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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन

Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)

DevanagariHindipublished118 pages
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थोड़ी देर बाद वह आदमी हाथ में थैली लिये, इधर-उधर देखता हुआ तेज कदमों से जाता
दिखा। सम्भवतः वह मुझे ही तलाश रहा था। मैं थोड़ी देर के बाद उस गली से निकला और
उससे कुछ दूरी बनाकर चलने लगा। जब वह व्यक्ति अपने घर पहुँच गया तब चटाई पर
बैठकर उसने स्वर्णमुद्राएँ गिनीं। उसने एक कपड़े के टुकड़े में थैली बाँधकर अपने हाथ में ले
ली और उसने कहीं जाने के लिए निकल गया। मैंने समझा कि जरूर वह स्वर्णमुद्राओं को
छुपाने के लिए जा रहा होगा लेकिन वह अपने घर से सीधे राज्य कोषागार पहुँचा और
सौ स्वर्णमुद्राओं की वह थैली वहाँ जमा कराकर पर्चा कटवाया। उसके बाद वह अपने घर
चला आया। राज्य कोषागार में उसने पर्चे पर अपना नाम रामानुजम् लिखवाया है।
तेनाली राम ने उस प्रहरी की भी पीठ थपथपाई और उन्हें सीधे राजभवन पहुँचने का
निर्देश देकर भोजन के लिए अपने घर के भीतर चला गया।
"महाराज! आपको अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी! आप कृपा कर राज्य कोषागार
से यह पता कराएँ कि राजमार्ग में पड़ी सौ-सौ स्वर्णमुद्राओं की दो थैलियाँ क्या किसी को
मिली हैं? और राज्य कोषागार में यदि इस तरह की थैलियाँ जमा कराई गई हैं तो जमा
करानेवाला कौन था?"
“अरे!“ महाराज चैंक पड़े। "क्या बात हो गई तेनाली राम! तुम शेष सभासदों के आने की
प्रतीक्षा भी नहीं करना चाहते?“ उन्होंने तेनाली राम से कहा।
"महाराज!" तेनाली राम ने विनम्रता से कहा, "जिन दो प्रहरियों की सेवाएँ मैंने ली थीं,
वे दोनों रात भर जगे रहे हैं। मैं उनकी सेवाएँ वापस करने के उद्देश्य से ही सभा शुरू होने के
समय से पहले पहुँच गया हूँ। कल जो पहेली सुलझाने का जिम्मा आपने मुझे सौंपा था
उसके लिए 'प्रमाण' प्राप्त कर लेने के उद्देश्य से मैं सक्रिय हुआ हूँ। कृपया वांछित सूचनाएँ
मँगाने में मेरा सहयोग करें। यदि आप निर्देश देंगे तो सूचना अतिशीघ्र प्राप्त हो जाएगी।
और सभासदों के आने पर इन दोनों प्रहरियों को मुक्ति मिल सकेगी ये दोनों प्रहरी मेरे शोध
के प्रमाण भी हैं और प्रत्यक्षदर्शी भी।"
महाराज कृष्णदेव राय समझ चुके थे कि तेनाली राम ने गरीबी और ईमानदारी का
सम्बन्ध स्थापित करने का कोई सूत्र अवश्य पा लिया है।
उन्होंने राज्य कोषागार से सूचना मँगाई। सूचना पत्र में लिखा गया था कि रामानुजम्
नाम के एक व्यक्ति ने सौ स्वर्णमुद्राओं की एक थैली राज्य कोषागार में कल मध्य रात्रि से
पूर्व जमा कराई है। यह थैली उसे राजमार्ग से हल्दी बाजार जानेवाली राह पर मिली थी।
रामानुजम् हल्दी बाजार के पास मछेरों की बस्ती में रहता है और मधुमक्खियों के छत्ते से
मधु निकालने का कार्य करता है।
महाराज ने सूचना-पत्र का अवलोकन कर उसे तेनाली राम को सौंप दिया।

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जब सभा भवन में सभी सभासद पहुँच गए तब तेनाली राम ने कहना आरम्भ किया,
“महाराज! आपके निर्देश पर कल मैंने एक प्रयोग किया और प्रयोग का परिणाम मुझे आज
मिल गया। यह सूचना-पत्र, जो राज्य कोषागार से मँगाया गया है, वह एक गरीब व्यक्ति के
ईमानदार होने का प्रमाण-पत्र है। यह सूचना-पत्र बताता है कि गरीब आदमी धन-लोलुप
नहीं होता है।” फिर तेनाली राम ने सविस्तार अपनी योजना के क्रियान्वयन की कथा सभा
भवन में सुनाई। प्रमाण के रूप में दोनों प्रहरियों को प्रस्तुत किया।
दोनों प्रहरियों ने सभासदों को सम्पूर्ण घटना की जानकारी दी।
महाराज ने सिपाहियों को भेजकर सेठ गिरधारी लाल को पकड़वाकर मँगवाया। पहले
तो सेठ इस घटना को ही गलत बताता रहा लेकिन जब तेनाली राम ने उससे कहा कि सौ
स्वर्णमुद्राओं से भरी थैली तुमने अपने कमरे की दीवार में लगी तिजोरी में रखी है तब वह
सेठ टूट गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
महाराज ने सिपाहियों को भेजकर स्वर्णमुद्राएँ मँगा लीं और उसे राज्य कोषागार को
सौंप दिया गया। सेठ गिरधारी लाल को महाराज ने जेल भिजवा दिया। गरीब रामानुजम्
को दरबार में बुलाकर सौ स्वर्णमुद्राएँ उसकी ईमानदारी के पुरस्कारस्वरूप प्रदान कीं।
इसके बाद महाराज ने तेनाली को अपने गले से लगा लिया और कहा, ”सचमुच तेनाली
राम! तुम्हारी मेधा का कोई दूसरा उदाहरण मैंने कहीं नहीं देखा।“

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स्वर्ण मूषक पुरस्कार
महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार के सभी सभासदों को विशेष महत्त्व देते थे किन्तु फिर
भी सभासदों को प्रायः ऐसा लगा करता था कि महाराज तेनाली राम पर अधिक कृपालु हैं
और उसे ऐसा मौका दे दिया करते हैं कि वह शेष सभी सभासदों पर भारी पड़ता है।
इसलिए आम सभासद ऐसे अवसरों की तलाश में रहते थे जिसमें तेनाली राम का मजाक
उड़ाया जा सके।
एक दिन महाराज का दरबार लगा हुआ था। आम दिनों की तरह ही राज्यसभा की
कार्रवाई चल रही थी। तभी महाराज ने एक अजीब सी गन्ध उठती महसूस की। उन्होंने
सभासदों से पूछा, “क्या उन्हें कोई दुर्गन्ध महसूस हो रही है?"
सभी सभासदों ने बिना सतर्कता से दुर्गन्ध अनुभव करने की कोशिश किए ही कहा, “नहीं
महाराज!”
लेकिन तेनाली राम अपने आस-पास की हवा को महसूस करता हुआ बोला, “हाँ,
महाराज! ऐसी गन्ध मरे चूहे के शरीर में सड़न उत्पन्न होने के कारण पैदा होती है। लगता
है, कहीं आस-पास ही कोई चूहा मरा पड़ा है।”
महाराज ने सेवकों से अविलम्ब चूहे की खोज करने के लिए कहा।
थोड़ी ही देर में एक सेवक ने मरा चूहा ढूँढ़ निकाला और उसे लेकर महाराज के पास
चला आया।
महाराज सेवक पर नाराज हो गए। उन्होंने कहा, “ठीक है! तुमने इसे खोज निकाला
मगर इसे यहाँ लाने की आवश्यकता क्या थी? कहीं फेंक आते, फिर मुझे आकर सूचना दे
देते! मैं इस चूहे का क्या करूँगा?”
सेवक डर से थरथर काँपने लगा।
तभी एक दरबारी ने कहा, “महाराज, आप चाहें तो चूहा इस दरबार के सबसे विद्वान
सभासद तेनाली राम को भेंट कर सकते हैं। आपने उसे तरह-तरह के उपहार दिए हैं, आज
मरा चूहा ही सही!”
उस दरबारी की बात पर सभी सभासद ही-ही-ही-ही करने लगे। बोलनेवाला सभासद
इस दरबार में मसखरा सभासद माना जाता था इसलिए महाराज ने उसकी बातें अनसुनी

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कर दीं। मगर तेनाली राम इस सभासद की बातों में छुपे कटाक्ष से तिलमिला गया और
तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “माननीय सभासद! यदि महाराज ने मुझे
यह चूहा उपहार में दिया तो मैं इसे आदर के साथ ग्रहण करूँगा। ऐसे भी चूहा विकल्पों का
प्रतीक है। भगवान गणपति का वाहन ऐसे ही नहीं बन गया है।”
महाराज तेनाली राम के प्रतिवाद पर मुस्कुरा उठे और बोले, “मरे चूहे का तुम क्या
करोगे?”
“यदि आपने मुझे यह चूहा भेंट किया तब मैं यह समझूँगा कि आप मेरी बुद्धि की
परीक्षा लेना चाहते हैं और यह परीक्षा देने के लिए मैं इस चूहे से व्यापार करूँगा
महाराज!” तेनाली राम ने कहा।
“मरे चूहे से व्यापार? यह तुम कैसे कर सकते हो तेनाली राम?” महाराज ने पूछा।
“महाराज! संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई-न-कोई उपयोग है। कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं
है। मैं इस मरे चूहे को किसी सपेरे को बेच आऊँगा और उससे गुड़ खरीद लूँगा। इन दिनों
गर्मी का मौसम है। मैं उस गुड़ को पानी में मिलाकर मीठा पानी बेचूँगा। मीठा पानी
बेचने से जो पैसे मिलेंगे उससे चना खरीदूँगा और चना बेचकर, चना से बने पकवान, सत्तू,
गुड़चना आदि बेचकर अच्छा पैसा कमाउँगा और उन पैसों से कोई बड़ा रोजगार आरम्भ
करूँगा।” तेनाली राम ने कहा।
महाराज तेनाली राम की बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और सभासदों से कहा, “तेनाली
राम की यही तर्कबुद्धि उसे तेनाली राम बनाती है। ऐसी तर्कबुद्धि आम इनसान में प्रायः
दुर्लभ है। हमें इस बात का गर्व है कि हमारे दरबार में तेनाली राम जैसा बुद्धिमान सभासद
है। मैं आज इसके उत्तर से इतना सन्तुष्ट हूँ कि इसके लिए ‘स्वर्ण मूषक’ पुरस्कार की
घोषणा करता हूँ तथा राज्य के कोषाध्यक्ष को आदेश देता हूँ कि तेनाली राम को
पुरस्कृत करने के लिए पाँच तोले सोने का चूहा बनवाकर दरबार को यथाशीघ्र सौंपे!”
महाराज के इस आदेश का पालन हुआ।
उस दिन दरबार में महाराज ने तेनाली राम को सोने का चूहा पुरस्कार में देकर उसे
अपने गले से लगा लिया।
तेनाली राम के आलोचकों को महाराज की ओर से दिया गया यह एक करारा जवाब था।

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महत्त्वाकांक्षी युवा तपस्वी
विजयनगर में प्रत्येक वर्ष कोई-न-कोई उत्सव-समारोह आदि हुआ करता था। महाराज
कृष्णदेव राय उत्सव-प्रेमी ही नहीं, अध्यात्म-प्रेमी भी थे। उनका मानना था कि
आध्यात्मिक होने का अर्थ यह नहीं है कि आप धार्मिक कर्मकांडों में उलझ जाएँ। ये कर्मकांड
तो मनुष्य को विचारों की संकीर्णता की ओर ले जाते हैं। यह करो, ऐसे करो बतानेवाले
कर्मकांड निषेध और वर्जनाओं पर आधारित हैं क्योंकि ये यह भी बताते हैं कि वह न करो,
वैसा न करो। प्रायः महाराज अपने चिन्तन की चर्चा तेनाली राम से करते रहते थे। एक
उत्सव के अवसर पर महाराज ने प्रसन्न होकर एक तपस्वी को विजयनगर में कुटिया बनाने
के लिए भूमि एवं अन्य सुविधाएँ दे दीं। तेनाली राम ने महाराज के इस व्यवहार पर अपनी
शंका जताई, “महाराज! मुझे तो यह युवा तपस्वी कहीं से भी पहुँचा हुआ प्राणी नहीं
लगा और न ही इसमें पांडित्य की वैसी प्रखरता है जिससे यह दूसरों का मार्गदर्शन कर
सके। फिर आपने यह उदारता क्यों दिखाई?”
“देखो तेनाली राम! मैं विजयनगर का राजा हूँ और इससे इतर भी मेरा एक निजत्व है।
मैं स्वयं आध्यात्मिक चिन्तक हूँ। विजयनगर में हर वर्ष आयोजित होनेवाले समारोहों
का उद्देश्य ही है लोगों को जोड़ना। इन समारोहों के समय ऐसे अनेक कार्यक्रम होते हैं
जिनमें भाग लेकर या देख-सुनकर लोगों की दमित इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। इसलिए
विजयनगर के निवासियों में तुम्हें सन्तोष और उल्लास की कमी नहीं दिखेगी। यही है मेरे
शासन की सफलता का पहला सोपान।...मेरे पास जब यह युवक पहुँचा तब मुझे यह
विश्वास हो गया कि यह युवक महत्त्वाकांक्षी है, अन्यथा सामान्य साधु-सन्तों की तरह यह
किसी के द्वार पर भी जा सकता था। जब इसने मुझसे वियनगर में कुटिया बनाने की
सुविधा माँगी, तो मेरे सामने यह बात साफ हो गई कि यह युवक किसी दूसरे राज्य से
आया है। इस प्रकार एक राजा के समक्ष वह एक शरणागत की तरह था, तो उसे कुटिया
बनाने की सुविधा देकर मैंने राजधर्मानुकूल कार्य किया है। रही उसके सिद्ध नहीं होने की
बात तो मुझे विश्वास है कि वह सिद्धि तो प्राप्त कर ही लेगा, क्योंकि महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति
वांछित को प्राप्त करके ही दम लेता है।” महाराज ने कहा।
महाराज की तर्कसंगत बातें सुनकर तेनाली राम मौन हो गया।
धीरे-धीरे समय बीतता रहा। महाराज उस युवक को भूल गए। दो राज्य महोत्सव बीत
गए। उस युवक ने महाराज के दर्शन नहीं किए।
तीसरे राज्य महोत्सव के प्रारम्भ में ही वह युवक महाराज के पास पहुँचा। उसके मुख
से विद्वत्ता का तेज प्रकट हो रहा था। वह दूर से ही तेजस्वी प्रतीत हो रहा था। युवक ने

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महाराज के समीप आकर कहा, “महाराज! मैंने सभी धर्मग्रन्थों का अध्ययन कर लिया है।
मैं सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो गया हूँ। आप मुझे अपना गुरु बना लें!”
महाराज ने युवक की ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोले, “युवक! यह ठीक है कि तुमने
सभी शास्त्र पढ़ लिये हैं मगर मेरा गुरु बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है। अब तो तुम्हें
अपने अध्ययन पर चिन्तन करना चाहिए। ...मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि तुममें अभी
भी कोई कमी है जिसके कारण मैं अभी तुम्हें अपना गुरु नहीं बना सकता।”
महाराज की बातें सुनकर वह युवक वापस लौट गया।
तेनाली राम उस समय वहीं था। उसने महाराज और युवक की बातें सुनी थीं। उसने कहा,
“महाराज! आपने ठीक ही कहा था कि युवक बहुत महत्त्वाकांक्षी है। सोद्देश्य साधना कर
रहा है, यह भी उसके महत्त्वाकांक्षी होने का संकेत है...और देखिए उसकी महत्त्वाकांक्षा की
पराकाष्ठा-वह आपका गुरु बनना चाहता है। इसका अर्थ तो यही है कि वह विजयनगर का
राजगुरु बनने की अभीप्सा से यहाँ आया है।”
“तुम ठीक समझे तेनाली राम!” महाराज ने उत्तर दिया।
और बात वहीं समाप्त हो गई।
महाराज अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गए। वही रोज दरबार का काम-काज देखना
और कभी-कभी प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर के भ्रमण पर निकल जाना-
यही थी उनकी सामान्य दिनचर्या।
वर्ष बीतते देर नहीं लगी। महाराज अपने अभ्यास के अनुरूप ही वार्षिक समारोह की
तैयारियों की स्वयं समीक्षा करते। कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे, कहाँ रंगमंच
बनेगा, पनसाला कहाँ लगेगी और भोजनालय कहाँ बनेगा; प्रजा को इस वर्ष के समारोह के
समय राज्य की ओर से मिलनेवाले भोजन के लिए क्या-क्या पकेगा-यानी छोटी से छोटी
बात के लिए भी महाराज स्वयं निर्देश दे रहे थे। तेनाली राम हमेशा की तरह उनके साथ
था।
हर्षोल्लास के साथ विजयनगर का वार्षिकोत्सव आरम्भ हुआ। इस वार्षिकोत्सव के
आरम्भ में वह युवा तपस्वी महाराज के पास आया लेकिन इस बार उसने महाराज से गुरु
बनाने को नहीं कहा। महोत्सव के अवसर पर उसने महाराज को शुभकामनाएँ दीं तथा
महाराज से कहा, “महोत्सव के समय रास-रंग-मनोरंजन के साथ ही उन्हें कोई धार्मिक
अनुष्ठान कराना चाहिए।”
महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा।

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तेनाली राम ने महाराज का भाव समझा और युवा तपस्वी से कहा, “प्रभु! सभी धर्म एक
सी ही बात करते हैं। इसलिए संशय है कि कौन-सा धार्मिक अनुष्ठान किया जाए और जब
तक संशय है तब तक कोई अनुष्ठान हो ही नहीं सकता क्योंकि संशययुक्त मन से धर्म की
बातें सम्भव नहीं हैं।”
युवा तपस्वी ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं।”
तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी से विनम्रता के साथ कहा, “प्रभु! ऐसा प्रतीत होता है कि
आपने चिन्तन कार्य तो पूरी निष्ठा से किया है, अब आप निष्ठापूर्वक मनन कार्य में लगें तब
ही आपकी साधना पूर्ण होगी।”
वह युवक वहाँ से चला गया। महाराज महोत्सव का आनन्द उठाने में लगे और तेनाली
राम सखा भाव से उनके साथ रमा रहा।
इसके बाद कई वर्षों तक युवा तपस्वी महोत्सव के समय महाराज से मिलने नहीं आया।
एक बार विजयनगर में जब महाराज और तेनाली राम वार्षिक महोत्सव के लिए
कार्यक्रम तय करने बैठे तो बात ही बात में उन्हें उस युवा तपस्वी का स्मरण हो आया।
उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “कई वर्ष व्यतीत हो गए, मेरा गुरु बनने की इच्छा से
विजयनगर में कुटिया बनाकर तपश्चर्या में लगा वह युवक आया नहीं...कुछ अता-पता है
उसका?”
तेनाली राम ने तत्परता से उत्तर दिया, “शीघ्र ही सूचित करूँगा महाराज!”
इसके बाद तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी के सन्दर्भ में सूचनाएँ एकत्रित करवाईं।
सूचना थी कि वह युवा तपस्वी अब कुटिया से निकलता ही नहीं। कभी-कभी किसी-किसी
को दिख जाता है। वह न तो पूजा- अनुष्ठान करता दिखाई देता है और न किसी से कोई
याचना करने जाता है। पिछले वर्ष जब अतिवृष्टि के कारण गाँव के गाँव पानी में डूब गए थे
तब इस युवा तपस्वी ने पीड़ित लोगों को बचाने और उनके लिए सुविधाएँ जुटाने में अपना
जी-जान लगा दिया था।
तेनाली राम ने महाराज को युवा तपस्वी के सन्दर्भ में मिली समस्त सूचनाएँ दीं और
कहा, “लगता है, महाराज! यह युवा तपस्वी सिद्ध हो चुका है।”
महाराज कुछ बोले नहीं। महोत्सव आरम्भ हुआ। राजा के साथ प्रजा के मेल से उन्मुक्ति
और आनन्द का एक सुखद और आह्लादकारी वातावरण बना। विजयनगर की खुशहाली
के इसी सूत्र को स्मरण रखने के लिए महाराज इस महोत्सव का आयोजन कराते थे।
महोत्सव के समापन के बाद महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम, चलो, जरा

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उस युवा तपस्वी से मिल आएँ।”
महाराज और तेनाली राम स्वयं चलकर युवा तपस्वी की कुटिया में गए। युवा तपस्वी ने
उन्हें देखकर अपने हाथ जोड़ लिये और कहा, “धन्यभाग्य! हमारे गुरुजन पधारे!’
महाराज विस्मित से रह गए युवक की बात सुनकर। उन्होंने कहा, “प्रभु, यह आप क्या
कह रहे हैं? मैं तो यह समझता हूँ कि अब आप सिद्ध हो चुके हैं इसलिए आपसे दीक्षा लेने
की इच्छा से आपके पास आया था।”
युवक ने गम्भीरता से कहा, “महाराज! आप मेरे आश्रयदाता हैं। पिता तुल्य और
आदरणीय और तेनाली राम मेरे गुरु हैं-उन्होंने मुझे मनन करने की सीख दी थी और मैं
उनके निर्देश पर ही मन में डूब गया। तब मैंने जाना कि संसार में ऐसा कोई नहीं जिसमें
ज्ञान का सागर न हो...चाहने पर कोई भी इस ज्ञान-सागर में गोते लगा सकता है।“ उस
युवक ने तेनाली राम के चरण छुए और तेनाली राम ने उसे अपने गले से लगा लिया।

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खेत का उपदेश
महाराज कृष्णदेव राय अपने प्रिय सभासद तेनाली राम के साथ प्रायः विजयनगर के भ्रमण
के लिए निकल जाते थे। प्रजा का दुख-दर्द जानने का उन्हें अपना यह तरीका बहुत पसन्द
था। इस तरह के भ्रमण से जहाँ वे अपने राज्य की समस्त सूचनाओं से भिज्ञ रहते थे, वहीं
अपने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के मनोभावों से भी परिचित होते थे। तेनाली राम
को वे इस तरह की यात्राओं के समय हमेशा साथ रखते थे। उसका एकमात्र कारण यह था
कि तेनाली राम उनके मनोभावों को आसानी से समझ लेता था और स्थिति देखकर उसके
अनुकूल आचरण करना जानता था।
एक बार विजयनगर में अच्छी बारिश हुई। समय पर अच्छी वर्षा हो जाने से फसल भी
बहुत अच्छी हुई जिससे विजयनगर के कृषकों में काफी खुशी थी।
महाराज तेनाली राम के साथ प्रदेश की यात्रा पर थे। वे एक गाँव से दूसरे गाँव जाते और
ग्रामीणों की वास्तविक दशा से अवगत होकर आगे बढ़ जाते। वे तेनाली राम के साथ ही
किसी गाँव में पड़ाव डालकर रात बिताते और सुबह होते ही आगे बढ़ जाते। यह सिलसिला
काफी समय से चल रहा था। एक दिन महाराज तेनाली राम के साथ एक गाँव से गुजर रहे
थे। रास्ते में धान के एक खेत में एक किसान उल्लसित भाव में बैठा हुआ मिल गया।
महाराज ने उसके पास जाकर कहा, “भगवान की कृपा से इस बार फसल बहुत अच्छी हुई
है-है न!”
उस किसान ने महाराज और तेनाली राम को सामान्य राहगीर समझा और बहुत दर्प के
साथ उत्तर दिया, “अरे भाई! इसमें भगवान की कृपा जैसी कोई बात नहीं है। खेत में कुछ
भी भगवान की कृपा से नहीं उगता है। उगता है अच्छे बीज, खाद, सिंचाई और निराई के
कारण। अभी जो यह लहलहाता हुआ खेत देख रहे हो, वह मेरी मेहनत के कारण है,
भगवान की कृपा के कारण नहीं। मैंने कड़ी धूप में इस खेत में कुदाल चलाया, कड़ी मेहनत
कर मिट्टी तैयार की, बारिश में भीग-भीगकर बुआई की, लगातार सतर्क रहा, समय पर
सिंचाई की, रात में जगकर फसल की रखवाली की। तब जाकर यह खेत इस तरह
लहलहाया है। यह मेरी लगातार मेहनत का परिणाम है। जो भी मेहनत करेगा, खेत उसके
लिए अच्छी पैदावार देगा ही। यही नियम है। न तो यह भाग्य का खेल है और न ही
ईश्वरीय चमत्कार!”
तेनाली राम ने किसान को इस तरह अतिविश्वास में बोलते सुना तब किसान से कहा,
“हाँ, तुम ठीक कहते हो, मेहनत करनेवालों को ही उसका अच्छा फल भी प्राप्त होता है।”
इतना कहकर उसने महाराज को आगे बढ़ने का संकेत किया।

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दोनों अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगे।
इस घटना के कुछ वर्ष बाद विजयनगर अनावृष्टि का शिकार हो गया। बरसात के मौसम
में भी आसमान में बादलों के दर्शन दुर्लभ हो गए। सूर्य की सीधी किरणों से धरती में दरारें
पड़ने लगीं। विजयनगर की प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। मवेशियों के लिए चारे का अभाव
हो गया। चारा नहीं मिलने के कारण मवेशी मरने लगे।
पूर्व में विजयनगर की ऐसी हालत कभी हुई हो, ऐसा महाराज की स्मृति में नहीं था।
उन्होंने एक दिन तेनाली राम से प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर भ्रमण का
कार्यक्रम तैयार करने के लिए कहा।
तेनाली राम ने महाराज के खुफिया विभाग से विजयनगर के ऐसे इलाकों का नक्शा
तैयार करवा लिया जहाँ अनावृष्टि के कारण भुखमरी की नौबत आ चुकी थी। किसान
पलायन करने को बाध्य हो गए थे। मवेशी मर रहे थे।
नक्शा मिल जाने पर तेनाली राम ने गाँवों की प्राथमिकताएँ तय कीं कि कहाँ पहले जाना
चाहिए और कहाँ बाद में। फिर महाराज और तेनाली राम का विजयनगर भ्रमण का
अभियान शुरू हो गया। महाराज कृष्णदेव राय बहुत सूक्ष्मता से यह जानकारी जुटा रहे थे
कि किस गाँव में कितने किसान रहते हैं और अनावृष्टि के कारण उन्हें कितना नुकसान
उठाना पड़ रहा है।
वैसे राज्य का खुफिया विभाग अपने स्तर पर पूरे राज्य की बदहाली के सम्बन्ध में
महत्त्वपूर्ण तथ्य जुटाने में लगा था और राज्य का सिंचाई विभाग उन सम्भावनाओं की
तलाश में था जिससे अनावृष्टि के बावजूद राज्य में कृषि की पहल की जा सके।
महाराज ने राज्य के अन्न भंडार के द्वार अनावृष्टि के शिकार कृषकों के सहायतार्थ खुलवा
दिए थे। मगर इतना ही काफी नहीं था। इसलिए वे स्वयं गाँवों की वास्तविक स्थिति का
मूल्यांकन करने के लिए निकले थे।
यात्रा आरम्भ करने के एक सप्ताह बाद ही महाराज उस गाँव में थे जहाँ का एक किसान
कभी उनसे बोला था, ‘कृषि उत्पाद उसके श्रम का परिणाम है, ईश्वरीय कृपा का नहीं।’ उस
गाँव में प्रवेश के साथ ही उन्हें वह घटना याद हो आई।
संयोग की बात थी कि तेनाली राम को वह किसान खेत की मेड़ पर बैठा दिख गया।
किसान उदास था और उसके खेत में भी दूर तक कोई फसल नहीं दिख रही थी। उसके पास
पहुँचने के बाद तेनाली राम ने महाराज को रुकने का संकेत किया और खुद उस किसान
के पास पहुँचकर पूछा, ”क्या बात है भाई! बहुत उदास दिख रहे हो?”

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उस किसान ने लम्बी साँस ली और बोला, “क्या कहूँ भाई, सब किस्मत का खेल है।
कभी इस खेत में फसलें लहलहाती थीं। इस साल ऊपरवाले ने ऐसा कहर बरपा किया है कि
खेत में डाले गए बीज सूरज की तपिश से भुन गए। खाद बरबाद हो गई। इस बार यदि
बारिश नहीं हुई तब बीज-खाद की कीमत भी जेब से भरनी होगी।”
तेनाली राम ने उसे दिलासा देते हुए कहा, “अजीब बाजीगर है यह ऊपरवाला भी! कभी
देता है तो कभी ले भी लेता है।”
तेनाली राम की बातें सुनकर किसान ने उसकी ओर देखा। उसे तेनाली राम का चेहरा
पहचाना-सा लगा। फिर उसे तेनाली राम से इसी मौसम में कुछ वर्ष पहले हुई मुलाकात
की याद हो आई। उसने तेनाली राम से पूछा, “आप मेरा दुख जानना चाहते हैं, तो कटाक्ष
क्यों कर रहे हैं? आपकी बातों से ऐसा लग रहा है मानो आप जले पर नमक छिड़कने आए
हैं। आपकी बातें मुझे सान्त्वना नहीं दे रही हैं और न ही ढाढस बँधा रही हैं!”
तेनाली राम ने उचित अवसर देखते हुए कहा, “बन्धु, तुम्हें स्मरण होगा जब हम लोग
पिछली बार तुमसे यहीं पर मिले थे तब तुमने यह मानने से इनकार कर दिया था कि
अच्छी फसल होना भगवान की कृपा है बल्कि अतिविश्वास से कहा था कि अच्छी फसल
मेरी मेहनत का परिणाम है।...अब जब फसल बरबाद हो गई है तब इसके लिए तुम
भगवान पर दोष मढ़ रहे हो! यह उचित नहीं है। अच्छे परिणाम का श्रेय खुद को देना और
बुरे परिणाम के लिए भगवान को दोषी बताना उचित नहीं है। इसी खेत की फसलों से मुझे
तो यही शिक्षा मिली है कि अच्छे परिणाम के लिए भगवान की कृपा और परिश्रम दोनों की
आवश्यकता होती है।”
किसान अवाक् होकर तेनाली राम का मुँह देखता रह गया।
महाराज ने तेनाली राम की पीठ थपथपाई और दोनों आगे बढ़ गए।

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श्रम और स्वाद
एक बार महाराज कृष्णदेव राय तेनाली राम के साथ घोड़े पर सवार होकर शिकार के
लिए विजयनगर के निकटवर्ती जंगल में गए। दोनों ने इच्छा भर शिकार किया और वापसी
के लिए घोड़ा घुमा लिया। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे राह
भटक गए हैं। दोनों भटकते-भटकते थककर चूर हो चुके थे। घोड़े पसीने से लथपथ थे। सूर्य
दक्षिण-पश्चिम के कोण तक पहुँचने ही वाला था। महाराज यह सब देखकर हताश हो रहे
थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “अब क्या होगा तेनाली राम! आखिर हम लोग कब तक
जंगल में भटकते रहेंगे? हमारे घोड़े भी थक चुके हैं, उन्हें भी विश्राम चाहिए। जिस तरह
प्यास के मारे हमारा गला सूख रहा है, उसी तरह इन घोड़ों को भी प्यास लगी होगी।
देखते नहीं, किस तरह हाँफ रहे हैं घोड़े!”
“महाराज! धैर्य के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अच्छा है कि हम एक ही दिशा में
आगे बढ़ते रहें।” तेनाली राम ने कहा।
दोनों के घोड़े दौड़ते रहे।
थोड़ी देर के बाद तेनाली राम ने महाराज से खुश होते हुए कहा, “महाराज! सामने
देखिए। पेड़ पर बगुलों का झुंड बैठा हुआ है।”
“तो इसमें खुश होने की क्या बात है? तुम तो ऐसे खुश हो रहे हो तेनाली राम मानो
विजयनगर वापसी की राह मिल गई हो!” महाराज ने तेनाली राम से कहा। “
जी हाँ, महाराज! बगुलों के दिखने से यह सम्भावना भी दिखने लगी है कि शीघ्र ही हमें
नगर वापसी की राह बतानेवाला कोई-न-कोई मिल जाएगा। खाने के लिए कुछ मिले न
मिले, पीने के लिए पानी अवश्य मिल जाएगा।” तेनाली राम ने कहा।
“यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?” महाराज ने पूछा।
“महाराज, बगुलों के आधार पर।” तेनाली राम ने उत्तर दिया।
“क्या मतलब?” महाराज ने पूछा।
“मतलब यह महाराज कि बगुलों के झुंड का यहाँ होना यह संकेत दे रहा है कि आस-पास
ही कोई नदी बह रही है।” तेनाली राम ने कहा।

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महाराज खुश होते हुए बोले, “अरे, मेरे ध्यान में तो यह बात ही नहीं आई थी! तुम ठीक
कह रहे हो तेनाली राम! ऐसा हो सकता है।”
थोड़ी दूर घोड़ा और दौड़ा तब तेनाली राम ने भूमि पर बड़े पत्तोंवाली लताएँ बिछी हुई
देखीं। इन लताओं के कुछ पत्तों पर जानवरों के खुरों और पंजों के कीचड़ सने निशान थे।
इनमें से कुछ निशान कच्चे थे तो कुछ सूखे यानी गीली मिट्टीवाले निशान और सूखी
मिट्टीवाले निशान।
तेनाली राम ने महाराज को उन निशानों को दिखाते हुए कहा, “महाराज, घोड़े को उस
ओर ले चलें जिधर से पंजों और खुरों के निशान आते दिखाई पड़ रहे हैं।” ऐसा कहते हुए
तेनाली राम ने स्वयं अपना घोड़ा मोड़ लिया।
महाराज समझ नहीं पाए कि तेनाली राम किन निशानों की बात कर रहा है। वे थक चुके
थे और पसीने से लथपथ हो चुके थे। उन्हें बोलने की इच्छा नहीं हुई इसलिए उन्होंने
चुपचाप घोड़े को तेनाली राम के घोड़े के पीछे लगा दिया।
थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक नदी दिखाई पड़ी। दोनों ने नदी की धारा में हाथ-मुँह धोए।
फिर जी भर के पानी पीया। जब उनकी प्यास बुझ गई तब वे अपने घोड़ों को ले आए।
दोनों घोड़ों ने भी पानी पीया।
महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम, मैं कामना करता हूँ कि दूसरी
सम्भावना भी सच साबित हो जाए।”
“जी हाँ, महाराज, नदी है तो आस-पास कोई बस्ती भी होगी। पहले थोड़ा विश्राम कर लें
फिर देखते हैं कि आगे क्या है।” इतना कहकर तेनाली राम ने दोनों घोड़ों को ऐसे स्थान
पर ले जाकर बाँध दिया जहाँ हरी घास दूर तक भूमि पर आच्छादित थी। उसने घोड़ों को
वहीं छोड़ दिया और स्वयं महाराज के पास आ गया। उसने महाराज से कहा, “महाराज!
आइए, नदी के किनारे बालू पर हम लोग थोड़ी देर लेट लें। थोड़े विश्राम के बाद सोचेंगे कि
अब क्या करना है और किधर जाना है।”
महाराज थके हुए तो थे ही, उन्होंने बालू पर लेटते हुए कहा, “लेकिन तेनाली राम! थोड़ी
ही देर में शाम हो जाएगी। ऊपर से, यह नदी का किनारा है। कभी भी कोई जंगली जानवर
इधर पानी पीने के लिए आ सकता है।“
महाराज के पास ही तेनाली राम लेट गया और कहा, “महाराज, जंगली जन्तुओं से भय
की आवश्यकता नहीं। इस समय यदि कोई भी जीव इधर आया तो विश्वास कीजिए कि वह
शिकार करके अपना पेट भर चुका होगा। वैसे भी मनुष्य से सभी भी जानवर स्वयं भयभीत
रहते हैं इसलिए भयरहित होकर हम लोग थोड़ी देर विश्राम करें।”

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अभी उन लोगों को विश्राम के लिए लेटे कुछ समय ही बीता था कि एक प्रौढ़ महिला
हाथ में घड़ा लिये नदी से पानी लेने के लिए आई। उसने घड़े को पानी में डुबोया तो उसमें
जाते पानी की 'गड-गड' ध्वनि से महाराज और तेनाली राम दोनों का ध्यान उस ओर
गया। उन दोनों ने नदी की ओर देखा और प्रसन्न हो गए। महाराज ने प्रसन्न होते हुए
तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! तुम्हारा दूसरा अनुमान भी सच साबित हुआ। चलो,
महिला से पता करें विजयनगर जाने का रास्ता।”
दोनों महिला के पास पहुँचे। महिला ने उन्हें देखते ही समझ लिया कि ये दोनों राजसी
व्यक्तित्व के स्वामी हैं। अवश्य इनमें से कोई राजा है। ऐसा सोचकर उसने दोनों को
नमस्कार किया और पूछने लगी, “राह भटक गए हो राजन?” महाराज
उस महिला की शालीनता से बहुत प्रभावित हुए और महिला से कहा, “हाँ माता! हम
दोनों राह भूल गए हैं। जंगल में भटकते-भटकते थक गए हैं और भूखे हैं।”
महिला ने उनसे कहा, “कोई बात नहीं, अब तुम दोनों मेरे साथ मेरी झोंपड़ी में चलो।
झोंपड़ी में जो कुछ है उससे अपनी भूख मिटाओ। घोड़ों को ले चलकर झोंपड़ी के पास बाँध
देना। घोड़ों के चारे की व्यवस्था भी मैं कर दूँगी। सुबह जहाँ कहीं भी जाना है, चले
जाना। पल-दो पल में अब सूरज डूब जाएगा। रात हो जाएगी। और जंगल में रात को
अनजान राह पर भटकना खतरे से खाली नहीं। कहते हैं कि भी जन्तुओं की शक्ति रात्रि में
कई गुना बढ़ जाती है।”
महाराज और तेनाली राम के समक्ष उस महिला का प्रस्ताव स्वीकार कर लेने के अलावा
कोई चारा नहीं था इसलिए वे दोनों उस महिला के साथ उसकी झोंपड़ी में चले गए।
महिला की झोंपड़ी जंगल में बसे एक छोटे गाँव में थी। पाँच-छः परिवारोंवाले इस गाँव
में पन्द्रह-बीस लोग ही रहते थे। वन-पत्रों और शिकार पर उनका जीवन आधारित था।
महाराज और तेनाली राम दोनों ही भूख से बेहाल थे। महिला ने उन्हें गुड़ और चने के
उपयोग से बनाया गया पेठा दिया। महाराज को यह पेठा बहुत स्वादिष्ट लगा।
दूसरे दिन सुबह महिला ने उन दोनों को विजयनगर की राह दिखा दी और वे दोनों
विजयनगर चले आए।
फिर सब कुछ सामान्य हो गया। महाराज और तेनाली राम नियमित राजभवन जाते।
वहाँ दोनों में बातचीत होती।
एक दिन महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! मुझे वह पेठा खाने की बड़ी
इच्छा है। कहीं से चने-गुड़ के पेठे की व्यवस्था करो।”

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तेनाली राम ने विजयनगर की एक दुकान से महाराज के लिए पेठा मँगवा दिया।
मगर महाराज को इस पेठे में वह स्वाद नहीं मिला।
दूसरे दिन महाराज ने तेनाली राम को बताया कि कल जो पेठा खाया, उसमें वह बात ही
नहीं थी जो उस जंगलवाली महिला के पेठे में थी।
तेनाली राम ने किसी दूसरी दुकान से महाराज के लिए पेठा मँगा दिया मगर महाराज
को उससे भी सन्तुष्टि नहीं मिली।
इस प्रकार महाराज को बारी-बारी से विजयनगर की सभी दुकानों के पेठे खिलाए गए
मगर महाराज को उस महिला की झोंपड़ी में मिले पेठे का स्वाद नहीं मिला।
अन्ततः एक दिन तेनाली राम ने महाराज से जंगल में उस महिला से मिलने चलने के
लिए कहा। महाराज सहर्ष तैयार हो गए।
दूसरे दिन सुबह दोनों जंगल में उस महिला की झोंपड़ी की ओर चल दिए। महिला की
झोंपड़ी तक पहुँचते-पहुँचते दोनों थककर चूर हो गए। उन्हें भूख भी जोरों की लगी थी।
महिला की झोंपड़ी में जब वे दोनों पहुँचे तब महिला उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने
उन दोनों को बैठने के लिए चटाई बिछा दी। पीने के लिए पानी दिया।
महाराज ने महिला से कहा, “माँ, मुझे चना-गुड़ का पेठा खिलाओ। तुम्हारे हाथ का पेठा
खाने के लिए ही मैं यहाँ आया हूँ।”
महाराज की अपनापन-भरी बातें सुनकर महिला बहुत प्रसन्न हुई। उसने तुरन्त महाराज
के लिए पेठा बनाया।
इस बीच तेनाली राम ने महिला को बता दिया था कि चना-गुड़ का यह पेठा महाराज
को कितना पसन्द है और कैसे विजयनगर की हर दुकान का पेठा खाने के बाद भी महाराज
को उसके हाथ से बने पेठे का स्वाद नहीं मिला और वे पेठा खाने जंगल में आ गए।
पेठा बनाकर महिला ने महाराज और तेनाली राम के लिए परोस दिया। महाराज ने पेठा
खाने पर पायादृवही स्वाद! वही मिठास! वे पेठे के स्वाद में खो से गए। जी भर के पेठा
खाया और महिला के पेठे की खूब प्रशंसा की।
महिला ने पेठे के स्वाद का रहस्य खोलते हुए कहा, “राजन! जब तुम पहली बार पेठा
खाए थे, उस दिन भी तुम्हें खूब जोरों की भूख लगी थी। जंगल में भटकने के कारण
श्रमजनित थकन से तुम क्लान्त से थे। शरीर से खूब पसीना बह चुका था। इस प्रकार

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तुम्हारे शरीर के रग-रग को नई उर्जा के लिए आहार की आवश्यकता थी और आज भी
तुम्हारी स्थिति उस दिन जैसी ही है। सच है कि यह पेठा भी वैसा ही पेठा है जैसा
विजयनगर की दुकानों में मिलता है। दरअसल बात यह है कि जब भी श्रम करने के बाद
भूख लगती है तब भोजन करने पर उसका स्वाद अद्वितीय लगता है।”
दरअसल बात यह है कि महिला की बात से महाराज और तेनाली राम बहुत सन्तुष्ट हुए।
महाराज ने महिला को ढेर सारा धन उपहार में दिया और वहाँ से विजयनगर वापस आ
गए।

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खुलीं आँखें महाराज की
महाराज कृष्णदेव राय कभी-कभी तेनाली राम को साथ लेकर विजयनगर की प्रजा का
दुख-सुख जानने के उद्देश्य से भ्रमण के लिए निकल जाते थे। ऐसे भ्रमण के समय दोनों आम
नागरिकों जैसे परिधान में रहते थे।
एक दिन महाराज ने कहा, "तेनाली राम! राज-काज की समरसता से बड़ी ऊब हो रही
है। क्यों न हम लोग दो-चार दिनों के लिए कहीं भ्रमण के लिए निकल जाएँ? इससे
समरसता भी दूर होगी और हम लोग अपनी प्रजा की वास्तविक स्थितियों को भी समझ
पाएँगे।"
तेनाली राम भला महाराज की बातों का क्या विरोध करता! वह तुरन्त तैयार हो गया।
कार्यक्रम तय हो गया। उस दिन तेनाली राम यात्रा की तैयारी के लिए अपने घर चला
गया। दूसरे दिन यात्रा आरम्भ होनी थी इसलिए तेनाली राम ने आनन-फानन में अपनी
तैयारियाँ पूरी कर लीं। उसने थैले में कुछ कपड़े रखे। जेब में कुछ मुद्राएँ रखीं। जूतों को
साफ किया। घोड़े को नहला-धुलाकर उसकी मालिश की। हो गई उसकी तैयारी पूरी। ऐसे
भी वह महाराज के साथ जा रहा था इसलिए राह व्यय आदि की चिन्ता उसे नहीं करनी
थी फिर भी उसने कुछ पैसे अपने साथ रख लिये थे। यह सोचकर कि पता नहीं कब पैसों
की आवश्यकता पड़ जाए। तेनाली राम का मानना था कि पैसों का कोई विकल्प नहीं
होता। पैसों का काम पैसे से ही पूरा हो सकता है।
दूसरे दिन वह महाराज के साथ राज्य-भ्रमण के लिए निकल पड़ा। यानी उन दोनों की
यात्रा प्रारम्भ हो गई। यात्रा के दौरान महाराज तेनाली राम से प्रायः कुछ बातें किया करते
थे। उनकी बातों में कई प्रकार की जिज्ञासाएँ हुआ करती थीं। इस बार यात्रा का पहला
पड़ाव एक नगर की धर्मशाला में था। महाराज ने धर्मशाला पहुँचकर स्नान किया और
वस्त्रा बदले। फिर तेनाली राम के साथ पैदल ही नगर भ्रमण के लिए निकले। उन्हें यह
देखकर प्रसन्नता हुई कि उनके राज्य का यह नगर खुशहाल था। बाजार में प्रकाश था।
अधिकांश दुकानों में तोरण द्वार लगे हुए थे। एक स्थान पर महाराज ने भीड़ देखी तो
तेनाली राम के साथ वे यह देखने के लिए उस स्थान पर गए कि भीड़ क्यों लगी हुई है। उस
स्थान पर पहुँचकर महाराज ने देखा कि एक धनाढ्य व्यक्ति गरीबों के बीच अनाज और
पैसे बाँट रहा है। महाराज उस व्यक्ति की दानशीलता से बहुत प्रभावित हुए और तेनाली
राम से कहा, "तेनाली राम! ऐसे दानी और पुण्यात्मा लोगों से ही धरती टिकी हुई है। देखो
इस दानी को, कितनी एकाग्रता से यह गरीबों को दान दे रहा है!"
महाराज इतना ही बोल पाए थे कि दानकर्ता के पास खड़े दो पगड़ीधारी लठैतों ने नारा

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बुलन्द किया, "...बोलो ध्यानी चन्द सेठ की..."
दान लेने के लिए खड़े लोगों ने आवाज लगाई, "जय!"
इस जयकार की गूँज के साथ ही महाराज तेनाली राम का हाथ पकड़कर पुनः धर्मशाला
की दिशा में चल पड़े।
महाराज चाहते थे कि तेनाली राम दान पर भी कुछ बोले। जिस तरह लोगों ने उस सेठ के
लिए जयकार किया था, उससे महाराज के मन में भी इच्छा हो गई थी कि कभी वे भी
गरीबों की बस्ती में जाएँगे और उनकी सहायता के लिए अन्न और द्रव्य दान करेंगे तब लोग
उनके लिए भी ऐसे ही जयघोष करेंगे। सत्ता हमेशा ऐसे ही छोटे प्रलोभन से उत्पन्न जय के
मद में डूबी रहती है। महाराज की इस चाह में भी सत्ता का वही मद काम कर रहा था।
महाराज द्वारा पूछे जाने पर भी तेनाली राम ने सेठ के दान के प्रसंग में कुछ भी नहीं
कहा।
महाराज क्षुब्ध हो उठे और तेनाली राम से चिढ़कर कहा, "तुम कैसे मनुष्य हो? एक प्रश्न
मैंने तुमसे कई बार पूछा लेकिन तुम मौन साधे रहे! आखिर क्यों?"
"महाराज! मैं एक ऐसा मनुष्य हूँ जिसका अपनी देह और मन पर पूर्ण अधिकार है।"
तेनाली राम ने कहा। "यह है आपके अभी-अभी पूछे गए प्रश्न का उत्तर।"
"क्या मतलब?" महाराज ने कहा, "क्यों उलझी हुई बातें कर रहे हो? जो कुछ कहना है,
साफ-साफ कहो।"
"मेरे कहने का मतलब है कि जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाता है, नाविक नौकाएँ
चलाता है, धनुर्धारी शरसन्धान करता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्ययंत्रा बजाता है,
उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति स्वयं पर शासन करता है। मैं ज्ञान-यात्रा का यात्री हूँ इसलिए
स्वयं पर शासन करने का अभ्यास करता हूँ। उचित अवसर आने पर ही मैं आपके पूर्व प्रश्न
का उत्तर दूँगा।"
जब तक ये बातें हो रही थीं तब तक धर्मशाला आ गया था। महाराज तेनाली राम के
उत्तर से सन्तुष्ट नहीं थे और अपने प्रश्न की उपेक्षा के कारण कुपित भी हो उठे थे इसलिए
विश्राम के लिए अपने कक्ष में चले गए।
जाड़े की रात थी। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तेनाली राम ने मध्य रात्रि में महाराज के
कमरे का द्वार खटखटाया। महाराज ने द्वार खोला तो दरवाजे पर तेनाली राम को देखकर
साश्चर्य प्रश्न किया, "क्या हुआ तेनाली राम! इतनी रात गए तुमने द्वार क्यों खटखटाया?"

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“महाराज, बड़ी कृपा होगी यदि आप वस्त्र बदल लें और इस समय नगर भ्रमण के लिए
चलें। शाम को या दिन को जो नगर दिखता है वह नगर का एक रूप है। नगर का
वास्तविक रूप तो रात को ही दिखता है।” तेनाली राम ने कहा।
महाराज मान गए और तैयार होकर तेनाली राम के साथ धर्मशाला से बाहर आ गए।
दोनों पैदल चलते हुए बाजार की ओर आ गए। शाम को इस बाजार में कितनी चहल-
पहल थी! महाराज सोच रहे थे-कितना भव्य और सम्पन्न दिख रहा था बाजार! अभी किस
तरह सन्नाटे में पड़ा है! मानो यहाँ कभी मनुष्य के पाँव ही न पड़े हों! दुकानों के आगे प्रकाश
के स्थान पर अँधेरा था। वे दोनों चलते रहे। एक स्थान पर उन्होंने देखा, एक बेसहारा
आदमी एक दुकान के पायों की ओट में ठिठुर कर लेटा हुआ है। ठंड से बचाव के लिए उसके
पास कम्बल नहीं था। वे लोग धीमी चाल से उस व्यक्ति की ओर बढ़ने लगे। तभी उन्होंने
देखा-विरोधी दिशा से एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े चला आ रहा था। उसकी भी -ष्टि उस व्यक्ति
पर पड़ी और वह तुरन्त उसके पास गया और अपना कम्बल उतारकर धीरे से उसने उस
व्यक्ति को ओढ़ा दिया और स्वयं बिना कम्बल के ही तेज कदमों से वहाँ से चला गया। उसने
उस व्यक्ति पर कम्बल डालते समय इतनी सतर्कता निभाई कि उस व्यक्ति की नींद न टूटे।
महाराज यह -श्य देखकर चमत्कृत हो उठे।
तेनाली राम ने कहा, “महाराज! ऐसे ही लोगों के कारण धरती टिकी हुई है। असल दान
तो यही है। बाकी दान के नाम पर जो कुछ भी होता है वह प्रशस्ति पाने का प्रयास है,
उपक्रम है, व्यापार है...और कुछ भी नहीं।”
महाराज मन-ही-मन ग्लानि से भर उठे कि उनके मन में भी गरीबों को कुछ दान करके
अपना जयघोष सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। उन्होंने तेनाली राम को गले लगाते हुए
कहा, “तेनाली राम! तुमने मेरी आँखें खोल दीं!”

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माँ की पहचान

तेनाली राम विलक्षण बुद्धि का था। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य बनाए
रखता था। उसमें ऐसे अनेक गुण थे जो उसे आम विद्वानों से अलग करते थे। उसकी इन
क्षमताओं के कारण ही महाराज कृष्णदेव राय उसे ऐसे उलझनपूर्ण कार्य भी सौंप दिया
करते थे जिसका हल आम सभासदों के पास नहीं हुआ करता था।

एक बार महाराज एक नवजात शिशु को लेकर बहुत परेशान हो उठे। हुआ यह कि
राजप्रासाद के निकट मन्दिर का पुजारी सुबह एक नवजात को अपनी गोद में उठाए
महाराज के पास पहुँचा और बच्चे को महाराज को सौंपते हुए बताया, “महाराज! आज
सुबह जब मैं मन्दिर की सफाई कर रहा था तब यह नवजात बालक मुझे मन्दिर की
सीढ़ियों के पास पड़ा हुआ मिला। सम्भवतः रात भर यह बालक वहीं पड़ा हुआ था जिसके
कारण ठंडी हवा के झोंकों ने बालक को अस्वस्थ कर दिया। मैंने सबसे पहले रुई के फाहे से
इस बच्चे को दूध पिलाया फिर आँच के पास बैठकर इस बच्चे के शरीर को सेंका जिसके बाद
बालक की स्थिति में सुधार आया। महाराज! मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और मन्दिर में ईश-
वन्दना में लगा रहता हूँ। मुझे अपनी ही सुध नहीं रहती। ऐसे में मैं इस बालक का लालन-
पालन कैसे करूँगा? आप इस राज्य के महाराज हैं। विजयनगर का हर प्राणी आप पर
निर्भर है। यहाँ के प्रत्येक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष और बालक-बालिका की
सुरक्षा की जिम्मेदारी, राजा होने के नाते, आपकी है। ऐसा सोचकर मैं यह बालक आपके
पास लेकर आया हूँ और इसे आपको सौंप रहा हूँ। आप इसके लालन-पालन की व्यवस्था
करें। वैसे महाराज, मेरी सलाह है कि आप इस बालक की माता की तलाश कराएँ और इसे
उसको ही सौंपें क्योंकि एक माँ से अधिक अच्छी परवरिश किसी भी शिशु की कोई दूसरा
नहीं कर सकता। यह बात मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त जीवों के लिए मान्य है।”

महाराज उस पंडित की अकाट्य बातें सुनकर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे
इसलिए उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में ले लिया।

पंडित बालक सौंपने के बाद महाराज से विदा लेकर मन्दिर चला आया।

बालक को अपनी गोद में लेकर महाराज कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में रहे। उनके
मन में बार-बार यह विचार उत्पन्न हो रहा था कि यदि इस शिशु को उसकी माँ की गोद
मिल जाए तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं होगी।

महाराज कृष्णदेव राय धुन के पक्के थे। उन्होंने मन में ठान लिया कि वे इस बच्चे को उसकी
माँ की गोद में ही सौंपेंगे। लेकिन कैसे? यह सवाल उनके अन्तर्मन में बार-बार उमड़-