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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
विराडसि दक्षिणा दिग्रुद्रास्ते देवा ऽ अधिपतय ऽ इन्द्रो हेतीनां प्रतिधर्त्ता पञ्चदशस्त्वा
स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु प्र उगमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु बृहत्साम प्रतिष्ठित्या ऽ
अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता
चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च
सादयन्तु.. (११)
हे इष्टके! आप विराट् हैं और दक्षिण दिशा स्वरूप हैं. रुद्र आप के देव व इंद्र
देव अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. पंचदश स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित
करने की कृपा करें. प्रउग उक्थ आप को स्थिर व सुदृढ़ करें. बृहत्साम आप को
अंतरिक्ष में स्थापित करें. ऋषिगण दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव
को सब देवों में स्थापित करें. वे दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव
को सब देवों में स्थापित करें. (११)
सम्राडसि प्रतीची दिगादित्यास्ते देवा ऽ अधिपतयो वरुणो हेतीनां प्रतिधर्त्ता
सप्तदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु मरुत्वतीयमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैरूप १४
साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा
प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके
यजमानं च सादयन्तु.. (१२)
हे इष्टके! आप पश्चिम दिशा के सम्राट् हैं. आदित्य आप के देवता हैं. वरुण
आप के अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. सप्तदश स्तोम दिशा के सम्राट् हैं.
मरुत् उक्थ दिशा के सम्राट् हैं. वैरूप साम दिशा के सम्राट् हैं. वह अंतरिक्ष में दृढ़ता
हेतु आप को प्रतिष्ठित करें. सृष्टि क्रम में प्रथम जन्मे ऋषि आप को देवलोक में
स्थित करें. इस तरह समस्त वसु आदि देवता याजकों को सुखसंपन्न स्वर्गलोक में
ले जाएं. (१२)
स्वराडस्युदीची दिङ्मरुतस्ते देवा ऽ अधिपतयः सोमो हेतीनां प्रतिधर्त्तैकवि १४
शस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु निष्केवल्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैराज १४ साम
प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु
विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं
च सादयन्तु.. (१३)
हे इष्टके! आप स्वयं प्रकाशमान हैं. आप उत्तर दिशा स्वरूप हैं. मरुद्गण
दिक्पालक हैं. सोम अधिपति हैं. सोम प्रतिधारक हैं. एकविंश स्तोम आप को पृथिवी
पर प्रतिष्ठित करें. निष्केवल्य स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. वैराज साम
स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. पहले प्रादुर्भूत ऋषिगण समस्त दिव्यलोक में
श्रेष्ठ दैवी गुणों को प्रसारित करें. वांछित निष्पादक और ये प्रमुख उच्च स्वर्गलोक में
यजमान को निस्संदेह स्थित करें. अधिपति भी आप को विस्तार दें. इस तरह वे समस्त
१८४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
वसु आदि देव याजकों को एक विचार होकर स्वर्ग में ले जाएं. ( १३ )
अधिपत्न्यसि बृहती दिग्विश्वे ते देवा ऽ अधिपतयो बृहस्पतिर्हेतीनां प्रतिधर्त्ता
त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ त्वा स्तोमौ पृथिव्या १७ श्रयतां वैश्वदेवान्निमारुते उक्थे अव्यथायै
स्तभ्नीता १७ शाक्वररैवते सामनी प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु
दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य
पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१४)
हे इष्टके! आप अधिपत्नी, विशाल, दिशा रूप व सब देवों के अधिपति हैं.
आप बृहस्पति देव के हेतु व प्रतिधारक हैं. हम त्रिणवयवयस्त्रिंशत स्तोम से आप
की प्रतिष्ठापना करते हैं. हम पृथ्वी पर आप की प्रतिष्ठापना करते हैं. वैश्वदेव
अग्निमरुत्देव उक्थ स्तोत्र के लिए आप की स्थापना करते हैं. शाक्वर साम आप
को अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. रैवत साम आप को अंतरिक्ष में
प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. पूर्व जन्मे ऋषि दिव्यलोक में श्रेष्ठ दैवी गुणों को
व्याप्त करें. वांछित कार्यों के कर्ता मुख्य देव भी आप का विस्तार करें. इस तरह
समस्त वसु आदि देव एक विचार से सुख संपन्न हों. ( १४ )
अयं पुरो हरिकेशः सूर्यरश्मिस्तस्य रथगृत्सश्च रथौजाइच सेनानीग्रामण्यौ.
पुञ्जिकस्थला च क्रतुस्थला चाप्सरसौ दङ्क्ष्णवः पशवो हेतिः पौरुषेयो वधः
प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां
जम्भे दध्मः.. (१५)
यह देव हरे केशों वाले हैं. सूर्य की किरणों की भांति हैं. आप रथज्ञान में निपुण
हैं, अग्रणी, सेनानायक, ग्रामस्थलों के नायक, यज्ञस्थल के नायक हैं. आप अप्सराओं
के नायक हैं. पशु आप के हथियार हैं. आप ताकतवर का भी वध करने में समर्थ हैं.
हम सभी देवताओं के साथ अग्नि को नमन करते हैं. वे हमारी रक्षा करें. वे हमें सुख
प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि
अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १५ )
अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य रथस्वनश्च रथेचित्रश्च सेनानीग्रामण्यौ.
मेनका च सहजन्या चाप्सरसौ यातुधाना हेती रक्षा १७ सिप्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते
नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१६)
दक्षिण दिशा में विश्वकर्मा देव को स्थापित किया गया है. विश्वकर्मा देव
रथवान, सेनानी, ग्राम रक्षक, अग्रणी व मेनका तथा सहजन्य इन की अप्सराएं हैं.
राक्षस इन के अस्त्रशस्त्र हैं. विश्वकर्मा देव हमारी रक्षा करें. अग्नि हमें सुख प्रदान
करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने
जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १६ )
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