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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

द्वितीय भाग: बौद्ध शून्यवाद व क्षणिकवाद समीक्षा एवं स्याद्वाद सिद्धि

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२९
नवि छेओ नवि दाहो ण पूरणं तेण भिन्नं तु ।
जम्हा य मोयगुच्चारणम्मि तत्थेव पच्चओ होइ ॥ २ ॥
न य होइ स अन्नत्थे तेण अभिन्नं तदत्थाओ ।"¹
एतेन—"विकल्पयोनयः शब्दा विकल्पाः शब्दयोनयः
कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपि ॥"
इति प्रत्युक्तम् । "अर्थाभिधानप्रत्ययास्तुल्यनामधेया"² इति वचनात् । शब्दस्य ह्येतदेव
तत्त्वं यदभिधेयं याथात्म्येनासौ प्रतिपादयति । स च तत् तथाप्रतिपादयन् वाच्यस्वरूपपरि-
णामपरिणत एव वक्तुं शक्यः, नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । घटाभिधानकाले पटाद्यभिधानस्यापि
प्राप्तेरिति ।
अथवा भङ्ग्यन्तरेण सकलं काव्यमिदं व्याख्यायते । वाच्यं वस्तु घटादिकम् । एका-
त्मकमेव एकस्वरूपमपि सत्, अनेकम् अनेकस्वरूपम् । अयमर्थः । प्रमाता तावत् प्रमेयस्वरूपं
लक्षणेन निश्चिनोति । तच्च सजातीयविजातीयव्यवच्छेदादात्मलाभं लभते । यथा घटस्य सजा-
तीया मृन्मयपदार्थाः, विजातीयाश्च पटादयः । तेषां व्यवच्छेदस्तल्लक्षणम् । पृथुबुध्नोदराद्या-
जलते, और 'मोदक' से नहीं भर आते, अतएव वाचकसे वाच्य भिन्न है। तथा 'मोदक' शब्दसे मोदकका ही
ज्ञान होता है, अग्निका नहीं, इसलिये वाचक ( शब्द ) और वाच्य ( अर्थ ) अभिन्न हैं ।"
इस कथनसे—
"विकल्पसे शब्द उत्पन्न होते हैं, और शब्दसे विकल्प उत्पन्न होते हैं, अतएव शब्द और विकल्प दोनों-
में कार्य-कारण संबंध हैं, परन्तु शब्द अपने अर्थसे भिन्न हैं ( अतएव दोनों एक दूसरेसे भिन्न हैं ) ।"—
यह कथन भी खंडित हो जाता है। क्योंकि "अर्थ, अभिधान और प्रत्यय ये पर्यायवाची शब्द हैं", ऐसा
कहा गया है। जब शब्द वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करता है, तब वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन
करना ही शब्दका स्वरूप है। वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करनेवाले शब्दका, वाच्यका स्वरूप जिसमें
अन्तर्निहित है ऐसे अपने परिणामके स्वरूपसे परिणत होनेपर ही उच्चारण करना शक्य है ( जैसे घटके यथार्थ
स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाला शब्द वाच्यभूत घटके स्वरूपका ज्ञान होनेके अनन्तर वाच्यके स्वरूपसे युक्त
अपने घट स्वरूप शब्दके परिणामस्वरूपसे परिणत होनेपर ही घट शब्दका उच्चारण शक्य है ), अन्यथा नहीं।
क्योंकि घट शब्दके उच्चारण कालमें पट आदि शब्दोंका उच्चारण होनेसे अतिप्रसंग उपस्थित होता है।
अथवा, दूसरी तरहसे श्लोकका अर्थ किया जा सकता है। वाच्य घट आदि एक रूप होकर भी
अनेक रूप हैं। भाव यह है कि प्रमाता प्रमेयभूत पदार्थके स्वरूपका उसके लक्षण द्वारा उसका निश्चय करता
है। सजातीय और विजातीय पदार्थोंका व्यवच्छेद करनेसे लक्षण अस्तिरूपको प्राप्त करता है। उदाहरणके
लिए, मिट्टीसे बने पदार्थ घटके सजातीय और पट आदि पदार्थ विजातीय होते हैं। इन सजातीय और विजा-
१. छाया—अभिधानमभिधेयाद् भवति भिन्नमभिन्नं च ।
क्षुराग्निमोदकोच्चारणे यस्मात् तु वदनश्रवणयोः ॥
नाऽपि च्छेदो नापि दाहो न पूरणं तेन भिन्नं तु ।
यस्माच्च मोदकोच्चारणे तत्रैव प्रत्ययो भवति ॥
न च भवति अन्यार्थे तेनाऽभिन्नं तदर्थात् ।
२. बाह्यः पृथुबुध्नोदराकारोऽर्थोऽपि घट इति व्यपदिश्यते । तद्वाचकमभिधानं घट इति । तद्ज्ञानरूपः
प्रत्ययोऽपि घट इति । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति । किमिदं पुरो दृश्यते घटः । किमसौ वक्ति घटं । किमस्य
चेतसि स्फुरति घटः ।
१७

१३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
कारः कम्बुग्रीवो जलधारणाहरणादिक्रियासमर्थः पदार्थविशेषो घट इत्युच्यते । तेषां च सजा-
तीयविजातीयानां स्वरूपं तत्र बुद्ध्या आरोप्य व्यवच्छिद्यते । अन्यथा प्रतिनियततत्स्वरूपपरि-
च्छेदानुपपत्तेः । सर्वभावानां हि भावाभावात्मकं स्वरूपम् । एकान्तभावात्मकत्वे वस्तुनो
वैश्वरूप्यं स्यात् । एकान्ताभावात्मकत्वे च निःस्वभावता स्यात् । तस्मात् स्वरूपेण सत्त्वात्
पररूपेण चासत्त्वाद् भावाभावात्मकं वस्तु । यदाह—
“सर्वमस्ति स्वरूपेण पररूपेण नास्ति च ।
अन्यथा सर्वसत्त्वं स्यात् स्वरूपस्याप्यसंभवः ॥”
ततश्चैकस्मिन् घटे सर्वेषां घटव्यतिरिक्तपदार्थानामभावरूपेण वृत्तेरनेकात्मकत्वं घटस्य सूप-
पादम् । एवं चैकस्मिन्नर्थे ज्ञाते सर्वेषामर्थानां ज्ञानम् । सर्वपदार्थपरिच्छेदमन्तरेण तन्निषेधा-
त्मन एकस्य वस्तुनो विविक्ततया परिच्छेदासंभवात् । आगमोऽप्येवमेव व्यवस्थितः—
“जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ॥”
तथा—“एको भावः सर्वथा येन दृष्टः
सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टाः
एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥”
तीय पदार्थोंका व्यवच्छेद ही घटका लक्षण है। सजातीय और विजातीय पदार्थोंकी व्यावृत्ति हो जानेपर ही
बड़े, मोटे उदरवाले, शंखकी ग्रीवाके सदृश ग्रीवावाले और जलके रखने और लाने आदि क्रियामें समर्थ
विशिष्ट पदार्थ घट कहा जाता है। इन मृत्तिकोपादानक परिणाम होनेसे सजातीय और पटादिरूप विजातीय
पदार्थोंके स्वरूपको बुद्धि द्वारा घटमें आरोपित कर उसका व्यवच्छेद किया जाता है; क्योंकि यदि घटका ज्ञान
करते समय सजातीय और विजातीय पदार्थोंकी व्यावृत्ति न की जाय, तो घटके निश्चित रूपका ज्ञान नहीं
हो सकता । समस्त पदार्थ भाव और अभाव रूप होते हैं । पदार्थको यदि एकान्तरूपसे, स्वचतुष्टयकी अपेक्षा,
अस्तिरूप ही माना जाये—परचतुष्टयकी अपेक्षा नास्तिरूप न माना जाये—तो पदार्थ परचतुष्टयकी अपेक्षासे
भी अस्तिरूप हो जानेसे अनेक रूप हो जायेगा । यदि उसे एकान्तरूपसे अभावात्मक माना जाय—स्वरूप
चतुष्टय और पररूप चतुष्टयकी अपेक्षासे भी नास्तिरूप माना जाये—तो वह स्वभावशून्य हो जायेगा । अत-
एव प्रत्येक पदार्थ स्वरूपकी अपेक्षा सत्, और पररूपकी अपेक्षा असत् होनेके कारण भाव-अभाव रूप है ।
कहा भी है—
“सभी पदार्थ स्वरूपकी दृष्टिसे विद्यमान हैं, पररूपकी दृष्टिसे विद्यमान नहीं है। यदि पदार्थ स्वरूपसे
अस्तिरूप और पररूपसे नास्तिरूप न हो—प्रत्येक पदार्थमें स्वरूपका अभाव और पररूपका सद्भाव माना
जाये—तो सभी पदार्थ सत् मात्र रूपसे एक हो जायँगे और पदार्थोंके स्वरूपका अस्तित्व नहीं रह जायेगा ।”
इससे एक घटमें घटभिन्न सभी पदार्थोंकी अभावरूपसे विद्यमानता होनेसे घटका अनेकात्मकत्व
( अस्तिनास्तिरूपत्वादि ) सुसिद्ध किया जा सकता है । इस प्रकार एक पदार्थके जाननेसे सब पदार्थोंका ज्ञान
होता है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंके बिना जाने, सर्व पदार्थ निषेधयुक्त एक पदार्थको अन्य सभी पदार्थोंसे
भिन्न रूपसे जानना असंभव हो जाता है । आगममें भी कहा है—
“जो एकको जानता है, वह सबको जानता है, जो सबको जानता है, वह एकको जानता है ।”
तथा—
“जिसने एक पदार्थको सम्पूर्ण रीतिसे जान लिया है, उसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया
है । जिसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया है, उसने एक पदार्थको सब प्रकारसे जान लिया है ।”

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३१
ये तु सौगताः परासत्त्वं नाङ्गीकुर्वते, तेषां घटादेः सर्वात्मकत्वप्रसङ्गः । तथाहि । यथा
घटस्य स्वरूपादिना सत्त्वं, तथा यदि पररूपादिनापि स्यात्, तथा च सति स्वरूपादिसत्त्ववत्
पररूपादिसत्त्वप्रसक्तेः कथं न सर्वात्मकत्वं भवेत् । परासत्त्वेन तु प्रतिनियतोऽसौ सिद्ध्यति ।
अथ न नाम नास्ति परासत्त्वं, किन्तु स्वसत्त्वमेव तदिति चेद्, अहो वैदग्धी । न खलु यदेव
सत्त्वं तदेवासत्त्वं भवितुमर्हति । विधिप्रतिषेधरूपतया विरुद्धधर्माध्यासेनानयोरैक्यायोगात् ।
अथ युष्मत्पक्षेऽप्येवं विरोधस्तदवस्थ एवेति चेद्, अहो वाचालता देवानांप्रियस्य । न हि वयं
येनैव प्रकारेण सत्त्वं, तेनैवासत्त्वं, येनैव चासत्त्वं, तेनैव सत्त्वमभ्युपेमः । किन्तु स्वरूपद्रव्य-
क्षेत्रकालभावैः सत्त्वं, पररूपद्रव्यक्षेत्रकालभावैस्त्वसत्त्वम् । तदा क्व विरोधावकाशः ॥
यौगास्तु प्रगल्भन्ते सर्वथा पृथग्भूतपरस्पराभावाभ्युपगममात्रेणैव पदार्थप्रतिनियम-
सिद्धेः, किं तेषामसत्त्वात्मकत्वकल्पनया इति । तदसत् । यदा हि पटाद्यभावरूपो घटो न
भवति, तदा घटः पटादिरेव स्यात् । यथा च घटाभावाद् भिन्नत्वाद् घटस्य घटरूपता, तथा
पटादेरपि स्यात्, घटाभावाद् भिन्नत्वादेव । इत्यलं विस्तरेण ।
जो बौद्ध पररूप चतुष्टयकी अपेक्षासे नास्तित्वको स्वीकार नहीं करते, उनके मतमें घटादिको ( घटादि-
भिन्न ) सर्वपदार्थात्मक माननेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्व-
चतुष्टयकी अपेक्षासे घटका अस्तित्व होता है, उसी प्रकार परचतुष्टयकी अपेक्षासे भी यदि घटका अस्तित्व
स्वीकार किया जाये, तो ऐसी स्थितिमें जिस प्रकार स्वरूप चतुष्टयकी अपेक्षासे ( घटादिका ) अस्तित्व होता
है, उसी प्रकार परचतुष्टयकी अपेक्षा भी ( घटादिका ) अस्तित्व स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित हो जानेसे
घटका सर्वपदार्थरूपत्व कैसे सिद्ध न होगा ? अतएव परचतुष्टयकी अपेक्षासे घटके नास्तित्वरूप माननेसे ही
निश्चितरूपसे उसकी सिद्धि होती है । यदि कहो कि 'परचतुष्टयकी अपेक्षासे घटका नास्तित्व सिद्ध नहीं होता,
ऐसी बात नहीं है; किन्तु स्वचतुष्टयकी अपेक्षासे घटका अस्तित्व ही परचतुष्टयकी अपेक्षासे नास्तित्व है'—तो
यह महान् पांडित्य है । वस्तुतः जो अस्तित्व है, वही नास्तित्वरूप नहीं हो सकता । क्योंकि विधि-प्रतिषेध-
रूप विरुद्धधर्माध्यासित होनेके कारण सत्त्व और असत्त्वकी एकरूपता घटित नहीं होती । यदि कहो कि जैन
लोग भी एक ही जगह विधि और प्रतिषेध मानते हैं, तो यह कथन मूर्खजनोंकी वाचालता ही है । क्योंकि
हम लोग ( जैन ) जिस प्रकारसे अस्तित्व मानते हैं, उसी प्रकारसे नास्तित्व नहीं मानते, तथा जिस प्रकारसे
नास्तित्व मानते हैं, उसी प्रकारसे अस्तित्व नहीं मानते। हमारी मान्यता है कि प्रत्येक वस्तु अपने रूप, द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा सत् है, और पर रूप, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा असत् है,
अतएव हमारे मतमें विरोधके लिए कोई स्थान नहीं है ।
वैशेषिक—पदार्थका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए पदार्थसे भिन्न अन्योन्याभाव माननेसे काम चल जाता
है, इसलिये पदार्थोंको अभावात्मक माननेकी आवश्यकता नहीं है । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि यदि पदार्थों-
को पररूपसे अभावात्मक नहीं मानें, तो पट आदिके अभावको घट नहीं कह सकते, अतएव घटको पट रूप
मानना चाहिये । क्योंकि जैसे घटाभावसे भिन्न होनेके कारण घटको घट कहते हैं, वैसे ही पटके घटाभावसे
भिन्न होनेके कारण पटको भी घट मानना चाहिये । भाव यह है कि वैशेषिक लोग अन्योन्याभावको पदार्थकी
स्थितिमें कारण मानते हैं। यह अन्योन्याभाव स्वयं पदार्थसे जुदा होता है । वैशेषिकोंके अनुसार जहाँ घटका
अभाव नहीं होता, वहीं घटका निश्चय होता है । परन्तु यह मान्यता ठीक नहीं, क्योंकि वस्त्र आदि भी घटके
अभाव रूप नहीं हैं, इसलिये वस्त्र आदिके घटके अभावसे भिन्न होनेपर वस्त्र आदिमें भी घटका ज्ञान होना
चाहिये । जैनसिद्धांतके अनुसार घटको घटके अतिरिक्त सभी पदार्थोंके अभाव रूप स्वीकार किया है, इसलिये
घटके वस्त्र आदिके भी अभाव स्वरूप होनेसे घटमें वस्त्रका ज्ञान नहीं हो सकता ।

एवं वाचकमपि शब्दरूपं द्वयात्मकम् । एकात्मकमपि सदनेकमित्यर्थः । अर्थोक्तन्यायेन
शब्दस्यापि भावाभावात्मकत्वात् । अथवा एकविषयस्यापि वाचकस्यानेकविषयत्वोपपत्तेः । यथा
किल घटशब्दः संकेतवशात् पृथुबुध्नोदराद्याकारवति पदार्थे प्रवर्तते वाचकत्या, तथा देश-
कालाद्यपेक्षया तद्वशादेव पदार्थान्तरेष्वपि तथा वर्तमानः केन वार्यते । भवन्ति हि वक्तारो
योगिनः शरीरं प्रति घट इति । संकेतानां पुरुषेच्छाधीनतयाऽनियतत्वात् । यथा चौरशब्दोऽ-
न्यत्र तस्करे रूढोऽपि दाक्षिणात्यानामोदने प्रसिद्धः । यथा च कुमारशब्दः पूर्वदेशे आश्विनमासे
रूढः । एवं कर्कटीशब्दादयोऽपि तत्तद्देशापेक्षया योन्यादिवाचका ज्ञेयाः । कालापेक्षया पुनर्यथा
जैनानां प्रायश्चित्तविधौ धृतिश्रद्धासंहनना१दिमति प्राचीनकाले षड्गुरुशब्देन शतमशीत्यधिक-
मुपवासानामुच्यते स्म, सांप्रतकाले तु तद्विपरीते तेनैव षड्गुरुशब्देन उपवासत्रयमेव सङ्केत्यते,
जीतकल्प२व्यवहारानुसारात् । शास्त्रापेक्षया तु यथा पुराणेषु द्वादशीशब्देनैकादशी । त्रिपुरार्णवे३
च अलिशब्देन मदिराभिषक्तम् च मैथुनशब्देन मधुसर्पिषोर्ग्रहणम् इत्यादि ।
न चैवं सङ्केतस्यैवार्थप्रत्यायने प्राधान्यम् । स्वाभाविकसामर्थ्यसाचिव्यादेव तत्र तस्य
प्रवृत्तेः । सर्वशब्दानां सर्वार्थप्रत्यायनशक्तियुक्तत्वात् । यत्र च देशकालादौ यदर्थप्रतिपादनशक्ति-
सहकारी संकेतस्तत्र तमर्थं प्रतिपादयति । तथा च निर्जितदुर्जयपरप्रवादाः श्रीदेवसूरिपादाः—
“स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोधनिबन्धनं शब्दः ।”४ अत्र शक्तिपदार्थसमर्थनं ग्रन्थान्त-
रा५दवसेयम् । अतोऽन्यथेत्यादि उत्तरार्द्धं पूर्ववत् । प्रतिभाप्रमादस्तु तेषां सदसदेकान्ते वाच्य-
स्य प्रतिनियतार्थविषयत्वे च वाचकस्य उक्तयुक्त्या दोषसद्भावाद् व्यवहारानुपपत्तेः । तदयं
समुदायार्थः । सामान्यविशेषात्मकस्य, भावाभावात्मकस्य च वस्तुनः सामान्यविशेषात्मको,
वाच्यकी तरह वाचक भी एक होकर भी अनेक है । जैसे अर्थ भाव और अभाव रूप है, वैसे ही शब्द
भी भाव और अभाव दोनों रूप है । अथवा, एक विषयका वाचक शब्द अनेक विषयोंका वाचक हो सकता है,
इसलिये भी शब्द भाव और अभाव रूप है । जैसे बड़े और मोटे उदरवाले पदार्थमें घट शब्दका व्यवहार होता
है, उसी प्रकार देश, काल आदिकी अपेक्षा उसी कारण अन्य पदार्थोंमें भी उसकी विद्यमानता कौन रोक सकता
है ! योगी लोग शरीरको ही घट कहते हैं । चौर शब्दका साधारण अर्थ चोर होता है, परन्तु दक्षिण जैसे
देशमें चौर शब्दका अर्थ चावल होता है; कुमार शब्दका सामान्यसे युवराज अर्थ होनेपर भी पूर्व देशमें इसका
अर्थ आश्विन मास किया जाता है; कर्कटी शब्दका प्रसिद्ध अर्थ ककड़ी होनेपर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ
योनि किया जाता है । तथा, जीतकल्पव्यवहार अनुसार प्रायश्चित्त विधिमें धृति, श्रद्धा और संहननवाले
प्राचीन समयमें षड्गुरु शब्दका अर्थ एकसौ अस्सी उपवास किया जाता था, परन्तु आजकल षड्गुरुका अर्थ
केवल तीन उपवास किया जाता है । पुराणोंमें उपवासके नियमोंका वर्णन करते समय द्वादशीका अर्थ एकादशी
किया जाता है । त्रिपुरार्णवमें अलि शब्द मदिरा, और मधु शब्द शहद और घीके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं ।
केवल संकेत मात्रसे अर्थका ज्ञान नहीं होता । स्वाभाविक शक्तिकी मुख्यतासे उनकी प्रवृत्ति होती है ।
क्योंकि शब्दोंमें ही सब अर्थोंको जनानेकी शक्ति होती है । संकेत केवल देश और काल आदिकी अपेक्षासे
शब्दके ही अर्थको जाननेमें सहकारी होता है । परवादियोंको जीतनेवाले श्रीदेवसूरि आचार्यने कहा भी

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३३
भावाभावात्मकश्च ध्वनिर्वाचक इति । अन्यथा प्रकारान्तरैः पुनर्वाच्यवाचकभावव्यवस्थामा-
तिष्ठमानानां वादिनां प्रतिभैव प्रमाद्यति, न तु तद्भणितयो युक्तिस्पर्शमात्रमपि सहन्ते ।
कानि तानि वाच्यवाचकभावप्रकारान्तराणि परवादिनामिति चेत्, एते ब्रूमः । अपोहं१
एव शब्दार्थ इत्येके । “अपोहः शब्दलिङ्गाभ्यां न वस्तुविधिनाेच्यते”२ इति वचनात् । अपरे
सामान्यमात्रमेव शब्दानां गोचरः । तस्य क्वचित् प्रतिपन्नस्य, एकरूपतया सर्वत्र संकेतविषय-
तोपपत्तेः । न पुनर्विशेषाः । तेषामानन्त्यतः कार्त्स्न्येनोपलब्धुमशक्यतया तद्विषयतानुपपत्तेः ।
विधिवादिनस्तु विधिरेव वाक्यार्थः, अप्रवृत्तप्रवर्तनस्वभावत्वात् तस्येत्याचक्षते । विधिरपि३
तत्तद्वादिविप्रतिपत्त्यानेकप्रकारः ।४ तथाहि । वाक्यरूपः५ शब्द एव प्रवर्तकत्वाद् विधिरित्येके।
तद्व्यापारो भावनापरपर्यायो६ विधिरित्यन्ये । नियोगं७ इत्यपरे । प्रैषाद्यर्थ८ इत्येके । तिरस्कृत-
जाननेके लिये स्याद्वादरत्नाकर ( २-२ ) आदि ग्रन्थ देखने चाहिए। अतएव सामान्य-विशेष रूप और भावाभाव
रूप वाचक ( शब्द ) से ही सामान्य-विशेष और भावाभाव रूप वाच्य ( अर्थ ) का ज्ञान हो सकता है ।
( १ ) बौद्ध लोग अपोह ( इतरव्यावृत्ति—परस्परपरिहार ) को ही शब्दार्थ मानते हैं । कहा भी है ।
“शब्द और लिंगसे अपोह कहा जाता है, वस्तुकी प्रेरणासे नहीं ।” ( २ ) कुछ लोग सामान्य ( जाति ) को
ही शब्दका अर्थ मानते हैं । क्योंकि सामान्यके किसी भी स्थानमें रहनेपर वह सब जगह संकेतसे जाना जा
सकता है । विशेष अनंत हैं, इसलिए उनकी एक साथ शब्दसे प्रतीति नहीं हो सकती; अतएव सामान्य ही
शब्दका विषय है । ( ३ ) विधिवादियोंके अनुसार विधि ही शब्दका अर्थ है, क्योंकि उससे प्रवृत्ति न करने-
वाले मनुष्योंकी प्रवृत्ति होती है । (प्रवृत्तिके अनुकूल व्यापारको विधि कहते हैं; विधि, प्रेरणा, प्रवर्तना आदि
शब्द एक ही अर्थके द्योतक हैं ) । विधि अनेक प्रकारकी है । ( सामान्यसे लौकिक और वैदिक विधिके दो भेद
हैं । अपूर्व, नियम और परिसंख्याके भेदसे विधि तीन प्रकारकी बतायी गई है । उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग
और अधिकार ये अपूर्व विधिके चार भेद हैं) । कोई विधिवादी वाक्यरूप शब्दको विधि कहते हैं। (जैसे 'स्वर्गकी
इच्छा रखनेवालेको अग्निहोत्र करना चाहिये') । कोई वाक्यसे उत्पन्न व्यापार ( भावना ) को विधि कहते हैं ।
पुरुषकी प्रवृत्तिके अनुकूल प्रवर्तन करनेको व्यापार अथवा भावना कहते हैं। ( यह भावना शब्दभावना और अर्थ-
भावनाके भेदसे दो प्रकारकी है । 'स्वर्गकी इच्छा रखनेवालेको यज्ञ करना चाहिये' ( यजेत स्वर्गकामः ) आदि
वाक्योंमें, ईश्वरके स्वीकार न करनेसे लिङ् ( विधिरूप ) शब्दके व्यापारको शब्दभावना कहते हैं । शब्दके व्या-
पारसे यज्ञ करनेवाले पुरुषकी प्रवृत्तिको अर्थभावना कहते हैं। भट्टमीमांसक भावनाको मानते हैं ) । कोई
नियोगको ही विधि मानते हैं । ( जिसके द्वारा यज्ञमें नियुक्त हो, उसे नियोग कहते हैं। यह नियोग ग्यारह
१. अतद्व्यावृत्तिः । यथा विज्ञानवादिबौद्धमते नीलत्वादिवर्मोऽनीलव्यावृत्तिरूपः ।
२. दिङ्नागः ।
३. विधिप्रेरणाप्रवर्तनादिशब्दाभिधेयः प्रवृत्त्यनुकूलव्यापारः ।
४. सामान्यतोऽयं विधिर्द्विविधः लौकिकः वैदिकश्च । प्रकारान्तरेण विधिः त्रिविधः अपूर्वविधिः नियम-
विधिः संख्याविधिश्च ।
५. यद्वाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः यथा 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' ।
६. भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः । यथा यजेतेत्यादौ लिङाद्याख्यातार्थो भावना । भाट्टमते
शाब्दीभावना आर्थीभावना चेति द्विविधा भावना । 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि वैदिकवाक्ये पुरुषाभावात् शब्द-
निष्ठत्वादेव शब्दभावना इत्युच्यते । अर्थभावना तु प्रवृत्त्यादिव्यापाररूपा ।
७. नियुक्तोऽहमनेनाग्निष्टोमादिवाक्येनेति निरवशेषो योगः । एकादशधा नियोगः विद्यानन्दिकृतअष्ट-
सहस्र्यां व्याख्यातः पृ. ६ ।
८. न्यक्कारपूर्विका प्रेरणा प्रैषः ।

१३४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
तदुपाधिप्रवर्त्तनामात्रमित्यन्ये । एवं फलतदभिलाषकर्म्यादयोऽपि वाच्याः । एतेषां निराकरणं
सपूर्वोत्तरपक्षं न्यायकुमुदचन्द्रादेवावसेयम् ॥ इति काव्यार्थः ॥१४॥
इदानीं सांख्याभिमतप्रकृतिपुरुषादितत्त्वानां विरोधावरुद्धत्वं ख्यापयन्, तद्बालिशता-
विलसितानामपरिमितत्वं दर्शयति—
चिदर्थशून्या च जडा च बुद्धिः शब्दादितन्मात्रजमम्बरादि ।
न बन्धमोक्षौ पुरुषस्य चेति कियज्जडैर्न ग्रथितं विरोधि ॥१५॥
प्रकारका बताया गया है । प्रभाकर लोग नियोगवादी हैं । भट्टमीमांसक नियोगवादका खंडन करते हैं ।) कोई
प्रेरणा आदिको, और कोई तिरस्कार पूर्वक प्रेरणा करनेको ही विधि मानते हैं । इसी तरह विधिके फल, अभि-
लाषा और कर्म आदि भी विधिवादियोंने भिन्न भिन्न स्वीकार किये हैं। इन सब मतोंका निरूपण और उनका
खंडन प्रभाचन्द्रकृत न्यायकुमुदचन्द्रोदय नामक ग्रन्थमें देखना चाहिये ।। यह श्लोकका अर्थ है ॥१४॥
भावार्थ—इस श्लोकमें प्रत्येक वस्तुको सामान्य-विशेष और एक-अनेक प्रतिपादन करते हुए सामान्य
एकान्तवादी, विशेष एकान्तवादी, तथा परस्पर भिन्न निरपेक्ष सामान्य-विशेष वादियोंकी समीक्षा की गई है ।
( १ ) अद्वैतवेदांती, मीमांसक और सांख्योंका मत है कि वस्तु सर्वथा सामान्य है, क्योंकि विशेष सामान्यसे
भिन्न प्रतिभासित नहीं होते । ( २ ) क्षणिकवादी बौद्धोंकी मान्यता है कि प्रत्येक वस्तु सर्वथा विशेषरूप है,
क्योंकि विशेषको छोड़कर सामान्य कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता, और वस्तुका अर्थक्रियाकारित्व लक्षण भी
विशेषमें ही घटित होता है । ( ३ ) न्यायवैशेषिकोंका कथन है कि सामान्य-विशेष परस्पर भिन्न और निरपेक्ष
हैं, अतएव सामान्य और विशेषको एक न मानकर परस्पर भिन्न स्वीकार करना चाहिये ।
जैनसिद्धांतके अनुसार उक्त तीनों सिद्धांत कथंचित् सत्य हैं। वस्तुको सर्वथा-सामान्य माननेवाले वादी
द्रव्यास्तिकनयकी अपेक्षासे, सर्वथा-विशेष माननेवाले वादी पर्यायास्तिकननयकी अपेक्षासे, तथा सामान्य-विशेषको
परस्पर भिन्न और निरपेक्ष माननेवाले वादी नैगमनयकी अपेक्षासे सच्चे हैं । इसलिए सामान्य-विशेषको कथं-
चित् भिन्न-अभिन्न ही स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि पदार्थोंका ज्ञान करते समय सामान्य और विशेष
दोनोंका ही एक साथ ज्ञान होता है, बिना सामान्यके विशेष, और विना विशेषके सामान्यका कहीं भी ज्ञान
नहीं होता । जैसे गौके देखनेपर हमें अनुवृत्तिरूप गौका ज्ञान होता है, वैसे ही भैंस आदिकी व्यावृत्तिरूप
विशेषका भी ज्ञान होता है । इसी तरह शवला गौ कहनेपर जैसे विशेषरूप शबलत्वका ज्ञान होता है, वैसे
ही गोत्वरूप सामान्यका भी ज्ञान होता है । अतएव सामान्य-विशेष कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न
होनेसे सामान्य और विशेष दोनों रूप ही हैं ।
इसी प्रकार वाच्य ( अर्थकी ) तरह वाचक ( शब्द ) भी सामान्य-विशेषरूप है । (यहाँ मल्लिषेणने
शब्द को पौद्गलिक सिद्ध करके उसे भी सामान्य-विशेषरूप सिद्ध किया है ।) तथा, प्रत्येक वस्तुको
भाव और अभावरूप मानना चाहिये, क्योंकि यदि वस्तु सर्वथा अभावरूप हो, तो उसे सर्वात्मक माननी
चाहिये, और ऐसी अवस्थामें उसका कोई भी स्वभाव नहीं मानना चाहिये । अतएव प्रत्येक वस्तुको
अपने स्वरूपसे सत्, और पररूपसे असत् मानना चाहिये । अतएव प्रत्येक वस्तु सापेक्ष है; इसलिये वाच्य
और वाचक दोनों सामान्य-विशेष और एक-अनेकरूप हैं ।
अब सांख्योंके प्रकृति, पुरुष आदि तत्त्वोंका विरोध दिखलाते हुए उन लोगोंके मतका खंडन करते हैं—
श्लोकार्थ—चैतन्यस्वरूप अर्थसे रहित बुद्धि जड़रूप है; शब्द आदि पांच तन्मात्राओंसे आकाश,
पृथिवी, जल, अग्नि और वायु उत्पन्न होते हैं; पुरुषके न बंध होता है और न मोक्ष—ये सब सांख्य लोगोंकी
विरुद्ध कल्पनायें हैं ।
१. भट्टाकलङ्कदेवकृतलघीयस्त्रयग्रन्थटीकात्मकः प्रभाचन्द्रेण प्रणीतः ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३५
चित्—चैतन्यशक्तिः, आत्मस्वरूपभूता। अर्थशून्या—विषयपरिच्छेदविरहिता। अर्था-
ध्यवसायस्य बुद्धिव्यापारत्वाद् इत्येका कल्पना। बुद्धिश्च महत्तत्त्वाख्या। जडा अनवबोध-
स्वरूपा इति द्वितीया। अम्बरादि—व्योमप्रभृतिभूतपञ्चकं शब्दादितन्मात्रजम्—शब्दादीनि यानि
पञ्चतन्मात्राणि सूक्ष्मसंज्ञानि, तेभ्यो जातमुत्पन्नं, शब्दादितन्मात्रजम् इति तृतीया। अत्र च
शब्दो गम्यः। पुरुषस्य च प्रकृतिविकृत्यनात्मकस्यात्मनो न बन्धमोक्षौ, किन्तु प्रकृतेरेव। तथा
च कापिलाः—
“तस्मान्न बध्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित्।
संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः॥१”
तत्र बन्धः—प्राकृतिकादिः। मोक्षः—पञ्चविंशतितत्त्वज्ञानपूर्वकोऽपवर्गः इति चतुर्थी।
इतिशब्दस्य प्रकारार्थत्वाद्—एवंप्रकारमन्यदपि विरोधीति विरुद्धं, पूर्वापरविरोधादिदोषाग्रा-
तम्। जडैः—मूर्खैः, तत्त्वावबोधविधुरधीभिः कापिलैः। कियन्न ग्रथितं—कियद् न स्वशास्त्रे-
षूपनिबद्धम्। कियदित्यसूयागर्भम्। तत्प्ररूपितविरुद्धार्थानामानन्त्येनेयत्तानवधारणात्। इति
संक्षेपार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। साङ्ख्यमते किल दुःखत्रयाभिहतस्य पुरुषस्य तदपघातहेतुतत्त्वजि-
ज्ञासा उत्पद्यते। आध्यात्मिकमाधिदैविकमाधिभौतिकं चेति दुःखत्रयम्। तत्राध्यात्मिकं द्वि-
विधम्—शारीरं मानसं च। शारीरं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यनिमित्तम्। मानसं कामक्रोधलोभ-
मोहेर्ष्याविषयादर्शननिबन्धनम्। सर्वं चैतदान्तरोपायसाध्यत्वादाध्यात्मिकं दुःखम्। वाह्योपाय-
साध्यं दुःखं द्वेधा आधिभौतिकमाधिदैविकं चेति। तत्राधिभौतिकं मानुषपशुपक्षिमृगसरीसृप-
स्थावरनिमित्तम्। आधिदैविकं यक्षराक्षसग्रहाद्या वेशहेतुकम्। अनेन दुःखत्रयेण रजःपरिणाम-
बुद्धिवर्तिना चेतनाशक्तेः प्रतिकूलतया अभिसम्बन्धो अभिघातः॥
तत्त्वानि पञ्चविंशतिः। तद्यथा अव्यक्तम् एकम्। महदहङ्कारपञ्चतन्मात्रैकादशेन्द्रियपञ्च-
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष (१) चेतनशक्ति पदार्थोंका ज्ञान नहीं करती, बुद्धिसे ही पदार्थोंका ज्ञान
होता है। (२) बुद्धि (महत्त्व) अज्ञान रूप है। (३) आकाश आदि शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न
होते हैं। (४) प्रकृति और विकृतिसे भिन्न पुरुषके बन्ध और मोक्ष नहीं होता, प्रकृतिके ही बन्ध और मोक्ष
होता है। कहा भी है—
“न कोई बँधता है, न मुक्त होता है, और न कोई संसारमें परिभ्रमण करता है; बन्ध, मोक्ष और
परिभ्रमण नाना आश्रयवाली प्रकृतिके ही होते हैं।”
(५) बन्ध प्रकृतिमें होता है, और पच्चीस तत्त्वोंके ज्ञानसे मोक्ष मिलता है।
आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखोंसे पीडित पुरुष दुःखोंके नष्ट करनेके कारणोंको जानना
चाहता है। आध्यात्मिक दुख शारीर और मानसके भेदसे दो प्रकारका है। वात, पित्त, और कफकी विष-
मतासे उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको शारीर, तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और विषयोंके प्राप्त न होनेसे
उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको मानस दुख कहते हैं। शारीर और मानस दुख, दुखके अन्तरंग कारण मनसे उत्पन्न
होते हैं, इसलिये इन्हें आध्यात्मिक दुख कहा है। आधिभौतिक और आधिदैविक दुख बाह्य कारणोंसे उत्पन्न
होते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प और स्थावर आदिसे उत्पन्न होनेवाले दुखको आधिभौतिक, तथा यक्ष, राक्षस,
ग्रह आदिसे पैदा होनेवाले दुखको आधिदैविक दुख कहते हैं। तीनों प्रकारके दुख रजोधर्मसे बुद्धिमें उत्पन्न
होते हैं। जब इन दुःखोंका चेतनाशक्तिके साथ विपरीत सम्बन्ध होता है, उस समय चेतनाशक्तिका अभिघात
होता है।
तत्त्व पच्चीस होते हैं—१ अव्यक्त, २ महत् (बुद्धि), ३ अहंकार, ४-८ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और
१. ईश्वरकृष्णविरचितसांख्यकारिका ६२।

१३६ श्रीमद्रामचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
महाभूतभेदात् त्रयोविंशतिविधं व्यक्तम् । पुरुषश्चिद्रूप इति । तथा च ईश्वरकृष्णः—
“मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥”१
प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकानां लाघवोष्टम्भगौरवधर्माणां परस्परोपकारिणां त्रयाणां गुणानां
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । प्रधानमव्यक्तमित्यनर्थान्तरम् । तच्च अनादिमध्यान्त-
मनवयवं साधारणमशब्दमस्पर्शमरूपमगन्धमव्ययम् । प्रधानाद् बुद्धिर्महदित्यपरपर्यायोत्पद्यते ।
योऽयमध्यवसायो गवादिषु प्रतिपत्तिः एवमेतद् नान्यथा, गौरेवायं नाश्वः, स्थाणुरेव नायं पुरुष
इत्येषा बुद्धिः । तस्यास्त्वष्टौ रूपाणि धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यरूपाणि चत्वारि सात्त्विकानि । अधर्मा-
दीनि तु तत्प्रतिपक्षभूतानि चत्वारि तामसानि ॥
बुद्धेः अहङ्कारः । स च अभिमानात्मकः । अहं शब्देऽहं स्पर्शेऽहं रूपेऽहं गन्धेऽहं रसेऽहं
स्वामी अहमीश्वरः असौ मया हतः ससत्वोऽहममुं हनिष्यामीत्यादिप्रत्ययरूपः । तस्मात्
पञ्चतन्मात्राणि शब्दतन्मात्रादीनि अविशेषरूपाणि सूक्ष्मपर्यायवाच्यानि । शब्दतन्मात्राद् हि
शब्द एवोपलभ्यते, न पुनरुदात्तानुदात्तस्वरितकम्पितषड्जादिभेदाः२ । षड्जादयः शब्दविशेषा-
दुपलभ्यन्ते । एवं स्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्रेष्वपि योजनीयमिति । तत एव चाहङ्काराद् एकादशे-
न्द्रियाणि च । तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं त्वगिति पंचबुद्धीन्द्रियाणि । वाक्पाणिपादपायूपस्थाः
पञ्चकर्मेन्द्रियाणि । एकादशं मन इति ॥
गन्ध (पांच तन्मात्रा), ९-१९ घ्राण, रसना, चक्षु, स्पर्श और श्रोत्र (पांच बुद्धीन्द्रिय), और वाक् (वचन)
पाणि (हाथ), पाद (पांव), पायु (गुदा), उपस्थ (लिंग) (पांच कर्मेन्द्रिय), तथा मन, २०-२४ आकाश,
वायु, तेज, जल और पृथिवी (पांच महाभूत), तथा २५ प्रकृति और विकृति रहित पुरुष (चित्) । ईश्वर-
कृष्णने कहा भी है—
“पच्चीस तत्त्वोंका मूल कारण प्रकृति (प्रधान-अव्यक्त) है, यह स्वयं किसीका विकार नहीं है
(अविकृति) । महत्, अहंकार और पांच तन्मात्रायें ये प्रकृति और विकृति दोनों हैं (महत्त्व अहंकारकी
प्रकृति, और मूल प्रकृतिकी विकृति है । अहंकार पांच तन्मात्रा और इन्द्रियोंकी प्रकृति, और महान्की विकृति
है । पांच तन्मात्रायें पंचभूतोंकी प्रकृति और अहंकारकी विकृति है) । तथा ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महा-
भूत ये सोलह तत्त्व विकृति रूप ही हैं । पुरुष प्रकृति और विकृति दोनोंसे रहित है ।”
एक दूसरेका उपकार करनेवाले प्रीति और लाघव रूप सत्त्व, अप्रीति और उपष्टंभ रूप रज, और
विषाद और गौरव रूप तम गुणोंकी साम्य अवस्थाको प्रकृति, प्रधान अथवा अव्यक्त कहते हैं । यह प्रधान
आदि, मध्य, अन्त और अवयव रहित है, साधारण है, शब्द, स्पर्श, रूप और गन्धसे रहित, तथा अविनाशी
है । प्रधानसे बुद्धि अथवा महान् उत्पन्न होता है । यह गो ही है, घोड़ा नहीं; पुरुष ही है, ठूंठ नहीं, इस प्रकार
किसी वस्तुके निश्चयरूप ज्ञानको बुद्धि कहते हैं । बुद्धिके धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्त्विक) और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, और अनैश्वर्य (तामसिक) ये आठ गुण हैं ।
बुद्धिसे अहंकार होता है । यह अहंकार 'मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ, मैं देखता हूँ, मैं सूँघता हूँ,
मैं चखता हूँ, मैं स्वामी हूँ, मैं ईश्वर हूँ, यह मैंने मारा है, मैं बलवान हूँ, मैं इसे मारूँगा' आदि अभिमानरूप
होता है । अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ होती हैं । ये शब्द आदि पाँच तन्मात्राएँ सामान्यरूप और सूक्ष्म पर्याय
रूप हैं । शब्द तन्मात्रासे केवल शब्दका ही ज्ञान होता है, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, कंपित और षड्ज
आदि शब्दके विशेषरूपोंका नहीं, क्योंकि षड्ज आदिका ज्ञान विशेष शब्दसे ही होता है । इसी प्रकार स्पर्श,
रूप, रस, गंध आदि तन्मात्राओंसे सामान्यरूपसे स्पर्श, रूप, रस, गंध, आदिका ज्ञान होता है, विशेष स्पर्श
१. सांख्यकारिका ३ !
२. षड्जऋषभगान्धारा मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतो निषधः सप्त तन्त्रीकण्ठोद्भवाः स्वराः ॥
अभिधानचिन्तामणौ ६-३७ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३७
पञ्चतन्मात्रेभ्यश्च पञ्चमहाभूतान्युत्पद्यन्ते । तद्यथा शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दगुणम् ।
शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्राद् वायुः शब्दस्पर्शगुणः। शब्दस्पर्शतन्मात्रसहिताद् रूपतन्मात्रात्
तेजः शब्दस्पर्शरूपगुणम् । शब्दस्पर्शरूपतन्मात्रसहिताद् रसतन्मात्रादापःशब्दस्पर्शरूपरसगुणाः ।
शब्दस्पर्शरूपरसतन्मात्रसहिताद् गन्धतन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी जायत इति ॥
पुरुषस्तु—
“अमूर्तश्चेतनो भोगी नित्यः सर्वगतोऽक्रियः ।
अकर्ता निर्गुणः सूक्ष्म आत्मा कापिलदर्शने ॥”
इति । अन्धपङ्गुवत् प्रकृतिपुरुषयोः संयोगः । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या ।
यत इन्द्रियद्वारेण सुखदुःखादयो बुद्धौ प्रतिसंक्रामन्ति बुद्धिश्चोभयमुखदर्पणाकारा । ततस्तस्यां
चैतन्यशक्तिः प्रतिबिम्बते । ततः सुख्यहं दुःख्यहमित्युपचारः । आत्मा हि स्वं बुद्धेर्व्यतिरिक्त-
मभिमन्यते । आह च पतञ्जलिः— “शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन् अतदा-
त्मापि तदात्मक इव प्रतिभासते”१ इति । मुख्यतस्तु बुद्धेरेव विषयपरिच्छेदः । तथा च वाच-
स्पतिः— “सर्वो व्यवहर्ता आलोच्य नन्वहमत्राधिकृत इत्यभिमत्य कर्तव्यमेतन्मया इत्यध्यव-
स्यति । ततश्च प्रवर्तते इति लोकतः सिद्धम् । तत्र कर्तव्यमिति योऽयं निश्चयश्चितिसन्निधा-
नापन्नचैतन्याया बुद्धेः सोऽध्यवसायो बुद्धेरसाधारणो व्यापारः”२ इति । चिच्छक्तिसन्निधाना-
च्वाचेतनापि बुद्धिश्चेतनावतीवाभासते । वादमहार्णवोऽप्याह३ । “बुद्धिदर्पणसंक्रान्तमर्थप्रतिवि-
आदिका ज्ञान नहीं होता । अहंकारसे चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श (बुद्धीन्द्रिय); वाक्, पाणि, पाद,
गुदा, लिंग (कर्मेन्द्रिय) और मन ये ग्यारह इन्द्रियां उत्पन्न होती हैं ।
पाँच तन्मात्राओंसे पाँच महाभूत पैदा होते हैं । शब्द तन्मात्रासे आकाश पैदा होता है । शब्द और
स्पर्श तन्मात्राओंसे शब्द और स्पर्शके गुणसे युक्त वायु; शब्द, स्पर्श और रूप तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श और
रूप गुणोंसे युक्त अग्नि; शब्द, स्पर्श, रूप और रस तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, और रससे युक्त जल;
तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधसे युक्त पृथिवी उत्पन्न
होती है ।
पुरुष तो—
“सांख्य दर्शनमें अमूर्त, चेतन, भोक्ता, नित्य, सर्वव्यापी, क्रिया रहित, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म” है ।
अंधे और लंगड़े पुरुषकी तरह प्रकृति और पुरुषका संबंध होता है । चित् शक्ति (पुरुष) स्वयं पदार्थोंका
ज्ञान नहीं कर सकती, क्योंकि सुख-दुख इन्द्रियों द्वारा ही बुद्धिमें प्रतिभासित होते हैं। बुद्धि दोनों तरफसे दर्पणकी
तरह है, इसमें एक ओर चेतनाशक्ति और दूसरी ओर बाह्य जगत् झलकता है । बुद्धिमें चेतनाशक्तिके प्रति-
बिम्ब पड़नेसे आत्मा (पुरुष) अपनेको बुद्धिसे अभिन्न समझता है, और इसलिये आत्मामें 'मैं सुखी हूँ', 'मैं
दुखी हूँ', ऐसा ज्ञान होता है । पतंजलिने भी कहा है— “यद्यपि पुरुष स्वयं शुद्ध है, परन्तु वह बुद्धि सम्बन्धी
अध्यवसायको देखकर, बुद्धिसे भिन्न होकर भी अपने आपको बुद्धिसे अभिन्न समझता है ।” वास्तवमें वह
ज्ञान बुद्धिका ही होता है । वाचस्पतिने भी कहा है— “लोकके कार्योंमें प्रवृत्ति करनेवाले सभी लोग यह
मानते हैं कि इसमें हमारा अधिकार है, और यह हमारा कर्तव्य है, ऐसा समझकर निश्चय करते हैं ।
निश्चय करनेके पश्चात् कार्यमें प्रवृत्ति होती है, इस प्रकार लोगोंमें परिपाटी चलती है । यहाँ बुद्धिमें
चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे ही कर्तव्य-बुद्धिका निश्चय होता है; यह निश्चय बुद्धिका असाधारण
व्यापार है ।” बुद्धिमें चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे अचेतन बुद्धि चेतनकी तरह प्रतिभासित होने लगती
है । वादमहार्णवमें भी कहा है— “दर्पणके समान बुद्धिमें पड़नेवाला पदार्थोंका प्रतिबिम्ब पुरुषरूपी दर्पणमें
१. व्यासभाष्ये । २. सांख्यतत्त्वकौमुद्यां ।
३. सांख्यग्रन्थविशेषः । जैनाचार्यः अभयदेवसूरिरपि वादमहार्णवनामग्रन्थं कृतवान् ।
१८

१३८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
म्बकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति । तदेव भोक्तृत्वमस्य न त्वात्मनो विकारापत्तिः।"
इति । तथा चासुरिः¹—
"विविक्ते दृक्परिणतौ बुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥"
विन्ध्यवासी त्वेवं भोगमाचष्टे ।
"पुरुषोऽविकृतात्मैव स्वनिर्भासमचेतनम् ।
मनः करोति सान्निध्यादुपाधिः स्फटिकं यथा ॥"
न च वक्तव्यम् पुरुषश्चेद्गुणोऽपरिणामी कथमस्य मोक्षः । मुचेर्बन्धनविश्लेषार्थत्वात्
सवासनक्लेशकर्माशयानां च बन्धसमाम्नातानां पुरुषेऽपरिणामिन्यसम्भवात् । अत एव नास्य
प्रेत्यभावापरनामा संसारोऽस्ति, निष्क्रियत्वादिति । यतः प्रकृतिरेव नानापुरुषाश्रया सती
बध्यते संसरति मुच्यते च न पुरुष इति बन्धमोक्षसंसाराः पुरुषे उपचर्यन्ते । तथा जयपरा-
जयौ भृत्यगतावपि स्वामिन्युपचर्येते, तत्फलस्य कोशलाभादेः स्वामिनि संबन्धात्, तथा
भोगापवर्गयोः प्रकृतिगतयोरपि विवेकाग्रहात् पुरुषे संबन्ध इति ॥
तदेतदखिलमालजालम् । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या चेति परस्परविरुद्धं वचः ।
चित्ते संज्ञाने । चेतनं चित्यते वानयेति चित् । सा चेत् स्वपरपरिच्छेदात्मिका नेष्यते तदा
चिच्छक्तिरेव सा न स्यात्, घटवत् । न चामूर्तायाश्चिच्छक्तेर्बुद्धौ प्रतिबिम्बोदयो युक्तः । तस्य
मूर्त्तधर्मत्वात् । न च तथापरिणाममन्तरेण प्रतिसंक्रमोऽपि युक्तः । कथञ्चित् सक्रियात्मकता-
प्रतिबिम्बित होता है। बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है, इसीसे पुरुषको भोक्ता
कहते हैं। इससे आत्मामें कोई विकार नहीं आता।" आसुरिने भी कहा है—
"जिस प्रकार निर्मल जलमें पड़नेवाला चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलका ही विकार है, चन्द्रमाका नहीं,
उसी तरह आत्मामें बुद्धिका प्रतिबिम्ब पड़नेपर आत्मामें जो भोक्तृत्व है, वह केवल बुद्धिका विकार है,
वास्तवमें पुरुष निर्लेप है।"
भोगके विषयमें विन्ध्यवासीने कहा है—
"जैसे भिन्न भिन्न रंगोंके संयोगसे निर्मल स्फटिक मणि काले, पीले आदि रूपका होता है, वैसे ही
अविकारी चेतन पुरुष अचेतन मनको अपने समान चेतन बना लेता है। वास्तवमें विकारी होनेसे मन चेतन
नहीं कहा जा सकता।"
प्रतिवादी--यदि पुरुष निर्गुण और अपरिणामी है तो उसे मोक्ष नहीं हो सकता। मुच् धातुका
अर्थ बन्धनसे छूटना है। अपरिणामी आत्मामें वासना और क्लेशरूप कर्मोंके सम्बन्धसे बन्धनका उत्पन्न होना
सम्भव नहीं, अतएव आत्माके निष्क्रिय होनेसे उसके परलोक (संसार) भी नहीं हो सकता। सांख्य—
नाना पुरुषोंके आश्रित प्रकृतिका ही बन्ध होता है, वही संसारमें भ्रमण करती है, और प्रकृति ही को मोक्ष
होता है, अतएव पुरुषके बन्ध, मोक्ष और संसारका व्यवहार उपचारसे होता है। जिस प्रकार भृत्यों द्वारा
किसी सेनाकी जय, पराजय किये जानेपर वह जय, पराजय सेनाके स्वामीकी समझी जाती है, क्योंकि जय,
पराजयसे होनेवाले लाभ और हानिका फल स्वामीको ही मिलता है, उसी तरह वास्तवमें संसार और मोक्ष
दोनों प्रकृतिके होते हैं, परन्तु पुरुषके विवेकख्याति होनेसे, पुरुषके ही संसार और मोक्ष माना जाता है।
उत्तरपक्ष-(१) क-यह सब बड़ा भारी जाल है। एक ओर चैतन्यशक्ति है और दूसरी ओर
वह ज्ञेय पदार्थके ज्ञानसे शून्य है-यह कथन परस्पर विरुद्ध है। चित् धातु जाननेके अर्थमें प्रयुक्त होती है।
जाननेकी जो क्रिया होती है अथवा जिसके द्वारा जाना जाय, उसे चित् (चेतनं, चित्यते वा अनयेति चित्)
कहते हैं। यदि यह शक्ति स्व और परको जाननेके स्वभाववाली न मानी गई तो उसे चेतनाशक्ति (चित्शक्ति)
नहीं कह सकते; जैसे घट। ख-अमूर्त चेतनाशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्बित न होना युक्त नहीं है; क्योंकि
१. अयं सांख्याचार्य ईश्वरकृष्णगुरुपरम्परायामुपलभ्यते ।

व्यतिरेकेण प्रकृत्युपधानेऽप्यन्यथात्वानुपपत्तेः, अप्रच्युतप्राचीनरूपस्य च सुखदुःखादिभोगव्यप-
देशानर्हत्वात् । तत्प्रच्यवे च प्राक्तनरूपत्यागेनोत्तररूपाध्यासिततया सक्रियत्वापत्तिः । स्फटिका-
दावपि तथा परिणामेनैव प्रतिबिम्बोदयसमर्थनात्, अन्यथा कथमन्धोपलादौ न प्रतिबिम्बः ।
तथापरिणामाभ्युपगमे च बलादायातं चिच्छक्तेः कर्तृत्वं साक्षाद्भोक्तृत्वं च ॥
अथ “अपरिणामिनी भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्ते च तद्वृ-
त्तिमनुभवति” १ इति पतञ्जलिवचनादौपचारिक एवायं प्रतिसंक्रम इति चेत्, तर्हि “उपचार-
स्तत्त्वचिन्तायामनुपयोगी” इति प्रेक्षावतामनुपादेय एवायम् । तथा च प्रतिप्राणिप्रतीतं सुख-
दुःखादिसंवेदनं निराश्रयमेव स्यात् । न चेदं बुद्धेरुपपन्नम् । तस्या जडत्वेनाभ्युपगमात् ।
अतएव

१४० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
न खल्वतिकोपनत्त्वादिना समारोपिताग्नित्वो माणवकः कदाचिदपि मुख्याग्निसाध्यां दाह-
पाकाद्यर्थक्रियां कर्तुमीश्वरः । इति चिच्छक्तेरेव विषयाध्यवसायो घटते न जडरूपाया बुद्धेरिति ।
अत एव धर्माद्यष्टरूपतापि तस्या वाङ्मात्रमेव, धर्मादीनामात्मधर्मत्वात् । अत एव चाह-
ङ्कारोऽपि न बुद्धिजन्यो युज्यते, तस्याभिमानात्मकत्वेनात्मधर्मस्याचेतनादुत्पादायोगात् ॥
अम्बरादीनां च शब्दादितन्मात्रजत्वं प्रतीतिपराहतत्वेनैव विहितोत्तरम् । अपि च,
सर्ववादिभिस्तावदविगानेन गगनस्य नित्यत्वमङ्गीक्रियते । अयं च शब्दतन्मात्रात् तस्याप्या-
विर्भावमुद्भावयन्नित्यैकान्तवादिनां च धुरि आसनं न्‍यासयन्नसंगतप्रलापीव प्रतिभाति । न च
परिणामिकारणं स्वकार्यस्य गुणो भवितुमर्हतीति "शब्दगुणमाकाशम्"१ इत्यादि वाङ्मात्रम् ।
वागादीनां चेन्द्रियत्वमेव न युज्यते । इतरासाध्यकार्यकारित्वाभावात् । परप्रतिपादनग्रहण-
विहरणमलोत्सर्गादिकार्याणामितरावयवैरपि साध्यत्वोपलब्धेः । तथापि तत्त्वकल्पने इन्द्रिय-
संख्या न व्यवतिष्ठते, अन्याङ्गोपाङ्गानामपीन्द्रियत्वप्रसङ्गात् ।
यच्चोक्तं 'नानाश्रयायाः प्रकृतेरेव बन्धमोक्षौ संसारश्च न पुरुषस्य' इति । तदप्य-
सारम् । अनादिभवपरम्परानुबुद्ध्या प्रकृत्या सह यः पुरुषस्य विवेकाग्रहणलक्षणोऽविवग्भावः
स एव चेन्न बन्धः, तदा को नामान्यो बन्धः स्यात् । प्रकृतिः सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तम् इति च
'अचेतन बुद्धि चेतना सहित जैसी प्रतिभासित होती है', यहाँ 'इव' ( जैसी ) शब्दसे अचेतन बुद्धिमें चेतनाका
आरोप किया गया है । परन्तु आरोपसे अर्थक्रियाकी सिद्धि नहीं होती । जैसे यदि किसी बालकका अत्यन्त
क्रोधी स्वभाव देख कर उसका अग्नि नाम रख दिया जाय, परन्तु वह अग्निकी जलाने, पकाने आदि क्रियाओं-
को नहीं कर सकता, इसी प्रकार विषयोंका—ज्ञेय पदार्थोंका-ज्ञान चेतनाशक्तिसे ही हो सकता है, अचेतन
बुद्धिमें चेतनाका आरोप करने पर भी बुद्धिसे पदार्थोंका ज्ञान संभव नहीं । अतएव आप लोगोंने जो बुद्धिके
धर्म आदि आठ गुण माने हैं, वे भी केवल वचनमात्र हैं, क्योंकि धर्म आदि आत्माके ही गुण हो सकते हैं,
अचेतन बुद्धिके नहीं । इसीलिये अहंकारको भी बुद्धिजन्य नहीं मानना चाहिये, क्योंकि अहंकार अभिमान
रूप है, इसलिये वह आत्मासे हो उत्पन्न होता है, अचेतन बुद्धिसे उत्पन्न नहीं हो सकता ।
( ३ ) आकाश आदिका शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न होना अनुभवके सर्वथा विरुद्ध है ।
तथा, सब लोगोंने आकाशको नित्य स्वीकार किया है; नित्य एकान्तवादको मानकर भी केवल सांख्य लोग ही
उसकी शब्द तन्मात्रासे उत्पत्ति मान कर असंगत प्रलाप करते हैं। तथा, परिणामी ( उपादान ) वस्तुके परिणाममें
कारण है, वह अपने कार्यका गुण नहीं हो सकता, इसलिये "शब्दको आकाशका गुण मानना" भी कथन-
मात्र है । तथा, वाक् आदि इन्द्रियाँ नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि दूसरोंको प्रतिपादन करना, किसी वस्तुको
ग्रहण करना, विहार करना, मल त्याग करना आदि, वाक्, पाणि, पाद, पायु आदि कर्मेन्द्रियोंसे होने वाले
कार्य शरीरके अन्य अवयवोंसे भी किये जा सकते हैं; जैसे उंगलियों द्वारा भी दूसरोंको प्रतिपादित किया
जा सकता है । अतएव वाक् आदि शरीरके अवयव हैं, इन्हें इन्द्रियाँ नहीं कह सकते । यदि इतर अवयवों
द्वारा न किये जानेवाले कार्योंके कर्तृत्वका अभाव होने पर भी वाक् आदिको इन्द्रिय माना जाय, तो इन्द्रियों-
की ग्यारह संख्या ही नहीं बन सकती, क्योंकि शरीरके अन्य अंग-उपांगोंको भी इन्द्रियत्वका प्रसंग उपस्थित
हो जाता है ।
( ४ ) तथा, 'अनेक पुरुषोंके आश्रय रहनेवाली प्रकृतिके ही बन्ध, मोक्ष और संसार होते हैं, पुरुषके
नहीं', यह कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि आप लोगोंके मतमें यदि अनादि भव-परम्परासे बद्ध और पुरुषके
विवेकको न समझने वाले अपृथग्भावको बन्ध नहीं कहते, तो फिर आपके मतमें बन्धका क्या लक्षण है ?
१. वैशेषिकसूत्रे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४१
प्रतिपद्यमानेनायुष्मता संज्ञान्तरेण कर्मैव प्रतिपन्नं । तस्यैवंस्वरूपत्वात् अचेतनत्वाच्च ॥
यस्तु प्राकृतिकवैकारिकदाक्षिणभेदात् त्रिविधो बन्धः । तद्यथा प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये
प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः । ये विकारानैव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीः पुरुषबुद्धयोपासते
तेषां वैकारिकः । इष्टापूर्ते¹ दाक्षिणः । पुरुषतत्त्वानामभिज्ञो हीष्टापूर्तकारी कामोपहतमना
बध्यत इति ।
“इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेन भूत्वा
इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥”²
इति वचनात् । स त्रिविधोऽपि कल्पनामात्रं कथञ्चिद् मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमाद-
कषाययोगे³भ्योऽभिन्नस्वरूपत्वेन कर्मबन्धहेतुष्वेवान्तर्भावात् । बन्धसिद्धौ च सिद्धस्तस्यैव
निर्वाधः संसारः । बन्धमोक्षयोश्चैकाधिकरणत्वाद् य एव बद्धः स एव मुच्यत इति पुरुषस्यैव
मोक्षः आबालगोपालं तथाप्रतीतेः ॥
प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनात् प्रवृत्तेरुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति
चेत् । न । प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदासीन्यायोगात् । अथ पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः प्रवृत्तिः ।
यदि कहो कि उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थोंका कारण प्रकृति है तो आप लोगोंने नामान्तरसे कर्मको ही
स्वीकार किया है; क्योंकि कर्मका यह स्वरूप है और वह अचेतन है। अतएव बन्ध पुरुषके ही मानना
चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
सांख्य—प्राकृतिक, वैकारिक, और दाक्षिणके भेदसे बन्ध तीन प्रकारका होता है। प्रकृतिको
आत्मा समझकर जो प्रकृतिकी उपासना करते हैं, उनके प्राकृतिक बन्ध होता है। जो पाँच भूत, इन्द्रिय,
अहंकार, और बुद्धिरूप विकारोंको पुरुष मानकर उपासना करते हैं उनके वैकारिक बन्ध होता है। जो यज्ञ दान
आदि कर्म करते हैं उनके दाक्षिण बन्ध होता है। आत्माको न जानकर, सांसारिक इच्छाओंसे यज्ञ, दान
आदि कर्म करनेसे दाक्षिण बन्ध होता है। कहा भी है—
“जो मूढ़ पुरुष यज्ञ दान आदिको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, यज्ञ दान आदिके अतिरिक्त किसी भी
शुभ कर्मकी प्रशंसा नहीं करते, वे लोग स्वर्गमें उत्पन्न होते हैं, और अन्तमें फिर मनुष्य लोकमें अथवा इससे
भी हीन लोकमें जन्म लेते हैं ।”
जैन—उक्त तीनों प्रकारका बन्ध मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगमें गर्भित हो
जाता है, अतएव उसे पृथक् स्वीकार करना ठीक नहीं । अतएव जीवके बन्ध सिद्ध होनेपर, जीवके ही
संसारकी भी सिद्धि होती है। तथा, जो बँधता है, वह कभी मुक्त भी होता है, अतएव बन्ध और मोक्षका
एक ही अधिकरण होनेसे पुरुषके मोक्ष भी सिद्ध होता है। अतएव 'पुरुषके न बन्ध होता है, न मोक्ष' यह
कहना अयुक्तियुक्त है।
शंका—जिस समय प्रकृति और पुरुषमें विवेकख्याति उत्पन्न होती है, प्रकृति प्रवृत्तिसे मुँह मोड़
लेती है, उस समय पुरुष अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है, इसे ही मोक्ष कहते हैं। समाधान—
प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करना ही है, अतएव वह प्रकृति प्रवृत्तिसे उदासीन नहीं हो सकती । शंका—
१. एतल्लक्षणं—वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमर्थ्याः प्रचक्षते ।
एकाग्निकर्महवनं त्रेतायां यश्च हूयते । अन्तर्वेद्यां च यद्दानमिष्टं तदभिधीयते ॥
२. मुंडक उ० १–२–१० ।
३. मिथ्या विपरीतं दर्शनं मिथ्यादर्शनम् । सावद्ययोगेभ्यो निवृत्त्यभावः अविरतिः । प्रकर्षेण माद्य-
त्यनेनेति प्रमादः । विषयक्रीडाभिष्वङ्गः। कलुषयन्ति शुद्धस्वभावं सन्तं कर्ममलिनं कुर्वन्ति जीवमिति कषायाः।
कायवाङ्मनसां कर्म योगः ।

१४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
विवेकख्यातिश्च पुरुषार्थः । तस्यां जातायां निवर्तते, कृतकार्यत्वात् ।
“रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ॥”१
इति वचनादिति चेत् । नैवम् । तस्या अचेतनाया विमृश्यकारित्वाभावात् । यथेयं
कृतेऽपि शब्दाद्युपलम्भे पुनस्तदर्थं प्रवर्तते, तथा विवेकख्यातौ कृतायामपि पुनस्तदर्थं प्रवर्तिष्यते ।
प्रवृत्तिलक्षणस्य स्वभावस्यानपेतत्वात् । नर्तकीदृष्टान्तस्तु स्वेष्टविघातकारी । यथा हि नर्तकी
नृत्यं पारिषदेभ्यो दर्शयित्वा निवृत्तापि पुनस्तत्कुतूहलात् प्रवर्तते, तथा प्रकृतिरपि पुरुषाया-
त्मानं दर्शयित्वा निवृत्तापि पुनः कथं न प्रवर्तेतामिति । तस्मात् कृत्स्नकर्मक्षये पुरुषस्यैव मोक्ष
इति प्रतिपत्तव्यम् ॥
एवमन्यासामपि तत्कल्पनानां तमोमोहमहामोहतामिस्रान्धतामिस्रभेदात्२ पञ्चधा अवि-
³द्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशरूपो विपर्ययः । ब्राह्मप्राजापत्यसौम्येन्द्रगान्धर्वयक्षराक्षसपैशाच-
भेदादष्टविधो दैवः सर्गः । पशुमृगपक्षिसरीसृपस्थावर४भेदात् पञ्चविधस्तैर्यग्योनः । ब्राह्मणत्वाद्य-
वान्तरभेदाविवक्षया चैक५विधो मानुषः । इति चतुर्दशधा भूतसर्गः । बाधिर्यकुण्ठतान्धत्वजड-
प्रकृतिकी प्रवृत्ति केवल पुरुषार्थके लिये उत्पन्न होती है, और पुरुष और प्रकृतिमें भेद-दृष्टि होना ही पुरुषार्थ
है । इस भेद-दृष्टिके उत्पन्न होनेपर प्रकृति कृतकृत्य होकर विश्राम लेती है । कहा भी है—
“जिस प्रकार रंगभूमिमें अपना नृत्य दिखाकर नटी निवृत्त होती है उसी तरह प्रकृति पुरुषको
अपना रूप दिखाकर निवृत्त होती है ।”
समाधान—प्रकृति अचेतन है, अतएव वह विचारपूर्वक प्रवृत्ति नहीं कर सकती । तथा जिस
प्रकार विषयका एक बार उपभोग करनेपर भी फिरसे उसी विषयके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है
( क्योंकि प्रकृति प्रवृत्तिशील है ), वैसे ही विवेकख्याति होनेपर भी फिरसे पुरुषमें प्रकृतिकी प्रवृत्ति
होना चाहिये, क्योंकि प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करनेका है । तथा, नटीका दृष्टांत उलटा आप लोगोंके
सिद्धांतका घातक है । क्योंकि दर्शकोंको एक बार नृत्य दिखाकर चले जानेपर भी अच्छा नृत्य होनेसे दर्शक
लोगोंके आग्रहसे नर्तकी फिरसे अपना नाच दिखाने लगती है, वैसे ही पुरुषको अपना स्वरूप दिखाकर
प्रकृतिके निवृत्त हो जानेपर भी प्रकृतिको फिरसे प्रवृत्ति करना चाहिये । अतएव सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय होने-
पर पुरुषको ही मोक्ष होता है, यह मानना चाहिये ।
इसके अतिरिक्त, सांख्य लोगोंकी निम्न कल्पनायें भी विरुद्ध हैं : ( क ) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष
तथा अभिनिवेश रूप तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अंधतामिस्र, यह पाँच प्रकारका विपर्यय है । ( तम
और मोहके आठ-आठ, महामोहके दस, तामिस्र और अंधतामिस्रके अठारह-अठारह भेद होनेसे यह विपर्यय कुल
६२ प्रकारका होता है ) । ( ख ) ब्राह्म, प्राजापत्य, सौम्य, इन्द्र, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पैशाच ये आठ प्रकारके
देव; पशु, मृग, पक्षी, सर्प, स्थावर ये पाँच प्रकारके तिर्यंच ( अचेतन घट आदि भी स्थावरमें ही गर्भित होते
१. सांख्यकारिका ५९ । २. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ४७ ।
३. अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या । दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ।
सुखानुशयी रागः । दुःखानुशयी द्वेषः । स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः । पातंजलयोगसूत्रे २–५,
६, ७, ८, ९ ।
४. घटादयस्त्वशरीरत्वेऽपि स्थावरा एव । इति वाचस्पतिमिश्रः ।
५. मनुष्यजातिरेकैव जातिनामोदयोद्भवा ।
वृत्तिभेदाद्धि तद्भेदाः चातुर्विध्यमिहाश्नुते ॥ जिनसेनकृत-आदिपुराणे ३२–४६
६. सांख्यकारिकागौडपादभाष्ये सांख्यतत्त्वकौमुद्यां च कारिका ५३ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४३
ताऽजिघ्रतामूकताकौण्यपङ्गुत्वक्लैव्योदावर्त्तमत्ततारूपैकादशेन्द्रियवधतुष्टिनवकविपर्ययसिद्ध्य-
ष्टकविपर्ययलक्षणसप्तदशबुद्धिवधभेदादष्टाविंशतिधा अशक्तिः । प्रकृत्युपादानकालभोगाख्या
अम्भःसलिलौघवृष्ट्यपरपर्यायाश्चतस्र आध्यात्मिकाः । शब्दादिविषयोपरतयश्चार्जनरक्ष-
णक्षयभोगहिंसादोषदर्शनहेतुजन्मानः पञ्चवाह्यास्तुष्टयः । ताश्च पारसुपारपारापारानुत्तमाम्भ-
उत्तमाम्भःशब्दव्यपदेश्याः । इति नवधा तुष्टिः । त्रयो दुःखविघाता इति मुख्यास्तिस्रः सिद्धयः
प्रमोदमुदितमोदमानाख्याः । तथाध्ययनं शब्द ऊहः सुहृत्प्राप्तिर्दानमिति दुःखविघातोपायतया
गौण्यः पञ्चतारसुतारतारताररम्यकसदाप्रमुदिताख्याः । इत्येवमष्टधा¹ सिद्धिः । धृतिश्रद्धासुखवि-
विदिषाविज्ञप्तिभेदात् पञ्चकर्मयोनयः । इत्यादीनां संवरप्रतिसंवरादीनां च तत्त्वकौमुदीगौडपाद-
भाष्यादिप्रसिद्धानां विरुद्धत्वमुद्भावनीयम् ॥ इति काव्यार्थः ॥१५॥

हैं—वाचस्पति मिश्र ) ; तथा ब्राह्मण आदिके भेदोंकी अपेक्षा न करके एक प्रकारका मनुष्य—यह चौदह प्रकारका
भौतिक सर्ग कहा जाता है । (भौतिक सर्ग ऊर्ध्व, अधः और मध्यलोकके भेदसे तीन प्रकारका है । आकाशसे
लेकर सत्यलोक पर्यंत ऊर्ध्वलोकमें सत्त्व, पशुसे लेकर स्थावर पर्यंत अधोलोकमें तम, और ब्रह्मसे लेकर वृक्ष
पर्यंत मध्यलोकमें रजकी बहुलता है । सात द्वीप और समुद्रोंका मध्य लोकमें अन्तर्भाव होता है) । ( ग )
ग्यारह प्रकारके इन्द्रियवध और सतरह प्रकारके बुद्धिवधको मिला कर २८ प्रकारकी अशक्ति होती है ।
बधिरता ( श्रोत्र ), कुंठता ( वचन ), अंधापन ( चक्षु ), जड़ता ( स्पर्श ), गंधका अभाव ( घ्राण ),
गूंगापन ( जिह्वा ), लूलापन ( हाथ ), लंगड़ापन ( पैर ), नपुंसकता ( लिंग ), गुदग्रह ( पायु ), तथा
उन्मत्तता ( मन ), यह ग्यारह इन्द्रियोंका वध है । नौ तुष्टि और आठ सिद्धिको उलटा करनेसे सतरह
प्रकारका बुद्धिवध होता है । प्रकृति ( अंभ ), उपादान ( सलिल ), काल ( ओघ ), भोग ( वृष्टि ) इन
चार आध्यात्मिक तुष्टि, और पाँच इन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्तिरूप उपार्जन, रक्षण, क्षय, भोग और हिंसासे
उत्पन्न होनेवाली पार, सुपार, पारापार, अनुत्तमांभ और उत्तमांभ नामक पांच बाह्य तुष्टियोंको मिला कर
नौ तुष्टि होती हैं । तीन प्रकारके दुःखोंके नाशसे उत्पन्न होनेवाली प्रमोद मुदितमोद और मान नामक तीन
मुख्य सिद्धि; अध्ययन, शब्द, तर्क, सच्चे मित्रोंकी प्राप्ति, और दानसे होनेवाली तार, सुतार, तारतार, रम्यक
और सदामुदित नामक पाँच गौण सिद्धियोंको मिला कर आठ सिद्धियां होती हैं । ( घ ) धृति, श्रद्धा, सुख,
वाद करनेकी इच्छा तथा ज्ञान ये पाँच कर्मयोनि हैं । इसी प्रकार संवर, प्रतिसंवर आदिकी विरुद्ध कल्पनायें
सांख्यतत्त्वकौमुदी, गौड़पादभाष्य आदि ग्रंथोंमें की गई हैं ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—सांख्य ( १ ) चित्शक्ति ( पुरुष अथवा चेतनशक्ति ) से पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता ।
अचेतन बुद्धिसे ही पदार्थ जाने जाते हैं । यह बुद्धि पुरुषका धर्म नहीं है, केवल प्रकृतिका विकार है । इस
अचेतन बुद्धिमें चित्शक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे चित्शक्ति अपने आपको बुद्धिसे अभिन्न समझती है, इसलिये
पुरुषमें 'मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' ऐसा ज्ञान होता है । चित्शक्तिके प्रतिबिम्ब पड़नेसे यह अचेतन बुद्धि
चेतनकी तरह प्रतिभासित होने लगती है । इस बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है ।
वास्तवमें बंध और मोक्ष प्रकृतिके ही होता है, पुरुष और प्रकृतिका अभेद होनेसे पुरुषके संसार और मोक्षका
सद्भाव माना जाता है । वास्तवमें पुरुष निष्क्रिय और निर्लेप है । जैन—( क ) चेतनशक्तिको ज्ञानसे शून्य
कहना परस्पर विरुद्ध है । यदि चेतनशक्ति स्व और परका ज्ञान करनेमें असमर्थ है, तो उसे चेतनशक्ति नहीं
कह सकते । तथा, अमूर्त चेतनशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता । क्योंकि मूर्त पदार्थका ही

१. सांख्यकारिकागौडपादभाष्ये सांख्यतत्त्वकौमुद्यां च कारिका ५३ ।
२. 'संचारप्रतिसंचारादीनाम्' इति पाठान्तरं ।

१४४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
इदानीं ये प्रमाणादेकान्तेनाभिन्नं प्रमाणफलमाहुः ये च बाह्यार्थप्रतिक्षेपेण ज्ञानाद्वैत-
मेवास्तीति ब्रुवते तन्मतस्य विचार्यमाणत्वे विशरारुतामाह—
न तुल्यकालः फलहेतुभावो हेतौ विलीने न फलस्य भावः ।
न संविदद्वैतपथेऽर्थसंविद् विलूनशीर्णं सुगतेन्द्रजालम् ॥ १६ ॥
बौद्धाः किल प्रमाणात् तत्फलमेकान्तेनाभिन्नं मन्यन्ते । तथा च तत्सिद्धान्तः—“उभयत्र
तदेव ज्ञानं प्रमाणफलमधिगमरूपत्वात् १ ।” “उभयत्रेति प्रत्यक्षेऽनुमाने च तदेव ज्ञानं प्रत्यक्षा-
नुमानलक्षणं फलं कार्यम् । कुतः । अधिगमरूपत्वादिति परिच्छेदरूपत्वात् । तथाहि । परि-
प्रतिबिंब पड़ता है । चेतनशक्तिको परिणमनशील और कर्ता माने बिना चेतनशक्तिका बुद्धिमें परिवर्तन होना
भी संभव नहीं है । पूर्व रूपके त्याग और उत्तर रूपके ग्रहण किये बिना पुरुष सुख-दुखका भोक्ता नहीं
कहला सकता । इस पूर्वाकारके त्याग और उत्तराकारके ग्रहण माननेसे पुरुषको निष्क्रिय नहीं कह सकते ।
तथा, यह पुरुष अनादिकालसे अविवेकके कारण प्रकृतिसे बंध रहा है । परन्तु प्रकृति अचेतन है, इसलिये
बंध पुरुषके ही मानना चाहिये । तथा, प्रकृतिका स्वभाव सदा प्रवृत्ति करना है, अतएव प्रकृति अपने स्वभाव-
से कभी निवृत्त नहीं हो सकती, इसलिये पुरुषको कभी मोक्ष नहीं हो सकता ! ( ख ) बुद्धिको जड़
मानना भी विरुद्ध है, क्योंकि बुद्धिको जड़ माननेसे उससे पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । जिस प्रकार
दर्पणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे अचेतन दर्पण चेतन नहीं हो सकता, उसी तरह अचेतन बुद्धि चेतन पुरुषके
प्रतिबिम्बसे चेतन नहीं कही जा सकती । अतएव धर्म आदि बुद्धिके आठ गुण मानना भी ठीक नहीं, क्योंकि
बुद्धि अचेतन है । इसी तरह अहंकारको भी आत्माका ही गुण मानना चाहिये, बुद्धिका नहीं ।
सांख्य ( २ ) ( क ) आकाश आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न होते हैं । ( ख ) ग्यारह इन्द्रियाँ
होती हैं । जैन ( क ) आकाश आदिकी पाँच तन्मात्राओंसे उत्पत्ति मानना अनुभवके विरुद्ध है । सत्कार्यवाद
( नित्यैकान्तवादके ) माननेवाले सांख्य लोग भी आकाशको नित्य मानते हैं, यह आश्चर्य है । आकाशको
सभी वादियोंने नित्य माना है । ( ख ) वाक्, पाणि आदिको अलग इन्द्रिय नहीं कह सकते । क्योंकि वाक्,
पाणि आदि कर्म-इन्द्रियोंसे होनेवाले कार्य शरीरके अन्य अवयवोंसे भी किये जा सकते हैं । अतएव वाक्
आदिको अलग इन्द्रिय मानना ठीक नहीं । यदि इन्हें इन्द्रिय माना जाय तो शरीरके अन्य अंगोपांगोंको भी
इन्द्रिय कहना चाहिये ।
अब, प्रमाणसे प्रमाणके फल ( प्रमितिको ) सर्वथा भिन्न माननेवाले, तथा बाह्य पदार्थोंका निषेध
करके ज्ञानाद्वैतको स्वीकार करनेवाले बौद्धोंका खंडन करते हैं—
श्लोकार्थ—हेतु और हेतुका फल साथ साथ नहीं रह सकते, और हेतुके नाश हो जानेपर फलकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि जगत्‌को विज्ञानरूप माना जाय तो पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव
बुद्धका इन्द्रजाल विशीर्ण हो जाता है ।
व्याख्यार्थ—( १ ) बौद्धपक्ष—प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों एकान्तरूपसे अभिन्न हैं । सिद्धान्त
भी है “जो ज्ञान प्रमिति और अनुमितिका कारण होता है वही ज्ञान दोनोंमें प्रमाण फलरूप है, क्योंकि
ज्ञान अधिगम रूप है ।१” “उभयत्र अर्थात् प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणमें प्रत्यक्षरूप और अनुमानरूप ज्ञान
ही फलरूप ( कार्यरूप ) है, क्योंकि वह अधिगम रूप—परिच्छेद रूप है । तथाहि—ज्ञप्ति रूप ही ज्ञान
उत्पन्न होता है । पदार्थोंको जाननेकी क्रियाके अतिरिक्त ज्ञानका कोई दूसरा फल नहीं हो सकता, क्योंकि
परिच्छेदका अधिकरण और परिच्छेदसे भिन्न ज्ञानके फलका अधिकरण भिन्न-भिन्न होते हैं । ( हानोपादानादि
१. दिङ्नागविरचितन्यायप्रवेशे पृ० ७ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४५
च्छेदरूपमेव ज्ञानमुत्पद्यते । न च परिच्छेदादृतेऽन्यद् ज्ञानफलम्, भिन्नाधिकरणत्वात्१ । इति
सर्वथा न प्रत्यक्षाक्षानुमानाभ्यां भिन्नं फलमस्तीति२ ॥"
एतच्च न समीचीनम् । यतो यद्यस्मादेकान्तेनाभिन्नं, तत्तेन सहैवोत्पद्यते । यथा घटेन
घटत्वम् । तैश्च प्रमाणफलयोः कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यते । प्रमाणं कारणं फलं कार्यमिति ।
स चैकान्ताभेदे न घटते । न हि युगपदुत्पद्यमानयोस्तयोः सव्येतरगोविषाणयोरिव कार्यकारण-
भावो युक्तः । नियतप्राक्कालभावित्वात् कारणस्य । नियतोत्तरकालभावित्वात् कार्यस्य । एतद्दे-
वाह न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । फलं कार्यं हेतुः कारणम् तयोर्भावः स्वरूपम्, कार्य-
कारणभावः । स तुल्यकालः समानकालो न युज्यत इत्यर्थः ॥
अथ क्षणान्तरितत्वात् तयोः क्रमभावित्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह । हेतौ विलीने न
फलस्य भाव इति । हेतौ कारणे प्रमाणलक्षणे विलीने क्षणिकत्वादुत्पत्त्यनन्तरमेव निरन्वयं
विनष्टे फलस्य प्रमाणकार्यस्य न भावः सत्ता, निर्मूलत्वात् । विद्यमाने हि फलहेतावस्येदं
फलमिति प्रतीयते नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । किञ्च, हेतुफलभावः सम्बन्धः स च द्विष्ठ एव
स्यात् । न चानयोः क्षणक्षयैकदीक्षितो भवान् सम्बन्धं क्षमते । ततः कथम् 'अयं हेतुरिदं
ज्ञानका फल—कार्य—नहीं है; क्योंकि ज्ञानफलका आश्रय ज्ञान होता है और हानोपादानका अधिकरण ज्ञानसे
भिन्न पुरुष होता है) । इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका फल प्रत्यक्ष और अनुमान रूप ज्ञानसे
सर्वथा भिन्न नहीं होता ।"
( १ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । क्योंकि जो जिससे एकान्तरूपसे अर्थात् सर्वथा अभिन्न होता है
वह उसीके साथ उत्पन्न होता है । जैसे, घटसे घटत्व सर्वथा अभिन्न होता है, इसलिये घटके साथ घटत्व,
उत्पत्ति होती है । तथा, बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्यकारण सम्बन्ध मानते हैं—प्रमाणको
कारण और प्रमाणके फलको उसका कार्य कहते हैं । यह कार्य-कारण भाव प्रमाण और उसके फलको सर्वथा
अभिन्न माननेमें नहीं बनता । जैसे एक साथ उत्पन्न होनेवाले गायके बांये और दाहिने सींगोंमें कार्य-कारण
सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक साथ उत्पन्न होनेवाले प्रमाण और फलमें कार्य-कारणभाव उचित
नहीं । क्योंकि कारण नियतरूपसे पहिले, और कार्य नियतरूपसे कारणके उत्तरकालमें होता है । कार्य-कारण-
भाव समान काल वाला नहीं होता । अतएव प्रमाण और प्रमाणका फल सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकते ।
शंका—प्रमाण और प्रमाणके फलमें क्षणमात्रका अन्तर पड़ता है, अतएव प्रमाण और प्रमाणका
फल क्रमसे होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि बौद्ध लोगोंके क्षणिकवादमें प्रत्येक वस्तु एक
क्षणके लिये ठहर कर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतएव प्रमाणके क्षणिक होनेके कारण प्रमाण ( कारण )
के उत्पन्न होते ही सर्वथा नष्ट हो जानेसे प्रमाणके फल ( कार्य ) की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कारण
रूप प्रमाणका सर्वथा (निरन्वय) विनाश हो जाता है । कार्यकी उत्पत्ति उसके कारणके रहने पर ही होती
है, अन्यथा नहीं । यदि कारणके विना कार्य उत्पन्न होने लगे, तो अतिप्रसंग हो जायेगा—बीजके विना वृक्षकी
उत्पत्ति माननी होगी । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रमाण
और उसके फलका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहता है । किन्तु क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले प्रमाण और प्रमाणके
फलमें कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव 'यह हेतु है, और यह उसका फल है' यह निश्चयात्मक ज्ञान
१. हरिभद्रसूरिकृता न्यायप्रवेशवृत्तिः पृ० ३६ ।
२. पार्श्वदेवकृतन्यायप्रवेशवृत्तिपञ्जिकायां—भिन्नमधिकरणमाश्रयो यस्य फलस्य तत्तथा''''अयम्अर्थः ।
ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं यद्युच्यते फलं हानोपानादिकं तदा तत्फलं प्रमातुरेव स्यान्न ज्ञानस्य । तथाहि ज्ञानेन प्रदर्शितेऽर्थे
हानादिकं तद्विषये पुरुषस्यैवोपजायते अतो हानादिकस्य भिन्नाश्रयत्वान्न फलत्वं मन्तव्यं ।
१९

१४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
फलम्' इति प्रतिनियता प्रतीतिः । एकस्य ग्रहणेऽप्यन्यस्याग्रहणे तदसम्भवात् ।
“द्विष्ठसंबन्धसंवित्तिर्नैकस्योपप्रवेदनात् ।
द्वयोः स्वरूपग्रहणे सति संबन्धवेदनम् ॥”१
इति वचनात् ॥
यद्यपि धर्मोत्तरेण “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”२ इति न्याय-
बिन्दुसूत्रं विवृण्वता भणितम्— “नीलनिर्भासं हि विज्ञानं, यतस्तस्माद् नीलस्य प्रतीतिरवसीयते ।
येभ्यो हि चक्षुरादिभ्यो ज्ञानमुत्पद्यते, न तद्वशात् तज्ज्ञानं नीलस्य संवेदनं शक्यतेऽवस्थापयितुं
नीलसदृशं त्वनुभूयमानं नीलस्य संवेदनमवस्थाप्यते । न चात्र जन्यजनकभावनिबन्धनः
साध्यसाधनभावः । येनैकस्मिन् वस्तुनि विरोधः स्यात् । अपि तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापक-
भावेन तत एकस्य वस्तुनः किञ्चिद्रूपं प्रमाणं किञ्चित् प्रमाणफलं न विरुध्यते । व्यवस्थापनहेतु-
र्हिं सारूप्यं तस्य ज्ञानस्य व्यवस्थाप्यं च नीलसंवेदनरूपम्”३ इत्यादि ॥
नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों क्षणिक होनेसे एक साथ नहीं रहते । इसलिये
प्रमाणके फल, और फलके होनेसे प्रमाणका ज्ञान नहीं हो सकता । कहा भी है—
“दो वस्तुओंमें रहनेवाले सम्बन्धका ज्ञान दोनों वस्तुओंके ज्ञान होने पर ही हो सकता है । यदि दोनों
वस्तुओंमेंसे एक वस्तु रहे, तो उस सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता ।”
बौद्ध— “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”—अर्थके साथ होनेवाली समानरूपताके
कारण अर्थनिर्णयकी सिद्धि हो जानेसे अर्थके साथ होनेवाली समानरूपता प्रमाण है—इस न्यायबिन्दुके
सूत्रका विवरण करनेवाले धर्मोत्तरने कहा है— “जिस कारण विज्ञानमें नील ( नील वर्ण पदार्थ ) का
प्रतिभास होता है, उस कारण नीलकी प्रतीति होती है । जिन चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती
है, उन इन्द्रियोंके अधीन होनेसे इन्द्रियजन्य वह ज्ञान 'नील पदार्थका यह ज्ञान है' इस प्रकार संवेदन नहीं
कर सकता, किन्तु अनुभूयमान नील ( पदार्थके ) सदृश ज्ञान ( नीलाकार ज्ञान ) नील पदार्थका ज्ञान है,
ऐसा संवेदन किया जाता है । यहाँ प्रमाण और प्रमाणके फलमें जन्य-जनकभाव ( कार्य-कारणभाव ) जिसका
कारण है ऐसा साध्य-साधनभाव नहीं है, जिससे एक वस्तुमें विरोध उत्पन्न हो; किन्तु यहाँ व्यवस्थाप्य-
व्यवस्थापक ( निश्चय-निश्चायक ) रूपसे साध्य-साधनभाव है । इसलिये एक वस्तुका किंचित् प्रमाणरूप होनेमें
और किंचित् प्रमाणफलरूप होनेमें विरोध नहीं आता । सारूप्य उस ज्ञान ( नील पदार्थका ज्ञान ) का निश्चय
करनेमें हेतु है और नील पदार्थका ज्ञान व्यवस्थाप्य ( निश्चेय ) ।” स्पष्टार्थ—बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमिति-
को अभिन्न मानते हैं । उनके मतमें जिस ज्ञानसे ( प्रत्यक्ष, अनुमान ) पदार्थ जाने जाते हैं, वही ज्ञान प्रमाण
और प्रमिति दोनों रूप होता है । बौद्ध लोगोंने पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेवाले संशय और विपर्यय रहित प्रापक
ज्ञानको प्रमाण माना है । जिस प्रापण शक्तिसे ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होनेपर भी प्रापक होता है, वही प्रमाणका
फल है । अतएव जिस ज्ञानसे अर्थकी प्रतीति होती है, उसी ज्ञानसे अर्थका दर्शन होता है, इसलिये ज्ञान
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप है ( तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ) । शंका—यदि
ज्ञान प्रमिति रूप होनेसे प्रमाणका फल है, तो प्रमाण किसे कहते हैं ? उत्तर—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है,
और पदार्थोंके आकार रूप होकर पदार्थोंको जानता है, इसलिये ज्ञान प्रमाण है। हमारे ( बौद्ध ) मतके अनुसार
ज्ञान इन्द्रिय आदिकी सहायतासे पदार्थोंको नहीं जानता । किन्तु नील घटको जानते समय नील घटसे उत्पन्न
१. कारिकेयं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके, पृ० ४२१ उद्धृता ।
२. न्यायबिन्दौ १-१९, २० ।
३. न्यायबिन्दौ १-२० स्वोपज्ञटीकायां ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४७
तदप्यसारम् । एकस्य निरंशस्य ज्ञानक्षणस्य व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकत्वलक्षणस्वभाव-
द्वयायोगात्, व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावस्यापि च संबन्धत्वेन द्विष्ठत्वादेकस्मिन्नसंभवात् ।
किञ्च, अर्थसारूप्यमर्थाकारता । तच्च निश्चयरूपम्, अनिश्चयरूपं वा ? निश्चयरूपं चेत्, तदेव
व्यवस्थापकमस्तु, किमुभयकल्पनया ? अनिश्चितं चेत्, स्वयमव्यवस्थितं कथं नीलादिसंवेदन-
व्यवस्थापने समर्थम् ? अपि च केयमर्थाकारता ? किमर्थग्रहणपरिणामः ? अहोस्विदर्था-
कारधारित्वम् ? नाद्यः, सिद्धसाधनात् । द्वितीयस्तु ज्ञानस्य प्रमेयाकारानुकरणाज्जडत्वापत्त्या-
दिदोषाग्रातः । तन्न प्रमाणादेकान्तेन फलस्याभेदः साधीयान् । सर्वथातादात्म्ये हि प्रमाणफल-
योर्न व्यवस्था, तद्भावविरोधात् । न हि सारूप्यमस्य प्रमाणमधिगतिः फलमिति सर्वथा-
तादात्म्ये सिद्ध्यति, अतिप्रसङ्गात् ॥
ननु प्रमाणस्यासारूप्यव्यावृत्तिः सारूप्यम्, अनधिगतिव्यावृत्तिरधिगतिरिति व्यावृत्ति-
ज्ञान नील घटके आकार रूप होता है। नील घटके सदृश आकारको धारण करना ही ज्ञानका प्रामाण्य है
( अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं ) । शंका—यदि ज्ञान सादृश्य ( नील सादृश्य ) से अभिन्न है, तो उसी ज्ञानको
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप कहना चाहिये । एक ही वस्तुमें साध्य और साधन दोनों नहीं रह सकते ।
अतएव ज्ञान ( प्रमाण ) पदार्थोंके सदृश नहीं हो सकता । उत्तर—सारूप्य ( सदृश आकार ) से ही
पदार्थोंकी प्रतीति होती है । क्योंकि पदार्थोंको जाननेवाला प्रत्यक्ष ज्ञान नील घटके आकारका हो कर ही नील
घटका ज्ञान करता है । चक्षु आदिकी सहायतासे नील घटका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव हम ( बौद्ध ) लोग
प्रमाण और प्रमितिमें कार्य-कारण सम्बन्ध न स्वीकार करके व्यवस्थाप्य और व्यवस्थापक सम्बन्ध मानते हैं ।
सारूप्य व्यवस्थापक है, और नील ज्ञान व्यवस्थाप्य है । अतएव प्रमाण और प्रमितिको अभिन्न माननेसे कोई
विरोध नहीं आता ।
जैन—धर्मोत्तरका यह कथन ठीक नहीं । क्योंकि निरंश ज्ञान-क्षण ( बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
क्षणिक है, इसलिये वे लोग घटको घट न कहकर घट-क्षण कहते हैं । इसी प्रकार यहाँ भी ज्ञान-क्षणसे
क्षणिक ज्ञान समझना चाहिये ) में व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूप दो स्वभाव नहीं बन सकते, और
व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भावका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहनेवाला होनेसे एक निरंश ज्ञान-क्षणमें नहीं रह
सकता । तथा, ज्ञानका जो अर्थके साथ सारूप्य है वह ज्ञानकी अर्थाकारता है । यह ज्ञानका अर्थसारूप्य
निश्चयरूप है, या अनिश्चयरूप ? यदि यह अर्थसारूप्य निश्चयरूप है, तो इस अर्थसारूप्यको ही व्यवस्थापक
( निश्चयात्मक ) मानना चाहिये, उसे व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूपसे अलग-अलग माननेकी आवश्यकता
नहीं । यदि ज्ञानका वह अर्थसारूप्य अनिश्चित है, तो स्वयं अनिश्चित अर्थसारूप्यसे नील आदि पदार्थका
ज्ञान निश्चित नहीं हो सकता । तथा, ज्ञानकी अर्थाकारतासे आपका क्या अभिप्राय है ? आप लोग ज्ञेय
पदार्थको जाननेवाले ज्ञानके परिणामको अर्थाकारता कहते हैं, अथवा ज्ञानके अर्थके आकाररूप होनेको अर्था-
कारता कहते हैं ? प्रथम पक्ष माननेमें सिद्धसाधन है, क्योंकि हम भी ज्ञानका स्वभाव पदार्थोंको जानना
मानते हैं । यदि आप लोग ज्ञानके पदार्थोंके आकार रूप होनेको अर्थाकारता कहते हैं, तो ज्ञानको जड़
प्रमेयके आकार माननेमें ज्ञानको भी जड़ मानना पड़ेगा । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलको एकान्त
अभिन्न नहीं मान सकते । क्योंकि प्रमाण और प्रमाणके फलका सर्वथा तादात्म्य सम्बन्ध माननेसे प्रमाण और
प्रमाणके फलकी व्यवस्था नहीं बनती; क्योंकि एक निरंश ज्ञान-क्षणमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भाव होनेमें
विरोध आता है। प्रमाण और प्रमाणके फलमें सर्वथा तादात्म्य मानने पर ‘ज्ञानका अर्थके साथ
होनेवाला सारूप्य प्रमाण है और अर्थ ज्ञानका फल है’—यह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि इससे अतिप्रसंग उप-
स्थित हो जायेगा ।
शंका—सारूप्यके असारूप्यव्यावृत्ति रूप और अधिगतिके अनधिगतिव्यावृत्तिरूप होनेसे व्यावृत्तियोंमें

१४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
भेदादेकस्यापि प्रमाणफलव्यवस्थेति चेत्, नैवम् । स्वभावभेदमन्तरेणान्यव्यावृत्तिभेदस्यानु-
पपत्तेः । कथं च प्रमाणस्य फलस्य चाप्रमाणाफलव्यावृत्त्या प्रमाणफलव्यवस्थावत् प्रमाणान्तर-
फलान्तरव्यावृत्त्याप्यप्रमाणत्वस्याफलत्वस्य च व्यवस्था न स्यात् ? विजातीयादिव सजातीया-
दपि व्यावृत्तत्वाद् वस्तुनः । तस्मात् प्रमाणात् फलं कथञ्चिद्भिन्नमेवैष्टव्यं । साध्यसाधनभावेन
प्रतीयमानत्वात् । ये हि साध्यसाधनभावेन प्रतीयते ते परस्परं भिद्यते यथा कुठारच्छिदि-
क्रिये इति ॥
एवं यौगाभिप्रेतः प्रमाणात् फलस्यैकान्तभेदोऽपि निराकर्त्तव्यः तस्यैकप्रमातृत्तादात्म्येन
प्रमाणात् कथञ्चिदभेदव्यवस्थितेः प्रमाणतया परिणतस्यैवात्मनः फलतया परिणतिप्रतीतेः यः
प्रमिमीते स एवोपादत्ते परित्यजति उपेक्षते चेति सर्वव्यवहारिभिरस्खलितमनुभवात् । इतरथा
स्वपरयोः प्रमाणफलव्यवस्थाविप्लवः प्रसज्यत इत्यलम् ॥
अथवा पूर्वार्द्धमिदमन्यथा व्याख्येयं । सौगताः किलेत्थं प्रमाणयन्ति । सर्वं सत् क्षणि-
कम् । यतः सर्वं तावद् घटादिकं वस्तु मुद्गरादिसंनिधौ नाशं गच्छद् दृश्यते । तत्र येन स्व-
रूपेणान्यावस्थायां घटादिकं विनश्यति तच्चैत्तत्स्वरूपमुत्पन्नमात्रस्य विद्यते तदानीमुत्पादानन्तर-
मेव तेन विनष्टव्यम् , इति व्यक्तमस्य क्षणिकत्वम् ॥
भेद होनेके कारण, प्रमाणके एक रूप होनेपर भी उसके प्रमाणरूप होनेका और फलरूप होनेका निश्चय होता
हैँ। समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्वभावोंके अभावमें व्यावृत्तियोंमें भेदका होना नहीं
बनता । तथा, जिस प्रकार अप्रमाणकी व्यावृत्तिसे प्रमाणकी प्रमाणरूपताका और अफलकी व्यावृत्तिसे फलकी
फलरूपताका निश्चय होता है, वैसे ही प्रमाणान्तरकी व्यावृत्तिसे प्रमाणके अप्रमाणत्वका और फलान्तरकी
व्यावृत्तिसे फलके अफलत्वका निश्चय मानना चाहिये। क्योंकि जैसे आप लोग विजातीय वस्तुसे व्यावृत्ति
मानते हैं, वैसे ही सजातीय वस्तुसे भी व्यावृत्ति माननी चाहिये। अतएव प्रमाण और उसका फल कथंचित्
भिन्न हैं, क्योंकि दोनों साध्य-साधन भावरूपसे प्रतीयमान होते हैं। जो साध्य-साधन भावसे प्रतीयमान होते
हैं, वे परस्पर भिन्न होते हैं, जैसे कुठार और छेदनक्रिया।
इससे प्रमाण और प्रमाणके फलका एकान्त भेद माननेवाले यौगोंका भी निराकरण हो जाता हैं। क्योंकि
जो आत्मा ज्ञेय पदार्थको यथार्थरूपसे जानती है वही आत्मा उस पदार्थको ग्रहण करती है, उसका त्याग
करती है और उसकी उपेक्षा करती है यह सबको दृढ़ अनुभव होता है। इससे प्रमाणरूपसे परिणत हुई
आत्माकी ही फलरूपसे जो परिणति होती है, उसका निर्णायक ज्ञान होनेके कारण, इस प्रमाणफलका एक
प्रमाताके साथ तादात्म्य होनेसे, प्रमाण द्वारा उसके कथंचित् अभेदकी सिद्धि होती है। यदि प्रमाण और
उसके फलमें कथंचित् अभेद न माना जाये—दोनोंमें सर्वथा अभेद माना जाये—तो अपना प्रमाण और अपना
फल, तथा दूसरेका प्रमाण और दूसरेका फल—इस व्यवस्थाके नाशका ही प्रसंग उपस्थित हो जाता है। (विज्ञा-
नाद्वैतमें स्व और पर दोनों विज्ञानरूप माने गये हैं, अतएव दोनोंमें भेदका अभाव होनेसे स्वप्रमाण और
स्वफल, तथा परप्रमाण और परफलकी व्यवस्थाका अभाव हो जाता है) ।
(२) पूर्वपक्ष—'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं' (सर्वं सत् क्षणिकं) । क्योंकि सभी घट आदि
पदार्थ मुद्गर आदिका संयोग होने पर नष्ट होते हुए देखे जाते हैं। घट आदि पदार्थ अन्त्य अवस्थामें जिस
स्वरूपसे विनाशको प्राप्त होते हैं, वही स्वरूप उत्पन्नमात्र पदार्थोंका होता है। अतएव उत्पत्तिके बाद ही
घट आदि पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं। स्पष्टार्थ—बौद्धोंके अनुसार, प्रत्येक
पदार्थ क्षणिक है, क्योंकि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव है। यदि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव न हो, तो
पदार्थ दूसरी वस्तुके संयोगसे भी नष्ट नहीं हो सकते। पदार्थोंका यह क्षणिक स्वभाव पदार्थोंकी आरम्भ
और अन्त दोनों अवस्थाओंमें समान है। यदि पदार्थोंको उत्पन्न होनेके बाद नाशमान न माना जाय, तो