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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 214 of 421

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Page 214

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
इंद्र देव इन सब के नेता हैं. बृहस्पति और इंद्र दोनों देव सेना का नियंत्रण करते
हैं. सोम यज्ञ के सम्मुख रहते हैं. मरुद्गण सेना के आगेआगे रहते हैं. विष्णु दाहिनी
ओर रहते हैं. ( ४० )
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज ऽ आदित्यानां मरुता १४ शर्ध ऽ उग्रम्.
महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (४१)
इंद्र वरुण व राजा आदित्य देव की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. वे मरुद्गण
की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. महान् मन वाले लोकों में देवताओं का जयघोष
गूंजता है. ( ४१ )
उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मना १४ सि.
उद्द्वृत्रहन् वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:... (४२)
हे इंद्र देव! आप धनवान हैं. आप अपने आयुधों को तीखा कीजिए. वीरों को
व घोड़ों को शीघ्र जाने के लिए उत्साहित कीजिए. आप शत्रुनाशक व बलशाली
हैं. रथों के जयघोष सब ओर गूंजें. ( ४२ )
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽ इषवस्ता जयन्तु.
अस्माकं वीरा ऽ उत्तरे भवन्त्वस्माँ २ उ देवा ऽ अवता हवेषु.. (४३)
हमारे इंद्र देव ध्वजों को अच्छी तरह फहराते हैं. हमारे शत्रुओं को जीतें. हमारे
बाण शत्रुओं को जीतें. हमारे वीर उत्तरोत्तर विजयी हों. देवगण यज्ञों में हमारी रक्षा
करें. ( ४३ )
अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि.
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्.. (४४)
व्याधियां हमारे शत्रुओं के चित्त को लुभाएं. उन के अंगों को ग्रहण करें.
निर्दयता से शत्रुओं के चित्र को चबाएं. उन के हृदय में शोक व्यापे. शोक से शत्रु
गहन अंधकार में डूब जाएं. ( ४४ )
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं १४ शिते.
गच्छामित्रान् प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः... (४५)
ब्रह्मज्ञानमय वचनों से बाण तीखे हो कर अमित्रों पर गिरें. शत्रुओं पर प्रहार
करें. उन का उच्छेदन ( विनाश ) करें. ( ४५ )
प्रेता जयता नर ऽ इन्द्रो वः शर्म यच्छतु.
उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (४६)
हे नरो! इंद्र देव विजयी हों और हमें सुख प्रदान करें. उन की बाहुएं उग्र हों,
जिस से वह शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें. ( ४६ )
२१४ - यजुर्वेद