यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध आठवां अध्याय
उपयामगृहीतोसि हरिरसि हारियोजनो हरिभ्यां त्वा.
हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय.. (११)
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप हरे रंग के हैं. आप योजन
दूर से अपने घोड़ों की सहायता से पधारिए. आप इंद्र देव के साथ हरे रंग के घोड़ों
वाले रथ पर पधारिए. (११)
यस्ते अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिस्तस्य त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य
शस्तोक्थस्योपहूतस्योपहूतो भक्षयामि.. (१२)
हे सोम! आप उपासना योग्य हैं. हम बारबार आप को आमंत्रित करते हैं. हम
उक्त मंत्र से आप की उपासना करते हैं. आप घोड़ों व गायों के प्रेरक हैं. हम यजुर्वेद
के मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. हम अपने अभीष्ट की पूर्ति चाहते हैं. (१२)
देवकृतस्यैनसोवयजनमसि मनुष्यकृतस्यैनसोवयजनमसि पितृकृतस्यैनसो-
वयजनमस्यात्मकृतस्यैनसोवयजनमस्येनस ऽ एनसोवयजनमसि.
यच्चाहमेनो विद्वाँश्चकार यच्चाविद्वाँस्तस्य सर्वस्यैनसोवयजनमसि.. (१३)
आप देवताओं के प्रति यज्ञ आदि से संबंधित पापों को दूर करने वाले हैं. आप
यज्ञ आदि से संबंधित मनुष्य के पापों को दूर करने वाले हैं. पितरों के प्रति किए
गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप अपनेआप के प्रति किए गए पापों को दूर
करने वाले हैं. आप जानेअनजाने में किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप हमें
सभी पापों से मुक्त करने की कृपा कीजिए. (१३)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१४)
हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले और मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा
देव हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन देने व कष्ट विहीन करने की कृपा
कीजिए. (१४)
समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः स ँ४ सूरिभिर्मघवन्तस् ँ४ स्वस्त्या.
सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति सं देवाना ँ४ सुमतौ यज्ञियाना ँ४ स्वाहा.. (१५)
हे इंद्र देव! आप हमें अच्छा मन, इष्ट गाएं व वीरता वाली भावना दीजिए. आप
हमें कल्याणकारी भावनाओं से भरिए. आप ब्राह्मणों द्वारा देवताओं के लिए किए
गए कार्यों के प्रति श्रेष्ठ बुद्धि से जोड़िए. यजमानों की ओर से भेंट की गई आहुति
स्वीकार कीजिए. (१५)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१६)
९६ - यजुर्वेद 632/6