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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन

Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)

DevanagariHindipublished118 pages

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माँ की पहचान

तेनाली राम विलक्षण बुद्धि का था। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य बनाए
रखता था। उसमें ऐसे अनेक गुण थे जो उसे आम विद्वानों से अलग करते थे। उसकी इन
क्षमताओं के कारण ही महाराज कृष्णदेव राय उसे ऐसे उलझनपूर्ण कार्य भी सौंप दिया
करते थे जिसका हल आम सभासदों के पास नहीं हुआ करता था।

एक बार महाराज एक नवजात शिशु को लेकर बहुत परेशान हो उठे। हुआ यह कि
राजप्रासाद के निकट मन्दिर का पुजारी सुबह एक नवजात को अपनी गोद में उठाए
महाराज के पास पहुँचा और बच्चे को महाराज को सौंपते हुए बताया, “महाराज! आज
सुबह जब मैं मन्दिर की सफाई कर रहा था तब यह नवजात बालक मुझे मन्दिर की
सीढ़ियों के पास पड़ा हुआ मिला। सम्भवतः रात भर यह बालक वहीं पड़ा हुआ था जिसके
कारण ठंडी हवा के झोंकों ने बालक को अस्वस्थ कर दिया। मैंने सबसे पहले रुई के फाहे से
इस बच्चे को दूध पिलाया फिर आँच के पास बैठकर इस बच्चे के शरीर को सेंका जिसके बाद
बालक की स्थिति में सुधार आया। महाराज! मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और मन्दिर में ईश-
वन्दना में लगा रहता हूँ। मुझे अपनी ही सुध नहीं रहती। ऐसे में मैं इस बालक का लालन-
पालन कैसे करूँगा? आप इस राज्य के महाराज हैं। विजयनगर का हर प्राणी आप पर
निर्भर है। यहाँ के प्रत्येक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष और बालक-बालिका की
सुरक्षा की जिम्मेदारी, राजा होने के नाते, आपकी है। ऐसा सोचकर मैं यह बालक आपके
पास लेकर आया हूँ और इसे आपको सौंप रहा हूँ। आप इसके लालन-पालन की व्यवस्था
करें। वैसे महाराज, मेरी सलाह है कि आप इस बालक की माता की तलाश कराएँ और इसे
उसको ही सौंपें क्योंकि एक माँ से अधिक अच्छी परवरिश किसी भी शिशु की कोई दूसरा
नहीं कर सकता। यह बात मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त जीवों के लिए मान्य है।”

महाराज उस पंडित की अकाट्य बातें सुनकर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे
इसलिए उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में ले लिया।

पंडित बालक सौंपने के बाद महाराज से विदा लेकर मन्दिर चला आया।

बालक को अपनी गोद में लेकर महाराज कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में रहे। उनके
मन में बार-बार यह विचार उत्पन्न हो रहा था कि यदि इस शिशु को उसकी माँ की गोद
मिल जाए तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं होगी।

महाराज कृष्णदेव राय धुन के पक्के थे। उन्होंने मन में ठान लिया कि वे इस बच्चे को उसकी
माँ की गोद में ही सौंपेंगे। लेकिन कैसे? यह सवाल उनके अन्तर्मन में बार-बार उमड़-