Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished421 pages

About this granth

The Yajurveda (यजुर्वेद) is the second of the four Vedas and the Veda of sacrificial ritual. Its formulas are largely in prose, and it was compiled as a manual for priests conducting the sacrifices; most mantras used in household rites and fire rituals today still come from it.

This edition by Dr. Rekha Vyas gives the mantras with a simple Hindi rendering of their sense. It was published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi (copyright 1979); the scanned copy is the 2015 edition. In her foreword the author notes that 663 mantras of the Rigveda reappear unchanged in the Yajurveda, yet the two differ, since the Rigveda is in verse and the Yajurveda in prose. She also mentions the tradition of 101 branches of the Yajurveda, of which two are the most widely followed.

The translation runs chapter by chapter after a table of contents, offering readers the plain meaning of the mantras without a dense commentary.

सत्रहवां अध्याय

Page 207Permalink

सत्रहवां अध्याय
अश्मन्नूर्जं पर्वते शिश्रियाणामद्भ्य ऽ ओषधीभ्यो वनस्पतिभ्यो अधि सम्भृतं पयः.
तां न ऽ इषमूर्जं धत्त मरुतः स ष्ठ रराणा अश्मँस्ते क्षुन्मयि त ऽ ऊर्ग्यं द्विष्मस्तं ते
शुगृच्छतु.. (१)
हे मरुद्गण! आप हमें अन्न से ऊर्जस्वी बनाने की कृपा करें. आप पत्थरों,
ओषधियों, जलों व वनस्पतियों का बल धारिए. उन्हें और अधिक रसपूर्ण बनाइए.
आप अन्न धारिए. आप की क्षुधा शांत हो. आप का क्रोध उन लोगों पर हो, जो हम
से द्वेष रखते हैं. ( १ )
इमा मे अग्न ऽ इष्टका धेनवः सन्त्वेका च दश च दश च शतं च शतं च सहस्रं च
सहस्रं चायुतं चायुतं च नियुतं च नियुतं च प्रयुतं चार्बुदं च न्यर्बुदं च समुद्रश्च मध्यं
चान्तश्च परार्धश्चैता मे अग्न ऽ इष्टका धेनवः सन्त्वमुत्रामुष्मिँल्लोके.. (२)
हे अग्नि! ये इष्टकाएं ( हवि का सूक्ष्म भाग ) हमारे लिए मनोरथपूरक
कामधेनु की तरह हो जाएं. ये इष्टकाएं दस गुनी हो जाएं. दस से दस गुनी हो जाएं.
सौ की दस गुनी हजार हो जाएं. हजार की दस गुनी हो कर दस हजार हो जाएं.
अयुत ( दस हजार ) की गुनी हो कर नियुत ( लाख ) हो जाएं. नियुत की दस गुनी
हो कर प्रयुत ( दस लाख ) हो जाएं. प्रयुत की दस गुनी हो कर करोड़ हो जाएं.
करोड़ की दस गुनी हो कर दस करोड़ हो जाएं. दस करोड़ की दस गुनी हो कर
अरब हो जाएं. समुद्रसमुद्र की दस गुनी मध्य ( शंख पद्म ), मध्य की दस गुनी
अंत. अंत की दस गुनी हो कर परार्द्ध संख्या तक बढ़ती जाएं. हे अग्नि! इष्टकाएं
इस लोक और परलोक में हमारा कल्याण करें. ये इष्टकाएं हमारे लिए कामधेनु
की तरह हो जाएं. ( २ )
ऋतवः स्थ ऽ ऋतावृध ऽ ऋतुष्ठाः स्थ ऽ ऋतावृधः.
घृतश्च्युतो मधुश्च्युतो विराजो नाम कामदुघा ऽ अक्षीयमाणाः.. ( ३)
इष्टकाएं सत्य को स्थिर रखती हैं, सत्य की बढ़ोतरी करती हैं, इष्टका सत्य
में स्थित रहती हैं. इष्टकाएं सत्य में बढ़ोतरी करती हैं. ये घी व मधु चुआएं. ये
शोभित और कामनापूरक हों. कभी क्षीण न हों. ( ३ )
यजुर्वेद - २०७

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

Page 208Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
समुद्रस्य त्वावकयाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (४)
हे अग्नि! हम आप को समुद्र के कवक से चारों ओर से घेर कर रखते हैं. आप
हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (४)
हिमस्य त्वा जरायुणाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (५)
हे अग्नि! हम भ्रूण को लपेटने की तरह आप को हिम के आवरण से चारों
ओर से घेर लेते हैं. आप हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी
होइए. (५)
उप ज्मन्नुप वेतसे ऽ वतर नदीष्वा.
अग्ने पित्तमपामसि मण्डूकि ताभिरागहि सेमं नो यज्ञं पावकवर्ण १४ शिवं कृधि.. (६)
हे अग्नि! आप हमारे समीप पधारिए. हे अग्नि! आप बड़वाग्नि के साथ नदी
में बहते हैं. हे अग्नि! आप जल के पित्त हैं. मंडूकि को अग्नि का अनुसरण करना
चाहिए. आप पृथ्वी से बाहर निकलिए. जल में प्रवेश कीजिए. आप हमारे इस यज्ञ
को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (६)
अपामिदं न्ययन १४ समुद्रस्य निवेशनम्.
अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (७)
यह अग्नि जल के आश्रय समुद्र के घर में रहते हैं. आप हमारे शत्रुओं को
तपाइए. आप हमारे इस यज्ञ को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (७)
अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान् वक्षि यक्षि च.. (८)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले और चमकने वाले हैं. आप देवों को जिह्वा
से बुलाइए. आप यज्ञ कराइए. (८)
स नः पावक दीदिवो ऽ ग्ने देवाँ २ इहा वह. उप यज्ञ १४ हविश्च नः.. (९)
हे अग्नि! आप पवित्र बनाने वाले हैं. स्वर्गलोक को दीप्तिमय बनाते हैं. आप
यहां देवों का आह्वान कीजिए. यज्ञ के समीप विराजने व उन के पास इस हवि को
पहुंचाने की कृपा कीजिए. (९)
पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन् रुरुच ऽ उषसो न भानुना.
तूर्वन् न यामन्नेतशस्य नू रण ऽ आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (१०)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाली ज्वालाओं से प्रदीप्त होते हैं. जैसे उषा काल
में किरणों से घिरा हुआ सूर्य शोभता है, वैसे ही आप ज्वालाओं से शोभते हैं. जैसे
वेगवान घोड़े पर बैठा हुआ सैनिक शोभा देता है, उसी प्रकार आप अपने वेग
(तेज) से शोभा पाते हैं. (१०)
२०८ - यजुर्वेद 632/13

Page 209Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वर्चिषे.
अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १७ँ शिवो भव.. (११)
हे अग्नि! आप को नमस्कार. आप की ज्वालाएं चमकीली हैं. आप को नमस्कार.
हम आप की अर्चना करते हैं. आप पवित्र करने वाले हैं. जो हमारे द्वेषी हैं, आप उन्हें
संतप्त कीजिए. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (११)
नृषदे वेड्प्सुषदे वेड् बर्हिषदे वेड् वनसदे वेट् स्वर्विदे वेट्.. (१२)
मनुष्यों में स्थित अग्नि ( जठराग्नि ) हेतु आहुति अर्पित है. जलों में स्थित
अग्नि ( बड़वाग्नि ) हेतु आहुति अर्पित है. कुश में स्थित अग्नि हेतु आहुति
अर्पित है. (१२)
ये देवा देवानां यज्ञिया यज्ञियाना १७ँ संवत्सरीणमुप भागमासते.
अहुतादो हविषो यज्ञे अस्मिन्त्स्वयं पिबन्तु मधुनो घृतस्य.. (१३)
जो देव देवताओं के यज्ञ में यज्ञीय आहुति ग्रहण करते हैं, वे इस यज्ञ में यज्ञ
के भाग हवि को ग्रहण करें. देवगण यज्ञ में बिना बुलाए ही मधु और घी की आहुति
को स्वयं ही पीने की कृपा करें. (१३)
ये देवा देवेष्वधि देवत्वमायन् ये ब्रह्मणः पुर ऽ एतारो अस्य.
येभ्यो न ऽ ऋते पवते धाम किञ्चन न ते दिवो न पृथिव्या ऽ अधि स्नुषु.. (१४)
जिन देवताओं ने देवाधिदेव की तरह देवत्व का अधिकार पाया, जो ब्राह्मण
के सामने विचरते हैं, जिन के बिना शरीर किंचित् ( जरा ) भी पवित्र नहीं होता वे
न स्वर्गलोक में हैं, न पृथ्वी में हैं, बल्कि हर एक में विद्यमान हैं. (१४)
प्राणदा ऽ अपानदा व्यानदा वर्चोदा वरिवोदाः.
अन्यांस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १७ँ शिवो भव.. (१५)
हे अग्नि! आप प्राणदाता, अपानदाता, व्यानदाता व वर्चस्वदाता हैं. हे अग्नि!
आप वायुदाता व शक्तिदाता हैं. आप के आयुध हमारे शत्रुओं पर पड़ें. आप पवित्र
करने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (१५)
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं न्यतृत्रिणम्. अग्निर्नो वनते रयिम्.. (१६)
हे अग्नि! आप की ज्वालाएं शुचिपूर्ण ( पवित्र ) हैं. हे अग्नि! आप की ज्वालाएं
सारे विश्व का कल्याण करने वाली हैं. अग्नि हमें धन प्रदान करने की कृपा
करें. (१६)
य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत् पिता नः.
स ऽ आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छद्वराँ २ आ विवेश.. (१७)
यजुर्वेद - २०९

Page 210Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
जो परम शक्ति इस पूरे विश्व का पालनपोषण और संहार करती है, हम उन
से धन की इच्छा करते हुए पहले ही उन्हें भी अपने वश में रखते हैं और हम भी उन
के वश में रहते हैं. ( १७ )
कि ँᳵ स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्.
यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः.. ( १८ )
परमात्मा किस अधिष्ठान पर आरंभ में अधिष्ठित थे ? इन की उत्पत्ति की क्या
कथा है ? वह उत्पादक द्रव्य कैसा था ? वह भूमि पर उत्पन्न हुआ. विश्वकर्मा सारे
विश्व का द्रष्टा है. स्वर्गलोक तक व्याप्त है. ( १८ )
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्.
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव ऽ एकः.. (१९)
वह परम शक्ति संपूर्ण विश्व पर आंख रखने वाली है. वह परम शक्ति सब
ओर मुंह वाली है. वह परम शक्ति सब ओर बाहु वाली है. वह परम शक्ति सब ओर
सामर्थ्य वाली है. उस परम शक्ति ने अपने बाहुबल की क्षमता से स्वर्ग को बिना
आधार के उत्पन्न किया. परमात्मा एक है. ( १९ )
कि ँᳵ स्विद्वनं क ऽ उ स वृक्ष ऽ आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः.
मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्.. (२०)
वह वन कौन सा है, वह वृक्ष कौन सा है, जिस से ईश्वर ने स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक को रचा. आप मनीषियों के मन से पूछिए कि सभी भुवनों को धारते हुए
वे स्वयं किस स्थान पर अधिष्ठित हैं. ( २० )
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा.
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः.. (२१)
जिस ने ये परमधाम रचे; जो उन्नत, निम्न और मध्य धाम का रचयिता है; उस
सर्जक के प्रति हम अपना सखा भाव प्रकट करते हैं. हम आप के लिए हवि धारते
हैं. हम आप के लिए स्वयं यज्ञ करते हैं और आप के तन की बढ़ोतरी करते हैं. ( २१ )
विश्वकर्मन् हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्.
मुह्यन्त्वन्ये अभितः सपत्ना ऽ इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (२२)
हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप स्वयं यज्ञ कीजिए.
आप पृथ्वी के हित के लिए यज्ञ कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को मोहित कीजिए.
आप यहां ज्ञानवान सूर्य स्वरूप हैं. ( २२ )
वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम.
स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.. (२३)
२१० - यजुर्वेद

Page 211Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हम आज अपनी रक्षा के लिए वाचस्पति व विश्वकर्मा को आमंत्रित करते हैं.
हम आज अपनी रक्षा के लिए मन जैसे वेगवान को आमंत्रित करते हैं. आप सत्कर्म
करने वाले हैं. आप हमारे यज्ञ में हमारे द्वारा भेंट की गई हवि का प्रेम से भोग
लगाइए. ( २३ )
विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्.
तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमग्रो विहव्यो यथासत्.. ( २४ )
आप विश्व के रचयिता हैं. आप ने हवियों से इंद्र देव की बढ़ोत्तरी की. आप
ने इंद्र देव को संसार का रक्षक बनाया. आप ने इंद्र देव को अवध्य बनाया. इंद्र देव
को मन से नमस्कार करते हैं. हम उन्हें नम कर ( झुक कर ) नमस्कार करते हैं. इंद्र
देव अपूर्व, उग्र और सर्वसमर्थ हैं. ( २४ )
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने.
यदेदन्ता ऽ अददृहन्त पूर्व ऽ आदिद् द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. ( २५ )
हमारे पिता ( पूर्वजों ) ने सृष्टि के आरंभ में स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक को सुदृढ़
बनाया. सृष्टि के आरंभ में उन का विस्तार किया. पिता ने चक्षु ( आंख ) आदि सभी
इंद्रियों का पालन किया. पिता ने धीर हो कर पृथ्वी को घी से सींचा. ( २५ )
विश्वकर्मा विमना ऽ आद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक्.
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन् पर ऽ एकमाहुः.. ( २६ )
जग की रचना में सृष्टि रचयिता के साथ सात ऋषियों ने अद्वितीय सहयोग
किया. वह परम शक्ति एक है. धाता है. विधाता है. पोषक है. सर्वश्रेष्ठ है. उन की
कृपा से सभी इष्ट कार्य पूर्ण होते हैं. वे हवि से प्रसन्न होते हैं. ( २६ )
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा.
यो देवानां नामधा ऽ एक ऽ एव त १७ सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या.. ( २७ )
जो परमेश्वर हमारे पिता हैं, जो सब के जनक हैं, जो विधाता हैं, सब वेदों के
धाम हैं, सब विश्व के भुवनों के ज्ञाता हैं, जो देवताओं के नाम धारण करते हैं,
भले ही वे एक ही हैं, समस्त भुवन ( लोकों ) के प्राणी अंततः उन्हीं के लोक में
प्राप्त होते हैं. ( २७ )
त ऽ आयजन्त द्रविण १७ समस्मा ऽ ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना.
असूत्ते सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि.. ( २८ )
उस परमेश्वर ने सब को जना, सभी धनों को उपजाया. समस्त ऋषिगण जिस
की उपासना करते हैं. यज्ञ में संपूर्ण वैभव जिसे समर्पित करते हैं, वह परमेश्वर
अप्रत्यक्ष रूप से सब में निवास करता है. ( २८ )
यजुर्वेद - २११

Page 212Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
परो दिवा पर ऽ एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति.
क १७ स्विद् गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समपश्यन्त पूर्वे.. (२९)
वह परम तत्त्व स्वर्गलोक से परे है. वह परम तत्त्व पृथ्वीलोक व देवताओं से
परे है. वह परम तत्त्व असुरों से परे है. जलों ने पहले गर्भ में किसे धारण किया ?
जहां देवगण पहले उन्हें देखते हैं. ( २९ )
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे.
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (३०)
वह परम तत्त्व सभी देवताओं का आश्रय है. सभी उस परम तत्त्व को प्राप्त होते
हैं. उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम जल को अपने गर्भ में धारण किया. परमतत्त्व के
नाभि में एक ही परम तत्त्व अधिष्ठित है, जिस में सारे भुवन स्थिर होते हैं. ( ३० )
न तं विदाथ य ऽ इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव.
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप ऽ उक्थशासश्चरन्ति.. (३१)
उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम ब्रह्मांड को रचा. उसे आप और हम लोग नहीं
जानते. वह सब में है भी तथा सब से अलग भी है. कोहरे से ढके बादल की तरह
लोग उस परम तत्त्व के बारे में विविध व्यर्थ धारणाओं ( भ्रांतियों ) से ग्रसित रहते
हैं. उस की स्तुति नहीं कर पाते. ( ३१ )
विश्वकर्मा ह्याजनिष्ट देव ऽ आदिद्गन्धर्वो अभवद् द्वितीयः.
तृतीयः पिता जनितौषधीनामपां गर्भं व्यदधात् पुरुत्रा.. (३२)
सर्वप्रथम विश्व का निर्माण करने वाले देवता पृथ्वी पर आए. तत्पश्चात पृथ्वी
पर आदि गंधर्व हुए. पृथ्वी पालक ओषधियों में जल उपजाने वाले तीसरे क्रम में
हुए. प्रथम रक्षक सभी जलों के गर्भ को विविध रूपों में धारता है. ( ३२ )
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्.
संक्रन्दनो ऽ निमिषएकवीरः शत १७ सेना ऽ अजयत् साकमिन्द्रः.. (३३)
इंद्र देव शीघ्रता से शत्रुओं पर हमला करने वाले हैं. बैल जैसे बलवान हैं.
घनघोर गर्जना करने वाले हैं. शत्रुओं के लिए क्षोभकारी हैं. पल भर में शत्रुओं को
हराने वाले हैं. इंद्र देव अकेले ही ऐसे वीर हैं, जो सैकड़ों शत्रुओं की सेना को एक
साथ जीत लेते हैं. ( ३३ )
संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना.
तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽ इषुहस्तेन वृष्णा.. (३४)
गर्जना से पल भर में शत्रुओं को जीतने वाले हैं. आक्रमण के विविध तरीकों
से शीघ्र ही युद्ध में तैयार होने वाले हैं. संगठित शत्रुओं को भी जीतने वाले हैं. इंद्र
२१२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

Page 213Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
देव से जुड़ कर हम उन के साथ साहसपूर्वक, बलपूर्वक हाथ में बाण ले कर
शत्रुओं को जीत जाएं. सुखपूर्वक जीवन गुजारें. ( ३४ )
स ऽ इषुहस्तैः स निष्षङ्गिभिर्वशी स १९ स्रष्टा स युध ऽ इन्द्रो गणेन.
स १९ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३५)
इंद्र देव हाथ में बाणधारी हैं. वे वीरों को संगठित करने वाले, संगठित शत्रुओं
को भी जीतने वाले व सोमपायी हैं. शत्रु पर बाण प्रहरी, उग्र व धनुषधारी हैं. वे
हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ३५ )
बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ २ अपबाधमानः.
प्रभञ्जन्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (३६)
हे बृहस्पति देव! आप चारों ओर रथ से भ्रमण करते हैं. आप राक्षसों का
विनाश करने वाले और मित्रों की बाधाओं को दूर करने वाले हैं. युद्धों में
विनाश करने वालों को युद्ध में जीतते हुए हमारे रथों की रक्षा करने की कृपा
करें. ( ३६ )
बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान ऽ उग्रः.
अभिवीरो अभिसत्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (३७)
इंद्र देव बल के ज्ञाता, युद्ध में स्थिर, प्रकृष्ट ( अत्यंत ) वीर हैं. वे सामर्थ्यवान,
बलशाली, साहसी व वीर हैं. वे प्रसिद्ध बलशाली और शत्रुओं की भूमि जीतने वाले
हैं. आप सदैव जीतने वाले रथ पर सवार रहते हैं. ( ३७ )
गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.
इम १९ सजाता ऽ अनु वीरयध्वमिन्द्र १९ सखायो अनु स १९ रभध्वम्.. (३८)
हे देवगण! आप गो नाशकों का भेदन करने वाले, गौओं को जानने वाले,
वज्र जैसी भुजाओं वाले और जीतने वाले हैं. ओज से शत्रुओं के नाशक हैं. आप
इंद्र को वीरों के योग्य कार्यों के लिए उत्साह दिलाएं. आप स्वयं भी उन का
अनुकरण करें. हम इंद्र देव के सखा हैं. ( ३८ )
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः.
दुश्च्यवनः पृतनाषाड्युध्योस्माक १९ सेना अवतु प्र युत्सु.. (३९)
इंद्र देव शत्रुओं को पूरी तरह नष्ट करने वाले, क्रोधी व शत्रुओं को पूरी तरह
हराने वाले हैं. वे हमारी सेना की रक्षा करें. वे हमारी सेना को पूरा संरक्षण प्रदान
करें. ( ३९ )
इन्द्र ऽ आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽ एतु सोमः.
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (४०)
यजुर्वेद - २१३

Page 214Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
इंद्र देव इन सब के नेता हैं. बृहस्पति और इंद्र दोनों देव सेना का नियंत्रण करते
हैं. सोम यज्ञ के सम्मुख रहते हैं. मरुद्गण सेना के आगेआगे रहते हैं. विष्णु दाहिनी
ओर रहते हैं. ( ४० )
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज ऽ आदित्यानां मरुता १४ शर्ध ऽ उग्रम्.
महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (४१)
इंद्र वरुण व राजा आदित्य देव की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. वे मरुद्गण
की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. महान् मन वाले लोकों में देवताओं का जयघोष
गूंजता है. ( ४१ )
उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मना १४ सि.
उद्द्वृत्रहन् वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:... (४२)
हे इंद्र देव! आप धनवान हैं. आप अपने आयुधों को तीखा कीजिए. वीरों को
व घोड़ों को शीघ्र जाने के लिए उत्साहित कीजिए. आप शत्रुनाशक व बलशाली
हैं. रथों के जयघोष सब ओर गूंजें. ( ४२ )
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽ इषवस्ता जयन्तु.
अस्माकं वीरा ऽ उत्तरे भवन्त्वस्माँ २ उ देवा ऽ अवता हवेषु.. (४३)
हमारे इंद्र देव ध्वजों को अच्छी तरह फहराते हैं. हमारे शत्रुओं को जीतें. हमारे
बाण शत्रुओं को जीतें. हमारे वीर उत्तरोत्तर विजयी हों. देवगण यज्ञों में हमारी रक्षा
करें. ( ४३ )
अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि.
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्.. (४४)
व्याधियां हमारे शत्रुओं के चित्त को लुभाएं. उन के अंगों को ग्रहण करें.
निर्दयता से शत्रुओं के चित्र को चबाएं. उन के हृदय में शोक व्यापे. शोक से शत्रु
गहन अंधकार में डूब जाएं. ( ४४ )
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं १४ शिते.
गच्छामित्रान् प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः... (४५)
ब्रह्मज्ञानमय वचनों से बाण तीखे हो कर अमित्रों पर गिरें. शत्रुओं पर प्रहार
करें. उन का उच्छेदन ( विनाश ) करें. ( ४५ )
प्रेता जयता नर ऽ इन्द्रो वः शर्म यच्छतु.
उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (४६)
हे नरो! इंद्र देव विजयी हों और हमें सुख प्रदान करें. उन की बाहुएं उग्र हों,
जिस से वह शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें. ( ४६ )
२१४ - यजुर्वेद

पूर्वाध सत्रहवां अध्याय

Page 215Permalink

पूर्वाध सत्रहवां अध्याय
असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽ ओजसा स्पर्धमाना.
तां गूह्त तमसापव्रतेन यथामी अन्यो अन्यं न जानन्.. (४७)
मरुतों की सेना हमारे वेग के साथ स्पर्द्धा करने वाले शत्रुओं तक पहुंचे, ताकि
भ्रम हो जाने के कारण एक दूसरे को जानने में ही असमर्थ हो जाएं तथा अपने ही
लोगों का नाश कर दें. ( ४७ )
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽ इव.
तन्न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (४८)
जहां बाण ऐसे गिरे जैसे बिना चोटी वाले बालक गिरते हैं, वहां इंद्र देव हमें
सुख प्रदान करें. बृहस्पति देव हमें सुख प्रदान करें. अदिति देव हमें सुख प्रदान करें.
स्वामी देव हमें सुख प्रदान करें. ( ४८ )
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (४९)
हम वीर अपने अंगों को कवच से ढकते हैं. वरुण देव इसे दृढ़ बनाए रखें.
सोम राजा हैं. वह सब को अमृत से अमर बनाएं. वरुण देव वरीय हैं. वह हमें विजयी
करें. देवगण उन्हें आनंदित करें. ( ४९ )
उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाहुत. रायस्पोषेण स ᳪ सृज प्रजया च बहुं कृधि.. (५०)
हे अग्नि! हम यजमान आप के लिए घी से आहुति भेंट करते हैं. आप उस से
तृप्त होइए. आप हमें धन से पुष्ट कीजिए. हमारे लिए सुख प्रदान कीजिए. आप हमें
बहुत प्रजा ( पुत्रपौत्र ) से समृद्ध कीजिए. ( ५० )
इन्द्रेमं प्रतरां नय सजातानामसद्वशी.
समेनं वर्चसा सृज देवानां भागदा ऽ असत्.. (५१)
हे इंद्र देव! आप हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाइए. आप हमारे सजातियों को
हमारे वश में कीजिए. आप हमें समान वर्चस्वी और देवताओं को उन का भाग देने
में समर्थ बनाइए. ( ५१ )
यस्य कुर्मो गृहे हविस्तमग्ने वर्धया त्वम्.
तस्मै देवा ऽ अधि ब्रुवन्नयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (५२)
हे अग्नि! हम जिस के घर पर यज्ञ कर्म करते हैं, उन को हवि प्रदान करते हैं,
आप उस की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. सभी देवता उस का वर्चस्व स्वीकारें.
सभी ब्रह्मज्ञान के स्वामी हो जाएं. ( ५२ )
उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः.
स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः.. (५३)
यजुर्वेद - २१५

Page 216Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हे अग्नि! सभी देवगण मन से आप का भरपूर विस्तार करने की कृपा करें.
आप हमारा कल्याण करें. आप हमें वैभववान बनाइए. ( ५३ )
पञ्च दिशो दैवीर्यज्ञमवन्तु देवीरपामतिं दुर्मतिं बाधमाना:.
रायस्पोषे यज्ञपतिमाभजन्ती रायस्पोषे अधि यज्ञो अस्थात्.. (५४)
पांचों दिशाएं इस दैवीय यज्ञ की रक्षा करें व यजमान की मंदबुद्धि दूर करें.
पांचों दिशाएं यजमान की दुर्मति दूर करें. यज्ञपति को धन से पोसें. यज्ञपति को
यशस्वी धन से पोसें. यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा करें. ( ५४ )
समिद्धे अग्नावधि मामहान ऽ उक्थपत्र ऽ ईड्यो गृभीतः.
तप्तं घर्मं परिगृह्यायजन्तोजां यद्यज्ञमयजन्त देवाः.. (५५)
यजमान समिधा से अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. घी से भरी आहुति अग्नि को
प्रदान करते हैं. महान उक्थों ( स्तोत्रों ) से यज्ञ को सिद्ध किया जाता है. ( ५५ )
दैव्याय धर्त्रे जोष्ट्रे देवश्रीः श्रीमनाः शतपयाः.
परिगृह्य देवा यज्ञमायन् देवा देवेभ्यो अध्वर्यन्तो अस्थुः.. (५६)
सैकड़ों लोग देवताओं की दिव्यता तथा शोभा पाने के लिए यज्ञ करते हैं. देवों
को यज्ञ में बुला कर अध्वर्यु यज्ञ करते हैं. उन के धाम को प्राप्त होते हैं. ( ५६ )
वीत १४ हविः शमित १४ शमिता यजद्ध्ये तुरीयो यज्ञो यत्र हव्यमेति.
ततो वाका ऽ आशिषो नो जुषन्ताम्.. (५७)
यजमान शांत मन से शांत हवियों वाला यज्ञ करते हैं. यह यज्ञ तुरीय ( चौथा
एवं उत्तम ) कहा जाता है. यज्ञ के वाणीमय आशीष तन हमारी इच्छा के अनुकूल
फलीभूत होते हैं. ( ५७ )
सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुदयाँ २ अजस्रम्.
तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः.. (५८)
हरे केशों वाली और सम्मुख स्थित सविता देव की रश्मियां उन के उदय होने
से पूर्व ही प्रकट हो जाती हैं. अजस्र ( लगातार ) ज्योति प्रवाहित होने लगती है.
सूर्य का प्रसव ( उदय ) होते ही विद्वान् समस्त भुवनों को देखने में समर्थ हो जाते
हैं. ( ५८ )
विमान ऽ एष दिवो मध्य ऽ आस्त ऽ आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम्.
स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम्.. (५९)
सूर्य जगत् को रचने में समर्थ हैं. यह सूर्य मध्यलोक, पृथ्वीलोक तथा
अंतरिक्षलोक—तीनों लोकों को अपनी दीप्ति से पूरी तरह भर देते हैं ( प्रकाशित
२१६ - यजुर्वेद

Page 217Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
कर देते हैं )। सारे विश्व को अपने आश्रय में रखते हैं. सभी जलों को धारते हैं.
सर्वद्रष्टा हैं. पूर्व और पश्चात के सभी मनोभावों को जानते हैं. ( ५९ )
उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुराविवेश.
मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा विचक्रमे रजसस्पत्यन्तौ.. (६०)
सूर्य वर्षा द्वारा समुद्र को सींचते हैं. वे समुद्र को धारते हैं. उन का मूल स्थान
पूर्व दिशा है. वे अंतरिक्ष में निरंतर भ्रमणशील व स्वर्गलोक के बीच निहित रहते हैं.
वे रज की रक्षा करते हैं. वे अद्भुत रश्मियों वाले और सर्वत्र भ्रमणशील हैं. ( ६० )
इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतम १४ रथीनां वाजाना १४ सत्पतिं पतिम्.. (६१)
सभी प्रार्थनाएं इंद्र देव को बढ़ोतरी प्रदान करती हैं. आप समुद्र की तरह
विस्तृत, उत्तम रथी, अन्न के स्वामी व पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ६१ )
देवहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्सुम्नहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्.
यक्षदग्निर्देवो देवाँ २ आ च वक्षत्.. (६२)
यह यज्ञ देवताओं का आह्वान करने वाला है. यह यज्ञ देवताओं के लिए अच्छे
मन से हवि वहन करें, देवताओं को सभी सुख प्रदान करे और देवताओं को
अधिष्ठित करे. ( ६२ )
वाजस्य मा प्रसव ऽ उद्ग्राभेणोदग्रभीत्.
अधा सपत्नानिन्र्दो मे निग्राभेणाधराँ २ अकः.. (६३)
हे इंद्र देव! आप हमारे लिए अन्न उत्पादक हैं. आप हमारा उच्च मार्ग प्रशस्त
कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को नीचे मार्ग पर पहुंचाइए. उन्हें अधोगति प्रदान
कीजिए. ( ६३ )
उद्ग्राभं च निग्राभं च ब्रह्म देवा ऽ अवीवृधन्.
अधा सपत्नानिन्द्राग्नी मे विषूचीनानव्यस्यताम्.. (६४)
हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप ब्रह्मज्ञान की बढ़ोतरी कीजिए. आप श्रेष्ठ कर्म
करने वालों का उच्च मार्ग प्रशस्त कीजिए. आप हमारे शत्रुओं का सर्वनाश
कीजिए. ( ६४ )
क्रमध्वमग्निना नाकमुख्य १४ हस्तेषु बिभ्रतः.
दिवस्पृष्ठ १४ स्वर्गात्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (६५)
यजमान अग्नि से श्रेष्ठ व स्वर्गिक सुख पाएं. हाथ में उखा शोभित हों.
देवताओं के साथ दिव्यलोक में जाकर स्वर्गिक सुख अनुभव करें. ( ६५ )
यजुर्वेद - २१७

Page 218Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
प्राचीमनु प्रदिशं प्रेहि विद्वानग्नेरग्ने पुरो अग्निर्भवेह.
विश्वा ऽ आशा दीद्यानो वि भाह्यूर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे.. (६६)
हे अग्नि! आप पूर्व दिशा का अनुकरण कीजिए. आप अग्रगामी होइए. आप
सब का नेतृत्व कीजिए. आप विद्वान् और सब की आस हैं. आप अपनी चमकीली
लपटों से सभी दिशाओं को चमकाइए. आप दोपायों तथा चौपायों सभी के लिए
बल धारिए. ( ६६ )
पृथिव्या ऽ अहमुदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम्.
दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्वर्ज्योतिरगामहम्.. (६७)
हम पृथ्वि से उच्च अंतरिक्षलोक में चढ़ते हैं. हम उच्च अंतरिक्षलोक से
स्वर्गलोक में चढ़ते हैं. स्वर्गलोक से सूर्यलोक की ज्योति को प्राप्त होते हैं. ( ६७ )
स्वर्यन्तो नापेक्षन्त ऽ आ द्या ᳪ रोहन्ति रोदसी.
यज्ञं ये विश्वतोधार ᳪ सुविद्वा ᳪ सो वितेनिरे.. (६८)
जो सुखदायी स्वर्ग के सुख भोगते हैं, वे सांसारिक भोगों की अपेक्षा नहीं
करते. वे यज्ञ के धारक वे श्रेष्ठ विद्वान् हैं. वे अपना उज्ज्वल यश फैलाते हैं. वे
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक से ऊपर आरोहण करते हैं. ( ६८ )
अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयतां चक्षुर्देवानामुत मर्त्यानाम्.
इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषोः स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (६९)
हे अग्नि! आप प्रथम प्रार्थित हैं. आप मनुष्यों और देवताओं के चक्षु स्वरूप
और सब के पथ प्रदर्शक हैं. यज्ञ के इच्छुकों के पापनाशक हैं. आप ऐसे यजमानों
को अपनी ज्योति से प्रकाशित करते हैं. उन का कल्याण करते हैं. ( ६९ )
नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेक ᳪ समीची.
द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्विभाति देवा ऽ अग्निं धारयन् द्रविणोदाः.. (७०)
हे अग्नि! आप रात्रिकाल तथा उषस काल में समान रूप से सुशोभित होते
हैं. आप विभिन्न रूप धारते हैं. आप उपयुक्त शिशु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हैं.
आप पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक के बीच में शोभते हैं. आप धनदाता व वैभवधारी
हैं. ( ७० )
अग्ने सहस्राक्ष शतमूर्धञ्छतं ते प्राणाः सहस्रं व्यानाः.
त्व ᳪ साहस्रस्य राय ऽ ईशिषे तस्मै ते विधेम वाजाय स्वाहा.. (७१)
हे अग्नि! आप हजार आंखों, सौ मूर्धा, सौ प्राण वाले हैं. आप हजार प्राण वाले
व हजार धन वाले हैं. आप हमारे स्वामी हैं. हम आप के लिए अन्नमय आहुति भेंट
करते हैं. आप के लिए स्वाहा. ( ७१ )
२१८ - यजुर्वेद

Page 219Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
सुपर्णो ऽ सि गरुत्मान् पृष्ठे पृथिव्याः सीद.
भासा ऽ न्तरिक्षमापृण ज्योतिषा दिवमुत्तभान तेजसा दिश ऽ उद्दृ ष्य ह.. (७२)
हे अग्नि! आप सुंदर पंख वाले गरुड़ स्वरूप हैं. आप पृथ्वी तल पर अधिष्ठित
होने की कृपा कीजिए. आप अंतरिक्ष को अपनी कांति से पूर्ण करते हैं. आप अपनी
ज्योति से स्वर्गलोक को उत्कृष्टता प्रदान करें. आप अपने तेज से दिशाओं को
सुदृढ़ता व उत्कृष्टता प्रदान करें. ( ७२ )
आजुह्वानः सुप्रतीकः पुरस्तादग्ने स्वं योनिमा सीद साधुया.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (७३)
हे अग्नि! हम बहुत नम्रतापूर्वक आप का आह्वान करते हैं. आप हमारे सम्मुख
पधारने व मूल स्थान पर सज्जनता से विराजने की कृपा कीजिए. आप इस यज्ञ में
अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप सभी यजमानों के साथ इस यज्ञ में होने व
विराजने की कृपा कीजिए. ( ७३ )
ता ष्य सवितुर्वरेण्यस्य चित्रामाहं वृणे सुमतिं विश्वजन्याम्.
यामस्य कण्वो अदुहत्प्रपीना ष्य सहस्रधारां पयसा महीं गाम्.. (७४)
सविता देव! आप वरेण्य व अद्भुत हैं. हम आप का वरण करते हैं. आप विश्व
के जन्मदाता हैं. कण्व ऋषि ने सविता देव की किरणें धारण करने वाली हजारों
धाराओं से गाय को दुहा. हम आप की सुमति को स्वीकार करते हैं. ( ७४ )
विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे.
यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवी ष्य षि जुहुरे समिद्धे.. (७५)
हे अग्नि! आप ने परम स्थान पर जन्म लिया है. हम आप के लिए स्तुतियों का
विधान करते हैं. आप श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान हैं. आप जिस मूल स्थान से प्रकट
होते हैं. उसे यज्ञ के अनुकूल बनाते हैं. हम समिधाओं से आप के लिए आहुतियां
समर्पित करते हैं. ( ७५ )
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नो ऽ जस्रया सूर्म्या यविष्ठ.
त्वा ष्य शश्वन्त उपयन्ति वाजाः.. (७६)
हे अग्नि! आप प्रदीप्त व हमारे सम्मुख दीप्तिमान होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ
में अधिष्ठित व लगातार यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप हमें लगातार अपना
प्रकाश प्रदान कीजिए. हम आप को शाश्वत अन्नमय आहुति प्रदान करते हैं. ( ७६ )
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र ष्य हृदिस्पृशम्. ऋध्यामात ऽ ओहैः.. (७७)
हे अग्नि! हम हृदयस्पर्शी स्तोत्रों से आप के घोड़ों को कल्याणकारी यज्ञ के
लिए संवर्धित करते हैं. ( ७७ )
यजुर्वेद - २१९

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

Page 220Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
चित्तिं जुहोमि मनसा घृतेन यथा देवा ऽ इहागमन्वीतिहोत्रा ऽ ऋतावृधः.
पत्ये विश्वस्य भूमनो जुहोमि विश्वकर्मणे विश्वाहादाभ्यं ४५ हविः.. (७८)
हम चित्त से यज्ञ करते हैं. हम मन से घी की आहुति भेंट करते हैं. देवगण इस
यज्ञ में आने व सत्य की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. देवगण विश्वपति, विश्व के
रचयिता, विश्वकर्मा व विश्व के संतापहर्ता हैं. हम उन के लिए हवि प्रदान करते
हैं. ( ७८ )
सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि.
सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा.. (७९)
हे अग्नि! आप की सात समिधाएं, सात जिह्वाएं व आप के सात ऋषि हैं. आप
के सात प्रिय धाम व सात होता हैं. वे आप का सात प्रकार से यजन करते हैं. आप
के सात मूल उत्पत्ति स्थान हैं. हम घी से आप के प्रति आहुति अर्पित करते हैं. ( ७९ )
शुक्रज्योतिश्च चित्रज्योतिश्च सत्यज्योतिश्च ज्योतिष्माँश्च.
शुक्रश्च ऋतपाश्चात्य ४५ हा:... (८०)
आप चमकीले, अद्भुत ज्योति वाले हैं. आप सत्य रूप ज्योति वाले और
ज्योतिष्मान हैं. चमकीले सत्य स्वरूप पश्चिम दिशा वाले मरुत् देव हेतु यह आहुति
अर्पित है. ( ८० )
ईदृङ् चान्यादृङ् च सदृङ् च प्रतिसदृङ् च. मितश्च सम्मितश्च सभरा:... (८१)
यज्ञ में अर्पित हवि को इस तरह देखने वाले, अन्य दृष्टि से देखने वाले, समान
दृष्टि से देखने वाले व सम्मिलित दृष्टि से देखने वाले मरुद्गण हेतु यह आहुति
अर्पित है. ( ८१ )
ऋतश्च सत्यश्च ध्रुवश्च धरुणश्च. धर्त्ता च विधर्त्ता च विधारय:... (८२)
मरुद्गण सत्य, सत्यवान, ध्रुव, धारक, धर्ता व विधर्ता हैं. वे देव हमारे यज्ञ
को विशेष रूप से धारने की कृपा करें. ( ८२ )
ऋतजिच्च सत्यजिच्च सेनजिच्च सुषेणश्च. अन्तिमित्रश्च दूरे अमित्रश्च गण:... (८३)
शुद्धस्वरूप, सत्यरूप, शत्रु सेनाओं के विजेता, श्रेष्ठ सेनाओं वाले, मित्रों के
समीप रहने वाले, शत्रुओं को दूर हटाने वाले तथा संघबद्ध रहने वाले ये मरुद्गण
हमारे इस यज्ञ में पधारें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. ( ८३ )
ईदृक्षास ऽ एतादृक्षास ऽ ऊ षु णः सदृक्षासः प्रतिसदृक्षास ऽ एतन.
मितासश्च सम्मितासो नो अद्य सभरसो मरुतो यज्ञे अस्मिन्.. (८४)
हे मरुद्गण! आप विविध कोणों से देखने वाले, समान कोण से देखने वाले,
२२० - यजुर्वेद

Page 221Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
प्रत्येक समान कोण से देखने वाले मिश्रित कोण से देखने वाले, समान प्रकार के
मिश्रित कोण से देखने वाले तथा समान अलंकारों के धारक हैं. आप आज हमारे
इस यज्ञ में पधारें. आप के निर्मित यह आहुति अर्पित है. (८४)
स्वतवाँश्च प्रघासी च सान्तपनश्च गृहमेधी च. क्रीडी च शाकी चोज्जेषी.. (८५)
आप स्वयं अर्जित तप बल पूर्ण पुरोडाश का सेवन करते हैं. आप शत्रुओं
को संताप देने वाले, गृहस्थ धर्म के पालक, क्रीड़ाशाली, बलवान व विजयशील
हैं. (८५)
इन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्यथेन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्.
एवमिमं यजमानं दैवीश्च विशो मानुषीश्चानुवर्त्मानो भवन्तु.. (८६)
मरुद्गण की सेना इंद्र देव का अनुकरण करती है. वह इंद्र देव की प्रजा जैसी
है व इंद्र देव के पथ का अनुकरण करती है. वैसे ही सभी दैवीय गुण मनुष्यों का
अनुकरण करें. वैसे ही सभी प्रजा मनुष्यों का अनुकरण करें. (८६)
इम २४ स्तनमूर्जस्वन्तं धयापां प्रपीनमग्ने सरिरस्य मध्ये.
उत्सं जुषस्व मधुमन्तमर्वन्त्समुद्रिय २४ सदनमा विशस्व.. (८७)
हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी स्तन व घी से भरे स्रुक का प्रेम से पान करें. आप उस
से तृप्त होने की कृपा करें. वह मधुर हैं. आप इस समुद्र सदन में प्रवेश करने की
कृपा करें. (८७)
घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम.
अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्.. (८८)
हम घी को अग्नि के मुख में समर्पित करना चाहते हैं. यह अग्नि का मूल स्थान
है. अग्नि घृत पर अश्रित हैं. वह अग्नि का धाम हैं. हे अध्वर्यु! आप अग्नि के लिए
हवि प्रदान कीजिए. उन्हें हवि से मदमस्त बनाइए. उन्हें हवि से बलवान बनाइए. अग्नि
से अनुरोध है कि वह हवि को निर्धारित देव तक पहुंचाने की कृपा करें. (८८)
समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ २ उदारदुपा २४ शुना सममृतत्वमानट्.
घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः.. (८९)
घी जैसा समुद्र है. उस में मधुर लहरें उमड़ रही हैं. ये लहरें अग्नि से एकमेक
हो जाती हैं. घी का जो गुप्त नाम है, वह देवों की जिह्वा है. गुप्त नाम अमृत की
नाभि है. (८९)
वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन् यज्ञे धारयामा नमोभिः.
उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुः शृङ्गो ऽ वमीद्गौर ऽ एतत्.. (९०)
यजुर्वेद - २२१

Page 222Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
हम इस यज्ञ में घी के नाम को धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. हम यज्ञ में
घी के नाम को नमस्कारपूर्वक धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. ब्रह्मा इस यज्ञ में
इस नाम को पास से सुनने की कृपा करें. चार सींगों ( होता रूपी ) वाला घी इस
यज्ञ के फल को प्रदान करने की कृपा करे. ( ९० )
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य.
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ २ आविवेश.. (९१)
इस यज्ञ के चार सींग ( पुरोहित रूपी ), तीन पैर ( तीन वेद रूपी ), दो सिर
( हवि प्रवर्ग्य ) व सात हाथ ( सात छंद रूपी ) हैं. यह यज्ञ तीन प्रकार की संध्याओं
में बंधा हुआ, महान् शब्द करने वाला व मनुष्यों का महान् देव है. इस यज्ञ के
मनुष्यलोक में अधिष्ठित हैं. ( ९१ )
त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन्.
इन्द्र ऽ एक १४ सूर्य ऽ एकं जजान वेनादेक १४ स्वधया निष्टतक्षुः.. (९२)
असुरों से छिपा कर रखे हुए घी को देवताओं ने तीन प्रकार से गायों से प्राप्त कर
लिया. एक प्रकार से ( एक भाग ) इंद्र देव के लिए जना. दूसरे प्रकार से ( दूसरा भाग )
सूर्य के लिए जना. तीसरे प्रकार से ( तीसरा भाग ) ब्राह्मणों के लिए जना. ( ९२ )
एता ऽ अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे.
घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य ऽ आसाम्.. (९३)
जैसे हृदय रूपी समुद्र से भावों की धाराएं फूटती हैं, दुश्मन इन धाराओं को
देख नहीं सकता, वैसे ही इस यज्ञ में घी की धाराएं फूटती हैं. इन धाराओं के बीच
विद्यमान अग्नि को हम सब ओर से देखते हैं. ( ९३ )
सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः.
एते अर्षन्त्युर्मयो घृतस्य मृगा ऽ इव क्षिपणोरीषमाणाः.. (९४)
जैसे सम्यक् रूप से नदी बहती है, वैसे ही हमारे अंतःहृदय से पवित्र की जाती
हुई वाणी स्रवित होती है. ये वाणियां घी की तरंगों की तरह हैं. यज्ञ की ओर शिकारी
से डरे हुए हिरण की तरह भागती हैं. ( ९४ )
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः.
घृतस्य धारा ऽ अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः.. (९५)
जैसे समुद्र में वायु के वेग से नदियों की धाराएं मिलती हैं, वैसे ही घी की
धाराएं तीव्र वेग से यज्ञ की अग्नि में गिरती हैं. जैसे बलवान घोड़ा शत्रुओं की सेना
को बेध देता है और पसीने से पृथ्वी को सींचता हुआ प्रस्थान करता है, वैसे ही घी
की धाराएं पृथ्वी को सींचती हैं. ( ९५ )
२२२ - यजुर्वेद

Page 223Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम्.
घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः.. (९६)
जैसे समान मन वाली सुंदर स्त्रियां खुश होती हुई अपने पति के पास जाती हैं,
वैसे ही घी की धाराएं प्रदीप्त करती हुई अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि को व्यापक
बनाती हैं. घी की धाराएं सर्वज्ञ अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि निरंतर उन धाराओं
की कामना करते हैं. ( ९६ )
कन्या ऽ इव वहतुमेतवा ऽ उ अञ्ज्यञ्जाना ऽ अभि चाकशीमि.
यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा ऽ अभि तत्पवन्ते.. (९७)
जैसे सुंदर कन्या रूप वहन करती हुई स्वयंवर में वर के पास पहुंचती है,
वैसे ही जहां सोमरस निचोड़ा जाता है, यज्ञ किया जाता है, वहां घी की धाराएं
जाती हैं. ( ९७ )
अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त.
इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते.. (९८)
हे देवताओ! यह यज्ञ घी से सिंचित है. श्रेष्ठ स्तुतियुक्त है. जिस यज्ञ में मधुर
स्वाद वाली घी की कल्याणमयी धाराएं गिरती हैं, आप ऐसी घृतमयी मधुर
आहुतियों को यज्ञ से देवलोक तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( ९८ )
धामं ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि.
अपामनीके समिथे य ऽ आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऽ ऊर्मिम्.. (९९)
हे अग्नि! सभी लोक आप के धाम हैं. आप सब लोकों के आश्रय हैं. समुद्र
के हृदय में आप का श्रेष्ठ रूप उपस्थित है. हम आप के मधुर लहरदार रूप को
पा सकें. ( ९९ )
यजुर्वेद - २२३

अठारहवां अध्याय

Page 224Permalink

अठारहवां अध्याय

वाजश्च मे प्रसवश्च मे प्रयतिश्च मे प्रसितिश्च मे धीतिश्च मे क्रतुश्च मे स्वरश्च मे
श्लोकश्च मे श्रवश्च मे श्रुतिश्च मे ज्योतिश्च मे स्वश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१)
यह यज्ञ हमारे लिए अन्नदाता हो. यह यज्ञ हमारे लिए ऐश्वर्यदाता हो. यह यज्ञ
हमारे लिए पौरुष हो. यह यज्ञ हमारे लिए प्रबंधकौशल हो. यह यज्ञ हमारे लिए बुद्धि
हो. यह यज्ञ हमारे लिए निर्णय क्षमता हो. यह यज्ञ हमारे लिए करने की शक्ति हो.
यह यज्ञ हमारे लिए श्लोक हो. यह यज्ञ हमारे लिए श्रवणक्षमता हो. यह यज्ञ हमारे
लिए तेजदाता हो. सर्वविधि फलीभूत हो. (१)
प्राणश्च मेपानश्च मे व्यानश्च मेसुश्च मे चित्तं च म ऽ आधीतं च मे वाक् च मे
मनश्च मे चक्षुश्च मे श्रोत्रं च मे दक्षश्च मे बलं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२)
यह यज्ञ हमें प्राण दे. यह यज्ञ हमें अपान दे. यह यज्ञ हमें व्यान दे. यह यज्ञ हमें
मुख्य प्राण दे. यह यज्ञ हमें चिंतन दे. यह यज्ञ हमें वाणी दे. यह यज्ञ हमें नेत्र दे. यह
यज्ञ हमें कान दे. यह यज्ञ हमें दक्षता दे. यह यज्ञ हमें बल दे. यह यज्ञ सर्वविधि
फलीभूत हो. (२)
ओजश्च मे सहश्च म ऽ आत्मा च मे तनूश्च मे शर्म च मे वर्म च मेङ्गानि च मेस्थीनि
च मे परूंषि च मे शरीराणि च म ऽ आयुश्च मे जरा च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (३)
इस यज्ञ से हमारा ओज फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी सहिष्णुता फलीभूत
हो. इस यज्ञ से हमारा आत्मबल फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारा दैहिकबल फलीभूत
हो. इस यज्ञ से हमारा सुख फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारा कवच फलीभूत हो. इस
यज्ञ से हमारी अस्थियों की दृढ़ता फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी संधियों की दृढ़ता
फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी निरोगता फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी आयु
फलीभूत हो. इस यज्ञ से हमारी परिपक्वता फलीभूत हो. (३)
ज्यैष्ठ्यं च म ऽ आधिपत्यं च मे मन्युश्च मे भामश्च मेमश्च मेम्भश्च मे जेमा च मे
महिमा च मे वरिमा च मे प्रथिमा च मे वर्षिमा च मे द्राघिमा च मे वृद्धं च मे वृद्धिश्च
मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (४)
२२४ - यजुर्वेद 632/14

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय

Page 225Permalink

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ हमें फलीभूत हो. ज्येष्ठता हमारे आधिपत्य में रहे. अनीति हमारे नियंत्रण
में रहे. क्रोध हम से दूर रहे. दुष्टों का हम प्रतिकार कर सकें. हमारी परिपक्वता में
बढ़ोत्तरी हो. हमारी गरिमा में बढ़ोत्तरी हो. हमारी वरिष्ठता में बढ़ोत्तरी हो. हम सर्वत्र
प्रथम (श्रेष्ठ) साबित हों. हमारी व्यापकता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी आयु में बढ़ोत्तरी
हो. हमारे बड़प्पन में बढ़ोत्तरी हो. हमारे वंश में बढ़ोत्तरी हो. हमारी उत्कृष्टता में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें (सर्वविध) फलीभूत हो. (४)
सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनं च मे विश्वं च मे महश्च मे क्रीडा च
मे मोदश्च मे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (५)
यज्ञ फलीभूत हो. सत्य की बढ़ोत्तरी हो. श्रद्धा की बढ़ोत्तरी हो. धन की
बढ़ोत्तरी हो. विश्व में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. मनोविनोद की बढ़ोत्तरी हो. हर्ष स्तर
की बढ़ोत्तरी हो. संतान की बढ़ोत्तरी हो. सूक्तों में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ
सर्वविध फलीभूत हो. (५)
ऋतं च मेमृतं च मेयक्ष्मं च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वं च मेनमित्रं च
मेभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्च मे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (६)
यज्ञ से हमारे ऋत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे अमृत को बढ़ोत्तरी मिले.
यज्ञ से हमारे यक्ष्मा में कमी हो. यज्ञ से हमारे आरोग्य में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
जीने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
शत्रुओं का अभाव हो. यज्ञ से हमारे अभय में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुख में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शयन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे संध्याकर्म में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से हमारे सुदिन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. (६)
यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्च मे धृतिश्च मे विश्वं च मे महश्च मे संविच्च मे ज्ञात्रं
च मे सूश्च मे प्रसूश्च मे सीरं च मे लयश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (७)
यज्ञ से हम धारक हो जाएं. धैर्य की क्षमता बढ़े. यज्ञ से हमें संसार की सारी
महानता प्राप्त हो. यज्ञ से हमें संपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हो. यज्ञ से हमें ज्ञान प्राप्त हो. यज्ञ
से उत्पादन की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से खेती के साधनों की क्षमता में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से कष्टों में कमी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (७)
शं च मे मयश्च मे प्रियं च मेनुकामश्च मे कामश्च मे सौमनसश्च मे भगश्च मे द्रविणं
च मे भद्रं च मे श्रेयश्च मे वसीयश्च मे यशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (८)
यज्ञ से सब सुखों में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब आनंद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब
प्रकार के आमोदप्रमोद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब अनुकूल कामनाओं में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से सब सौमनस्य कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौभाग्य में बढ़ोत्तरी
यजुर्वेद - २२५

Page 226Permalink

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हो. यज्ञ से सब वैभव में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब भद्रता में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब
श्रेय में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब वास सुख में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब यश में बढ़ोतरी
हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( ८ )
ऊर्क् च मे सूनृता च मे पयश्च मे रसश्च मे घृतं च मे मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च
मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे जैत्रं च म ऽ औद्भिद्यं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ९ )
यज्ञ हमें फलीभूत हो. यज्ञ से अन्न की प्राप्ति हो. यज्ञ से अच्छी वाणी की प्राप्ति
हो. यज्ञ से पेय की प्राप्ति हो. यज्ञ से रस की प्राप्ति हो. यज्ञ से घी की प्राप्ति हो. यज्ञ
से मधु की प्राप्ति हो. हम संबंधियों के साथ भोजन करें. हम संबंधियों के साथ पीएं.
वर्षा हमारी कृषि को फलीभूत व बढ़ोतरी करे. हम शत्रुओं का भेदन करें. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हो. ( ९ )
रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टं च मे पुष्टिश्च मे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णं च मे पूर्णतरं
च मे कुयवं च मेक्षितं च मेन्नं च मेक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १० )
यज्ञ से हमारे धन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी संपत्ति में बढ़ोतरी हो. हम
धन से पुष्ट हों. हम वैभव से पुष्ट हों. हम प्रभु से पुष्ट हों. हम पूर्ण से पुष्ट हों.
हम पूर्णतर से पुष्ट हों. हमारे यहां पशुओं के खाद्य में बढ़ोतरी हो. हमारे यहां
अक्षय अन्न में व हमारी भूख में भी बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १० )
वित्तं च मे वेद्यं च मे भूतं च मे भविष्यच्च मे सुगं च मे सुपथ्यं च म ऽ ऋद्धं च म ऽ
ऋद्धिश्च मे क्लृप्तं च मे क्लृप्तिश्च मे मतिश्च मे सुमतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ११ )
यज्ञ से हमारे वित्त, ज्ञान, अतीत, भविष्य व अच्छे धन को बढ़ोतरी मिले. यज्ञ
से हमारे पथ सुगम हों. यज्ञ से हमारे पथ के रोड़े समाप्त हों. यज्ञ से हमारे अच्छे
कर्म, सामर्थ्य, सत्य, बुद्धि व सद्बुद्धि में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( ११ )
व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे खल्वाश्च मे प्रियङ्गवश्च
मेणवश्च मे श्यामाकाश्च मे नीवाराश्च मे गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. ( १२ )
यज्ञ से हमारे धान, जौ, उड़द, तिल, मूंग, चना, प्रियंग ( राई ), छोटे चावलों
में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारे सावां चावल, नीवार, गेहूं, मसूर में बढ़ोतरी हो. यज्ञ
हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( १२ )
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यं
च मेयश्च मे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १३ )
२२६ - यजुर्वेद