जाइए. जैसे यह वायु जाती है, जैसे यह
समुद्र जाता है, वैसे ही आप दस मास के जरायु के साथ उत्पन्न हुए. ( २८ )
यस्यै ते यज्ञियो गर्भो यस्यै योनिर्हिरण्ययी.
अङ्गान्यहुता यस्य तं मात्रा समजीगम १७ स्वाहा.. (२९)
हे देवी! इसी से आप का गर्भ यज्ञ से संबंधित भावनाएं रखने वाला है. आप
की योनि इसी से स्वर्गमयी है. अंग अग्नि की तरह पवित्र हैं. मंत्रों से आप का पवित्र
समागम होता है. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( २९ )
पुरुदस्मो विषुरूप ऽ इत्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः.
एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता १७ स्वाहा.. (३०)
गर्भ दानी रूपवान, बुद्धिमान, महिमावान और धीर है. एक पद वाली, दो पद
वाली, तीन पद वाली, चार पद वाली, आठ पद वाली, प्रार्थनाएं भुवनों में प्रसारित
हों. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( ३० )
मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः. स सुगोपातमो जनः.. (३१)
हे मरुद्गण! आप दिव्य व विशिष्ट हैं. आप लोगों के कष्ट दूर करते हैं. आप
लोगों की गायों के अच्छे रक्षक हैं. ( ३१ )
मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२)
महान् पृथ्वी, स्वर्गलोक इस यज्ञ की रक्षा करने की कृपा करें. धन पिपासुओं
( प्यासों ) को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ३२ )
आ तिष्ठ वृत्रहन्न्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी.
अर्वाचीन १७ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३३)
हे इंद्र देव! आप वृत्रनाशक हैं. आप के घोड़े संकेत मात्र से चलने वाले हैं.
आप अपने ब्रह्मज्ञानी घोड़ों को रथ में जोतिए. प्राचीन सोम को पत्थर से कूटने पर
यजुर्वेद - ९९
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
होने वाली ध्वनियों से आप का मन यज्ञ की ओर आकर्षित हो. हे सोम! आप को
इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप सोलह कलाओं वाले हैं. आप
को इंद्र देव के लिए इस पात्र में लिया गया है. सोलह कलाओं वाले इंद्र देव के
लिए आप को इस पात्र में ग्रहण किया गया है. ( ३३ )
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा.
अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३४)
हे इंद्र! आप हरि नामक घोड़े हैं. आप शत्रुनाशी हैं. तेज गति वाले घोड़े आप
को मनुष्यों के यज्ञ में लेने आते हैं. यजमान ऋषियों की श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से आप
की उपासना करते हैं. सोमरस को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है.
यह इंद्र देव के लिए मूल स्थान है. वे सोलह कलाओं वाले हैं. हम सोलह कलाओं
वाले इंद्र के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३४ )
इन्द्रमिद्धरी वहतोप्रतिधृष्टशवसम्.
ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३५)
हे इंद्र! आप शत्रुओं का नाश करने वाले और सोम पीने वाले हैं. तेज गति वाले
दो घोड़े आप को यज्ञ स्थल तक ले जाते हैं. हे सोम! आप कलश में ग्रहण करने
योग्य हैं. यह आप का आश्रय स्थल है. इसलिए हम सोलह कलाओं वाले इंद्र की
प्रसन्नता हेतु आप को ग्रहण करते हैं. ( ३५ )
यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य ऽ आविवेश भुवनानि विश्वा.
प्रजापतिः प्रजया स १४ रराणस्त्रीणि ज्योति १४ षि सचते स षोडशी.. (३६)
इंद्र देव से परम श्रेष्ठ और कोई देव नहीं है. वे सभी लोकों में व्यापक हैं.
प्रजापति प्रजा के साथ रमण करते हैं. वे सोलह कलाओं वाले हैं. तीनों ज्योतियों
को अपने में धारे हुए हैं. ( ३६ )
इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा तौ ते भक्षं चक्रतुरग्र ऽ एतम्.
तयोरहमनु भक्षं भक्षयामि वाग्देवी जुषाणा सोमस्य तृप्यतु सह प्राणेन स्वाहा.. (३७)
इंद्र सम्राट् हैं. वरुण देव राजा हैं. वे दोनों देव पहले भोग लगाते हैं. उस के
बाद हम उस सामग्री का सेवन करते हैं. वाग् देवी प्राण के साथ जुड़ कर सोमरस
तृप्ति देने की कृपा करें. हम उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ३७ )
अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम्.
दधद्रयिं मयि पोषम्.
१०० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे.
अग्ने वर्चस्विन्वर्चस्वाँस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३८)
हे अग्नि! आप अपना काम करने में कुशल व पवित्र हैं. आप हमें पूरा
वर्चस्व दीजिए. आप हमें श्रेष्ठ वीर्यवान बनाइए. आप हमारे लिए धन धारिए.
आप हमें पोषण दीजिए. हे सोम! आप को अग्नि के लिए कलश में ग्रहण करते
हैं. हम वर्चस्व के लिए आप को ग्रहण करते हैं. यह आप का मूल स्थान है. आप
वर्चस्वियों में वर्चस्ववान देव हैं. हमें भी इसी तरह मनुष्यों में बारबार वर्चस्वी
बनाइए. ( ३८ )
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः.
सोममिन्द्र चमू सुतम्.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वौजस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे.
इन्द्रौजिष्ठौजिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३९)
हे इंद्र देव! आप ओज के साथ उठिए. आप सुंदर ठोड़ी वाले हैं. आप इस पेय
का पान कीजिए. हे सोम! इंद्र के लिए आप को चुआ रहे हैं. सोम को इंद्र देव के
लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव का मूल निवास है. हम ओज के
लिए आप को ग्रहण करते हैं. इंद्र देव ओजवान हैं. वे देवताओं में ओजवान हैं, वैसे
ही हम मनुष्यों में ओजवान हो जाएं. ( ३९ )
अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ २ अनु.
भ्राजन्तो अग्नयो यथा.
उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय.
सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोहं मनुष्येषु भूयासम्.. (४०)
अदृश्य रश्मियों ( किरणों ) की अग्निपताका अनुकरण करती है. वह मनुष्यों
को नहीं दिखाई देती है. आप को सूर्य के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप
चमकते रहिए. कलश आप का मूल स्थान है. सूर्य प्रकाशमान है. वह देवों में
प्रकाशमान है, वैसे ही हम मनुष्यों में प्रकाशमान हो जाएं. ( ४० )
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः.
दृशे विश्वाय सूर्यम्.
उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय.. (४१)
ये सूर्य की किरणें विश्वविख्यात हैं. ये दिव्यता वहन करती हैं. सूर्य की किरणें
सारे संसार को दृष्टि प्रदान करती हैं. हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है.
आप को प्रकाशमान सूर्य के लिए ग्रहण किया है. यही आप का मूल स्थान है. आप
सूर्य के लिए प्रकाशित होइए. ( ४१ )
यजुर्वेद - १०१
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः.
पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः.. (४२)
हे महिमाशालिनी! आप इस कलश को पूरी तरह सूंघिए. इस के सोम आदि
आप में प्रवेश करें. आप पुनः उस ऊर्जा को लौटाइए. वह ऊर्जा हमें हजारों धाराओं
के रूप में मिले. हमें दुधारी गाएं व धन मिलें. (४२)
इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते ऽदिते सरस्वति महि विश्रुति.
एता ते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्.. (४३)
हे गोमाता! आप हवन में काम्य हैं. आप चंद्रमा और सूर्य की ज्योति की तरह
हैं. आप सरस, पृथ्वी पर विख्यात व वध योग्य नहीं हैं. आप हमारे नाम से अच्छी
वाणी से देवताओं को बुलाने के लिए बोलिए. (४३)
वि न ऽइन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विमृध ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे.. (४४)
हे इंद्र देव! आप हमारे शत्रुओं व नीचों को मारिए. जो हमें दासता और अंधकार
देना चाहते हैं. आप उन्हें अंधकार में ले जाइए. आप को इंद्र देव के लिए कलश में
ग्रहण किया गया है. आप यहां स्थित रहिए. यह आप का मूल स्थान है, आप यहां
स्थित रहिए. (४४)
वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम.
स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४५)
हे वाचस्पति! आप विश्व के कर्मों के सर्जक हैं. आप मन जैसे हैं. आज
हम जो अन्न हवन कर रहे हैं. उसे स्वीकारिए. आप सज्जनता भरे काम करते हैं.
आप विश्व का भरणपोषण करते हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण
किया है. आप को विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया है. यह आप
का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा इंद्र देव के लिए समर्पित किया जाता
है. (४५)
विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्.
तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुरो विहव्यो यथासत्.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४६)
हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप दुःख दूर करने वाले
हैं. आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, अपूर्व, उग्र व विशेष आदरणीय हैं. हम आप का विशेष
१०२ – यजुर्वेद