यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
समर्पित करते हैं. कुश के समूह विश्व के साथ दिव्य नभ, अरिष्यगण व वसुगणों के
साथ दिव्य नभ तक जाएं. उन के लिए स्वाहा. ( २२ )
कस्त्वा विमुञ्चति स त्वा विमुञ्चति कस्मै त्वा विमुञ्चति तस्मै त्वा विमुञ्चति.
पोषाय रक्षसां भागोसि.. (२३)
कौन आप को छोड़ता है ? किसलिए आप को छोड़ता है ? वह आप को अन्य
( याजकों और उन के परिजनों ) के लिए छोड़ता है. जो भाग अवशिष्ट है, वह
राक्षसों के पोषण के लिए है. ( २३ )
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं ४श शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (२४)
हम वर्चस्वी हों. हम दूध से अपने तन को पोषित करें. हमारे मन कल्याणमयी
भावनाओं से युक्त हों. हमारे लिए धन धारण करने की कृपा करें. हमारे शरीर में
जो भी कमी हो, वह पूरी करने की कृपा करें. ( २४ )
दिवि विष्णोर्व्यक्र ४श स्त जागतेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मोन्तरिक्षे विष्णोर्व्यक्र ४श स्त त्रैष्टुभेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मः पृथिव्यां विष्णोर्व्यक्र ४श स्त गायत्रेण छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मोस्मादन्नादस्यै प्रतिष्ठाया ऽ अगन्म स्वः सं ज्योतिषाभूम.. (२५)
विष्णु ने जगती छंद से स्वर्गलोक में पूरा भ्रमण किया है. उन्होंने जो हम से द्वेष
करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन का नाश कर दिया है. उन्होंने त्रिष्टुप् का नाश
कर दिया है. वे गायत्री छंद पृथ्वी से समाप्त करने की कृपा करें. अन्न से ऐसे शत्रुओं
को हटा दिया गया है. हम स्वर्गलोक को पाएं तथा ज्योति संपन्न हो जाएं. ( २५ )
स्वयंभूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चोदा ऽ असि वर्चो मे देहि. सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२६)
आप स्वयं भू, श्रेष्ठ भू, किरणमय भू व वर्चस्वी भू हैं. हम सूर्य की परिक्रमा
के अनुसार ही परिक्रमा करते हैं. ( २६ )
अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेहं गृहपतिना भूयास ४श सुगृहपतिस्त्वं मयाग्ने
गृहपतिना भूयाः.
अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु शत ४श हिमाः सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२७)
हे अग्नि! आप घर के व अच्छे के स्वामी हैं. आप की कृपा से हम भी गृहपति
व अच्छे गृहपति बनें. आप की कृपा से हम भी बारंबार अच्छे गृहपति बनें. हम अच्छे
गृहस्थ हों. हम सौ वर्षों तक यज्ञ कर्म करें. हम सूर्य की परिक्रमा के अनुरूप
अनुशासन का पालन करें. ( २७ )
अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं तदशकं तन्मेराधी दमहं य ऽ एवास्मि सोस्मि.. (२८)
४४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
हे अग्नि! आप व्रतपति हैं. हम भी आप के व्रतों के अनुसार चल कर सामर्थ्यवान
बनते हैं. आप ने हमारी आकांक्षाएं फलीभूत की हैं. हम जैसे यज्ञ करते समय थे
( यज्ञफल प्राप्त हो जाने पर भी ) हम वैसे ही हैं. ( २८ )
अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहा.
अपहता ऽ असुरा रक्षा १७ सि वेदिषदः.. ( २९ )
पितरों के लिए आहुति पहुंचाने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. पितरों के साथी
सोम के लिए स्वाहा. यज्ञ की वेदी से असुर और राक्षसगण दूर हो गए हैं. ( २९ )
ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना ऽ असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति.
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात्.. ( ३० )
जो असुर रूप बदल कर या अन्य रूप में आ कर पितरों के लिए अर्पित आहुति
को खा जाते हैं, आप इस तरह अपना भरणपोषण करने वाले नीच कार्य करने वाले
राक्षसों को लोक से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३० )
अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्.
अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत.. ( ३१ )
जैसे बैल अपना भाग प्राप्त कर के मदमस्त हो जाते हैं, पुष्ट हो जाते हैं, वैसे
ही पितृगण अपना भाग पा कर पुष्ट एवं मदमस्त हो जाते हैं. ( ३१ )
नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः
स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो
गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वास ऽ आधत्त.. ( ३२ )
पितरों के रस रूप को नमन. पितरों के शुष्क रूप को नमन. पितरों के जीवन
रूप को नमन. पितरों के अन्न रूप को नमन. पितरों के पोषक रूप को नमन. पितरों
के उत्साह रूप को नमन. पितरों के क्रोध रूप को नमन. पितरों के मन्यु रूप को
नमन. हम पितरों को घर, वस्त्र आदि समर्पित करते हैं. पितर भी हमारे लिए घर,
वस्त्र आदि धारण करने की कृपा करें. ( ३२ )
आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम्. यथेह पुरुषोसत्.. ( ३३ )
हे पितृगण! आप गर्भ में ही बालक के लिए अजस्र ( भरपूर ) पोषण प्रदान
करने की कृपा कीजिए जिस से वह वीर बन सके. ( ३३ )
ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतुम्. स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्.. ( ३४ )
ऊर्जा वहन करने वाली व ऊर्जामयी करने वाली, दूधमयी तथा अन्नमयी करने
वाली जलधाराएं पितरों को तृप्त करने की कृपा करें. ( ३४ )
यजुर्वेद - ४५