तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
Tenali Rama Stories (Tales of Wit and Humour)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
घोड़े को एड़ लगाई। घोड़ा सरपट भागने लगा। एक स्थान विशेष पर
महाराज कृष्णदेव राय पसीने से तरबतर थे। यह पसीना उनके शरीर से इस अप्रत्याशित
दृश्य के कारण निकल रहा था। यह श्रमजनित स्वेद नहीं था। किंकर्तव्यविमूढ़ से महाराज ने
घोड़े को एड़ लगाई। घोड़ा सरपट भागने लगा। एक स्थान विशेष पर
साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज कृष्णदेव राय को रुकने का संकेत किया। महाराज ने
घोड़े की लगाम खींच ली और घोड़े से उतर गए। साधुवेशी तेनाली राम भी घोड़े से उतर
आया और महाराज से कहा, “राजन! घोड़े को यहाँ विश्राम करने के लिए छोड़ दो और मेरे
साथ आओ। अब कुछ दूर हमें पैदल चलना होगा,“ यह कहते हुए साधुवेशी तेनाली राम
एक दिशा में चल पड़ा।
विवश थे महाराज कृष्णदेव राय! साधु के साथ चलने के सिवा कोई चारा उनके पास
नहीं था मगर वे आशंकित थे कि न जाने यह साधु उन्हें कहाँ ले जा रहा है क्योंकि जिस
दिशा में वह साधुवेशी तेनाली राम बढ़ रहा था उस दिशा में कहीं कोई सड़क नहीं थी, न
कोई ऐसी पगडंडी कि जिससे पता चले कि यहाँ से किसी मानव-बस्ती की ओर जाया जा
सकता है!
थोड़ी दूरी दोनों ने मौन रहकर पूरी की। फिर पेड़ों की झुरमुटों में कुछ झोंपड़ियाँ दिखने
लगीं। महाराज कृष्णदेव राय आश्वस्त हो गए कि वे किसी मानव-बस्ती के ही निकट हैं।
एक झोंपड़ी के निकट पहुँचकर साधुवेशी तेनाली राम ने आवाज दी, "माँ!"
झोंपड़ी के भीतर से एक क्लान्त महिला का स्वर उभरा, “आती हूँ...बेटा!...कौन है
तू...द्वार पर...किसे पुकार रहा है? यहाँ तो कोई आता नहीं कभी भी...आवाज देने!”
कुछ ही देर में झोंपड़ी के द्वार पर एक वृद्ध महिला आकर खड़ी हो गई और कहा,
“बोल...क्या कहना है? कौन हो तुम? क्या चाहिए तुम्हें?”
साधुवेशी तेनाली राम ने अपने कंधे से लटके कमंडल से कुछ फल निकालकर उस वृद्धा
को दिया और कहा, “यही देने आया था, “माँ!”
वृद्धा चकित दृष्टि से साधुवेशी तेनाली राम और उसके साथ राजसी परिधान में खड़े
महाराज कृष्णदेव राय को देख रही थी और साधुवेशी तेनाली राम महाराज कृष्णदेव राय
से मन्द स्वर में कह रहा था, “देखो राजन! यह वृद्धा भी तुम्हारे वैभवशाली विजयनगर
की प्रजा है। इसके प्रति भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य है।... अब चलो! मैंने वृथा ही तुम्हें कष्ट नहीं
दिया। अब सूरज ढलने से पहले तुम्हें तुम्हारे राजभवन के द्वार तक पहुँचाना मेरा कर्तव्य है।
यहाँ के मार्ग तुम्हारे लिए अपरिचित से हैं...कहीं भटक न जाओ...”
महाराज कृष्णदेव राय के लिए वह वृद्धा और वहाँ का सम्पूर्ण परिवेश पूरी तरह
अपरिचित था। उनकी कल्पना में भी कभी यह बात नहीं आई थी कि उनके राज्य में भी
ऐसी वृद्धा रहती है। ऐसी विवश और अकल्पनीय स्थिति में भी लोग साँस ले सकते हैं,
यह अब तक उनके अनुभव क्षेत्र में नहीं आया था।
साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज कृष्णदेव राय के साथ चलते हुए अपनी बातें जारी
रखीं। उसने महाराज से कहा, “राजन! यह वृद्धा कुष्ठ रोगी है और अपने परिजनों द्वारा
बहिष्कृत है। गाँववालों ने इस वृद्धा के ग्राम प्रवेश को वर्जित कर दिया है कि कहीं इस वृद्धा
के सम्पर्क में आने से कोई अन्य इस गलित रोग का शिकार हो जाए। ऐसी अनेक
वास्तविकताओं से परिचित होने के बाद ही तुम अपने राज्य की सम्पदा का सही उपयोग
करने के योग्य बन सकोगे!”
बातें करते हुए दोनों घोड़े के पास आ चुके थे। तभी साधुवेशी तेनाली राम ने पूछा, “क्यों
राजन! अपने राज्य की इन वास्तविकताओं से परिचित होने के बाद तुम्हें कैसा लग रहा है?
क्या तुम समझ पा रहे हो कि राज्य की सम्पदा का उपयोग कैसे और कहाँ होना चाहिए?”
महाराज कृष्णदेव राय से रहा नहीं गया। वे अपने वैभव-प्रदर्शन के निर्णय के कारण
लज्जित थे और अपने राज्य के पीड़ित जनों को देखकर द्रवित हो उठे थे। पश्चात्ताप-भरे
स्वरों में उन्होंने कहा, “महाराज! आपने मुझे प्रजाजनों को देखने की नवीन दृष्टि दी है। मैं
आपका ऋणी हूँ।” ऐसा कहकर वे विनीत भाव से साधुवेशी तेनाली राम के पैरों पर गिर
पड़े, “मुझे क्षमा करें महाराज! मैं अहंकार के वशीभूत होकर दर्प भरा निर्णय ले बैठा।”
साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज को कन्धा पकड़कर उठाया और अपने वास्तविक स्वर
में बोल पड़ा, “अरे...अरे महाराज! ऐसा न करें! मैं तो आपका सेवक तेनाली राम हूँ।” ऐसा
कहते हुए तेनाली राम ने अपने जटाजूट और दाढ़ी-मूँछ उतारकर अपना वास्तविक चेहरा
महाराज कृष्णदेव राय को दिखा दिया।
महाराज ने उसे गले लगाते हुए कहा, “तुमने मेरी आँखें खोल दीं, तेनाली राम!”
फिर, दोनों घोड़े पर सवार होकर राजधानी लौट आए।
विजयनगर के राजप्रासाद में दूसरे दिन से सब कुछ सामान्य हो गया। महाराज कृष्णदेव
राय नियमित दरबार लगाने लगे। उस वर्ष विजयनगर में पहले से भी अधिक उमंग में
विजयोत्सव मनाया गया। विजयोत्सव में सैनिकों की शौर्यकलाओं के प्रदर्शन का कार्यक्रम
रद्द कर दिया गया और पहले की भाँति ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही।