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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग १०: दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्

दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्
दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम् ।
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्त ॐ* ॥१॥
दृशीति—जो दृशिस्वरूप ( चेतनस्वरूप ); आकाश जैसा व्यापक है, इन्द्रियादि से परे है, नित्य प्रकाशमान
है, अजन्मा है, एक है, अविनाशी है, असंग है, सर्वगत और अद्वितीय है—वही 'मैं' हूँ । अतः सदा मुक्त हूँ, ॐ ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व प्रकरण में आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता को युक्ति से सिद्ध किया था, अब इस प्रकरण में उसी को
अनुभव के द्वारा प्रकट करते हुए अविषय प्रत्यगात्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) निर्विषय ही होता है, यह बताया जा रहा
है । एक बार में ही स्फुरित होनेवाला अर्थात् स्पष्टरूप से भासमान जो अक्षर ब्रह्म है, वही 'मैं' सदा से हूँ, अतः मैं
विमुक्त हूँ । गुरु के द्वारा शिष्य को बताया हुआ जो आत्मस्वरूप है, उसे 'मुमुक्षु शिष्य ने अच्छी तरह समझ लिया है'
यह ॐ कार के द्वारा सूचित किया है। एवंच 'ॐ' शब्द स्वीकृति का सूचक है । अथवा आत्मा का उक्त स्वरूप ॐ
कार द्वारा मुमुक्षुओं की बुद्धि में अभिव्यक्त होता है—यह बताने के लिए ॐ का निर्देश किया है ॥ १ ॥
दृशिस्तु शुद्धोऽहमविक्रियात्मको न मेऽस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः ।
पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः +सम्पूर्णभूमा त्वज आत्मनि स्थितः ॥२॥
दृशिस्त्विति—मैं तो ज्ञानस्वरूप ( दृशिः) हूँ, अतएव शुद्ध हूँ, निर्विकार हूँ, वस्तुतः मेरा कोई विषय नहीं
है। मैं आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सभी ओर परिपूर्ण व्यापक रूप हूँ । मैं अजन्मा हूँ, और अपने स्वरूप में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'दृशि' (ज्ञानस्वरूप चेतन) को आकाश के समान अलेपक कहा गया था, किन्तु वह संगत नहीं प्रतीत हो
रहा है, क्योंकि दृशि का दृश्य के साथ सम्बन्ध रहने से उसमें अशुद्धि और विक्रिया (विकार) होना निश्चित है। किन्तु
इस आशंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है कि 'दृशि' तो आत्मस्वरूप है, उसके नित्य शुद्धत्व आदि
का निश्चय श्रुति ने ही कर दिया है । भगवती श्रुति ने क्या बताया है, उसे बताते हैं—मैं तो दृशि अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ,
अतः वस्तुतः (परमार्थतः) शुद्ध हूँ, क्योंकि अशुद्धि तो अज्ञान से होती है अर्थात् वह तो अज्ञाननिबन्धन है, और अज्ञान,
आभासरूप है यह हमें' मन्त्रवर्ण से ज्ञात होता है। दूसरा कारण यह है कि वह (आत्मा) विक्रियात्मक (विकाररूप)
प्राणादिकों से अन्य (अतिरिक्त) है, अर्थात् अविक्रियात्मक है । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी कहा है२ । अतः इसकी
(आत्मा की) शुद्धता में कोई किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। परमार्थतः (स्वभावतः) आत्मा के साथ विषय का भी
सम्बन्ध (विषयसंसर्ग) नहीं है, इस कथन से यह ज्ञात होता है कि विकार के हेतुभूत विषयों के न होने से भी वह
(आत्मा) अविक्रिय (विकाररहित) है। श्रुति३ ने भी इसी अभिप्राय का समर्थन किया है। विषय के न होने से उस
आत्मा की अद्वयरूपता को छान्दोग्य के भूमवाक्यांश में इस प्रकार कहा है४—आत्मा का स्वरूपावस्थान किसी के
अधीन नहीं है अर्थात् स्वतंत्र है, ऐसा उपन्यास (आरंभ) करके उसी के उपपादनार्थ यह बताया कि पूर्वादि विभाग

  • शिवगीता—१।७ से तुलना की जा सकती है ।
    † सुपर्ण०—पाठः मुक्ति० उप० (२।७४)
    १. 'शुद्धमपापविद्धम्'—( ई. उ. ८ )
    २. 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः'—( मुं. उ. २।१।२ ), तथा 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्'—( बृ. उ. ३।८।८ )
    ३. 'न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन'—( छां उ. ७।२४।१ )
    ४. 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नि ।'—( छां. उ. ७।२५।२ )
    ६

४२ उपदेशसाहस्री
तथा अधरोत्तरादि भेद से जो भी उपलब्ध हो रहा है, वह सब 'भूमा' ही है। तब यह शंका हो सकती है कि देह से
लेकर बुद्धि तक जो भी अहंकारास्पद है, वह 'भूमा' (ब्रह्म) से भिन्न है। किन्तु इस शंका का समाधान बीच में ही
कर दिया कि अहंबुद्धिग्राह्य भी 'भूमा' ही है। इदम्-अनिदम् जो भी है, वह सब भूमा ही है, उसके अतिरिक्त कुछ
नहीं है। जब भूमा से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब भेदक के न रहने से 'प्रत्यगात्मा' ही भूमा है, इस रीति से 'आत्मै-
वेदं सर्वम्'१ यहाँ तक के अंशद्वारा छान्दोग्य में सम्पूर्ण को भूमा ही बताया गया है। मैं अपनी महिमा में (आत्मा में)
ही स्थित रहता हूँ अर्थात् किसी अन्य के अधीन नहीं हूँ, अतः 'मैं' अज (आविर्भावरहित) हूँ ॥ २ ॥
अजोऽमरश्चैव तथाऽजरोऽमृतः स्वयंंप्रभः सर्वगतोऽहमद्वयः ।
न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥३॥
अज इति—मैं जन्म रहित ( अजन्मा ), अमर, अजर, अमृत, स्वयम्प्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय हूँ। मैं
किसी का कारण नहीं हूँ और किसी का कार्य भी नहीं हूँ, अपितु अत्यन्त निर्मल और सर्वदा एकमात्र निजानन्द से ही
तृप्त हूँ, अतः मैं मुक्त हूँ, ॐ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को अज (जन्मरहित) बताया गया है, तथापि उसे जरा आदि अन्य विकार हो सकते हैं। इस
आशंका के समाधानार्थ अनेक श्रुतियों के सहारे ग्रन्थकार ने उसे कूटस्थ, अद्वयस्वरूप बताया है। अत एव उसमें
जन्म, जरा आदि कोई विकार नहीं हो पाते। उसकी अजता, अमरता, अजरता, अमृतता, स्वयम्प्रकाशता, सर्वगतता
और अद्वयता इन सबके मूल में श्रुतियां हैं२ । इन श्रुतियों के निर्मल, एकतृप्त और विमुक्त आदि अर्थ को ग्रन्थकार
ने श्लोक के३ उत्तरार्ध में ग्रथित कर दिया है। वह प्रत्यगात्मा सदा निर्मल है, सदा एकतृप्त है और सदा विमुक्त है।
आचार्य के द्वारा जो मेरा स्वरूप बताया गया, वह ठीक वैसा ही है, ऐसी स्वीकृति 'ॐ' कहकर शिष्य दे रहा है ॥ ३ ॥
सुषुप्तजाग्रत्स्वपतश्च दर्शनं न मेऽस्ति किञ्चित्तु मतेर्हि मोहनम् ।
स्वतश्च तेषां परतोऽप्यसत्वतस्तुरीय एवास्मि सदादृगद्वयः ॥४॥
सुषुप्तेति—सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न इन तीनों अवस्थाओं में रहते हुए भी मेरा अपना कोई व्यावहारिक दर्शन
नहीं है, अर्थात् तीनों ही अवस्थाओं में मैं किसी दृश्य को प्रकाशित नहीं करता। 'मैं दृश्य को प्रकाशित कर रहा हूँ'—
यह तो केवल मोहमात्र है, क्योंकि उन दृश्य पदार्थों की स्वतः या परतः किसी प्रकार की भी सत्ता नहीं है। अतः 'मैं'
सदा ही साक्षीस्वरूप अद्वितीय तुरीय ही हूँ ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह दृशित्वरूप आत्मा सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न तीनों अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से जब कि प्रतीत
होता रहता है, तब उसे विकाररहित कैसे कहा जा सकता है ? इस शंका का समाधान यह है कि तीनों अवस्थाओं के
१. 'आत्मैवेदं सर्वम्'—( छां. उ. ७।२५।२ )
२. 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः'—(कठ. उ. २।२८), 'स वा एष महानज आत्मा'—(बृ. उ. ४।४।२२), 'अजरोऽमरोऽमृतोऽभयो
ब्रह्म'—( बृ. उ. ४।४।२५ ), 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ), 'तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः'—( मुं. उ.
१।१।६), 'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्'—( मुं. उ. २।२।९ ), 'एको देवः'—( श्वे. उ. ६।११ ), 'एकमेवाद्वितीयम्'—
( छां. उ. ६।२।१) 'तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्'—( बृ. उ. २।५।१९ )
३. 'न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥ ३ ॥
निर्मलः—'निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'—( मु० उ० ३।१।३ )
एकतृप्तः—'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन'—( तै. उ. २।९ )
अमृत—'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति'—( मुं. उ. २।२।७ )
विमुक्त—'विमुक्तश्च विमुच्यते'—( कठ. उ. ५।१ )

दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४३
साक्षी के रूप में रहने वाले मेरी ( मुझ आत्मा की ) अपनी-सी ( आत्मीय-सी ) या मेरे स्वरूप जैसी ( आत्मीयमिव
या स्वरूपभूतमिव ) व्यावहारिक वस्तु कोई भी नहीं दिखाई देती । फिर भी व्यवहार में ( जाग्रत् आदि अवस्था में )
जो वस्तु मेरी आत्मीय-सी या मत्स्वरूप-सी प्रतीत होती रहती है, वह सब अविद्या ( अविवेक या मोहन ) से आरोपित
( अध्यारोपित ) है । क्योंकि जाग्रदादि अवस्थारूप या जाग्रदादि अवस्थाओं में दिखाई देनेवाली वस्तुओं की सत्ता न
स्वतः है और न परतः ही है । अर्थात् उन वस्तुओं की सत्ता ( सत्त्व ) और उनका स्फुरण स्वयं हो नहीं सकता ( अन्य-
निरपेक्ष सत्त्व संभव नहीं ), वह तो आगमापायी ( उत्पाद-विनाशशील ) है, अतः रज्जु-सर्प की तरह उसे ( सत्ता-
स्फुरण को ) आरोपित ही समझना होगा । दृश्य वस्तुओं की सत्ता और स्फुरण को परतः भी नहीं कह सकते, क्योंकि
इन जड़ (दृश्य) वस्तुओं से 'पर' एकमात्र 'चैतन्य' को ही कहना होगा । तब उस चैतन्य के रूप में इन वस्तुओं की सत्ता
और स्फूर्ति तो हो नहीं सकती, क्योंकि दोनों के स्वभाव परस्परविरुद्ध हैं, अर्थात् 'चैतन्य' प्रत्यक् है और 'जड़ वस्तु'
पराक् है । इस प्रकार विरुद्ध स्वभाव वालों का तादात्म्य (एकाकार) होना कभी संभव ही नहीं है । उनका तादात्म्य
समझना केवल भ्रम ही है । सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में भासित होने वाले प्राज्ञ, तैजस और विश्व ये
मत्स्वरूपभूत (मेरे स्वरूप) नहीं हैं । मेरा स्वरूप तो 'तुरीय' है, क्योंकि विश्वादि तीनों की अपेक्षा परे (अतिरिक्त) हूँ,
इसीलिये मुझे 'तुरीय, (चतुर्थ) कहते हैं । विश्व आदि तो केवल अपनी-अपनी अवस्थाओं के द्रष्टा (दर्शक) हैं, और 'मैं'
सभी अवस्थाओं का द्रष्टा हूँ, इसलिये उनसे अतिरिक्त हूँ । स्थूल-सूक्ष्म के क्रम से विचारने पर विश्व आदि के तीनों
स्थानों को भी पार करके यह रहता है इसीलिये इसे 'तुरीय' शब्द से कहा गया है । वस्तुतः इसमें 'तुरीयत्व' नहीं है,
अर्थात् इसके अतिरिक्त तीन हैं, उनके अनन्तर होने से यह चौथा (तुरीय) है, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि इसे
'अद्वय' कहते हैं, अर्थात् यह 'आत्मा' सदा निर्विशेष ही है ॥ ४ ॥
शरीरबुद्धीन्द्रियदुःख१ सन्ततिर्न मे न चाहं मम निर्विकारतः ।
असत्वहेतोश्च तथैव सन्ततेरसत्त्वमस्याः स्वप्नतो हि दृश्यवत् ॥५॥
शरीरेति— शरीर, बुद्धि, इन्द्रिय और दुःखपरम्परा (दुःखसन्तति ) का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है, और न मैं
तत्स्वरूप हूँ, क्योंकि मैं विकाररहित (निर्विकार) हूँ । वह दुःखपरम्परा तो सोये हुए मनुष्य के स्वप्नजनित दृश्य के
समान है । जैसे स्वप्नजनित दृश्य की कोई सत्ता नहीं, वैसे ही शरीरादि दुःखपरम्परा की भी कोई सत्ता नहीं है । अतः
उसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में आत्मा की निर्विशेषता को 'अद्वय' शब्द से बताया गया था, किन्तु वह संगत नहीं हो पा
रहा है, क्योंकि उससे शरीर आदि का सम्बन्ध सबके प्रत्यक्ष है । इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा कर रहे
हैं । वास्तव में यह शरीरादि परंपरा (सन्तति) न मत्स्वरूप है और न मेरी ही है । अर्थात् ये सब न मुझ आत्मा के
धर्म हैं और न ये मत्स्वरूप (आत्मस्वरूप) ही हैं । क्योंकि मैं तो निर्विकार (विकार रहित) हूँ । अविक्रिय (विकाररहित)
वस्तु, आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) शरीरादि के रूप में परिणत या उससे सम्बद्ध नहीं हुआ करती, जिससे उन
जड़ वस्तुओं में तत्स्वरूपता (आत्मस्वरूपता) या तद्धर्मता (आत्मधर्मता) हो सके । इन जड़ वस्तुओं की पारमार्थिक
(वास्तविक) सत्ता न हो सकने में एक अन्य हेतु भी है—स्वप्नावस्था के दृश्य के समान यह शरीरादि परम्परा भी
दृश्य है । अतः स्वप्नदृश्य जैसे मिथ्या, वैसे ही यह शरीर-परम्परा भी मिथ्या समझनी चाहिये ॥ ५ ॥
इदं तु सत्यं मम नास्ति विक्रिया विकारहेतुर्न हि मेऽद्वयत्वतः ।
न पुण्यपापे न च मोक्षबन्धने न चास्ति वर्णाश्रमतोऽशरीरतः ॥६॥
इदमिति—यह तो सत्य ही है कि अद्वितीय होने के कारण मुझमें विकार नहीं है, न विकार का कारण ही
है, तथा शरीर-रहित होने के कारण मुझमें पुण्य-पाप, मोक्ष-बन्ध तथा वर्णाश्रमधर्म भी नहीं है ॥ ६ ॥
१. सन्ततेर्न ०— पाठांतरम् ।

४४ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
शरीरादि परम्परा दृश्य होने से यदि मिथ्या है, तो आत्मा की शुद्धता, अविक्रियता (निर्विशेषता) भी
दृश्य होने के कारण मिथ्या क्यों नहीं है? इसके उत्तर में यह कहा जा रहा है कि मुझमें न विकार (विक्रिया) है
और न विकारहेतु ही है, क्योंकि मुझे 'अद्वय' कहा गया है, अद्वय (द्वयाभाव) होने के कारण ही 'स्वतः या परतः
मुझमें विकार नहीं है' यह कहना यथार्थ ही है। तात्पर्य यह है, कि शंका करने वाले ने आत्मा के शुद्धत्व, अवि-
क्रियत्वादि को मिथ्या सिद्ध करने के लिये जो अनुमान¹ किया है, उसमें 'दृश्यत्व' हेतु ही 'असिद्धि' दोष से युक्त होने
से (वह) असद्धेतु है। उस असद्धेतु से आत्मा के शुद्धत्व, अविक्रियत्वादि में मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो सकती।
क्योंकि आत्मा के विक्रियाभावाद्युपलक्षित स्वरूप में ही अविक्रिय कहने का तात्पर्य है। अतः उसके शुद्धत्वादि में
मिथ्यात्व की आशंका करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता है। यदि कहें कि उसमें विकार न होने पर भी विकार-
हेतुभूत कर्म, उनके फल, उनका ध्वंस, और कर्मादि साधनों के रहने से उसकी अद्वयता कैसे हो सकती है? इस का
उत्तर यह है कि वह (आत्मा) अशरीरी (शरीररहित) होने से उसे पुण्य, पाप, मोक्ष, बन्ध, वर्ण-आश्रम के धर्म आदि
कुछ नहीं हैं। अतः उसमें जैसे विकार नहीं है, वैसे ही विकार के हेतु कर्मादि भी नहीं हैं, इसलिये उसके शुद्धत्व,
अद्वयत्व में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥
अनादितो निर्गुणतो न कर्म मे फलं च तस्मात् परमोऽहमद्वयः ।
यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते तथा ह्यहं देहगतोऽपि सूक्ष्मतः ॥७॥
अनादित इति—मैं अनादि और निर्गुण हूँ, इस कारण मेरा कोई कर्म या कर्मफल भी नहीं है, इसलिये मैं
सर्वोत्कृष्ट और अद्वितीय हूँ। जैसे गगन (आकाश) सर्वव्यापक (सर्वगत विभु) होने पर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं
होता, वैसे ही अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं, देह (शरीर) में व्याप्त होने पर भी उससे लिप्त नहीं हूँ ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि आत्मा शरीरोपादान और तद्धर्मक होने से शरीरवान् (शरीरी) नहीं है तथापि उसका शरीर
के साथ 'उपलक्ष्य-उपलम्भकभावरूप सम्बन्ध' तो है ही। तब उसे (आत्मा को) 'अशरीर' (शरीररहित) कैसे कह
सकते हैं ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, केवल सम्बन्ध को देखकर सशरीर मान लेने पर भी कर्म आदि से उसका
सम्बन्ध कहना ठीक नहीं है। इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर पूर्व श्लोक में कहे गये पुण्य-पापादि सम्बन्धराहित्य
को ही विस्तार से बता रहे हैं। जो कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) रहता है, वह सादि (आदिमान्) होता देखा गया है,
जैसे रथ, शरीर आदि। इस व्याप्ति (नियम) का परमाणु और मन में यदि व्यभिचार कहें तो ठीक नहीं है, क्योंकि
'मन' की उत्पत्ति श्रुत है। और परमाणु तो कतिपय लोगों के द्वारा कल्पित मात्र है, हम उन्हें नहीं मानते। तथा जो
कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) होता है, वह सगुण रहता देखा गया है, जैसे रथ, शरीर आदि। अर्थात् 'यत्र यत्र
क्रियावत्त्वं तत्र तत्र सगुणत्वं सादित्वं च' इस व्याप्ति के अनुसार 'क्रियावत्त्व' व्याप्य है और 'सगुणत्व,
सादित्व' व्यापक है। एवं च प्रत्यगात्मा से व्यावृत होने वाला व्यापक सगुणत्व, सादित्व अपने व्याप्य क्रियावत्त्व को
लेकर (व्याप्य क्रियावत्त्व के साथ) ही उस आत्मा से निवृत्त होता है। इस प्रकार आत्मा में क्रियावत्त्व के न होने से
तत्साध्य पुण्य-पापादि का होना भी असंभव है। अतः आत्मा पुण्य-पाप से रहित है। इसीलिये श्लोक में कहा गया
है कि मुझसे पुण्यादिरूप कर्म और तत्साध्य (उससे होनेवाले) सुखादि फल का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कारण मैं
संसारियों से विलक्षण, उत्तम (परम), अद्वय, निर्विशेष हूँ। क्रियावत्त्व न होने से तत्साध्य पुण्यादि का भी असंभव है,
यही अविद्याकल्पित अन्य संसारियों से मेरी विलक्षणता है। मैं देह में उपलभ्यमान रहने पर भी सूक्ष्म (अमूर्त) हूँ,
१. आत्मनः शुद्धत्वाविक्रियत्वादिकं मिथ्या दृश्यत्वात् शरीरादिसन्ततिवत् ।'
२. 'अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥-(भ. गी. १३।३१-३२)

दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४५
इस कारण मैं किसी से लिप्त नहीं हो पाता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि "मैं परमात्मा अनादि
तथा निर्गुण होने से 'अव्यय' हूँ । हे कौन्तेय ! मैं शरीरस्थ होता हुआ भी न कुछ करता हूँ और न किसी से लिप्त होता
हूँ । जैसे सर्वव्यापक आकाश सूक्ष्म होने से किसी से लिप्त नहीं हो पाता, उसी तरह यह आत्मा (परमात्मा) शरीर
में सर्वत्र रहता हुआ भी किसी से लिप्त नहीं हो पाता' ।।'' अर्थात् माया के द्वारा उपस्थित देहों में अनुप्रविष्ट रहने
पर भी मैं उनके दोषों से दूषित नहीं हो पाता ।। ७ ।।
सदा च भूतेषु समोऽहमीश्वरः क्षराक्षराभ्यां परमो ह्यथोत्तमः ।
परात्मतत्त्वं* च तथाऽद्वयोऽपि सन् विपर्ययेणाभि†मतस्त्वविद्यया ॥८॥
सदेति-मैं सम्पूर्ण भूतों में समान भाव से स्थित ईश्वर हूँ, मैं कार्य-कारण भाव से अलग (अतिरिक्त) हूँ।
तथा उसका अधिष्ठान रहने से उनकी अपेक्षा मैं उत्कृष्ट हूँ, तथा मैं परमात्मतत्त्व और अद्वितीय होनेपर भी अविद्या के
कारण विपरीत ( अन्यथा) रूप से समझा जाता हूँ ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मोपलब्धि के अधिष्ठानस्वरूप देहादिकों की विषमता सबके प्रत्यक्ष है, ऐसे विषम देहों में प्रविष्ट हुए
आत्मा की उपलब्धि होती है। अतः उस उपलभ्यमान आत्मा में भी देहादिकृत वैषम्य का होना संभव है, ऐसी स्थिति
में कैसे उसका परमात्मत्व और कैसी उसकी परिपूर्णता ? किन्तु तारतम्य (वैषम्य) का यह प्रतिभास अविद्या का
विलास मात्र है, वास्तविक नहीं है। देह में उसका अनुप्रवेश व्यवहार की दृष्टि में है, वस्तुतः नहीं है। 'आत्मा' को
ईश्वर कहा गया है, इससे यह सूचित होता है कि वह उपाधि के परवश ( परतन्त्र) नहीं है। अतः उसमें (आत्मा में)
देहादिकृत वैषम्य नहीं है। आत्मा को 'ईश्वर' (नियामक) कहनेपर उसे ईशितव्य (नियम्य) की अपेक्षा अवश्य
रहेगी, उसके बिना उसमें ईश्वरत्व (नियामकत्व) कैसे बन सकेगा ? अर्थात् उसे अद्वय कहना ठीक नहीं, वह तो
सद्वय है। किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि वह तो क्षर-अक्षर (कार्य-कारण) से परम (व्यतिरिक्त) है इसी कारण
उसे 'उत्तम' (उत्कृष्ट) कहते हैं। अतः उसकी अद्वयता सुरक्षित है। और उसका ईश्वरत्व भी उचित है। 'क्षर' का
अर्थ कार्यवर्ग है क्योंकि 'क्षरति नश्यति इति क्षरः' यह 'क्षर' शब्द का निर्वचन है। और 'अक्षर' का अर्थ कारण है।
अर्थात् माया से युक्त (शबलित) चिद्वस्तु, उन दोनों से यह आत्मा परम (व्यतिरिक्त) है, अर्थात् कार्यकारणादि की
भेदकल्पना का यह अधिष्ठानस्वरूप है। इसीलिये इसे (आत्मा को) पुरुषोत्तम कहते हैं। अतः आत्मा का 'ईश्वरत्व'
भी समुचित है। उसके ईश्वरत्व में और अद्वयता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। वह 'उत्तम' है, उसी कारण
अन्य आत्माओं का स्वरूप (तत्त्व) भी यानी परमात्मतत्त्व भी वही है, अर्थात् 'मैं' ही सर्वात्मा हूँ, यह समझना
चाहिये। इस प्रकार वह सर्वात्मा होनेपर भी उसके स्वरूप का विपरीत भान (विपरीतस्वरूपप्रतिभास) जो हो रहा
है, वह विपर्यय (मिथ्याज्ञान) से अर्थात् तत्कारणीभूत अविद्या से अवच्छिन्न (युक्त) होने के कारण उसके वास्तविक
रूप का ज्ञान नहीं हो पाता। भगवदुक्ति से भी उपर्युक्त अभिप्राय का समर्थन हो जाता है-भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने
कहा है१ कि 'इस लोक में क्षर और अक्षर नामके दो ही पुरुष हैं, उनमें समस्त भूत 'क्षर' हैं, और कूटस्थ 'अक्षर' है।
इन दोनों से उपाधिरहित उत्तम पुरुष 'अन्य' ही है, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो अव्यय (अविनाशी) ईश्वर है,
१. "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥" ( १५।१६-१८)

  • तत्त्वञ्च०-पाठान्तरम् ।
    † भिभूत०-पाठान्तरम् ।

४६ उपदेशसाहस्री
वही तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर उनका भरण (धारण) करता है। मैंने क्षर का (विनाशी मायामय संसार का)
अतिक्रमण किया है और अक्षर से (संसारबीज अव्यक्त से) मैं उत्तम हूँ, इस कारण मैं लोक और वेद में 'पुरुषोत्तम'
नाम से प्रसिद्ध हूँ॥ ८ ॥
अविद्यया भावनया च कर्मभिर्विविक्त आत्माऽव्यवधिः सुनिर्मलः।
दृगादि शक्ति प्रचितोऽहमद्वयः स्थितः स्वरूपे गगनं यथाऽचलम् ॥९॥
अविद्ययेति—अविद्या, भावना और कर्मों से असंग आत्मा का कोई व्यवधान नहीं है, इस कारण वह निर्मल
है। अविद्या से अध्यस्त हुए अन्तःकरण की परिणामरूप दृगादि शक्तियों के संबंध से ही उसमें द्रष्टृत्वादि व्यवहार किया
जाता है। वास्तव में तो मैं अद्वितीय हूँ, और आकाश के समान अचल (स्थिर) भाव से अपने स्वरूप में स्थित हूँ॥ ९॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि अविद्यामूलक मिथ्या ज्ञान से आत्मा आवृत है, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अवश्य रहेगा। किन्तु
यह कहना उचित नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' तो चित्प्रकाश है, यह बात श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण और तर्क से
भी सिद्ध है। अविद्या जड़ (अप्रकाशात्मिका) है। अतः दोनों का स्वभाव अत्यन्त परस्परविरुद्ध है। इस कारण दोनों
का सम्बन्ध परमार्थतः होना तो दुर्घट ही है। ऐसी स्थिति में अविद्या का आश्रय अनवच्छिन्न चैतन्य तो हो नहीं
सकता। यदि यह न माना जाय तो अणुमात्र का भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। किसी से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के भाग-
विशेष को अविद्या का आश्रय कहें तो अविद्या के अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है, जिसकी कल्पना की जाय, तथा प्रमाण
रहित कोई कल्पना नहीं की जाती। अतः अविद्या के अतिरिक्त अन्य किसी का व्यवधान न होने से दिवान्ध व्यक्ति
के द्वारा दिन में कल्पित अन्धकार के समान आत्मा में अविद्या की कल्पना की जाती है। अविद्या का अर्थ 'मूलाज्ञान'
है, तथा भावना का अर्थ अविद्याकृत देहाभिमान और अभिमान पूर्वक किये जाने वाले पुण्य-पापलक्षण (रूप) ही
कर्म हैं। इन अविद्या, भावना और कर्म के स्पर्श से रहित (विविक्त) यह आत्मा है, क्योंकि वह व्यवधानरहित
(अव्यवधि, आच्छादकरहित) है, इसी कारण वह 'सुनिर्मल' (समस्त आशंकित दोषों से रहित) है। ऐसे आत्मा में
द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा का व्यवहार कैसे किया जाता है ? यह व्यवहार तो अविद्या के द्वारा अध्यस्त अन्तःकरण-
परिमाणरूप दृगादि शक्ति के सम्बन्ध से ही होता है। अर्थात् वास्तव में न वह द्रष्टा, है, न मन्ता है, न श्रोता है,
न बोद्धा है, तथापि उसमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा होने-का-सा आभास होता है। क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा
उत्पन्न होनेवाली दर्शन-श्रवणादिशक्तिरूप बुद्धिवृत्तियों से उपचित (प्रचित) हुए की तरह मैं रहता हूँ, अतः उनसे
सम्बद्ध हुआ-सा प्रतीत होता हूँ, वस्तुतः वैसा नहीं हूँ॥ ९ ॥
अहं परं ब्रह्म विनिश्चयात्मदृङ् न जायते भूय इति श्रुतेर्वचः।
न चैव बीजेऽप्यसति* प्रजायते फलं न जन्मास्ति मतो ह्यमोहता ॥१०॥
अहमिति—'मैं परब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चयात्मक आत्मज्ञान जिसे हो जाता है, उसका पुनः जन्म नहीं होता,
ऐसा श्रुतिवचन है। बीज के न रहने पर फल उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार चूंकि अज्ञान नहीं रहा, इसलिये
जन्म भी नहीं होता ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार प्रत्यगात्मतत्त्व का परिज्ञान होने पर पुनरावृत्तिरहित कैवल्यफल की प्राप्ति होती है, ऐसा
श्रुति वचन है¹। इसी श्रुतिसिद्ध बात को युक्ति से भी बताते हैं कि 'बीज के न रहने पर फल भी नहीं होता'। इसी
१. 'स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते'— ( कठ. उ. ३।८ )
'पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः'— ( कठ. उ. ३।११ )
'अथ सोऽभयं गतो भवति'— ( तै. उ. २।७ ), 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'— ( बृ. उ. ३।२।९ )

  • जे त्वसति०—पाठान्तरम् ।

दृशिश्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४७
सामान्य नियम के अनुसार चूंकि ब्रह्मात्मज्ञान होने से मोहराहित्य (अमोहता अर्थात् मूलभूत मोह का अभाव) होता
है, उस कारण मोहमूलक जन्मादिलक्षणविचित्र संसार भी नहीं होता । क्योंकि जन्मादिविकार मोहपदवाच्य
अविद्यामूलक हैं। जब मूलभूत अविद्या ही नहीं रहेगी, तब तत्कार्यभूत जन्मादि विकार भी नहीं होगा ॥ १० ॥
ममेदमित्थं च तथेदमीदृशं तथाहमेवं न परो न वान्यथा ।
विमूढतैवँ न जनस्य कल्पना सदा समे ब्रह्मणि चाद्वये शिवे ॥११॥
ममेति—मेरा यह शरीर ऐसा ( सुन्दर या असुन्दर ) है, यह शरीर इस प्रकार का ( स्थूल या सूक्ष्म ) है,
मैं ऐसा (स्थूल या सूक्ष्म) हूँ, तथा अन्य पुरुष ऐसा (हृष्ट-पुष्ट) नहीं है, ऐसी कल्पना करते रहना लोगों की मूर्खता ही है,
क्योंकि सदा समानरूप से स्थित, अद्वितीय शिवस्वरूप ब्रह्म में इन कल्पनाओं के लिये स्थान नहीं है ॥ ११ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ब्रह्मात्मज्ञान होने पर मोहनिवृत्ति होती है, और मोहनिवृत्ति होने पर मोहकार्यरूप संसार की
निवृत्ति होती है, यह बता चुके । अब मोहकार्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पहिले तो दोनों देहों (सूक्ष्म-स्थूल) का
अहंकार, तदनन्तर बाह्य वस्तुओं (पदार्थों) की कल्पना, तदनन्तर शोभनादि का अध्यास, तदनन्तर यह मेरा, वह
ऐसा (इस प्रकार का) है, उसी प्रकार यह मेरा नहीं, इत्यादि कल्पना, उसी तरह दूसरा भी इसी प्रकार का है, या इस
प्रकार का नहीं है, अन्य प्रकार का है, या अन्य प्रकार का नहीं है, या यह मेरी या दूसरे की मूढ़ता है या सुज्ञता है—
ये सब, अनादि-अज्ञान ( अविद्या ) से तिरोहित आत्मस्वरूप वाले मनुष्य को जन्मादि का सम्बन्ध होने पर
जो कल्पनाएँ हुआ करती हैं, वे कल्पनाएँ सदा समान परमानन्दरूप शिव अद्वय ब्रह्म में कभी नहीं हुआ करतीं ।
एवंच यह विचित्र संसार अज्ञान का कार्य है ॥ ११ ॥
यदद्वयं ज्ञानमतीव निर्मलं महात्मनां तत्र न शोकमोहता ।
तयोरभावे न हि जन्म* कर्म वा भवेद्द्वयं वेदविदां विनिश्चयः ॥१२॥
यदिति—अत्यन्त निर्मल अद्वितीय ( अद्वय ) ज्ञान के उत्पन्न होनेपर महात्माओं ( महान् आत्माओं ) को
शोक-मोह नहीं हुआ करते, और शोक-मोह के न होनेपर कर्म या जन्म नहीं होते –यह वेदवेत्ताओं का निर्णय है ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मतत्त्व का ज्ञान होनेपर अज्ञान की निवृत्ति होती है। उससे इस विचित्र संसार की निवृत्ति हो जाती है,
इसीको और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। अद्वयात्माकार ( अद्वय ) तथा असंभावना-विपरीतभावनादिप्रतिबन्ध से शून्य
( अतीव निर्मल ) ज्ञान के उदित होनेपर ब्रह्मभूत महात्माओं को शोक-मोहता संसारित्व नहीं रहता१। उन शोक-मोह
के अभाव में ( न रहनेपर ) तदुपलक्षित ( उनके द्वारा सूचित ) उन शोक-मोह के कारणभूत अज्ञान की निवृत्ति होने-
पर 'बीजाभावे फलाभावः' नियम के अनुसार जन्म-मरण पुनः नहीं हो सकते, यह वेदार्थज्ञ विद्वानों का निश्चय है ।
यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है२ ॥ १२ ॥
सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं तु पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः ।
तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः ॥१३॥
सुषुप्तवदिति—आत्मा के अद्वितीयत्व का निश्चय हो जाने के कारण जो मनुष्य सुषुप्त ( सोये हुए ) पुरुष के
समान जाग्रत् अवस्था में भी द्वैत का अनुभव नहीं करता तथा जो सब कुछ करते हुए भी निष्क्रिय रहता है, वही आत्मज्ञ है,
अन्य कोई नहीं—यही वेदान्तशास्त्र का निर्णय ( निश्चय ) है ॥ १३ ॥
१. 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः'—( ई. उ. ७),
२. 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' ॥ ( मुं. उ. २।२।८ )

  • कर्म जन्म०—पाठान्तरम् ।

४८ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि शास्त्र के अनुसार आत्मविद् (आत्मज्ञ) की मुक्ति बताई गई। अब
आत्मवित् के स्वरूप को बता रहे हैं—द्वैत का बाध हो जाने के कारण जाग्रत् अवस्था में अपने पूर्व संस्कार (वासना)
वश द्वैत प्रपञ्च को देखता हुआ भी (उल्लेख करता हुआ भी) विशेष रूप से (आसक्ति से) उसे नहीं देखता, किन्तु
सुषुप्त पुरुष की तरह विलीन प्रपञ्चवाले प्रत्यगात्मस्वरूप में ही उस द्वैत प्रपञ्च को देखता रहता है अर्थात् द्वैत की
सत्ता ही न रह जाने के कारण सर्वत्र अपने को ही वह देखता है। एवञ्च यथापूर्व (आत्मज्ञान होने के पूर्व) स्नान,
शौच, भिक्षाटन आदि कार्यों को करता हुआ भी अकर्तृभूत आत्मस्वरूप का आविर्भाव होने से वह निष्क्रिय है अर्थात्
निर्विकार है। इस प्रकार जो आत्मवित् होगा उसीको विक्षेपदशा में भी यथार्थ आत्मज्ञान (अप्रच्युतात्मयाथात्म्य-
दर्शन) होने के कारण ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ कहा गया है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई भले ही शास्त्रार्थज्ञ विद्वान् ही
क्यों न हो, किन्तु व्यवहारकाल में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि अभिमान उसमें भरा होने से आत्मज्ञ नहीं कहा जा सकता
यही वेदान्तशास्त्र का निश्चय है ।। १३ ।।
इतोदमुक्तं परमार्थदर्शनं मया हि वेदान्तविनिश्चितं परम् ।
विमुच्यतेऽस्मिन् यदि निश्चितो भवेन्न लिप्यते व्योम१ इवेह कर्मभिः ॥१४॥
इतीति—इस रीति से वेदान्तशास्त्रनिर्णीत उत्कृष्ट परमार्थदृष्टि का निरूपण मैंने किया। यदि इसमें किसी का
विश्वास (निष्ठा) हो जाय तो वह अवश्य ही मुक्त हो सकता है। तब वह आकाश के समान इस संसार में पुनः कर्मों से
लिप्त (बद्ध) नहीं होगा ॥ १४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वेदान्त शास्त्र के विषय में शास्त्रनियम के अनुसार अपने अनुभव को बता चुके। अब बता रहे हैं कि
इस अद्वैत वेदान्तदर्शन में परिनिष्ठित हुआ विद्वान् कृतकृत्य होता है। अतः परानुग्रहार्थ ही इस प्रकरण के निर्माण में
मेरी प्रवृत्ति हुई है ।। १४ ।।
।। इति दशमं दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणं समाप्तम् ।।
१. व्योमवदेव०—पाठान्तरम् ।