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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन

Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)

DevanagariHindipublished118 pages

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महाराज के समीप आकर कहा, “महाराज! मैंने सभी धर्मग्रन्थों का अध्ययन कर लिया है।
मैं सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो गया हूँ। आप मुझे अपना गुरु बना लें!”
महाराज ने युवक की ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोले, “युवक! यह ठीक है कि तुमने
सभी शास्त्र पढ़ लिये हैं मगर मेरा गुरु बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है। अब तो तुम्हें
अपने अध्ययन पर चिन्तन करना चाहिए। ...मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि तुममें अभी
भी कोई कमी है जिसके कारण मैं अभी तुम्हें अपना गुरु नहीं बना सकता।”
महाराज की बातें सुनकर वह युवक वापस लौट गया।
तेनाली राम उस समय वहीं था। उसने महाराज और युवक की बातें सुनी थीं। उसने कहा,
“महाराज! आपने ठीक ही कहा था कि युवक बहुत महत्त्वाकांक्षी है। सोद्देश्य साधना कर
रहा है, यह भी उसके महत्त्वाकांक्षी होने का संकेत है...और देखिए उसकी महत्त्वाकांक्षा की
पराकाष्ठा-वह आपका गुरु बनना चाहता है। इसका अर्थ तो यही है कि वह विजयनगर का
राजगुरु बनने की अभीप्सा से यहाँ आया है।”
“तुम ठीक समझे तेनाली राम!” महाराज ने उत्तर दिया।
और बात वहीं समाप्त हो गई।
महाराज अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गए। वही रोज दरबार का काम-काज देखना
और कभी-कभी प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर के भ्रमण पर निकल जाना-
यही थी उनकी सामान्य दिनचर्या।
वर्ष बीतते देर नहीं लगी। महाराज अपने अभ्यास के अनुरूप ही वार्षिक समारोह की
तैयारियों की स्वयं समीक्षा करते। कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे, कहाँ रंगमंच
बनेगा, पनसाला कहाँ लगेगी और भोजनालय कहाँ बनेगा; प्रजा को इस वर्ष के समारोह के
समय राज्य की ओर से मिलनेवाले भोजन के लिए क्या-क्या पकेगा-यानी छोटी से छोटी
बात के लिए भी महाराज स्वयं निर्देश दे रहे थे। तेनाली राम हमेशा की तरह उनके साथ
था।
हर्षोल्लास के साथ विजयनगर का वार्षिकोत्सव आरम्भ हुआ। इस वार्षिकोत्सव के
आरम्भ में वह युवा तपस्वी महाराज के पास आया लेकिन इस बार उसने महाराज से गुरु
बनाने को नहीं कहा। महोत्सव के अवसर पर उसने महाराज को शुभकामनाएँ दीं तथा
महाराज से कहा, “महोत्सव के समय रास-रंग-मनोरंजन के साथ ही उन्हें कोई धार्मिक
अनुष्ठान कराना चाहिए।”
महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा।