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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 91 of 421

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Page 91

पूर्वार्ध सातवां अध्याय
पीने की कृपा कीजिए. आप शूरवीर, सुखदाता, श्रेष्ठ यज्ञ वाले एवं अच्छे कवि हैं.
आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मरुद्गण देव के
लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. आप मरुद्गण के
साथ यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३५ )
मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्य १४ँ शासमिन्द्रम्.
विश्वासाहमवसे नूतनायोग १४ँ सहोदामिह त १४ँ हुवेम.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.
उपयामगृहीतोसि मरुतां त्वौजसे.. ( ३६ )
हे इंद्र! आप हम यजमानों की विनती पर मरुद्वान हो कर पधारिए. मरुद्गण
जल की वर्षा करने वाले एवं दिव्य हैं. आप को विश्वासपूर्वक आमंत्रित करते हैं.
आप नूतन और उग्र हैं. आप साथसाथ रहते हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के
लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है.
ओज पाने के लिए आप को कलश में ग्रहण किया गया है. ( ३६ )
सजोषा ऽ इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्.
जहि शत्रूँ २ ऽ रप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः.
उपयाम गृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३७ )
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक, शूरवीर, विद्वान् हैं. मरुद्गणों के साथ इस
यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुओं को दूर एवं उन का नाश कीजिए.
आप हमें सब ओर से सुरक्षा प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव व
मरुद् देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल
स्थान है. ( ३७ )
मरुत्वाँ २ ऽ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय.
आसिञ्चस्व जठरे मध्व ऽ ऊर्मिं त्व १४ँ राजासि प्रतिपत्सुतानाम्.
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३८ )
हे मरुद्गण! आप यजमानों के लिए जल, धन व अन्न बरसाते हैं. आप सोमरस
पी कर आनंदित होइए. आप शत्रुओं से युद्ध कीजिए. सोमरस लहरदार व मीठा है.
आप छक कर इस को पीजिए. आप तो सोमरस के राजा हैं. आप को इंद्र देव व
मरुद्गण के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव व मरुद्गण का मूल
स्थान है. ( ३८ )
महाँ २ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः सहोभिः.
अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.
उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. ( ३९ )
यजुर्वेद - ९१