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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पञ्चमोऽध्यायं २ आह्निक १०३

पञ्चमोऽध्यायं २ आह्निक १०३
प्रकार अग्नि और वायु की क्रिया भी उत्पन्न होती समझनी चाहिये ॥ १२ ॥
अग्नि वायु और मन की अलक्ष्य अदृष्टकारित क्रिया क्या है ? उत्तर-
२१३-अग्नेरूर्ध्वज्वलनं वायोस्तिर्यक्पवनमणूनां
मनसश्चाद्यं कर्मादृष्टकारितम् ॥ १३ ॥
(अग्नेः) अग्नि का (ऊर्ध्वज्वलनम्) ऊपर को लपट निकलना (वायोः)
वायु का (तिर्यक्पवनम्) आगे पीछे दायें बायें चलना (अणूनाम्) पर-
माणुओं (च) और (मनसः) मन का (आद्यं) पहला (कर्म) काम
(अदृष्टकारितम्) अदृष्ट का कराया हुवा है ॥
अर्थात् हमारी आंखों से अदृष्ट=न देखा हुवा कोई कारण है, जिस को
इन स्वभाव कहते हैं, उसी कारण से अग्नि ऊपर को लपट लेता है, वायु
तिरछा चलता है, परमाणु और मन में पहली क्रिया (हरकत) उत्पन्न होती
है ॥ १३ ॥ तथा-
२१४-हस्तकर्मणा मनसः कर्म व्याख्यातम् ॥ १४ ॥
(हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (मनसः) मन की (कर्म) क्रिया
का (व्याख्यातम्) व्याख्यान समझलो ॥
अर्थात् जैसे जीवात्मा की प्रेरणा से हाथ क्रिया करता है वैसे ही जी-
वात्मा की प्रेरणा से मन में भी क्रिया होती है ॥ १४ ॥
२१५-आत्मेन्द्रियमनोर्थसन्निकर्षात् सुखदुःखे ॥ १५ ॥
(आत्मेन्द्रियमनोर्थसन्निकर्षात्) आत्मा=जीवात्मा, इन्द्रिय=नाक कान
आदि, मन और विषय=रूपादि के परस्पर छूने से (सुखदुःखे) सुख और
दुःख होते हैं ॥
अर्थात् आत्मा मन से छूता है, मन इन्द्रियों से छूता है और इन्द्रियां
विषयों से छूती हैं। इस प्रकार विषयों का सुख और दुःख आत्मा तक पहुं-
चता है ॥ १५ ॥ अब इस सब कथन का फल निकालते हैं कि-
२१६-तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि,
शरीरस्य दुःखाभावः स योगः ॥ १६ ॥
(मनसि) मन के (आत्मस्थे) अपने आपे ही में ठहर जाने पर (तद्-
नारम्भः) इन्द्रियों द्वारा उन विषयों का विषयग्रहण आरम्भ नहीं होता

[ तब ] ( शरीरस्य ) शरीर को ( दुःखाभावः ) दुःख नहीं रहता ( सः ) वह
( योगः ) योग कहाता है ॥
अर्थात् योग उस अवस्था का नाम है जब कि मन अपने आपे में ही ठहर
जावे और इन्द्रियों को प्रेरणा न करे और इन्द्रियां मन की सहायता न पाकर
विषयों को न छुवें तब आत्मा को दुःख नहीं पहुंच सकता । यद्यपि योगदशा
में जैसे इन्द्रियों और विषयों का स्पर्श होने से आत्मा को विषयों का दुःख नहीं
पहुंच सकता, इसी प्रकार विषयों का सुख भी तौ नहीं पहुंच सकता ? तौ भी
सूत्रकार ने केवल दुःख का अभाव कहा है, सुख का अभाव नहीं कहा, सो क्यों ?
उत्तर-सुख का अभाव इस लिये नहीं कहा कि साधारण पुरुषों को दूसरे
शब्दों में लौकिक पुरुषों को जिन रूपादि विषयों से सुख की प्रतीति होती
है, उन्हीं विषयों से योगी को दुःख की प्रतीति होती है क्योंकि योगी का
आत्मा योगसाधन की क्रिया करते २ ऐसा सुकुमार=नाजुक हो जाता है कि
जो स्थूल विषय अन्यों को सुखदायक प्रतीत होते हैं वे ही विषय योगी को
दुःखदायक प्रतीत होते हैं । इस में दृष्टान्त यह है कि जैसे मकड़ी का जाला
जो रेशम से भी नरम होता है, अङ्गुली से छूने में कैसा सुखदायक प्रतीत होता
है क्योंकि अङ्गुली का चमड़ा बड़ा मोटा और गंवार है । परन्तु वही मकड़ी का
जाला यदि आंख से छू जावे तो आंख को सुखदायक होने के बदले दुःखदायक
प्रतीत होता है क्योंकि आंख अङ्गुली के चमड़े की नाईं गंवार नहीं है
किन्तु नगरनिवासियों के समान सुकुमार है । बस ऐसे ही योगी की दृष्टि
में सब विषयों के सुख भी अपनी सुकुमारता के कारण दुःखों ही की गिनती
में हैं। इस लिये सूत्रकार ने स्थिरचित्त योगी को केवल दुःख का अभाव कहा,
सुख का अभाव नहीं कहा ॥ १६ ॥
अब मन की अन्य क्रियाओं को वर्णित करते हैं जो अदृष्ट=न देखे हुए
प्रारब्धकर्मसंस्कार से होती हैं-
२१७-अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः
कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि ॥ १७ ॥
( अपसर्पणम् ) बाहर निकलजाना ( उपसर्पणम् ) समीप चलाजाना
( अशितपीतसंयोगाः ) खाये पिये के संयोग (च) और (कर्मान्तरसंयोगाः)
अन्य कर्मों के साथ अनेक संयोग; [ ये सब ] ( अदृष्टकारितानि ) बिना
देखे पूर्व जन्मकृत पाप पुण्यों से बने प्रारब्ध संस्कार से कराये हुए होते हैं।

पञ्चमोऽध्याय २ आन्हिक १०५
अर्थात् मन का एक देह से निकलना, दूसरे देह में जाना, खाये पिये से
मन का नवीन नवीन उत्पन्न होना, बढ़ना घटना और अन्य कार्यों में मन का
लगन; ये सब फल प्रारब्ध कर्मानुसार होते हैं, जो अदृष्ट है ॥ १७ ॥
और जब ऐसा नहीं होता तब-
२१८-तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः ॥ १८ ॥
( तदभावे ) उस कर्माऽरम्भ के अभाव में (संयोगाभावः) आत्मा का मन
आदि के साथ संयोग नहीं होता (च) और (अप्रादुर्भावः) जन्म नहीं
होता (मोक्षः) वही मोक्ष है ॥ १८ ॥
२१९-द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यादभावस्तमः ॥ १६ ॥
(द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यात् ) पृथिव्यादि द्रव्यों, रूपादि गुणों और
उत्क्षेपण आदि कर्मों की सिद्धि से विरुद्ध धर्म होने से (अभावः) प्रकाश
का न होना (तमः) अन्धकार होता है ॥
अर्थात् प्रकाश कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है किन्तु प्रकाश का अभाव ही
अन्धकार कहाता है और प्रकाश के अभाव का कारण द्रव्यों, गुणों और
कर्मों की सिद्धि का विपरीत होना है। तैल, बत्ती आदि द्रव्यों के वैधर्म्य से
दीपशलाका के न रगड़ने रूप कर्म से प्रकाश गुण का न होना ही अन्धकार
है; अन्धकार कोई भाव पदार्थ नहीं ॥ १९ ॥
२२०-तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥
(तेजसः) तेज के (द्रव्यान्तरेणावरणात्) अन्य द्रव्य का आवरण होजाने
से (च) भी [प्रकाश का अभाव = अन्धकार होता है] ॥ २० ॥
२२१-दिक्कालाबाकाशं च क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियाणि ॥२१॥
(दिक्कालौ) दिशा और काल (च) और (आकाशम्) आकाश (नि-
ष्क्रियाणि) क्रियारहित पदार्थ हैं क्योंकि (क्रियावद्वैधर्म्यात् ) क्रिया वाले
पदार्थों से विरुद्धधर्मी हैं ॥
जो पदार्थ मूर्त्तिमान् होते हैं, उन में क्रिया होती है, इस के विरुद्ध
दिशा काल और आकाश अमूर्त्त हैं, इस वैधर्म्य से वे निष्क्रिय हैं। इस सूत्र
में चकार से शङ्कर मिश्रादि टीकाकार आत्मा का ग्रहण करते हैं, आत्मा भी
अमूर्त होने से निष्क्रिय है, यह दूसरी बात है कि आत्मा के सामीप्य से
मन और इन्द्रियों में क्रिया उत्पन्न होती है ॥ २१ ॥
१४

१०६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२२२-एतेन कर्माणि गुणाश्च व्याख्याताः ॥ २२ ॥
( एतेन ) इसी से ( कर्माणि ) कर्म ( च ) और ( गुणाः ) गुणों की
( व्याख्याताः ) व्याख्या की गयी ॥
अर्थात् जिस प्रकार दिशा काल और आकाश अमूर्त्त होने से निष्क्रिय
हैं और आत्मा भी निष्क्रिय है, इसी प्रकार कर्मों और गुणों का भी नि-
ष्क्रिय होना समझ लेना चाहिये क्योंकि कर्म और गुण भी अमूर्त्त हैं ॥२२॥
यदि कहो कि गुण और कर्म तौ मूर्त्तिमान् द्रव्यों में भी समवाय सम्बन्ध
से रहते हैं, फिर उन में क्रिया क्यों न मानी जाय, जब कि उन के आश्रय
द्रव्यों में क्रिया है ? उत्तर-
२२३-निष्क्रियाणां समवायः कर्मभ्यो निषिद्धः ॥ २३ ॥
( निष्क्रियाणाम् ) निष्क्रिय गुण कर्मों का ( समवायः ) समवाय सम्बन्ध
( कर्मभ्यः ) कर्मों से ( निषिद्धः ) निषिद्ध किया गया है ॥
अर्थात् क्रिया तौ संयोग से होती है न कि समवाय से । समवाय और
संयोग में भेद यह है कि एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अनादिकाल से
मिलाव=समवाय कहलाता है और भिन्न २ दो पदार्थों का एक दूसरे से नवीन
मिलाव=संयोग कहाता है ॥ २३ ॥
प्रश्न-यदि गुण और कर्म दोनों निष्क्रिय हैं तौ उन से कर्मों की उत्पत्ति
क्यों होती है ? उत्तर-
२२४-कारणं त्वऽसमवायिनो गुणाः ॥ २४ ॥
( गुणाः ) संयोगादि गुण, जो ( कारणम् ) कर्म का कारण होते हैं ( तु )
वे तो ( असमवायिनः ) समवायी गुण नहीं होते ॥ २४॥
अच्छा तौ गुण और कर्म निष्क्रिय सही, परन्तु दिशा और काल तौ
निष्क्रिय नहीं हो सकते क्योंकि उन में क्रिया देखी जाती है, जैसा कि पूर्व
दिशा में सूर्य उदय हो रहा है, पश्चिम में अस्त हो रहा है, दक्षिण में समुद्र
उमण्ड रहा है और उत्तर में झरने बह रहे हैं इत्यादि । क्या ये दिशाओं के
कर्म नहीं हुए ? इसी प्रकार-प्रातःकाल भ्रमण करता हूं, रात्रि में सोता हूं,
दिन में अनेक काम करता हूं, इत्यादि। क्या इस से काल में क्रिया नहीं सिद्ध
होती ? उत्तर-नहीं, क्योंकि-
२२५-गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २५ ॥

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पञ्चमाऽध्याय २ आन्हिक १०७
(गुणैः) गुणों से (दिक् ) दिशा का (व्याख्याता) व्याख्यान हो चुका ॥
जिस प्रकार अमूर्त्त होने से कर्मों का समवायी कारण गुण नहीं होते,
इसी प्रकार अमूर्त्त होने से पूर्वादि दिशाऐं भी सूर्योदयादि क्रियाओं का
समवायी कारण नहीं हैं किन्तु क्रियाओं का आधार होने से उपचार की
रीति पर उन में क्रिया कही जाती है, वास्तव में नहीं । जैसे 'चटाई पर
भोजन करता हूं' इस कथन में यद्यपि चटाई भोजन क्रिया का आधार है,
परन्तु समवायी कारण नहीं ॥ २५ ॥ तथा-
२२६-कारणेन कालः ॥ २६ ॥
(कारणेन) निमित्त कारण होने से (कालः) काल का व्याख्यान भी
हो चुका ॥
अर्थात जिस प्रकार वस्त्र की उत्पत्ति में सूत के डोरे तो समवायी कारण
हैं परन्तु तुरी वेमादि अथवा तन्तुवाय=जुलाहा समवायी कारण नहीं किन्तु
निमित्त कारण है, इसी प्रकार काल भी किसी क्रिया का समवायी कारण
नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इस लिये उस को सक्रिय नहीं कह सकते ॥२६॥
पञ्चमाध्याय के इस द्वितीय आन्हिक में पृथिवी आदि के कर्म और
प्रसङ्गवश अन्यद्वार का वर्णन किया गया ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
पञ्चमः कर्माध्यायश्च समाप्तः
॥ ५ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

ओ३म्
अथ षष्ठोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
इस वैशेषिकदर्शन में प्रथमाध्याय के तृतीय सूत्र में कहा गया था कि
'धर्म का प्रतिपादक होने से वेद को प्रामाणिकता है' इस लिये कर्म की
परीक्षा के पश्चात् वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये कहते हैं कि-
२२७-बुद्धिपूर्वा* वाक्यकृतिर्वेदे ॥ १ ॥
(वेदे) वेद में (वाक्यकृतिः) वाक्यरचना (बुद्धिपूर्वा) बुद्धिपूर्वक
है अर्थात् वेदों में कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जो बुद्धि के विपरीत हो, जैसा
कि मनुष्यों की वाक्यरचना में कभी २ हो जाता है ॥ १ ॥
२२८-ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ॥ २ ॥
(ब्राह्मणे) ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थ में (संज्ञाकर्म) संज्ञापूर्वक
कर्मानुष्ठान (सिद्धिलिङ्गम्) प्रथम सूत्रोक्त विषय की सिद्धि का चिन्ह है।
अर्थात् ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थों में वेदोक्त पदार्थों की संज्ञा जानकर जो
कर्मानुष्ठान बताया है वह कर्मानुष्ठान और उस का ठीक २ फल इस बात की
सिद्धि में पहचान है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है ॥ २ ॥ और भी-
२२९-बुद्धिपूर्वो ददातिः ॥ ३ ॥
(ददातिः) दानक्रिया (बुद्धिपूर्वः) बुद्धिपूर्वक पाई जाती है ॥
वेदों में जिस प्रकार दान का वर्णन है, उस से पाया जाता है कि वेदों
की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है। वेद के प्रकाशक ईश्वर ने उस को बुद्धिपूर्वक
प्रकाशित किया है। जैसेः-
दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धि-
रण्यम्। दक्षिणाऽन्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते
विजानन् ॥ ऋ० । १० । १०७ । ७ ॥

  • किसी २ पुस्तक में वाक्प्रकृति और किसी २ में वाक्कृति पाठ पाया
    जाता है, परन्तु अर्थ सब का एक है ॥

छष्ठाऽध्याय १ आन्हिक १८५
इस में वर्णन किया गया है कि दान करने से घोड़ा, गौ, आदि पशु,
चांदी सोना आदि रत्न और अन्न जिस से हमारा जीवन है, मिलता है।
इस लिये बुद्धिमान् मनुष्य दान=दक्षिणा को अपनी रक्षा के लिये कवचरूप
से धारण करता है ॥
यह समस्त सूक्त दान के माहात्म्य में कथन किया गया है, जिस के
पढ़ने से वेदों के प्रकाशक ईश्वर की चमत्कारिणी बुद्धिपूर्वक रचना का पता
लगता है ॥ ३ ॥ और-
२३०-तथा प्रतिग्रहः ॥ ४ ॥
(तथा) इसी प्रकार (प्रतिग्रहः) किये हुए दान को ग्रहण करने [का
वर्णन भी बुद्धिपूर्वक है ] ॥ ४ ॥
२३१-आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५ ॥
(आत्मान्तरगुणानाम्) अन्य आत्मा के गुणों को (आत्मान्तरे) अन्य
आत्मा में (अकारणत्वात्) कारण न होने से ॥
वेद में दान का फल दाता को और प्रतिग्रह का फल लेने वाले को
बतलाया गया है और यही बुद्धिपूर्वक है क्योंकि एक आत्मा के अनुष्ठान
किये हुये कर्म का फल दूसरे आत्मा को नहीं मिलना चाहिये किन्तु दाता
को दान का फल और प्रतिग्रहीता को ग्रहण का फल मिलना चाहिये क्योंकि
दाता दान क्रिया का कर्त्ता है और ग्रहीता ग्रहण क्रिया का कर्त्ता है ॥ ५ ॥
२३२-तद् दुष्टभोजने न विद्यते ॥ ६ ॥
(तत्) वह फल (दुष्टभोजने) दुष्टभोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥
यदि दाता दुष्टभोजन का दान करे और प्रतिग्रह लेने वाला दुष्ट अन्न
का भोजन करे तो वेद कहता है कि उन दोनों को शास्त्र में बताया फल
नहीं होगा ॥ ६ ॥ प्रश्न-दुष्टभोजन किसे कहते हैं ? उत्तर-
२३३-दुष्टं हिंसायाम् ॥ ७ ॥
(हिंसायाम्) हिंसा में (दुष्टम्) भोजन दुष्ट होता है ॥
किसी प्राणी को दुःख देकर वा मारकर जो भोजन सिद्ध किया जावे वा
जो भोजन दिया जावे वे दोनों भोजन दुष्ट हैं । चोरी से वा अन्याय से अथवा
सब से बड़े अन्याय=प्राण लेकर जो दाता दान करता है और जो प्रतिग्रहीता
उस दान को लेता है वे दोनों ही वेदोक्त फल नहीं पाते ॥ ७ ॥

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११० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२३४-तस्य सम्भिव्याहारतो दोषः ॥ ८ ॥
(तस्य) उस दुष्ट भोजन के (सम्भिव्याहारतः) खाने खिलाने से (दोषः)
[हिंसा का] दोष लगता है ॥
यद्यपि दाता ने स्वयं हिंसा न की हो और प्रतिग्रहीता ने भी स्वयम्
हिंसा न की हो किन्तु जिस हिंसाजनित भोजन को उन्होंने खिलाया
और खाया है, उस के खाने खिलाने से भी खाने और खिलाने वाले को वेद
में दोष बताया गया है ॥ ८ ॥ परन्तु-
२३५-तददुष्टे न विद्यते ॥ ९ ॥
(तत्) वह दोष (अदुष्टे) निर्दोष भोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥
जो भोजन हिंसादिदोषरहित है, उस में खाने खिलाने वालों को वेद
में दोष नहीं बतलाया गया ॥ ९ ॥
२३६-पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १० ॥
(पुनः) फिर (विशिष्टे) उत्तम सात्त्विक भोजन में (प्रवृत्तिः) खाने
खिलाने की प्रवृत्ति करनी विहित है ॥
दुष्ट भोजन को त्यागकर श्रेष्ठ भोजन देना कहा है ॥ १० ॥
२३७-समे हीने वा प्रवृत्तिः ॥ ११ ॥
(वा) अथवा (समे) साधारण भोजन में (हीने) घृत दुग्धादि उत्तम गुण-
कारक द्रव्यों से रहित भोजन में भी (प्रवृत्तिः) दान की प्रवृत्ति [विहित] है॥११॥
२३८-एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः
परस्वादानं व्याख्यातम् ॥ १२ ॥
(एतेन) इस से (व्याख्यातम्) व्याख्यात समझना चाहिये कि (हीन,
सम, विशिष्ट धार्मिकेभ्यः) अधम, मध्यम और उत्तम धार्मिक पुरुषों से (पर-
स्वादानम्) परधन का ग्रहण करना विहित है ॥
अर्थात् हिंसादि दुष्ट कर्मों से रहित धार्मिक पुरुषों से प्रतिग्रह लेना
चाहिये, चाहे वे उत्तम, मध्यम, अधम किसी कक्षा के धार्मिक हों किन्तु हिंसक
पापी न हों ॥ १२ ॥ और-
२३९-तथा विरुद्धानां त्यागः ॥ १३ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.