यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सत्ताईसवां अध्याय
अग्नि की स्तुति २०-२२ ३२५-३२६
सोमरस की रक्षा करना २३ ३२६
देव पत्नियों से हवि ग्रहण की प्रार्थना २४ ३२६
मददायी व रक्षक सोम २५-२६ ३२६
सत्ताईसवां अध्याय
अग्नि की उपासना १-७ ३२७-३२८
बृहस्पति देव तथा सविता देव की स्तुति ८-९ ३२८
सूर्य की आराधना १० ३२८
अग्नि और उन की दिव्य देवियों का आह्वान ११-२४ ३२९-३३०
जल की अपारता २५-२६ ३३०-३३१
वायु की स्तुति २७-३४ ३३१-३३२
इंद्र देव की स्तुति ३५-४१ ३३२-३३३
अग्नि से रक्षा की कामना ४२-४५ ३३३
अट्ठाईसवां अध्याय
इंद्र की उपासना १-६ ३३४-३३५
अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ ७ ३३५
तीन देवियों के लिए यज्ञ ८ ३३५
त्वष्टा देव की महिमा का गान ९ ३३५
शांतिदाता वनस्पति देव १० ३३६
विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण ११ ३३६
इंद्र के लिए यज्ञ कामना १२-१३ ३३६
उषा देवी और रात्रि देवी के लिए यज्ञ की कामना १४-१८ ३३६-३३७
इंद्र के लिए यज्ञ कामना १९ ३३८
वनस्पति देव के लिए यज्ञ की कामना २० ३३८
वैभव के लिए यज्ञ कामना २१ ३३८
अग्नि के लिए यज्ञ कामना २२ ३३८
अग्नि द्वारा होता का वरण २३ ३३८-३३९
अग्नि और इंद्र आदि के लिए यज्ञ २४-४६ ३३९-३४३
उनतीसवां अध्याय
अग्नि की स्तुति १-३ ३४४
अदिति की विशालता ४-५ ३४४
रात्रि और उषा देवी का वर्णन ६ ३४५
अग्नि और वायु की वंदना ७ ३४५
भारती देवी से यज्ञ की रक्षा की कामना ८ ३४५
त्वष्टा देव के लिए यज्ञ कामना ९ ३४५
वनस्पति देव से प्रार्थना १० ३४५
अग्रगामी अग्नि ११ ३४५
मेघ देव की महिमा १२ ३४६
इंद्र देव का रथ १३ ३४६
मेघ देव के तीन बंधन १४-१७ ३४६
वायु की स्तुति १८ ३४७
अर्वन् देव की स्तुति १९-२४ ३४७-३४८
अग्नि की स्तुति २५-२८ ३४८
कुशों का सुखासन २९ ३४८
दिव्य द्वार वाली देवियां ३० ३४९
दिव्य कार्य करने वाली देवियां ३१ ३४९
विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता ३२ ३४९
तीन देवियों का आह्वान ३३ ३४९
त्वष्टा देव का पूजन ३४ ३४९
यजमानों से निवेदन ३५ ३४९
अग्नि की स्तुति ३६-३७ ३४९-३५०
वीरों के लिए विजय कामना ३८-४६ ३५०-३५१
रक्षा के लिए देवों से प्रार्थना ४७ ३५१
बाणों से कल्याण कामना ४८ ३५१
चाबुक, रथ व दुंदुभि आदि युद्ध साधनों का वर्णन ४९-५७ ३५१-३५३
विभिन्न देवताओं से संबंध ५८-६० ३५३-३५४
तीसवां अध्याय
सविता देव की स्तुति १-४ ३५५
चारों वर्णों के कर्तव्य ५ ३५५
उपयुक्त संबंधों की विवेचना ६-२२ ३५५-३६०
इकतीसवां अध्याय
परम पुरुष का वर्णन १-३ ३६१