Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन

Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)

DevanagariHindipublished118 pages

प्रस्तावना व विषय-सूची (Intro & TOC)

Page 1Permalink

तेनाली राम
की
अनोखी दुनिया

Page 2Permalink

विषय सूची

  1. ...अब क्या होगा?
  2. आजादी
  3. आसमानी सौगात
  4. इस तरह हुआ हिसाब बराबर
  5. एक खरीदारी ऐसी भी
  6. ...और उस दिन मंत्रणा नहीं हुई
  7. कपड़ों की प्रतिष्ठा
  8. ‘कुछ नहीं’ की अदायगी
  9. खिलाने वाला ‘वो’
  10. गदहे की खरीद
  11. चाबी की खोज
  12. चैपाये का चक्कर
  13. जादूगर मुल्ला नसीरुद्दीन
  14. जाँबाज मुल्ला नसीरुद्दीन
  15. जीवों पर दया का उपदेश
  16. जेब की प्यास
  17. ठीक है, आ जाओ
  18. तलवार के बदले गदहा
Page 3Permalink
  1. तसल्ली भरे कदम
  2. ...दौलत बख्शो ऐ खुदा!
  3. नया शिष्य
  4. नहले पर दहला
Page 4Permalink

ईमानदारी
महाराज कृष्णदेव राय कभी-कभी अपने दरबार में इतने सहज हो जाते थे कि उन्हें देखकर
कोई कह नहीं सकता था कि वे एक कुशल प्रशासक, कुशल राजनीतिज्ञ और अनुशासनप्रिय
शासक हैं। जिस दिन महाराज में सहजता दिखती, उस दिन आम सभासद भी मस्ती में
आ जाते। सभा भवन में हँसी, ठिठोली, बहस, बतरस सब कुछ होता।
तेनाली राम एकमात्र ऐसा सभासद था जो यह समझता था कि महाराज का अचानक
सहज हो जाना और सभासदों को इस तरह ढील देना भी उनकी शासन-नीति का हिस्सा
है। इससे महाराज अपने सभासदों की मूल प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास करते हैं।
सभासदों में खुलापन आते ही थोड़ी-बहुत उच्छृंखलता भी आ जाती थी जिसे उस दिन
महाराज क्षम्य मानते थे लेकिन उच्छृंखल होने वाले सभासदों के प्रति उनका व्यवहार बाद
में बदल जाता था। वे ऐसे सभासदों से कड़ाई से पेश आते और आदेशात्मक होकर छोटी
पंक्तियों में बातें करते।
एक दिन तेनाली राम थोड़ी देर से सभाभवन में पहुँचा। उस समय एक सभासद कोई
मनोरंजक घटना सुना रहा था। उसकी बातें समाप्त होने पर सभी सभासद हँस पड़े।
महाराज भी खूब हँसे। चूँकि तेनाली राम ने पहले कही गई बातें नहीं सुनी थीं इसलिए वह
नहीं हँसा। अपने आसन पर गम्भीर बना बैठा रहा। महाराज ने उसे देखा और महसूस
किया कि सबके हँसने में तेनाली राम साथ नहीं दे रहा है। महाराज को यह बात बुरी
लगी मगर उन्होंने उस समय तेनाली राम से कुछ नहीं कहा।
न जाने कैसे सभासदों के बीच दान-पुण्य, धर्म-कर्म और ईमानदारी पर बहस होने लगी।
एक सभासद ने कहा, “महाराज! मेरे विचार से धनवान लोग गरीबों की तुलना में
अधिक ईमानदार होते हैं। वे स्वयं साधन-सम्पन्न होते हैं। आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु उन्हें
उपलब्ध होती है इसलिए छोटी-छोटी चीजों के लिए उनका ईमान नहीं डोलता। वे दान-
पुण्य करते हैं इसलिए उनमें धार्मिक भावना भी विद्यमान रहती है जबकि गरीबों का
ईमान जल्दी ही डोल जाता है।”
तेनाली राम, जो अब तक चुप था, इस सभासद की बातें सुनने के बाद अपने आसन से
उठा और बोला, “महाराज! मैं माननीय सभासद के इस कथन से सहमत नहीं हूँ। मेरा
विश्वास है कि गरीब आदमी अधिक धर्मभीरु होता है। वह भगवान से डरता है, इसलिए
वह गलत काम करने से बचता है। ईश्वर का भय गरीबों को इतना अधिक होता है कि
उसका ईमान इसी भय के कारण डोलता नहीं। धनवान में ईश्वर का भय इस तरह का नहीं

Page 5Permalink

होता। उसके दान-पुण्य में भी लौकिक प्रतिष्ठा की चाह छुपी रहती है कि लोग उसे
ऐश्वर्यशाली और परोपकारी के रूप में स्वीकार करें।”
तेनाली राम की गम्भीर वाणी थोड़ी देर तक सभाभवन में अनुगूँज उत्पन्न करती रही।
तेनाली राम के चुप होते ही महाराज ने कहा, “तेनाली राम! तुम एक मूल बात भूल रहे
हो, ईमानदारी एक मानवीय गुण है जो किसी में भी हो सकता है। इसमें धनवान और
निर्धन की कोई बात ही नहीं है।”
तेनाली राम ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं महाराज! बस, मैं यह कह रहा था कि गरीबों
के संघर्ष की ऊष्मा ईमानदारी की ऊष्मा के समरूप होती है। इसी ऊष्मा के कारण गरीबों
में उचित-अनुचित का ध्यान रखने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है।“
“तो, तुम फिर वही कह रहे हो कि गरीबों में ईमानदारी होती है और धनवान, वैभव-
सम्पन्न लोगों में अपेक्षाकृत इसका अभाव रहता है?” महाराज ने पूछा।
“जी हाँ श्रीमान-यही कहना चाहता हूँ मैं।” तेनाली राम ने निर्भीक होकर कहा।
महाराज स्वयं वैभव-सम्पन्न थे इसलिए तेनाली राम की बातें उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर
ले लीं और तेनाली राम से कहा, “तुम्हें प्रमाणित करना पड़ेगा तेनाली राम!”
“मुझे स्वीकार है महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
सभा में जो सहजता थी, इस गम्भीर चर्चा के कारण समाप्त हो गई। महाराज ने उसी
समय सभा विसर्जित कर दी और तेनाली राम को रोककर शेष सभासदों को जाने दिया।
लौट रहे सभासदों में इसी बात की चर्चा हो रही थी कि आज महाराज तेनाली राम से
नाराज हो गए...कि महाराज से तेनाली राम को मुँह नहीं लगाना चाहिए...कि अब आया
है ऊँट पहाड़ के नीचे! अर्थात् जितने मुँह, उतनी बातें!
सभासदों के जाने के बाद महाराज ने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली राम, तुम कितने
दिनों में सिद्ध कर सकोगे कि धनवानों की अपेक्षा गरीब आदमी अधिक ईमानदार होता
है?”
“महाराज! मुझे सौ-सौ स्वर्णमुद्राओं की दो थैलियाँ और दो सुरक्षा प्रहरी प्रदान करें। मैं
यह बात दो दिनों अर्थात आज और कल में प्रमाणित कर दूँगा कि धनवान लोगों में धन-
लोलुपता होती है जो उन्हें ईमानदार नहीं रहने देती जबकि गरीबों में धन-लोलुपता नहीं
होती!” तेनाली राम ने कहा।
महाराज तेनाली राम के इस उत्तर से भीतर ही भीतर तिलमिला गए। मगर उन्होंने कुछ

Page 6Permalink

कहा नहीं। उन्होंने तेनाली राम को दो थैलियों में स्वर्णमुद्राएँ और दो प्रहरी उपलब्ध करा
दिए।
तेनाली राम उन्हें लेकर राजभवन से बाहर राजमार्ग की ओर, महाराज की आज्ञा लेकर,
चल पड़ा। महाराज से चलते समय उसने कहा, “महाराज, आप मुझे शुभकामना दें कि कल
शाम तक मैं प्रमाण सहित अपनी बातें सिद्ध कर सकूँ।”
तेनाली राम ने दोनों प्रहरियों को व्यापारी वेश में अपने घर आने का निर्देश दिया और
स्वयं अपने घर चला गया। वह अपने साथ स्वर्णमुद्राओं की थैलियाँ भी लेता गया। ऐसे
अवसर पर तेनाली राम बहुत सजग हो जाया करता था। उसके रन्ध्र-रन्ध्र में सजगता
उत्पन्न हो जाती थी यानी वह सहस्रनेत्रधारी बन जाता था। लोग उसके इसी गुण के कारण
ही उसे 'चक्षुश्रवा' और 'प्रज्ञाचक्षु' आदि विशेषणों से सम्बोधित किया करते थे।
उसके घर पहुँचने के थोड़ी देर बाद ही दोनों प्रहरी व्यापारियों के बाने में उसके घर
पहुँचे। तेनाली राम उन्हें लेकर विजयनगर के बाजार में चला आया और देर तक इधर-
उधर टहलता रहा। वापसी के समय उसने दोनों प्रहरियों को एक-एक स्वर्णमुद्राओं की
थैली थमा दी और एक को एक धनी व्यापारी के आगे चलते हुए थैली कहीं सुनसान इलाके
में गिराकर चले जाने को कहा। उसने प्रहरी को उस धनी आदमी को भी दिखा दिया जिस
धनी आदमी के आगे उसे चलना था। सम्भवतः तेनाली राम उस धनी आदमी को
पहचानता था और जानता भी था कि वह कहाँ रहता है। पुनः दूसरे प्रहरी को एक गरीब
आदमी के आगे-आगे जाने का उसने निर्देश दिया और प्रहरी को बता दिया कि उस गरीब
आदमी का गन्तव्य क्या है। इस प्रहरी को भी तेनाली राम ने सुनसान स्थान पर थैली इस
तरह गिराने को कहा जिसे वह गरीब आदमी देख ले...।
अपनी व्यूह-रचना तैयार कर लेने के बाद उसने दोनों प्रहरियों को यह निर्देश भी दिया
कि वे दोनों थैलियाँ गिरा देने के बाद तेजी से आगे जाएँ और कहीं छुप जाएँ। जब उनका
'शिकार' राह में गिरी थैली लेकर बढ़े तब वे उनका पीछा करें और देखें कि वे थैली का क्या
करते हैं!
अपने द्वारा दिए गए निर्देशों से तेनाली राम सन्तुष्ट था। उसे विश्वास था कि आज रात में
ही उसे वांछित प्रमाण प्राप्त हो जाएगा। दोनों प्रहरियों को विदा करने के बाद तेनाली राम
अपने घर लौट आया।
दूसरे दिन, सुबह ही दोनों प्रहरी तेनाली राम के घर पर पहुँच गए। वह उस समय
दरबार जाने के लिए तैयार हो रहा था। उसने प्रहरियों से पूछा, “क्या समाचार लाए
हो?”

Page 7Permalink

एक प्रहरी ने तेनाली राम से कहा, “श्रीमान, मैं आपके निर्देश पर जिस व्यक्ति के पीछे
गया था उसका नाम गिरधारी लाल है। उसकी बाजार में सोने-चाँदी के जेवरों की दुकान
है। बहुत पैसेवाला आदमी है वह।”
अभी उसकी बात पूरी नहीं हुई थी कि तेनाली राम ने उसे टोक दिया, “अरे भाई! मैंने
तुम्हें किसी के पीछे नहीं भेजा था-आगे भेजा था। ठीक से सारी बातें बताओ।”
“क्षमा करना श्रीमान! भूल हो गई!“ प्रहरी ने कहा और कल शाम को घटित घटना
बताने लगा, “श्रीमान! जब मैं उस आदमी, मेरा मतलब है कि गिरधारी लाल के आगे-
आगे चलते हुए कदम्ब पेड़ के पास पहुँचा तो मुझे राह पूरी तरह खाली दिखी। सुनसान
रास्ते पर दो ही मुसाफिर थे-मैं और वह। मैं उससे मात्र चार कदम की दूरी पर था। मौका
देखकर मैंने कमर में खोंसी हुई स्वर्णमुद्राओं की थैली गिरा दी और सामान्य चाल से आगे
बढ़ता रहा, मानो मुझे थैली गिरने का भान ही नहीं है। कुल चार कदम चलकर मैंने अपनी
गर्दन पीछे की ओर हल्के से घुमाई तो पाया, वह व्यक्ति नीचे गिरी थैली उठा रहा था।
मैंने अपनी गति बढ़ा दी। थैली उठाने के बाद वह थोड़ी धीमी गति से चलने लगा। मैं तेज
चलता हुआ राह में आए एक पेड़ की ओट लेकर खड़ा होकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा। जब
वह उस पेड़ से थोड़ा आगे निकल गया तब मैं भी पेड़ की ओट से बाहर निकलकर उसका
पीछा करने लगा। वह आदमी हल्दी बाजार के निकट बसे कुलीनों के मुहल्ले में बने
गुलाबी मकान में रहता है। उसके घर की बाहरी दीवार पर उसका नाम खुदा हुआ है-
गिरधारी लाल। मैंने घर के चारों ओर छोड़ी गई खुली जमीन का लाभ लिया और एक
कमरे की खुली खिड़की से अन्दर झाँका तो पाया कि गिरधारी लाल थैली से स्वर्णमुद्राएँ
निकालकर गिन रहा है। उसने मुद्राएँ गिनकर उन्हें थैली में रखा और आसमान की ओर
हाथ जोड़े कुछ देर तक खड़ा रहा फिर स्वर्णमुद्राओं की थैली को कमरे में लगी तिजोरी में
रखा। तभी एक वृद्ध व्यक्ति उस कमरे में आया और पूछा, ‘क्या बात है गिरधारी? तुमने
हाथ-पाँव भी नहीं धोए और कमरे में चले आए? तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है?’ प्रतिउत्तर में
उसने क्या कहा, मैं नहीं सुन पाया।“
तेनाली राम ने उस प्रहरी की पीठ थपथपाई और दूसरे प्रहरी की ओर देखकर पूछा,
“तुम्हारा समाचार!”
उस प्रहरी ने कहा, “श्रीमान, मैं जिस व्यक्ति के पीछे गया था वह बहुत गरीब और
ईमानदार आदमी है। हल्दी बाजार के पश्चिम में बसे मछुआरों की बस्ती में रहता है। जब मैं
उसके आगे चलते हुए एक स्थान पर थैली गिराकर आगे बढ़ा तब उसने आवाज
लगाई-‘अरे भाई साहब! आपकी थैली!’ मैंने उसकी आवाज अनसुनी कर दी और तेजी से
आगे बढ़ने लगा और वह हाथ में थैली लिये लगभग दौड़ता हुआ, ‘भाई साहब, भाई साहब’
पुकारता रहा। अभी वह दो-चार कदम ही दौड़ पाया था कि उसके पाँव में किसी चीज से
ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। उसके हाथ से थैली छिटक गई और उसमें से स्वर्णमुद्राएँ
निकलकर सड़क पर बिखर गईं। तब तक मैं सड़क के पास के एक गड्ढे में जाकर छुप गया।

Page 8Permalink

थोड़ी देर बाद वह आदमी हाथ में थैली लिये, इधर-उधर देखता हुआ तेज कदमों से जाता
दिखा। सम्भवतः वह मुझे ही तलाश रहा था। मैं थोड़ी देर के बाद उस गली से निकला और
उससे कुछ दूरी बनाकर चलने लगा। जब वह व्यक्ति अपने घर पहुँच गया तब चटाई पर
बैठकर उसने स्वर्णमुद्राएँ गिनीं। उसने एक कपड़े के टुकड़े में थैली बाँधकर अपने हाथ में ले
ली और उसने कहीं जाने के लिए निकल गया। मैंने समझा कि जरूर वह स्वर्णमुद्राओं को
छुपाने के लिए जा रहा होगा लेकिन वह अपने घर से सीधे राज्य कोषागार पहुँचा और
सौ स्वर्णमुद्राओं की वह थैली वहाँ जमा कराकर पर्चा कटवाया। उसके बाद वह अपने घर
चला आया। राज्य कोषागार में उसने पर्चे पर अपना नाम रामानुजम् लिखवाया है।
तेनाली राम ने उस प्रहरी की भी पीठ थपथपाई और उन्हें सीधे राजभवन पहुँचने का
निर्देश देकर भोजन के लिए अपने घर के भीतर चला गया।
"महाराज! आपको अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी! आप कृपा कर राज्य कोषागार
से यह पता कराएँ कि राजमार्ग में पड़ी सौ-सौ स्वर्णमुद्राओं की दो थैलियाँ क्या किसी को
मिली हैं? और राज्य कोषागार में यदि इस तरह की थैलियाँ जमा कराई गई हैं तो जमा
करानेवाला कौन था?"
“अरे!“ महाराज चैंक पड़े। "क्या बात हो गई तेनाली राम! तुम शेष सभासदों के आने की
प्रतीक्षा भी नहीं करना चाहते?“ उन्होंने तेनाली राम से कहा।
"महाराज!" तेनाली राम ने विनम्रता से कहा, "जिन दो प्रहरियों की सेवाएँ मैंने ली थीं,
वे दोनों रात भर जगे रहे हैं। मैं उनकी सेवाएँ वापस करने के उद्देश्य से ही सभा शुरू होने के
समय से पहले पहुँच गया हूँ। कल जो पहेली सुलझाने का जिम्मा आपने मुझे सौंपा था
उसके लिए 'प्रमाण' प्राप्त कर लेने के उद्देश्य से मैं सक्रिय हुआ हूँ। कृपया वांछित सूचनाएँ
मँगाने में मेरा सहयोग करें। यदि आप निर्देश देंगे तो सूचना अतिशीघ्र प्राप्त हो जाएगी।
और सभासदों के आने पर इन दोनों प्रहरियों को मुक्ति मिल सकेगी ये दोनों प्रहरी मेरे शोध
के प्रमाण भी हैं और प्रत्यक्षदर्शी भी।"
महाराज कृष्णदेव राय समझ चुके थे कि तेनाली राम ने गरीबी और ईमानदारी का
सम्बन्ध स्थापित करने का कोई सूत्र अवश्य पा लिया है।
उन्होंने राज्य कोषागार से सूचना मँगाई। सूचना पत्र में लिखा गया था कि रामानुजम्
नाम के एक व्यक्ति ने सौ स्वर्णमुद्राओं की एक थैली राज्य कोषागार में कल मध्य रात्रि से
पूर्व जमा कराई है। यह थैली उसे राजमार्ग से हल्दी बाजार जानेवाली राह पर मिली थी।
रामानुजम् हल्दी बाजार के पास मछेरों की बस्ती में रहता है और मधुमक्खियों के छत्ते से
मधु निकालने का कार्य करता है।
महाराज ने सूचना-पत्र का अवलोकन कर उसे तेनाली राम को सौंप दिया।

Page 9Permalink

जब सभा भवन में सभी सभासद पहुँच गए तब तेनाली राम ने कहना आरम्भ किया,
“महाराज! आपके निर्देश पर कल मैंने एक प्रयोग किया और प्रयोग का परिणाम मुझे आज
मिल गया। यह सूचना-पत्र, जो राज्य कोषागार से मँगाया गया है, वह एक गरीब व्यक्ति के
ईमानदार होने का प्रमाण-पत्र है। यह सूचना-पत्र बताता है कि गरीब आदमी धन-लोलुप
नहीं होता है।” फिर तेनाली राम ने सविस्तार अपनी योजना के क्रियान्वयन की कथा सभा
भवन में सुनाई। प्रमाण के रूप में दोनों प्रहरियों को प्रस्तुत किया।
दोनों प्रहरियों ने सभासदों को सम्पूर्ण घटना की जानकारी दी।
महाराज ने सिपाहियों को भेजकर सेठ गिरधारी लाल को पकड़वाकर मँगवाया। पहले
तो सेठ इस घटना को ही गलत बताता रहा लेकिन जब तेनाली राम ने उससे कहा कि सौ
स्वर्णमुद्राओं से भरी थैली तुमने अपने कमरे की दीवार में लगी तिजोरी में रखी है तब वह
सेठ टूट गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
महाराज ने सिपाहियों को भेजकर स्वर्णमुद्राएँ मँगा लीं और उसे राज्य कोषागार को
सौंप दिया गया। सेठ गिरधारी लाल को महाराज ने जेल भिजवा दिया। गरीब रामानुजम्
को दरबार में बुलाकर सौ स्वर्णमुद्राएँ उसकी ईमानदारी के पुरस्कारस्वरूप प्रदान कीं।
इसके बाद महाराज ने तेनाली को अपने गले से लगा लिया और कहा, ”सचमुच तेनाली
राम! तुम्हारी मेधा का कोई दूसरा उदाहरण मैंने कहीं नहीं देखा।“

Page 10Permalink

स्वर्ण मूषक पुरस्कार
महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार के सभी सभासदों को विशेष महत्त्व देते थे किन्तु फिर
भी सभासदों को प्रायः ऐसा लगा करता था कि महाराज तेनाली राम पर अधिक कृपालु हैं
और उसे ऐसा मौका दे दिया करते हैं कि वह शेष सभी सभासदों पर भारी पड़ता है।
इसलिए आम सभासद ऐसे अवसरों की तलाश में रहते थे जिसमें तेनाली राम का मजाक
उड़ाया जा सके।
एक दिन महाराज का दरबार लगा हुआ था। आम दिनों की तरह ही राज्यसभा की
कार्रवाई चल रही थी। तभी महाराज ने एक अजीब सी गन्ध उठती महसूस की। उन्होंने
सभासदों से पूछा, “क्या उन्हें कोई दुर्गन्ध महसूस हो रही है?"
सभी सभासदों ने बिना सतर्कता से दुर्गन्ध अनुभव करने की कोशिश किए ही कहा, “नहीं
महाराज!”
लेकिन तेनाली राम अपने आस-पास की हवा को महसूस करता हुआ बोला, “हाँ,
महाराज! ऐसी गन्ध मरे चूहे के शरीर में सड़न उत्पन्न होने के कारण पैदा होती है। लगता
है, कहीं आस-पास ही कोई चूहा मरा पड़ा है।”
महाराज ने सेवकों से अविलम्ब चूहे की खोज करने के लिए कहा।
थोड़ी ही देर में एक सेवक ने मरा चूहा ढूँढ़ निकाला और उसे लेकर महाराज के पास
चला आया।
महाराज सेवक पर नाराज हो गए। उन्होंने कहा, “ठीक है! तुमने इसे खोज निकाला
मगर इसे यहाँ लाने की आवश्यकता क्या थी? कहीं फेंक आते, फिर मुझे आकर सूचना दे
देते! मैं इस चूहे का क्या करूँगा?”
सेवक डर से थरथर काँपने लगा।
तभी एक दरबारी ने कहा, “महाराज, आप चाहें तो चूहा इस दरबार के सबसे विद्वान
सभासद तेनाली राम को भेंट कर सकते हैं। आपने उसे तरह-तरह के उपहार दिए हैं, आज
मरा चूहा ही सही!”
उस दरबारी की बात पर सभी सभासद ही-ही-ही-ही करने लगे। बोलनेवाला सभासद
इस दरबार में मसखरा सभासद माना जाता था इसलिए महाराज ने उसकी बातें अनसुनी

Page 11Permalink

कर दीं। मगर तेनाली राम इस सभासद की बातों में छुपे कटाक्ष से तिलमिला गया और
तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “माननीय सभासद! यदि महाराज ने मुझे
यह चूहा उपहार में दिया तो मैं इसे आदर के साथ ग्रहण करूँगा। ऐसे भी चूहा विकल्पों का
प्रतीक है। भगवान गणपति का वाहन ऐसे ही नहीं बन गया है।”
महाराज तेनाली राम के प्रतिवाद पर मुस्कुरा उठे और बोले, “मरे चूहे का तुम क्या
करोगे?”
“यदि आपने मुझे यह चूहा भेंट किया तब मैं यह समझूँगा कि आप मेरी बुद्धि की
परीक्षा लेना चाहते हैं और यह परीक्षा देने के लिए मैं इस चूहे से व्यापार करूँगा
महाराज!” तेनाली राम ने कहा।
“मरे चूहे से व्यापार? यह तुम कैसे कर सकते हो तेनाली राम?” महाराज ने पूछा।
“महाराज! संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई-न-कोई उपयोग है। कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं
है। मैं इस मरे चूहे को किसी सपेरे को बेच आऊँगा और उससे गुड़ खरीद लूँगा। इन दिनों
गर्मी का मौसम है। मैं उस गुड़ को पानी में मिलाकर मीठा पानी बेचूँगा। मीठा पानी
बेचने से जो पैसे मिलेंगे उससे चना खरीदूँगा और चना बेचकर, चना से बने पकवान, सत्तू,
गुड़चना आदि बेचकर अच्छा पैसा कमाउँगा और उन पैसों से कोई बड़ा रोजगार आरम्भ
करूँगा।” तेनाली राम ने कहा।
महाराज तेनाली राम की बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और सभासदों से कहा, “तेनाली
राम की यही तर्कबुद्धि उसे तेनाली राम बनाती है। ऐसी तर्कबुद्धि आम इनसान में प्रायः
दुर्लभ है। हमें इस बात का गर्व है कि हमारे दरबार में तेनाली राम जैसा बुद्धिमान सभासद
है। मैं आज इसके उत्तर से इतना सन्तुष्ट हूँ कि इसके लिए ‘स्वर्ण मूषक’ पुरस्कार की
घोषणा करता हूँ तथा राज्य के कोषाध्यक्ष को आदेश देता हूँ कि तेनाली राम को
पुरस्कृत करने के लिए पाँच तोले सोने का चूहा बनवाकर दरबार को यथाशीघ्र सौंपे!”
महाराज के इस आदेश का पालन हुआ।
उस दिन दरबार में महाराज ने तेनाली राम को सोने का चूहा पुरस्कार में देकर उसे
अपने गले से लगा लिया।
तेनाली राम के आलोचकों को महाराज की ओर से दिया गया यह एक करारा जवाब था।

Page 12Permalink

महत्त्वाकांक्षी युवा तपस्वी
विजयनगर में प्रत्येक वर्ष कोई-न-कोई उत्सव-समारोह आदि हुआ करता था। महाराज
कृष्णदेव राय उत्सव-प्रेमी ही नहीं, अध्यात्म-प्रेमी भी थे। उनका मानना था कि
आध्यात्मिक होने का अर्थ यह नहीं है कि आप धार्मिक कर्मकांडों में उलझ जाएँ। ये कर्मकांड
तो मनुष्य को विचारों की संकीर्णता की ओर ले जाते हैं। यह करो, ऐसे करो बतानेवाले
कर्मकांड निषेध और वर्जनाओं पर आधारित हैं क्योंकि ये यह भी बताते हैं कि वह न करो,
वैसा न करो। प्रायः महाराज अपने चिन्तन की चर्चा तेनाली राम से करते रहते थे। एक
उत्सव के अवसर पर महाराज ने प्रसन्न होकर एक तपस्वी को विजयनगर में कुटिया बनाने
के लिए भूमि एवं अन्य सुविधाएँ दे दीं। तेनाली राम ने महाराज के इस व्यवहार पर अपनी
शंका जताई, “महाराज! मुझे तो यह युवा तपस्वी कहीं से भी पहुँचा हुआ प्राणी नहीं
लगा और न ही इसमें पांडित्य की वैसी प्रखरता है जिससे यह दूसरों का मार्गदर्शन कर
सके। फिर आपने यह उदारता क्यों दिखाई?”
“देखो तेनाली राम! मैं विजयनगर का राजा हूँ और इससे इतर भी मेरा एक निजत्व है।
मैं स्वयं आध्यात्मिक चिन्तक हूँ। विजयनगर में हर वर्ष आयोजित होनेवाले समारोहों
का उद्देश्य ही है लोगों को जोड़ना। इन समारोहों के समय ऐसे अनेक कार्यक्रम होते हैं
जिनमें भाग लेकर या देख-सुनकर लोगों की दमित इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। इसलिए
विजयनगर के निवासियों में तुम्हें सन्तोष और उल्लास की कमी नहीं दिखेगी। यही है मेरे
शासन की सफलता का पहला सोपान।...मेरे पास जब यह युवक पहुँचा तब मुझे यह
विश्वास हो गया कि यह युवक महत्त्वाकांक्षी है, अन्यथा सामान्य साधु-सन्तों की तरह यह
किसी के द्वार पर भी जा सकता था। जब इसने मुझसे वियनगर में कुटिया बनाने की
सुविधा माँगी, तो मेरे सामने यह बात साफ हो गई कि यह युवक किसी दूसरे राज्य से
आया है। इस प्रकार एक राजा के समक्ष वह एक शरणागत की तरह था, तो उसे कुटिया
बनाने की सुविधा देकर मैंने राजधर्मानुकूल कार्य किया है। रही उसके सिद्ध नहीं होने की
बात तो मुझे विश्वास है कि वह सिद्धि तो प्राप्त कर ही लेगा, क्योंकि महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति
वांछित को प्राप्त करके ही दम लेता है।” महाराज ने कहा।
महाराज की तर्कसंगत बातें सुनकर तेनाली राम मौन हो गया।
धीरे-धीरे समय बीतता रहा। महाराज उस युवक को भूल गए। दो राज्य महोत्सव बीत
गए। उस युवक ने महाराज के दर्शन नहीं किए।
तीसरे राज्य महोत्सव के प्रारम्भ में ही वह युवक महाराज के पास पहुँचा। उसके मुख
से विद्वत्ता का तेज प्रकट हो रहा था। वह दूर से ही तेजस्वी प्रतीत हो रहा था। युवक ने

Page 13Permalink

महाराज के समीप आकर कहा, “महाराज! मैंने सभी धर्मग्रन्थों का अध्ययन कर लिया है।
मैं सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो गया हूँ। आप मुझे अपना गुरु बना लें!”
महाराज ने युवक की ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोले, “युवक! यह ठीक है कि तुमने
सभी शास्त्र पढ़ लिये हैं मगर मेरा गुरु बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है। अब तो तुम्हें
अपने अध्ययन पर चिन्तन करना चाहिए। ...मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि तुममें अभी
भी कोई कमी है जिसके कारण मैं अभी तुम्हें अपना गुरु नहीं बना सकता।”
महाराज की बातें सुनकर वह युवक वापस लौट गया।
तेनाली राम उस समय वहीं था। उसने महाराज और युवक की बातें सुनी थीं। उसने कहा,
“महाराज! आपने ठीक ही कहा था कि युवक बहुत महत्त्वाकांक्षी है। सोद्देश्य साधना कर
रहा है, यह भी उसके महत्त्वाकांक्षी होने का संकेत है...और देखिए उसकी महत्त्वाकांक्षा की
पराकाष्ठा-वह आपका गुरु बनना चाहता है। इसका अर्थ तो यही है कि वह विजयनगर का
राजगुरु बनने की अभीप्सा से यहाँ आया है।”
“तुम ठीक समझे तेनाली राम!” महाराज ने उत्तर दिया।
और बात वहीं समाप्त हो गई।
महाराज अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गए। वही रोज दरबार का काम-काज देखना
और कभी-कभी प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर के भ्रमण पर निकल जाना-
यही थी उनकी सामान्य दिनचर्या।
वर्ष बीतते देर नहीं लगी। महाराज अपने अभ्यास के अनुरूप ही वार्षिक समारोह की
तैयारियों की स्वयं समीक्षा करते। कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे, कहाँ रंगमंच
बनेगा, पनसाला कहाँ लगेगी और भोजनालय कहाँ बनेगा; प्रजा को इस वर्ष के समारोह के
समय राज्य की ओर से मिलनेवाले भोजन के लिए क्या-क्या पकेगा-यानी छोटी से छोटी
बात के लिए भी महाराज स्वयं निर्देश दे रहे थे। तेनाली राम हमेशा की तरह उनके साथ
था।
हर्षोल्लास के साथ विजयनगर का वार्षिकोत्सव आरम्भ हुआ। इस वार्षिकोत्सव के
आरम्भ में वह युवा तपस्वी महाराज के पास आया लेकिन इस बार उसने महाराज से गुरु
बनाने को नहीं कहा। महोत्सव के अवसर पर उसने महाराज को शुभकामनाएँ दीं तथा
महाराज से कहा, “महोत्सव के समय रास-रंग-मनोरंजन के साथ ही उन्हें कोई धार्मिक
अनुष्ठान कराना चाहिए।”
महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा।

Page 14Permalink

तेनाली राम ने महाराज का भाव समझा और युवा तपस्वी से कहा, “प्रभु! सभी धर्म एक
सी ही बात करते हैं। इसलिए संशय है कि कौन-सा धार्मिक अनुष्ठान किया जाए और जब
तक संशय है तब तक कोई अनुष्ठान हो ही नहीं सकता क्योंकि संशययुक्त मन से धर्म की
बातें सम्भव नहीं हैं।”
युवा तपस्वी ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं।”
तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी से विनम्रता के साथ कहा, “प्रभु! ऐसा प्रतीत होता है कि
आपने चिन्तन कार्य तो पूरी निष्ठा से किया है, अब आप निष्ठापूर्वक मनन कार्य में लगें तब
ही आपकी साधना पूर्ण होगी।”
वह युवक वहाँ से चला गया। महाराज महोत्सव का आनन्द उठाने में लगे और तेनाली
राम सखा भाव से उनके साथ रमा रहा।
इसके बाद कई वर्षों तक युवा तपस्वी महोत्सव के समय महाराज से मिलने नहीं आया।
एक बार विजयनगर में जब महाराज और तेनाली राम वार्षिक महोत्सव के लिए
कार्यक्रम तय करने बैठे तो बात ही बात में उन्हें उस युवा तपस्वी का स्मरण हो आया।
उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “कई वर्ष व्यतीत हो गए, मेरा गुरु बनने की इच्छा से
विजयनगर में कुटिया बनाकर तपश्चर्या में लगा वह युवक आया नहीं...कुछ अता-पता है
उसका?”
तेनाली राम ने तत्परता से उत्तर दिया, “शीघ्र ही सूचित करूँगा महाराज!”
इसके बाद तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी के सन्दर्भ में सूचनाएँ एकत्रित करवाईं।
सूचना थी कि वह युवा तपस्वी अब कुटिया से निकलता ही नहीं। कभी-कभी किसी-किसी
को दिख जाता है। वह न तो पूजा- अनुष्ठान करता दिखाई देता है और न किसी से कोई
याचना करने जाता है। पिछले वर्ष जब अतिवृष्टि के कारण गाँव के गाँव पानी में डूब गए थे
तब इस युवा तपस्वी ने पीड़ित लोगों को बचाने और उनके लिए सुविधाएँ जुटाने में अपना
जी-जान लगा दिया था।
तेनाली राम ने महाराज को युवा तपस्वी के सन्दर्भ में मिली समस्त सूचनाएँ दीं और
कहा, “लगता है, महाराज! यह युवा तपस्वी सिद्ध हो चुका है।”
महाराज कुछ बोले नहीं। महोत्सव आरम्भ हुआ। राजा के साथ प्रजा के मेल से उन्मुक्ति
और आनन्द का एक सुखद और आह्लादकारी वातावरण बना। विजयनगर की खुशहाली
के इसी सूत्र को स्मरण रखने के लिए महाराज इस महोत्सव का आयोजन कराते थे।
महोत्सव के समापन के बाद महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम, चलो, जरा

Page 15Permalink

उस युवा तपस्वी से मिल आएँ।”
महाराज और तेनाली राम स्वयं चलकर युवा तपस्वी की कुटिया में गए। युवा तपस्वी ने
उन्हें देखकर अपने हाथ जोड़ लिये और कहा, “धन्यभाग्य! हमारे गुरुजन पधारे!’
महाराज विस्मित से रह गए युवक की बात सुनकर। उन्होंने कहा, “प्रभु, यह आप क्या
कह रहे हैं? मैं तो यह समझता हूँ कि अब आप सिद्ध हो चुके हैं इसलिए आपसे दीक्षा लेने
की इच्छा से आपके पास आया था।”
युवक ने गम्भीरता से कहा, “महाराज! आप मेरे आश्रयदाता हैं। पिता तुल्य और
आदरणीय और तेनाली राम मेरे गुरु हैं-उन्होंने मुझे मनन करने की सीख दी थी और मैं
उनके निर्देश पर ही मन में डूब गया। तब मैंने जाना कि संसार में ऐसा कोई नहीं जिसमें
ज्ञान का सागर न हो...चाहने पर कोई भी इस ज्ञान-सागर में गोते लगा सकता है।“ उस
युवक ने तेनाली राम के चरण छुए और तेनाली राम ने उसे अपने गले से लगा लिया।

Page 16Permalink

खेत का उपदेश
महाराज कृष्णदेव राय अपने प्रिय सभासद तेनाली राम के साथ प्रायः विजयनगर के भ्रमण
के लिए निकल जाते थे। प्रजा का दुख-दर्द जानने का उन्हें अपना यह तरीका बहुत पसन्द
था। इस तरह के भ्रमण से जहाँ वे अपने राज्य की समस्त सूचनाओं से भिज्ञ रहते थे, वहीं
अपने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के मनोभावों से भी परिचित होते थे। तेनाली राम
को वे इस तरह की यात्राओं के समय हमेशा साथ रखते थे। उसका एकमात्र कारण यह था
कि तेनाली राम उनके मनोभावों को आसानी से समझ लेता था और स्थिति देखकर उसके
अनुकूल आचरण करना जानता था।
एक बार विजयनगर में अच्छी बारिश हुई। समय पर अच्छी वर्षा हो जाने से फसल भी
बहुत अच्छी हुई जिससे विजयनगर के कृषकों में काफी खुशी थी।
महाराज तेनाली राम के साथ प्रदेश की यात्रा पर थे। वे एक गाँव से दूसरे गाँव जाते और
ग्रामीणों की वास्तविक दशा से अवगत होकर आगे बढ़ जाते। वे तेनाली राम के साथ ही
किसी गाँव में पड़ाव डालकर रात बिताते और सुबह होते ही आगे बढ़ जाते। यह सिलसिला
काफी समय से चल रहा था। एक दिन महाराज तेनाली राम के साथ एक गाँव से गुजर रहे
थे। रास्ते में धान के एक खेत में एक किसान उल्लसित भाव में बैठा हुआ मिल गया।
महाराज ने उसके पास जाकर कहा, “भगवान की कृपा से इस बार फसल बहुत अच्छी हुई
है-है न!”
उस किसान ने महाराज और तेनाली राम को सामान्य राहगीर समझा और बहुत दर्प के
साथ उत्तर दिया, “अरे भाई! इसमें भगवान की कृपा जैसी कोई बात नहीं है। खेत में कुछ
भी भगवान की कृपा से नहीं उगता है। उगता है अच्छे बीज, खाद, सिंचाई और निराई के
कारण। अभी जो यह लहलहाता हुआ खेत देख रहे हो, वह मेरी मेहनत के कारण है,
भगवान की कृपा के कारण नहीं। मैंने कड़ी धूप में इस खेत में कुदाल चलाया, कड़ी मेहनत
कर मिट्टी तैयार की, बारिश में भीग-भीगकर बुआई की, लगातार सतर्क रहा, समय पर
सिंचाई की, रात में जगकर फसल की रखवाली की। तब जाकर यह खेत इस तरह
लहलहाया है। यह मेरी लगातार मेहनत का परिणाम है। जो भी मेहनत करेगा, खेत उसके
लिए अच्छी पैदावार देगा ही। यही नियम है। न तो यह भाग्य का खेल है और न ही
ईश्वरीय चमत्कार!”
तेनाली राम ने किसान को इस तरह अतिविश्वास में बोलते सुना तब किसान से कहा,
“हाँ, तुम ठीक कहते हो, मेहनत करनेवालों को ही उसका अच्छा फल भी प्राप्त होता है।”
इतना कहकर उसने महाराज को आगे बढ़ने का संकेत किया।

Page 17Permalink

दोनों अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगे।
इस घटना के कुछ वर्ष बाद विजयनगर अनावृष्टि का शिकार हो गया। बरसात के मौसम
में भी आसमान में बादलों के दर्शन दुर्लभ हो गए। सूर्य की सीधी किरणों से धरती में दरारें
पड़ने लगीं। विजयनगर की प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। मवेशियों के लिए चारे का अभाव
हो गया। चारा नहीं मिलने के कारण मवेशी मरने लगे।
पूर्व में विजयनगर की ऐसी हालत कभी हुई हो, ऐसा महाराज की स्मृति में नहीं था।
उन्होंने एक दिन तेनाली राम से प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर भ्रमण का
कार्यक्रम तैयार करने के लिए कहा।
तेनाली राम ने महाराज के खुफिया विभाग से विजयनगर के ऐसे इलाकों का नक्शा
तैयार करवा लिया जहाँ अनावृष्टि के कारण भुखमरी की नौबत आ चुकी थी। किसान
पलायन करने को बाध्य हो गए थे। मवेशी मर रहे थे।
नक्शा मिल जाने पर तेनाली राम ने गाँवों की प्राथमिकताएँ तय कीं कि कहाँ पहले जाना
चाहिए और कहाँ बाद में। फिर महाराज और तेनाली राम का विजयनगर भ्रमण का
अभियान शुरू हो गया। महाराज कृष्णदेव राय बहुत सूक्ष्मता से यह जानकारी जुटा रहे थे
कि किस गाँव में कितने किसान रहते हैं और अनावृष्टि के कारण उन्हें कितना नुकसान
उठाना पड़ रहा है।
वैसे राज्य का खुफिया विभाग अपने स्तर पर पूरे राज्य की बदहाली के सम्बन्ध में
महत्त्वपूर्ण तथ्य जुटाने में लगा था और राज्य का सिंचाई विभाग उन सम्भावनाओं की
तलाश में था जिससे अनावृष्टि के बावजूद राज्य में कृषि की पहल की जा सके।
महाराज ने राज्य के अन्न भंडार के द्वार अनावृष्टि के शिकार कृषकों के सहायतार्थ खुलवा
दिए थे। मगर इतना ही काफी नहीं था। इसलिए वे स्वयं गाँवों की वास्तविक स्थिति का
मूल्यांकन करने के लिए निकले थे।
यात्रा आरम्भ करने के एक सप्ताह बाद ही महाराज उस गाँव में थे जहाँ का एक किसान
कभी उनसे बोला था, ‘कृषि उत्पाद उसके श्रम का परिणाम है, ईश्वरीय कृपा का नहीं।’ उस
गाँव में प्रवेश के साथ ही उन्हें वह घटना याद हो आई।
संयोग की बात थी कि तेनाली राम को वह किसान खेत की मेड़ पर बैठा दिख गया।
किसान उदास था और उसके खेत में भी दूर तक कोई फसल नहीं दिख रही थी। उसके पास
पहुँचने के बाद तेनाली राम ने महाराज को रुकने का संकेत किया और खुद उस किसान
के पास पहुँचकर पूछा, ”क्या बात है भाई! बहुत उदास दिख रहे हो?”

Page 18Permalink

उस किसान ने लम्बी साँस ली और बोला, “क्या कहूँ भाई, सब किस्मत का खेल है।
कभी इस खेत में फसलें लहलहाती थीं। इस साल ऊपरवाले ने ऐसा कहर बरपा किया है कि
खेत में डाले गए बीज सूरज की तपिश से भुन गए। खाद बरबाद हो गई। इस बार यदि
बारिश नहीं हुई तब बीज-खाद की कीमत भी जेब से भरनी होगी।”
तेनाली राम ने उसे दिलासा देते हुए कहा, “अजीब बाजीगर है यह ऊपरवाला भी! कभी
देता है तो कभी ले भी लेता है।”
तेनाली राम की बातें सुनकर किसान ने उसकी ओर देखा। उसे तेनाली राम का चेहरा
पहचाना-सा लगा। फिर उसे तेनाली राम से इसी मौसम में कुछ वर्ष पहले हुई मुलाकात
की याद हो आई। उसने तेनाली राम से पूछा, “आप मेरा दुख जानना चाहते हैं, तो कटाक्ष
क्यों कर रहे हैं? आपकी बातों से ऐसा लग रहा है मानो आप जले पर नमक छिड़कने आए
हैं। आपकी बातें मुझे सान्त्वना नहीं दे रही हैं और न ही ढाढस बँधा रही हैं!”
तेनाली राम ने उचित अवसर देखते हुए कहा, “बन्धु, तुम्हें स्मरण होगा जब हम लोग
पिछली बार तुमसे यहीं पर मिले थे तब तुमने यह मानने से इनकार कर दिया था कि
अच्छी फसल होना भगवान की कृपा है बल्कि अतिविश्वास से कहा था कि अच्छी फसल
मेरी मेहनत का परिणाम है।...अब जब फसल बरबाद हो गई है तब इसके लिए तुम
भगवान पर दोष मढ़ रहे हो! यह उचित नहीं है। अच्छे परिणाम का श्रेय खुद को देना और
बुरे परिणाम के लिए भगवान को दोषी बताना उचित नहीं है। इसी खेत की फसलों से मुझे
तो यही शिक्षा मिली है कि अच्छे परिणाम के लिए भगवान की कृपा और परिश्रम दोनों की
आवश्यकता होती है।”
किसान अवाक् होकर तेनाली राम का मुँह देखता रह गया।
महाराज ने तेनाली राम की पीठ थपथपाई और दोनों आगे बढ़ गए।

Page 19Permalink

श्रम और स्वाद
एक बार महाराज कृष्णदेव राय तेनाली राम के साथ घोड़े पर सवार होकर शिकार के
लिए विजयनगर के निकटवर्ती जंगल में गए। दोनों ने इच्छा भर शिकार किया और वापसी
के लिए घोड़ा घुमा लिया। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे राह
भटक गए हैं। दोनों भटकते-भटकते थककर चूर हो चुके थे। घोड़े पसीने से लथपथ थे। सूर्य
दक्षिण-पश्चिम के कोण तक पहुँचने ही वाला था। महाराज यह सब देखकर हताश हो रहे
थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “अब क्या होगा तेनाली राम! आखिर हम लोग कब तक
जंगल में भटकते रहेंगे? हमारे घोड़े भी थक चुके हैं, उन्हें भी विश्राम चाहिए। जिस तरह
प्यास के मारे हमारा गला सूख रहा है, उसी तरह इन घोड़ों को भी प्यास लगी होगी।
देखते नहीं, किस तरह हाँफ रहे हैं घोड़े!”
“महाराज! धैर्य के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अच्छा है कि हम एक ही दिशा में
आगे बढ़ते रहें।” तेनाली राम ने कहा।
दोनों के घोड़े दौड़ते रहे।
थोड़ी देर के बाद तेनाली राम ने महाराज से खुश होते हुए कहा, “महाराज! सामने
देखिए। पेड़ पर बगुलों का झुंड बैठा हुआ है।”
“तो इसमें खुश होने की क्या बात है? तुम तो ऐसे खुश हो रहे हो तेनाली राम मानो
विजयनगर वापसी की राह मिल गई हो!” महाराज ने तेनाली राम से कहा। “
जी हाँ, महाराज! बगुलों के दिखने से यह सम्भावना भी दिखने लगी है कि शीघ्र ही हमें
नगर वापसी की राह बतानेवाला कोई-न-कोई मिल जाएगा। खाने के लिए कुछ मिले न
मिले, पीने के लिए पानी अवश्य मिल जाएगा।” तेनाली राम ने कहा।
“यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?” महाराज ने पूछा।
“महाराज, बगुलों के आधार पर।” तेनाली राम ने उत्तर दिया।
“क्या मतलब?” महाराज ने पूछा।
“मतलब यह महाराज कि बगुलों के झुंड का यहाँ होना यह संकेत दे रहा है कि आस-पास
ही कोई नदी बह रही है।” तेनाली राम ने कहा।

Page 20Permalink

महाराज खुश होते हुए बोले, “अरे, मेरे ध्यान में तो यह बात ही नहीं आई थी! तुम ठीक
कह रहे हो तेनाली राम! ऐसा हो सकता है।”
थोड़ी दूर घोड़ा और दौड़ा तब तेनाली राम ने भूमि पर बड़े पत्तोंवाली लताएँ बिछी हुई
देखीं। इन लताओं के कुछ पत्तों पर जानवरों के खुरों और पंजों के कीचड़ सने निशान थे।
इनमें से कुछ निशान कच्चे थे तो कुछ सूखे यानी गीली मिट्टीवाले निशान और सूखी
मिट्टीवाले निशान।
तेनाली राम ने महाराज को उन निशानों को दिखाते हुए कहा, “महाराज, घोड़े को उस
ओर ले चलें जिधर से पंजों और खुरों के निशान आते दिखाई पड़ रहे हैं।” ऐसा कहते हुए
तेनाली राम ने स्वयं अपना घोड़ा मोड़ लिया।
महाराज समझ नहीं पाए कि तेनाली राम किन निशानों की बात कर रहा है। वे थक चुके
थे और पसीने से लथपथ हो चुके थे। उन्हें बोलने की इच्छा नहीं हुई इसलिए उन्होंने
चुपचाप घोड़े को तेनाली राम के घोड़े के पीछे लगा दिया।
थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक नदी दिखाई पड़ी। दोनों ने नदी की धारा में हाथ-मुँह धोए।
फिर जी भर के पानी पीया। जब उनकी प्यास बुझ गई तब वे अपने घोड़ों को ले आए।
दोनों घोड़ों ने भी पानी पीया।
महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम, मैं कामना करता हूँ कि दूसरी
सम्भावना भी सच साबित हो जाए।”
“जी हाँ, महाराज, नदी है तो आस-पास कोई बस्ती भी होगी। पहले थोड़ा विश्राम कर लें
फिर देखते हैं कि आगे क्या है।” इतना कहकर तेनाली राम ने दोनों घोड़ों को ऐसे स्थान
पर ले जाकर बाँध दिया जहाँ हरी घास दूर तक भूमि पर आच्छादित थी। उसने घोड़ों को
वहीं छोड़ दिया और स्वयं महाराज के पास आ गया। उसने महाराज से कहा, “महाराज!
आइए, नदी के किनारे बालू पर हम लोग थोड़ी देर लेट लें। थोड़े विश्राम के बाद सोचेंगे कि
अब क्या करना है और किधर जाना है।”
महाराज थके हुए तो थे ही, उन्होंने बालू पर लेटते हुए कहा, “लेकिन तेनाली राम! थोड़ी
ही देर में शाम हो जाएगी। ऊपर से, यह नदी का किनारा है। कभी भी कोई जंगली जानवर
इधर पानी पीने के लिए आ सकता है।“
महाराज के पास ही तेनाली राम लेट गया और कहा, “महाराज, जंगली जन्तुओं से भय
की आवश्यकता नहीं। इस समय यदि कोई भी जीव इधर आया तो विश्वास कीजिए कि वह
शिकार करके अपना पेट भर चुका होगा। वैसे भी मनुष्य से सभी भी जानवर स्वयं भयभीत
रहते हैं इसलिए भयरहित होकर हम लोग थोड़ी देर विश्राम करें।”