याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
(१५) संविद्व्यतिक्रम-( Breach of contract ) प्रकरण ( श्लो०
( १८ )
(१४) अभ्युपेत्याऽशुश्रूषा-( Negligence of promised service ) प्रकरण
(श्लो० १८२-१८४ ),
(१५) संविद्व्यतिक्रम-( Breach of contract ) प्रकरण ( श्लो०
१८५-१९२ ),
(१६) वेतनादान-प्रकरण ( श्लो० १९३-१९८ ),
(१७) द्यूत-समाह्वय'-( Gambling ) प्रकरण ( श्लो० १९९-२०३ ),
(१८) वाक्पारुष्य-( Defamation ) प्रकरण ( श्लो० २०४-२११ ),
(१९) दण्ड-पारुष्य-( Assault ) प्रकरण ( श्लो० २१२-२२९ ),
(२०) साहस- ( Aggressive act ) प्रकरण ( श्लो० २३०-२५३ ),
(२१) विक्रीयाऽसम्प्रदान-( Non-delivery of the sold ) प्रकरण ( श्लो०
२५४-२५८ ),
(२२) सम्भूय-समुत्थान-( joint dealing ) प्रकरण ( श्लो० २५९-२६५ ),
(२३) स्तेय ( Theft ) प्रकरण ( श्लो०२६६-२८२ ),
(२४) स्त्री-संग्रहण-( Seduction ) प्रकरण ( श्लो० २८३-२९४ ) तथा,
(२५) प्रकीर्णक-( Miscellany ) प्रकरण ( श्लो० २९५-३०७ ) ।
प्रायश्चित्ताध्याय में ५ प्रकरण हैं—
(१) अशौच-प्रकरण ( श्लो० १-३४ ), (२) आपद्धर्म-प्रकरण ( श्लो०
३५-५४ ), (३) वानप्रस्थ-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ५५-५५ ), (४) यति-धर्म-
प्रकरण ( श्लो० ५६-२०५ ), (५) प्रायश्चित्त-प्रकरण ( श्लो० २०६-३३४ ) ।
प्रायश्चित्त-प्रकरण में महा-पातक उप-पातक आदि का स्वरूप-निर्देश तथा प्राय-
श्चित्त-विधान आदि दिए गए हैं।
याज्ञवल्क्य-स्मृति का महत्त्व
पूर्व-निर्दिष्ट सभी धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक-सूचियों में मनु के सर्व प्रथम निर्देश
होने के कारण यह तो स्पष्ट है कि स्मृतियों में मनुस्मृति का स्थान सर्वोपरि है।
इसी लिए बृहस्पति का कथन है—
वेदार्थ-प्रतिबद्धत्वात् प्रामाण्यन्तु मनोः स्मृतम् ।
मन्वर्थ-विपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥
(बृ० स्मृ० सं० का० श्लो० १३ )
अङ्गिराने भी मनु को ही सर्वप्रथम स्थान दिया है—
यत्पूर्वं मनुना प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् ।
न हि तत्समतिक्रम्य वचनं हितमात्मनः ॥
( Dr. Jha : Hindu Law in its Sources. P. 44 )
उपर्युक्त बृहस्पति-वाक्य से यह स्पष्ट है कि किसी भी स्मृति को प्रतिष्ठित
होने के लिए यह आवश्यक है कि वह मनु के मत से समर्थित हो। प्रकृत
याज्ञवल्क्य-स्मृति भी आद्यन्त मनु के मत से ओत-प्रोत है। नीचे कुछ श्लोक
मनु-स्मृति तथा याज्ञवल्क्य-स्मृति के दिये जाते हैं जहाँ केवल अर्थ-साम्य ही
नहीं अपि तु शब्द-साम्य भी है—
( १६ )
मनु-स्मृति
याज्ञवल्क्य-स्मृति
(१) वेदः स्मृतिः सदाचारः
(१) श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः
स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधम्प्राहुः
सम्यक्संकल्पजः कामो
साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ।
धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥
२।१२॥
१।७॥
(२) निषेकादिश्मशानान्तो
(२) निषेकाद्याः श्मशानान्ताः
मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥
तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥
२।१६।
१।१०॥
(३) गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत
(३) गर्भाऽष्टमेऽष्टमे वाब्दे
ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥
ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥
२।३६॥
१।१४॥
(४) आषोडशाद्ब्राह्मणस्य
(४) आ-षोडशादाद्वाविंशात्
सावित्री नातिवर्तते ।
चतुर्विंशाच्च वत्सरात् ॥
आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोः
ब्रह्म-क्षत्र-विशां काल
आचतुर्विंशतेर्विशः ॥
औपनायनिकः परः॥
अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते
अत ऊर्ध्वं पतन्त्येते
यथाकालमसंस्कृताः ।
सर्वधर्म-बहिष्कृताः ।
सावित्री-पतिताः व्रात्याः
सावित्री-पतिताः व्रात्याः
भवन्त्यार्य-विगर्हिताः ॥
व्रात्यस्तोमादृते क्रतोः ॥
२।३८-३९॥
१।३७-३८ ॥
(५) न स्कन्दते न व्यथते
(५) अस्कन्नमन्यथक्तञ्चैव
न विनश्यति कर्हिचित् ।
प्रायश्चित्तैरदूषितम् ॥
वरिष्ठमग्नि-होत्रेभ्यो
अग्नेः सकाशाद्द्विप्राग्नौ
ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ।
हुतं श्रेष्ठमिहोच्यते ॥
७।८४॥
१।३१६॥
(६) अलब्धञ्चैव लिप्सेत
(६) अलब्धमीहेद्धर्मेण
लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
लब्धं यत्नेन पालयेत् ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव
पालितं वर्धयेन्नीत्या
वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत ॥
वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥
अलब्धमिच्छेद्दण्डेन
१।३१७॥
लब्धं रक्षेद्देवेक्षया ।
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या
वृद्धयंच पात्रेषु निक्षिपेत् ॥७।९९,१०१
( ३० )
याज्ञवल्क्य-स्मृति में किये गये मनु-स्मृति के संक्षेप के कुछ निदर्शन निम्न-
लिखित हैं—
म० स्मृ०
(१) प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो
जातकर्म विधीयते ।
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य
हिरण्य-मधु-सर्पिषाम् ॥
नामधेयं दशम्यान्तु
द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्त्ते वा
नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥
चतुर्थे मासि कर्तव्यम्
शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि
यथेष्टं मङ्गलं शुभे ॥
चूडाकर्म द्विजातीनां
सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा
कर्त्तव्यं श्रुति-चोदनात् ॥
२।२९-३०, ३४-३५ ॥
(२) हीन-जाति-स्त्रियं मोहात्
उद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु
स-सन्तानानि शूद्रताम् ॥
शूद्रां शयनमारोप्य
ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ॥
जनयित्वा सुतं तस्यां
ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ ३।१५, १७॥
(३) सुवासिनीः कुमारीश्च
रोगिणी गर्भिणीः स्त्रियः ।
अतिथिभ्योऽग्र एवैतान्
भोजयेदविचारयन् ॥
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु
स्वेषु भृत्येषु चैव हि ।
भुञ्जीयातां ततः पश्चात्
अवशिष्टन्तु दम्पती ॥ ३।११४, ११५॥
या० स्मृति०
(१) ......एते जातकर्म च ॥
अहन्येकादशे नाम
चतुर्थे मासि निष्क्रमः ।
षष्ठेऽन्न-प्राशनं मासि
चूडा कार्या यथाकुलम् ॥
१।११-१२।।
(२) यदुच्यते द्विजातीनां
शूद्रादारोपसंग्रहः ।
नैतन्मम मतं यस्मात्
तत्रायं जायते स्वयम् ॥ १।५६॥
(३) बालः स्ववासिनी-वृद्ध-
गर्भिण्यातुर-कन्यकाः ।
सम्भोज्यातिथि-भृत्यांश्च
दम्पत्योः शेष-भोजनम् ॥ १।१०५॥
( २१ )
स्थल-विशेष में याज्ञवल्क्य में मनु के मत का कुछ परिष्कार भी किया
गया है। उसके कुछ दृष्टान्त अधो-लिखित हैं—
( २२ )
इतनी समता या साधारण-विषमता के अतिरिक्त दोनों में असाधारण
विषमता भी द्यूत-समाह्वय-प्रायश्चित्त आदि में स्पष्ट उपलब्ध है। परन्तु देश-काल
के अनुसार ही याज्ञवल्क्य-स्मृति में यह परिवर्त्तन हुआ है—यही प्रतीत होता है।
अतः परमार्थतः याज्ञवल्क्य-स्मृति को मनुस्मृति का विप्रतीप कहना उचित
नहीं है।
मनुस्मृति से अतिरिक्त अन्यान्य प्राचीन धर्मशास्त्र के मत का भी यथोचित
सन्निवेश याज्ञवल्क्य-स्मृति में हुआ है, परन्तु विस्तर-भय से यहाँ उनके उदाहरण
नहीं दिये जाते हैं। बहुत से उदाहरण तो याज्ञवल्क्य-स्मृति की व्याख्याओं के
अवलोकन से भी स्पष्ट हो जाते हैं, दोनों की तुलना करने पर तो कुछ कहना
ही नहीं है।
विषय-विन्यास की दृष्टि से भी याज्ञवल्क्य-स्मृति बहुत ही प्रशस्त है। संक्षेप
में अधिक अर्थ की अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है। जहाँ मनुस्मृति में २७००
श्लोक हैं वहीं या० स्मृ० में केवल १००९ (मिताक्षरा-कार के अनुसार) श्लोक
हैं। मनुस्मृति का विषय-विन्यास स्फुट होने पर भी बहुधा सङ्कीर्ण हो गया है
जब कि या० स्मृ० में सङ्कीर्णता का सर्वथा अभाव ही दृष्टि-गोचर होता है।
मनुस्मृति में वर्णन के प्रसङ्ग में निदर्शन आदि का पुट अधिक है जो या० स्मृ० में
प्रायशः नहीं मिलता है। सृष्टि-प्रक्रिया आदि कुछ विषयों की तो या० स्मृ० में
कोई चर्चा ही नहीं है जब कि म० स्मृ० में पूरा प्रथम अध्याय सृष्टि-प्रकार के
वर्णन में ही पर्यवसन्न हुआ है। मनुस्मृति में पुनरुक्ति भी बहुत है। कुछ निदर्शन
निम्न-लिखित हैं :—
१ वेदोऽखिलो धर्म-मूलं स्मृति-शीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥ २।६ ॥
वेदःस्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधम्प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ २।१२॥
तथा,
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।९९ ॥
अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्यवेक्षया ।
रक्षितन्वर्षयेद्वृद्ध्या वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।१०१ ॥
अतः विषय में मन्वर्थानुगामिनी तथा प्रतिपादन में संक्षिप्त किन्तु युक्त्यनु-
सारिणी तथा देश-काल-पात्र को ध्यान में रखकर निर्णय करने वाली या० स्मृ०
का सभी स्मृतियों में विशिष्ट स्थान है।
याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकार
विश्वरूप-(७५०—१००० ई०)
याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकारों में सर्व-प्रसिद्ध तथा सर्व-प्रथम उपलब्ध
व्याख्याकार विश्वरूपाचार्य हैं। इनकी व्याख्या का नाम 'बालक्रीडा' है जिसका
( २३ )
प्रकाशन महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री के द्वारा 'त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला'
से हुआ है। यह व्याख्या दो भागों में प्रकाशित हुई है। व्याख्या की भाषा
अत्यन्त मनोहर है। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को, विशेषतः आचार तथा प्रायश्चित्त
अध्यायों में, विश्वरूप ने विश्वरूप बना दिया है। इसीलिए मिताक्षराकार ने
प्रारम्भ में ही इनका ससम्मान निर्देश किया है—
"याज्ञवल्क्य-मुनि-भाषितम्मुहुः विश्वरूप-विकटोक्तिविस्तृतम्” ॥
(मिताक्षरा० आचार० श्लो० २)
याज्ञवल्क्य के समर्थन के लिए (यत्र तत्र अपने विमत के समर्थन के लिए
भी) विश्वरूप ने वेदों से तथा अनेक स्मृतियों एवम् गृह्य-सूत्रों से उद्धरण
प्रस्तुत किये हैं। स्थान-स्थान पर मिताक्षराकार का मत भी इनसे भिन्न है।
यद्यपि इन्होंने 'अन्ये' 'अपरे', 'यत्त' आदि शब्दों से अपने से प्राचीनतर
व्याख्याकारों का भी निर्देश किया है तथापि किसी का नाम स्पष्ट रूप में निर्दिष्ट
नहीं हुआ है। विश्वरूप की प्रवृत्ति मीमांसा की ओर अधिक है। अनेकशः
जैमिनि के सूत्रों का इन्होंने उद्धरण किया है। इनका समय महामहोपाध्याय
काणे के अनुसार ७५० ई० से लेकर १००० ई० तक माना गया है।
विज्ञानेश्वर (१०७०—१११५)
विज्ञानेश्वर की ऋजु-मिताक्षरा समस्त धर्म-साहित्य में अद्वितीय है। महामहो-
पाध्याय काणे का कथन है—
Its position is analogous to that of the महाभाष्य of पतञ्जलि in
grammar or to that of the काव्य-प्रकाश of मम्मट in poetics.
(History of Dharma. P. 287)
आङ्ग्लशासन काल में तो मिताक्षरा का बड़ा ही महत्त्व था। इसी के आधार
पर न्यायालय में दायभाग आदि का निर्णय किया जाता था। यदि यह कहा
जाय कि मिताक्षरा के कारण याज्ञवल्क्य-स्मृति का भी महत्त्व कुछ अधिक हो
गया तो अत्युक्ति न होगी। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को परिष्कृत करने के लिए
इन्होंने अनेक स्मृतियों, पुराणों तथा वैदिक-ग्रन्थों से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं।
स्मृतिकारों का निर्देश तो विश्वरूप की तुलना में चतुर्गुण है—ऐसा कहा जा
सकता है। ये मीमांसा के बड़े ही प्रकृष्ट पण्डित प्रतीत होते हैं। वस्तुतः धर्म-
शास्त्र के मर्म को जानने के लिए मीमांसा का विशद ज्ञान अनिवार्य है। इन्होंने
'यथाकामी भवेद्रापि' (या० स्मृ० १।८१) श्लोक की व्याख्या में विधि का
विमर्श बहुत ही तार्किक युक्ति से मीमांसा शास्त्र के अनुसार प्रस्तुत किया है।
इसी प्रकार १।८६, २।११४, २।१२६ आदि श्लोकों की व्याख्या में भी उनके
मीमांसा-शास्त्रीय वैदुष्य का उत्कर्ष देखा जा सकता है।
इनका जन्म भारद्वाज गोत्र में हुआ था। इन्होंने अपने पिता का नाम
पद्मनाभ भट्टोपाध्याय बतलाया है। गुरु के विषय में इनका निर्देश है—
उत्तमोपपदस्येयं शिष्यस्य कृतिरात्मनः।