सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

( १८ )
(१४) अभ्युपेत्याऽशुश्रूषा-( Negligence of promised service ) प्रकरण
(श्लो० १८२-१८४ ),
(१५) संविद्व्यतिक्रम-( Breach of contract ) प्रकरण ( श्लो०
१८५-१९२ ),
(१६) वेतनादान-प्रकरण ( श्लो० १९३-१९८ ),
(१७) द्यूत-समाह्वय'-( Gambling ) प्रकरण ( श्लो० १९९-२०३ ),
(१८) वाक्पारुष्य-( Defamation ) प्रकरण ( श्लो० २०४-२११ ),
(१९) दण्ड-पारुष्य-( Assault ) प्रकरण ( श्लो० २१२-२२९ ),
(२०) साहस- ( Aggressive act ) प्रकरण ( श्लो० २३०-२५३ ),
(२१) विक्रीयाऽसम्प्रदान-( Non-delivery of the sold ) प्रकरण ( श्लो०
२५४-२५८ ),
(२२) सम्भूय-समुत्थान-( joint dealing ) प्रकरण ( श्लो० २५९-२६५ ),
(२३) स्तेय ( Theft ) प्रकरण ( श्लो०२६६-२८२ ),
(२४) स्त्री-संग्रहण-( Seduction ) प्रकरण ( श्लो० २८३-२९४ ) तथा,
(२५) प्रकीर्णक-( Miscellany ) प्रकरण ( श्लो० २९५-३०७ ) ।
प्रायश्चित्ताध्याय में ५ प्रकरण हैं—
(१) अशौच-प्रकरण ( श्लो० १-३४ ), (२) आपद्धर्म-प्रकरण ( श्लो०
३५-५४ ), (३) वानप्रस्थ-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ५५-५५ ), (४) यति-धर्म-
प्रकरण ( श्लो० ५६-२०५ ), (५) प्रायश्चित्त-प्रकरण ( श्लो० २०६-३३४ ) ।
प्रायश्चित्त-प्रकरण में महा-पातक उप-पातक आदि का स्वरूप-निर्देश तथा प्राय-
श्चित्त-विधान आदि दिए गए हैं।
याज्ञवल्क्य-स्मृति का महत्त्व
पूर्व-निर्दिष्ट सभी धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक-सूचियों में मनु के सर्व प्रथम निर्देश
होने के कारण यह तो स्पष्ट है कि स्मृतियों में मनुस्मृति का स्थान सर्वोपरि है।
इसी लिए बृहस्पति का कथन है—
वेदार्थ-प्रतिबद्धत्वात् प्रामाण्यन्तु मनोः स्मृतम् ।
मन्वर्थ-विपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥
(बृ० स्मृ० सं० का० श्लो० १३ )
अङ्गिराने भी मनु को ही सर्वप्रथम स्थान दिया है—
यत्पूर्वं मनुना प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् ।
न हि तत्समतिक्रम्य वचनं हितमात्मनः ॥
( Dr. Jha : Hindu Law in its Sources. P. 44 )
उपर्युक्त बृहस्पति-वाक्य से यह स्पष्ट है कि किसी भी स्मृति को प्रतिष्ठित
होने के लिए यह आवश्यक है कि वह मनु के मत से समर्थित हो। प्रकृत
याज्ञवल्क्य-स्मृति भी आद्यन्त मनु के मत से ओत-प्रोत है। नीचे कुछ श्लोक
मनु-स्मृति तथा याज्ञवल्क्य-स्मृति के दिये जाते हैं जहाँ केवल अर्थ-साम्य ही
नहीं अपि तु शब्द-साम्य भी है—