यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ हमें फलीभूत हो. ज्येष्ठता हमारे आधिपत्य में रहे. अनीति हमारे नियंत्रण
में रहे. क्रोध हम से दूर रहे. दुष्टों का हम प्रतिकार कर सकें. हमारी परिपक्वता में
बढ़ोत्तरी हो. हमारी गरिमा में बढ़ोत्तरी हो. हमारी वरिष्ठता में बढ़ोत्तरी हो. हम सर्वत्र
प्रथम (श्रेष्ठ) साबित हों. हमारी व्यापकता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी आयु में बढ़ोत्तरी
हो. हमारे बड़प्पन में बढ़ोत्तरी हो. हमारे वंश में बढ़ोत्तरी हो. हमारी उत्कृष्टता में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें (सर्वविध) फलीभूत हो. (४)
सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनं च मे विश्वं च मे महश्च मे क्रीडा च
मे मोदश्च मे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (५)
यज्ञ फलीभूत हो. सत्य की बढ़ोत्तरी हो. श्रद्धा की बढ़ोत्तरी हो. धन की
बढ़ोत्तरी हो. विश्व में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. मनोविनोद की बढ़ोत्तरी हो. हर्ष स्तर
की बढ़ोत्तरी हो. संतान की बढ़ोत्तरी हो. सूक्तों में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ
सर्वविध फलीभूत हो. (५)
ऋतं च मेमृतं च मेयक्ष्मं च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वं च मेनमित्रं च
मेभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्च मे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (६)
यज्ञ से हमारे ऋत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे अमृत को बढ़ोत्तरी मिले.
यज्ञ से हमारे यक्ष्मा में कमी हो. यज्ञ से हमारे आरोग्य में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
जीने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
शत्रुओं का अभाव हो. यज्ञ से हमारे अभय में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुख में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शयन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे संध्याकर्म में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से हमारे सुदिन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. (६)
यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्च मे धृतिश्च मे विश्वं च मे महश्च मे संविच्च मे ज्ञात्रं
च मे सूश्च मे प्रसूश्च मे सीरं च मे लयश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (७)
यज्ञ से हम धारक हो जाएं. धैर्य की क्षमता बढ़े. यज्ञ से हमें संसार की सारी
महानता प्राप्त हो. यज्ञ से हमें संपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हो. यज्ञ से हमें ज्ञान प्राप्त हो. यज्ञ
से उत्पादन की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से खेती के साधनों की क्षमता में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से कष्टों में कमी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (७)
शं च मे मयश्च मे प्रियं च मेनुकामश्च मे कामश्च मे सौमनसश्च मे भगश्च मे द्रविणं
च मे भद्रं च मे श्रेयश्च मे वसीयश्च मे यशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (८)
यज्ञ से सब सुखों में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब आनंद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब
प्रकार के आमोदप्रमोद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब अनुकूल कामनाओं में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से सब सौमनस्य कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौभाग्य में बढ़ोत्तरी
यजुर्वेद - २२५
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हो. यज्ञ से सब वैभव में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब भद्रता में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब
श्रेय में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब वास सुख में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब यश में बढ़ोतरी
हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( ८ )
ऊर्क् च मे सूनृता च मे पयश्च मे रसश्च मे घृतं च मे मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च
मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे जैत्रं च म ऽ औद्भिद्यं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ९ )
यज्ञ हमें फलीभूत हो. यज्ञ से अन्न की प्राप्ति हो. यज्ञ से अच्छी वाणी की प्राप्ति
हो. यज्ञ से पेय की प्राप्ति हो. यज्ञ से रस की प्राप्ति हो. यज्ञ से घी की प्राप्ति हो. यज्ञ
से मधु की प्राप्ति हो. हम संबंधियों के साथ भोजन करें. हम संबंधियों के साथ पीएं.
वर्षा हमारी कृषि को फलीभूत व बढ़ोतरी करे. हम शत्रुओं का भेदन करें. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हो. ( ९ )
रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टं च मे पुष्टिश्च मे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णं च मे पूर्णतरं
च मे कुयवं च मेक्षितं च मेन्नं च मेक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १० )
यज्ञ से हमारे धन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी संपत्ति में बढ़ोतरी हो. हम
धन से पुष्ट हों. हम वैभव से पुष्ट हों. हम प्रभु से पुष्ट हों. हम पूर्ण से पुष्ट हों.
हम पूर्णतर से पुष्ट हों. हमारे यहां पशुओं के खाद्य में बढ़ोतरी हो. हमारे यहां
अक्षय अन्न में व हमारी भूख में भी बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १० )
वित्तं च मे वेद्यं च मे भूतं च मे भविष्यच्च मे सुगं च मे सुपथ्यं च म ऽ ऋद्धं च म ऽ
ऋद्धिश्च मे क्लृप्तं च मे क्लृप्तिश्च मे मतिश्च मे सुमतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ११ )
यज्ञ से हमारे वित्त, ज्ञान, अतीत, भविष्य व अच्छे धन को बढ़ोतरी मिले. यज्ञ
से हमारे पथ सुगम हों. यज्ञ से हमारे पथ के रोड़े समाप्त हों. यज्ञ से हमारे अच्छे
कर्म, सामर्थ्य, सत्य, बुद्धि व सद्बुद्धि में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( ११ )
व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे खल्वाश्च मे प्रियङ्गवश्च
मेणवश्च मे श्यामाकाश्च मे नीवाराश्च मे गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. ( १२ )
यज्ञ से हमारे धान, जौ, उड़द, तिल, मूंग, चना, प्रियंग ( राई ), छोटे चावलों
में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारे सावां चावल, नीवार, गेहूं, मसूर में बढ़ोतरी हो. यज्ञ
हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( १२ )
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यं
च मेयश्च मे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १३ )
२२६ - यजुर्वेद