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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 85 of 421

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पूर्वार्ध सातवां अध्याय
हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप हमें ऐसा धन दीजिए जो वापस हम से न जाए.
उस धन को पा कर हम आनंदित हों. हमें ऐसी गाएं प्रदान कीजिए, जो हमें छोड़
कर कहीं नहीं जाएं. आप की इस कृपा से हम वैसे ही प्रसन्न होंगे, जैसे देवगण
हवि पा कर प्रसन्न होते हैं, गाय आहार पा कर प्रसन्न होती है. ऋत (सत्य) व यज्ञ
की आयु की बढ़ोतरी के लिए आप दोनों यज्ञशाला में अपने लिए निश्चित आसन
पर विराजिए. (१०)
या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावति.
तया यज्ञं मिमिक्षतम्. उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वैष ते योनिर्माध्वीभ्यां त्वा.. (११)
हे अश्विनी देवो! आप मधुर वाणी से हमारे यज्ञ को सींचने की कृपा कीजिए.
मधुर वाणी से हम ने भी यज्ञ को सींचा है. हम ने आप दोनों के लिए हवि को कलश
में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. यज्ञ में आप अपने निर्धारित आसन
पर विराजने की कृपा कीजिए. (११)
तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद छं स्वर्विदम्.
प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे.
उपयामगृहीतोसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाह्यपमृष्टः षण्डो देवास्त्वा शुक्रपाः
प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१२)
इंद्र देव बारबार सोमरस को पीते हैं. सोमरस पोषक व आनंददायी है. इंद्र
देव आत्मज्ञाता, ज्येष्ठ, कुश के आसन पर विराजते हैं. वे यजमानों के लिए धन
का दोहन करते हैं और यजमानों के लिए धन की बढ़ोतरी करते हैं. वे वीर्यरक्षक
हैं. उन के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. वही उस की मूल
योनि है. वे हमें दुष्टों से दूर करें तथा अपने लिए निर्धारित आसन पर विराजने
की कृपा करें. (१२)
सुवीरो वीरान् प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्.
सज्जमानो दिवा पृथिव्या शुक्रः शुक्रशोचिषा निरस्तः
षण्डः शुक्रस्याधिष्ठानमसि.. (१३)
आप सुवीर हैं. आप वीरों को पैदा कीजिए. आप यजमान को धन से पोषित
कीजिए. आप स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को चमकाने वाले हैं. आप सर्वत्र प्रकाश से
चमकाइए. आप प्रकाश के निवास स्थान हैं. आप उजड्डपन को नष्ट करने वाले
हैं. (१३)
अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम.
सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१४)
हे सोम! आप अनंत शक्तिमान, श्रेष्ठ वीर्यवान व धन के पोषक हैं. हम आप
यजुर्वेद - ८५