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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय
हमारे प्रति कल्याणकारी व अच्छे मन वाले होइए. आप वृक्ष की ठेठ ऊंचाई पर
अपने आयुध रख दीजिए. पशुओं की खाल के वस्त्र धारण कर के पधारिए. आप
केवल अपना धनुष धारण कर के आइए. ( ५१ )
विकिरिद्र विलोहित नमस्ते अस्तु भगवः.
यास्ते सहस्त्र १४ हेतयो ऽ न्यमस्मन्नि वपन्तु ताः... (५२)
हे रुद्र देव! आप उपद्रवनाशी हैं. आप शुद्ध स्वरूप हैं. आप हमें भाग्यवान
बनाइए. आप को नमस्कार. आप के हजारों अस्त्र हमारे हित साधक हों. वे अस्त्र
अन्यों (दुश्मनों) पर पड़ें. ( ५२ )
सहस्राणि सहस्रशो बाह्वोस्तव हेतयः.
तासामीशानो भगवः पराचीना मुखा कृधि.. (५३)
हे रुद्र देव! आप की बाहुओं में हजारों प्रकार के हजारों अस्त्रशस्त्र हैं. आप
उन आयुधों का मुंह हमारी ओर से फेरने की कृपा कीजिए. ( ५३ )
असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा ऽ अधि भूम्याम्.
तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५४)
हे रुद्र देव! आप असंख्य लोगों के नियंत्रक हैं. आप के हजारों गण भूमि पर
अधिष्ठित हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन ( दूरी सूचक एक इकाई )
दूर रखने की कृपा कीजिए. ( ५४ )
अस्मिन् महत्यर्णवे ऽ न्तरिक्षे भवा ऽ अधि.
तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५५)
अनेक लोगों को अपने वश में करने वाले रुद्र देव के हजारों गण इस पृथ्वी
पर हैं. वे अपने गणों के धनुषों को हम से दूर रखें. ( ५५ )
नीलग्रीवाः शितिकण्ठा दिव १४ रुद्रा ऽ उपश्रिताः.
तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५६)
हे रुद्र देव! आप नीली गरदन व सफेद कंठ वाले हैं. आप स्वर्गलोक में
निवास करते हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन दूर रखिए. ( ५६ )
नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्वा ऽ अधः क्षमाचराः.
तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५७)
हे रुद्र देव! आप नीली गरदन वाले और सफेद कंठ वाले हैं. आप नीचे
भूमंडल में विचरण करते हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन दूर रखने
की कृपा कीजिए. ( ५७ )
२०४ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय
ये वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्रीवा विलोहिताः.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५८)
हे रुद्र देव! आप नीली गरदन वाले हैं. आप का रंग हरा है. आप अत्यंत तेजस्वी
हैं. आप वृक्षादि में अधिष्ठित हैं. आप अपने धनुष को प्रत्यंचा हीन बना कर हम से
हजारों योजन दूर रखिए. ( ५८ )
ये भूतानामधिपतयो विशिखासः कपर्दिनः.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५९)
रुद्र देव! आप भूतों के अधिपति व विशेष शिखा ( चोटी ) सहित हैं. जो
जटाधारी हैं, आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बनाइए. आप उन्हें हम से हजारों
योजन दूर कीजिए. ( ५९ )
ये पथां पथिरक्ष्य ऽ ऐलबृदा ऽ आयुर्युधः.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६०)
हे रुद्र देव! आप कई राहों के राहगीरों के रक्षक हैं. अन्न से प्राणियों को
पोषण देने वाले व आयुधधारी हैं. जो जीवन के युद्ध में जूझ रहे हैं, आप उन
के धनुषों को हम से हजारों योजन दूर कीजिए. आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा
रहित बनाइए. ( ६० )
ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६१)
हे रुद्र देव! जो तीर्थों में हाथ में भाले, बाण आदि ले कर विचरते हैं, आप उन
के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बना दीजिए. आप उन्हें हम से हजारों योजन दूर कर
दीजिए. ( ६१ )
ये ऽ नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान्.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६२)
हे रुद्र देव! जो पात्रों में अन्न पीने वाले लोगों को परेशान करते हैं, आप उन
के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बना दीजिए. आप उन के धनुषों को हम से हजारों
योजन दूर कर दीजिए. ( ६२ )
य एतावन्तश्च भूया ष् सश्च दिशो रुद्रा वितस्थिरे.
तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६३)
हे रुद्र देव! जो दिशाओं और बहुत दिशाओं में स्थित रहते हैं, आप उन के
धनुषों को प्रत्यंचा रहित बनाइए. आप उन के धनुषों को हम से हजारों योजन दूर
रखने की कृपा कीजिए. ( ६३ )
यजुर्वेद - २०५

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय
नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः.
तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः.
तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे
दध्मः.. (६४)
हे रुद्र देव! जो स्वर्गलोक में रहते हैं, जो बरसात की तरह बाण बरसाते हैं,
हम उन्हें पूर्व दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें पश्चिम दिशा में नमस्कार करते
हैं. हम उन्हें उत्तर दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें दक्षिण दिशा में नमस्कार
करते हैं. उन रुद्रगण को नमस्कार हो. रुद्रगण द्वारा हमें सुख और रक्षा प्राप्त हो.
जो हम से द्वेष भाव रखते हैं, जिन से हम द्वेषभाव रखते हैं. रुद्रगण अपनी दाढ़ में
ऐसे लोगों को रख लें ( दबा लें ). ( ६४ )
नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये ऽ न्तरिक्षे येषां वात ऽ इषवः.
तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः.
तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे
दध्मः.. (६५)
हे रुद्रगण! अंतरिक्ष में स्थित आप को नमन. आप के बाण हवा की तरह हैं.
हम पूर्व दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम पश्चिम दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम
दक्षिण दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. उन्हें नमस्कार. वे हमारी रक्षा करें और हमें
सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं, जिन से हम द्वेष करते हैं, रुद्रगण उन्हें
अपनी दाढ़ में रख लें ( दबा लें ). ( ६५ )
नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः.
तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः.
तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे
दध्मः.. (६६)
हे रुद्रगण! पृथ्वी पर स्थित आप को नमन. आप के बाण अन्न बरसाते हैं. हम
पूर्व दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम पश्चिम दिशा में आप को नमस्कार
करते हैं. हम उत्तर दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम दक्षिण दिशा में आप
को नमस्कार करते हैं. आप हमारी रक्षा करें. आप हमें सुख दें. आप उन्हें दाढ़ में
रख लें ( दबा लें ), जो हम से द्वेष रखते हैं जिन से हम द्वेष रखते हैं. ( ६६ )
२०६ – यजुर्वेद