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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

About this granth

The Siddhantaleshasangraha (सिद्धान्तलेशसंग्रह) is a work on Advaita Vedanta by the sixteenth-century polymath Appayya Dikshita. After Shankara, Advaita teachers differed on many questions: where ignorance resides and what it veils, the nature of the individual soul and of God, whether souls are one or many, and how knowledge of Brahman arises. Appayya gathers these views concisely without taking sides, and the work remains a key guide to the schools of post-Shankara Vedanta.

It has four chapters following the order of the four books of the Brahma Sutras. This edition gives the text with a Hindi translation and notes by Vedantacharya Pandit Mulshankar Vyas, edited by Pandit Chandiprasad Shukla Shastri, principal of the J. G. Goenka Sanskrit College, and Pandit Shrikrishna Pant Shastri, head of the Achyut Granthamala.

It is the sixth volume of section B of the Achyut Granthamala, first published at Kashi by Gaurishankar Goenka in Samvat 1993 (1936) and printed by N. R. Soman at the Lakshminarayan Press, Benares. It runs to 590 pages.

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२१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


अन्ये त्वविद्यावृत्त्यैव सौषुप्तस्मृतिक्लृप्तया ।
अहङ्कारादिभानेन संस्कारं सम्प्रचक्षते ॥ १०४ ॥

कोई लोग कहते हैं कि सुषुप्तिकालीन अविद्याकी स्मृतिमें क्लृप्त अविद्या-वृत्तिसे ही अहंकार आदिका भान होनेसे उसीसे अहमर्थके संस्कारका आधान होता है ॥ १०४ ॥

अन्ये तु सुषुप्तावप्यविद्याद्यनुसन्धानसिद्धये कल्पितामविद्यावृत्तिमह-माकारामङ्गीकृत्याऽहमर्थे संस्कारमुपपादयन्ति ।
न चाऽस्मिन् पक्षे 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' इति अन्य-ज्ञानधाराकालीनाहमर्थानुसन्धानानुपपत्तिः । अवच्छेदकभेदेन सुखदुःख-


❄ कुछ लोग—उठनेके बाद अविद्या आदिके स्मरणकी उपपत्तिकाके लिए सुषुप्ति अवस्थामें अहमाकार अविद्याकी वृत्तिको मान कर—अहमर्थमें संस्कारका उपपादन करते हैं। इसपर शङ्का होती है कि इस पक्षमें 'एतावन्तं कालम्' 'इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार अन्य वस्तुके ज्ञानकी धाराके कालके अहमर्थका अनुसन्धान ( स्मरण ) नहीं होगा ? क्योंकि एक


ज्ञात होता है कि ज्ञान, इच्छा आदिका अवभासक नित्य चैतन्य ही है, इसलिए उसकी सूक्ष्मावस्था न होनेके कारण उन ज्ञान आदिमें संस्कारोंका आधान नहीं हो सकेगा। यदि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानादिको स्व-स्वावच्छिन्न साक्षिचैतन्यभास्य मानकर इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान माना जाय, तो 'ज्ञातताशब्दसे कहा जानेवाला घटादिगोचर वृत्तिप्रतिबिम्बित ज्ञान घटाकार वृत्तिसे अयुक्त विषयाधिष्ठानरूप ब्रह्मचैतन्यसे भास्य है' इस कथनसे विरोध होगा और ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न साक्षीसे भास्य हैं, इस द्वितीय पक्षके साथ भी विरोध होगा, अतः इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान कैसे होगा ? इसपर 'तयोरपि' इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। सारांश यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अवभासक है, इस मतमें वह ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अपरोक्षज्ञानरूप ही माना जाता है, क्योंकि 'यह घट ज्ञात है' इस प्रकार ज्ञातताका अपरोक्ष अवभास होता है। तथा अनवच्छिन्न शुद्ध चैतन्यको भी ज्ञान आदिका अपरोक्ष अवभासरूप मानना चाहिए, क्योंकि उन वृत्तियोंका भी अपरोक्ष भान होता है। इस परिस्थितिमें उक्त दो प्रकारके चैतन्यका स्वविषय ज्ञान, इच्छा आदिके साथ सम्बन्ध अवश्य होगा, क्योंकि जो अपरोक्ष ज्ञान होता है, वह अपने तादात्म्यापन्न विषयोंका अनुभवरूप है, ऐसा नियम है। इसलिए अपने विषयभूत ज्ञान, इच्छा आदिके विनाश समयमें ज्ञानादिसे विशिष्ट उक्त द्विविध चैतन्य भी अवश्य विनष्ट होगा, अतः चैतन्यविनाशरूप संस्कार-का आधान, इन पक्षोंमें भी उपपन्न हो सकता है।
* इस मत में पूर्वमतसे विशेष यह है कि यदि 'स्वाकारवृत्तिसे ही संस्कारोंका आधान

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अहंकार आदिके अनुसंधानका विचार] भाषानुवादसहित २११


यौगपद्यवद् वृत्तिद्वययौगपद्यस्याप्यविरोधिनाऽन्यज्ञानधाराकालेऽपि अहमाकाराविद्यावृत्तिसन्तानसम्भवादिति ।

उपास्तित्वन्मनोवृत्तिरियं न ज्ञानमिष्यते ।
प्रत्यभिज्ञा स्मृतिज्ञानं तत्तांश इति चापरे ॥ १०५ ॥

यह अहमाकारवृत्ति मनोवृत्ति है और वह उपासनाके समान ज्ञान नहीं है, प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांशमें ही स्मृतिज्ञान है, अहंशमें नहीं, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०५ ॥


कालमें दो वृत्तियाँ नहीं हो सकतीं, नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदक † सिर, पैर आदि देशके भेदसे जैसे सुख और दुःख दोनों एक ही समयमें माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें दो वृत्तियोंका स्वीकार करनेमें किसी प्रकारके विरोधके न होनेसे ज्ञानान्तरकी धाराके समयमें भी अहमाकार अविद्याकी वृत्तिका प्रवाह हो ‡ सकता है ।


होता है' यह नियम माना जाय, तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि अविद्यावृत्तियोंसे, जो कि अहङ्कार और तद्धर्मोंको विषय करती हैं, अहङ्कार आदिमें संस्कारोंक आधान होगा । अविद्यावृत्ति अनुभवके योग्य नहीं है, अतः ज्ञान या संस्कारके लिए अन्य वृत्ति माननी नहीं पड़ेगी, इसलिए पूर्वोक्त अनवस्था भी नहीं होगी । सुषुप्तिमें अज्ञान आदिका अनुभव होनेसे अविद्यावृत्ति माननी भी पड़ती है, अतः यह कल्पना नवीन भी नहीं होगी । अहङ्काराकार अविद्यावृत्तिके स्वीकार करनेसे अहङ्कार आदि केवल साक्षीसे वेद्य हैं, इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा ? नहीं, क्योंकि केवल साक्षीवेद्यत्वका अर्थ है—ज्ञानात्मकवृत्तिसे अनुपहित साक्षीसे वेद्य, फलतः ज्ञानकारणसे जन्य न होनेके कारण अविद्यावृत्तिको ज्ञानरूप नहीं मानते हैं ।

† अवच्छेदकशब्दका प्रकृतमें अर्थ है—सप्तमीविभक्तिसे निर्दिश्य विलक्षण विशेषण । प्रकृतमें 'शिरसि मे वेदना' 'पादे मे सुखम्' (माथेमें मुझे दर्द है, और पैरमें सुख है) । इसमें 'शिरसि' और 'पादे' इस सप्तमी विभक्तिसे विलक्षण अवच्छेदक—विशेषण—कहा जाता है, अतः इन अवच्छेदकोंके भेदसे जैसे एक कालमें सुख और दुःख दोनों माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें अर्थात् अन्य ज्ञानधाराकालमें अन्य वस्तुविषयक अन्तःकरणकी वृत्ति और अहमाकार अविद्याकी वृत्ति प्रमातामें अवच्छेदकभेदसे मानेंगे । इसमें कोई विरोध नहीं है, यह तात्पर्य है ।

‡ अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंका जो प्रवाह है, वही धारा है, इसलिए तत्कालीन अविद्यावृत्ति भी सन्ततिरूप ही होगी, इस सम्भावनामात्रसे मूलमें 'अविद्यावृत्तिसन्तान' कहा गया है, यह भाव है ।

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२१२ सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ प्रथम परिच्छेद

अपरे तु—अहमाकारा वृत्तिरन्तःकरणवृत्तिरेव । किन्तु उपासनादिवृत्तिवन्न ज्ञानम्, क्लृप्ततत्करणाजन्यत्वात् । नहि तत्र चक्षुरादिप्रत्यक्षलक्षणं सम्भवति, न वा लिङ्गादिकम् । लिङ्गादिप्रतिसन्धानशून्यस्याऽप्यहङ्कारानुसन्धानदर्शनात् । नाऽपि मनः करणम्, तस्योपादानभूतस्य क्वचिदपि करणत्वाक्लृप्तेः । तर्हि अहमर्थप्रत्यभिज्ञाऽपि ज्ञानं न स्यादिति चेत्, न; तस्या अहमंशे ज्ञानत्वाभावेऽपि तत्तांशे स्मृतिकरणत्वेन क्लृप्तसंस्कार-


कुछ* लोग कहते हैं कि अहमाकार वृत्ति अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, [ अविद्याकी वृत्ति नहीं है ] किन्तु अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति उपासना आदि वृत्तियोंके समान ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि क्लृप्त जो ज्ञानके चक्षुरादि करण हैं, उनसे ( वह वृत्ति ) जन्य नहीं है । क्योंकि न तो उस वृत्तिमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं और न हेतु आदि अनुमानादि प्रमाण हैं । तथा लिङ्गादि-ज्ञानके विरहकालमें भी अहमर्थका अनुसंधान होता है, इससे भी लिंगादि अन्तःकरणवृत्तिके कारण नहीं हैं। और मन भी ज्ञानका करण नहीं है, क्योंकि उसके उपादान होनेके कारण † किसी भी वृत्तिज्ञानका वह करण नहीं हो सकता है । इस परिस्थितिमें शङ्का होती है कि अन्तःकरणसे होनेवाली अहमर्थकी प्रत्यभिज्ञा भी ज्ञानात्मक नहीं होगी ? नहीं, यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञाके 'अहम्' अंशमें ज्ञानत्व न होनेपर भी तत्ता अंशमें ज्ञानत्व है, कारण कि स्मृतिके कारणरूपसे


* इन लोगोंका कहना है कि जब अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही अहमर्थमें संस्कारोंका आधान हो सकता है, तो अविद्याकी वृत्ति क्यों मानना ? यदि शङ्का हो कि सुख और दुःख तो एक कालमें हो सकते हैं, परन्तु एक कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते हैं, अतः अहमर्थगोचर अन्तःकरणवृत्ति अन्य ज्ञानकी धारा कालमें कैसे होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अन्तःकरणकी अहमाकारवृत्ति संस्कारार्थ है, वह ज्ञानरूप नहीं है, अतः दोष नहीं है ।

† जो जिस कार्यका उपादान होता है, वह उस कार्यका करण नहीं होता, क्योंकि करण वही होता है, जो व्यापारवान् होकर असाधारण कारण हो । घटकी उपादान कारण मृत्तिकामें घटकरणत्वका व्यवहार नहीं होता है, अतः अन्तःकरणवृत्तिके प्रति अन्तःकरण, जो उस वृत्तिका उपादान है, करण नहीं होगा, इस अभिमानसे मूलमें 'तस्योपादानभूतस्य' इत्यादिसे मनमें करणत्वका निरास करते हैं, यह भाव है ।

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अहंकार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २१३

जन्यतया ज्ञानत्वात्। अंशभेदेन ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्ववत् प्रमात्वा-
प्रमात्ववच्च ज्ञानत्वाज्ञानत्वयोरपि अविरोधादित्याहुः।

इतरे ज्ञानमेवेयं मनसोऽपीन्द्रियत्वतः।
वाह्यार्थेष्वेव वृत्तीनामावृत्याभिभवः फलम् ॥ १०६ ॥

मन भी इन्द्रिय है, अतः अहमर्थाकार मनकी वृत्ति ज्ञान ही है। और आवरणका विनाश करना वृत्तियोंका फल बाह्य अर्थोंमें ही है ॥ १०६ ॥

इतरे तु—अहमाकाराऽपि वृत्तिर्ज्ञानमेव, ‘मामहं जानामि’ इत्यनुभवात्। न च करणासम्भवः, अनुभवानुसारेण मनस एवाऽन्तरिन्द्रियस्य करणत्वस्यापि कल्पनादित्याहुः ॥१०७॥

निश्चित संस्कारसे वह जन्य है। अंशके भेदसे † ज्ञानमें जैसे परोक्षत्व और अपरोक्षत्व माना है, और अंशके भेदसे प्रमात्व और अप्रमात्व माना जाता है, वैसे ही अंशके भेदसे ज्ञानत्व और अज्ञानत्वके एकत्र अवस्थानमें भी कोई विरोध नहीं है।

कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति ज्ञान ही है। कारण कि 'मामहम्०' (मैं अपनेको जानता हूँ) ऐसा अहमर्थाकार वृत्तिमें साक्षात् ज्ञानत्वका अनुभव होता है। परन्तु मनके करणत्वका तो निरास है? नहीं, क्योंकि अनुभवके अनुसार मनमें, जो कि अन्दरकी इन्द्रिय है, ज्ञान-करणत्वकी भी कल्पना की जा सकती है * ॥ १७ ॥


† जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि अनुमितिमें पर्वत अंशमें अपरोक्षत्व है और वह्नि अंशमें परोक्षत्व है, तथा 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशमें प्रामाण्य है और रजत अंशमें अप्रामाण्य है, वैसे ही 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया है, वही मैं इस समयमें उसका स्मरण करता हूँ' इस प्रत्यभिज्ञामें अहमंशमें ज्ञानत्वाभाव और तत्तांशमें ज्ञानत्वका स्वीकार किया जाता है, क्योंकि अनुभव ऐसा ही होता है। प्रत्यभिज्ञा—संस्कार और इन्द्रिय दोनोंसे होनेवाला ज्ञान, यह भाव है।

* इस मतानुयायियोंका कहना है कि पूर्वकी टिप्पणीमें जिस प्रत्यभिज्ञाका उल्लेख किया है, उसको अहमर्थमें भी ज्ञान ही मानना चाहिए। अन्यथा सूत्र और भाष्यमें अन्तःकरणोपहित चैतन्यात्मक अहमर्थ जीवकी प्रत्यभिज्ञाके बलसे जो स्थायिताका साधन किया गया है, वह विरुद्ध होगा। इस अर्थमें प्रमाणभूत ब्रह्मसूत्र भी है—'अनुस्मृतेश्च' [अ० २ पा० २ सू० २५] अनुस्मृति—प्रत्यभिज्ञा। इसी प्रकार इस सूत्रके भाष्यमें कहा है—'य एवाऽहं पूर्वेद्युरद्राक्षम्, स एवाऽद्यमद्य स्मरामि' (जिस मैंने प्रथम दिन देखा था, वही

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२१४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

एवं सति बाह्यविषयापरोक्षवृत्तीनामेवावरणाभिभावकत्वनियमः पर्यवसन्नः ।

शुक्त्यादौ नन्विदंवृत्त्याऽऽवरणाभिभवो नहि ।
रूप्याध्यासाद्यसंसिद्धेरत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १०७ ॥

परन्तु बाह्यवृत्तियोंका भी आवरणका अभिभव फल नहीं हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतादि स्थलमें इदमाकार बाह्यवृत्तिसे अज्ञानका अभिभव नहीं देखा जाता है, यदि उक्त स्थलमें आवरणाभिभव फलको हठात् मानोगे, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास ही सिद्ध नहीं होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०७ ॥

ननु नाऽयमपि नियमः, शुक्तिरजतस्थले इदमाकारवृत्तेरज्ञानानभिभावकत्वात् । अन्यथोपादानाभावेन रजतोत्पत्त्ययोगादिति चेत् ,


इस अवस्थामें अर्थात् अहमाकार अपरोक्ष वृत्तिके स्वीकार करनेपर यही नियम प्राप्त होता है कि बाह्यके घट आदि विषयाकारोंमें परिणत वृत्तियां ही आवरणकी अभिभावक हैं—विनाशक हैं ।

परन्तु यह भी नियम नहीं हो सकता है—बाह्यविषयगोचर अपरोक्ष-वृत्ति अज्ञानकी विनाशक है, क्योंकि शुक्तिरजतभ्रमस्थलमें इदमाकार (बाह्यगोचर) अपरोक्षवृत्तिके होनेपर भी वहां अज्ञानका विनाश नहीं होता


मैं आज स्मरण करता हूँ) इसलिए प्रत्यभिज्ञाके अहमर्थमें ज्ञातत्वाभावका कथन अयुक्त ही है। 'मैं अपने को जानता हूँ' इसमें अहमर्थ वृत्तिमें अतिस्फुट ज्ञातत्वका अनुभव होता है। 'बुद्धेः करणत्वाभ्युपगमात्' (अन्तःकरण करण माना जाता है) इस (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ४० के) भाष्यके अनुसार मनको करण माननेमें कोई हानि भी नहीं है। इसीसे भाष्यकारने मनमें प्राणपादमें इन्द्रियत्वका साधन भी किया है। इस मतमें 'अज्ञान आदि केवल साक्षीसे भास्य हैं, यह सिद्धान्त भी अहमर्थव्यतिरिक्त अज्ञान, सुख आदि विषयक है। यदि मन इन्द्रिय माना जाय, तो रूपके प्रत्यक्षमें जैसे चक्षु प्रमाण है, वैसे अहमर्थमें यह भी प्रमाण हो जायगा, और वह हो नहीं सकता, क्योंकि अज्ञातज्ञापकत्वरूप (अज्ञात वस्तुका ज्ञापन) प्रमाणका लक्षण मनमें नहीं घटता है, कारण कि अहमर्थके अनावृत साक्षीरूप चैतन्यमें अध्यस्त होनेके कारण अहमर्थ अज्ञात नहीं है? यह शङ्का नहीं हो सकती है, क्योंकि अबाधितानुभवत्व या तद्वति तत्प्रकारकज्ञानत्व ही प्रमात्व है, इस मतके अनुरोधसे मनको अहमाकार ज्ञानके प्रति करण माननेमें विरोध नहीं है, अतः अहमाकार ज्ञानको प्रमा और उसके करण मनको प्रमाण माननेमें हानि नहीं है।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २१५


इदमाकारवृत्त्येदमंशे मोहक्षितावपि ।
शुक्त्याद्यंशेऽक्षितत्वेन. रजताद्युद्भवस्ततः ॥ १०८ ॥
अत एव स्फुरन् भ्रान्तावाधार इदमंशकः ।
शुक्तवाद्यंशस्त्वधिष्ठानं सकार्यज्ञानगोचरः ॥ १०९ ॥

इदमाकार वृत्तिसे इदमंशमें आवरणका नाश होनेपर भी शुक्ति आदि अंशमें आवरणका विनाश न होनेसे उस अज्ञानसे रजतका उद्भव होता है । इसीसे भ्रान्तिमें स्फुरनेवाला इदमंश आधार है और रजतादिविक्षेपके साथ अज्ञानका विषय शुक्ति आदि अंश अधिष्ठान है ॥ १०८ ॥ १०९ ॥

अत्राहुः--इदमाकारवृत्त्या इदमंशाज्ञाननिवृत्तावपि शुक्तित्वादिविशेषां-
शाज्ञानानिवृत्तेः तदेव रजतोपादानम्, शुक्तित्वाद्यज्ञाने रजताध्यासस्य
तद्भाने तदभावस्याऽनुभूयमानत्वात् । अध्यासभाष्यटीकाविवरणे अनुभूय-
मानान्ययव्यतिरेकस्यैवाऽज्ञानस्य रजताद्यध्यासोपादानत्वोक्तेः ।

है, [ अतः व्यभिचार है ] यदि इदमाकार वृत्तिको उक्त स्थलमें अज्ञानका अभिभावक मानेंगे, तो अज्ञानरूप रजतोपादानका अभाव होनेसे शुक्तिमें रजतकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकेगी ?

इस आक्षेपके समाधानमें कोई कहते हैं कि इदमाकार वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी शुक्तित्व आदि विशेष-अंशके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होनेसे वही विशेष अंशका अज्ञान रजत आदिका उपादान है, क्योंकि शुक्तित्व आदिके अज्ञानके होनेपर रजतका अध्यास होता है और शुक्तित्व आदिके अज्ञानके न होनेपर रजतका अध्यास नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक देखे जाते हैं । और अध्यासभाष्यकी पञ्चपादिका नामकी टीकाके विवरणमें *—जिसके अन्वय और व्यतिरेक अनुभूयमान हैं,


* श्रीपद्मपादाचार्यकृत पञ्चपादिका शङ्करभाष्यकी टीका है, वह सम्पूर्ण भाष्यके ऊपर उपलब्ध नहीं होती । प्रकाशात्मयतिकृत विवरण इसकी टीका है, ये दोनों चतुःसूत्री तक मुद्रित हैं । इस विवरण में अन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान अध्यासका उपादान कारण माना गया है, यहाँकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं—
'ननु कथं मिथ्याऽज्ञानमध्यासस्योपादानम् ? तस्मिन् सति अध्यासस्योदयादसति चानुदया- दिति ब्रूमः । ननु अध्यासस्य प्रतिबन्धकं तत्त्वज्ञानं तदभावश्चाज्ञानमिति प्रतिबन्धकाभाव

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२१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


अत एव शुक्त्यंशोऽधिष्ठानम् , इदमंश आधारः । सविलासाज्ञानविषयोऽधिष्ठानम् , अतद्रूपोऽपि तद्रूपेणाऽऽरोप्यबुद्धौ स्फुरन्नाधार इति संक्षेपशारीरकेऽपि विवेचनादिति ।

ऐसा—अज्ञान ही रजत आदि अध्यासके प्रति उपादान कहा गया है ।

* इसीसे शुक्त्यंश अर्थात् शुक्तित्वरूप विशेषधर्मसे पुरोवर्ती पदार्थावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है और इदमंश आधार है । क्योंकि अधिष्ठानका अर्थ है—रजत आदि विक्षेपसे युक्त अज्ञानका विषय, और आधारशब्दका अर्थ है—तद्रूप न होनेपर भी तद्रूपसे आरोप्यबुद्धिमें स्फुरनेवाला अर्थात् सचमुच अध्यस्त रजत आदिरूप न होकर रजत आदिरूपसे रजतादि बुद्धिमें भासने-


विषयतयाऽज्ञानस्याऽध्यासेनाऽन्वयव्यतिरेकावन्यथासिद्धौ, नैतत्सारम्, पुष्कलकारणे हि सति कार्योत्पादविरोधि प्रतिबन्धकम् , न चाऽध्यासपुष्कलकारणे सति तत्त्वज्ञानोदयः, तस्माच्चान्वयव्यतिरेकौ प्रतिबन्धकाभावविषयौ, तथापि विरोधिसंसर्गाभाव इति चेत्.....................मिथ्याज्ञानमेवाध्यासोपादानम् , नात्मान्तःकरणकाचादिदोषा इति सूक्तम्, [ द्रष्टव्य—भामती आदि नवव्याख्यायुत शाङ्करभाष्य पृ० ८९ कलकत्ता मुद्रित ] शङ्का—मिथ्याज्ञान अध्यासका उपादान कैसे है ? समाधान—मिथ्याज्ञानके रहनेपर अध्यास होता है और न रहनेपर नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक ही प्रमाण हैं । शङ्का—अध्यासका प्रतिबन्धक तत्त्वज्ञान है और तत्त्वज्ञानका अभाव अज्ञान है, इस प्रकार प्रतिबन्धकाभावविषयक होनेसे अज्ञानके साथ अन्वय और व्यतिरेक अन्यथासिद्ध हैं ? समाधान—नहीं, क्योंकि प्रतिबन्धकका अर्थ है-पुष्कल (सब) कारणके रहते कार्यकी उत्पत्तिमें विरोधी । और अध्यासके कारणोंके रहते तत्त्वज्ञान नहीं होता है, इससे उक्त अन्वय और व्यतिरेक प्रतिबन्धकाभावविषयक नहीं हैं, शङ्का—तथापि विरोधिसंसर्गाभावविषयक होंगे ? नहीं.........इत्यादिसे अनेक प्रकारकी आशङ्का करके अन्तमें स्थिर किया गया है कि अध्यासका उपादान कारण मिथ्या अज्ञान ही है, आत्मा, अन्तःकरण या काचादि दोष नहीं हैं, यह उपर्युक्त पङ्क्तियोंका आशय है ।

* तात्पर्य यह है कि शुक्तित्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट पुरोवर्ती पदार्थ ही यदि प्रातिभासिक रजतके कारण अज्ञानसे आवृत माना जाय, तो वह रजतत्वादि विशिष्ट द्रव्य अधिष्ठान होगा, इदन्त्वविशिष्ट इदमंश नहीं होगा, क्योंकि जो अज्ञानसे आवृत होता है, वही अधिष्ठान होता है, इस अवस्थामें अधिष्ठान और आरोप्यके एकज्ञानविषयत्व नियमसे 'शुक्ति रजत है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'इदं रजतम्' यह प्रतीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इदमंश अधिष्ठान नहीं है, इसलिए अधिष्ठान और आधारका लक्षण पृथक् पृथक् करते हैं, इस परिस्थितिमें इस मतके अनुकूल यही नियम होगा कि आधार और आरोप्य ( आरोपके विषय ) ही एक ज्ञानके विषय होंगे, अधिष्ठान और आरोप्य नहीं ।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २१७


अन्ये वृत्त्येदमज्ञानावरणांशपरिक्षयात् ।
विक्षेपांशेन रजतं जीवन्मुक्तौ जगद्यथा ॥ ११० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानके आवरणांशके नष्ट होनेपर भी उसके विक्षेप अंशसे रजतकी उत्पत्ति होती है, जैसे जीवन्मुक्तिमें जगत् ॥ ११० ॥

अपरे तु—'इदं रजतम्' इति इदमंशसम्भिन्नत्वेन प्रतीयमानस्य रजतस्य इदमंशाज्ञानमेवोपादानम् । तस्य चेदमाकारवृत्त्या आवरणशक्तिमात्रनिवृत्तावपि विक्षेपशक्त्या सह तदनुवृत्तेः नोपादानत्वासम्भवः । जलप्रतिबिम्बितवृक्षाधोऽग्रत्वाध्यासे जीवन्मुक्त्यनुवृत्ते प्रपञ्चाध्यासे च सर्वा-


वाला, इस प्रकार अधिष्ठान और आधारका संक्षेपशारीरकमें भी विवेचन † किया गया है ?

‡ 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकार इदमंशके तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान रजतके प्रति इदम् अंशका अज्ञान ही उपादान कारण है । इदमाकार वृत्तिसे उस अज्ञानकी आवरणशक्तिका विनाश होनेपर भी विक्षेप-शक्तिके साथ उसकी निवृत्ति न होनेसे रजत आदिके प्रति वह उपादान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि जलमें प्रतिबिम्बित वृक्षके अधोग्रत्वके (जिसका अग्रभाग नीचे है, ऐसे वृक्षके अधोग्रत्वके) अध्यासमें और जीवन्मुक्तिमें अनुवर्तमान प्रपञ्चके अध्यासमें सर्वांशसे ✻ अधिष्ठानका साक्षात्कार


† संक्षेपशारीरकमें अधिष्ठान और आधारकी भिन्नताका सूचक एक श्लोकार्द्ध है, वह इस प्रकार है—

'संविद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगी-
र्नाधारेऽध्ययनस्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान् संभ्रमः' इत्यादि । [अ० १ श्लोक ३१]

अर्थात् कार्यके युक्त अज्ञानसे आवृत वस्तुमें ही अध्यासके अधिष्ठानका व्यवहार होता है, आधारमें—आरोप्य पदार्थके साथ तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान वस्तुमें—नहीं होता है, यह इस श्लोकार्धका भाव है ।

‡ अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही एक ज्ञानके विषय होते हैं, यही मत भाष्यादि निबन्धोंसे ज्ञात होता है, इसलिए पूर्वोक्त मत सर्वसम्मत नहीं है, इस अरुचिसे 'अपरे तु' का मत कहते हैं ।

✻ रजत आदि भ्रमस्थलमें अधिष्ठानका सर्वात्मना साक्षात्कार नहीं होता है, क्योंकि शुक्तित्व आदि विशेषरूपसे शुक्तिका साक्षात्कार नहीं होता है, इसलिए शुक्तिरजतस्थलमें इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी विशेषांशके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे उसमें अध्यासकी उपादानता

३६

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२१८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

त्मना अधिष्ठानसाक्षात्कारानन्तरभाविन्यामावरणनिवृत्तावपि विक्षेपशक्तिसहिताज्ञानमात्रस्योपादानत्वसम्प्रतिपत्तेरित्याहुः ।

नृसिंहभट्टोपाध्यायः पूर्वं रजतविभ्रमात् ।
न मानमिदमाकारवृत्ताविति समव्यधात् ॥ १११ ॥

नृसिंहभट्टोपाध्यायने कहा है कि रजतभ्रमके पूर्वमें इदमाकार वृत्तिमें कोई प्रमाण नहीं है, [अतः वह अज्ञानकी निवर्तक है या नहीं, यह विचार ही असङ्गत है] ॥१११॥

कवितार्किकचक्रवर्तिनृसिंहभट्टोपाध्यायास्तु—'इदं रजतम्' इति भ्रमरूपवृत्तिव्यतिरेकेण रजतोत्पत्तेः प्रागिदमाकारा वृत्तिरेव नास्तीति तस्या अज्ञाननिवर्तकत्वतदसद्भावविचारं निरालम्बनं मन्यन्ते ।


होनेके अनन्तर आवरणकी निवृत्ति होनेपर भी केवल विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञान उपादान कारण माना जाता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

† कवितार्किकचक्रवर्ती नृसिंहभट्टोपाध्याय तो—'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस स्थलमें भ्रमवृत्तिसे पृथक् रजतकी उत्पत्तिके पूर्वमें इदमाकार अन्य वृत्ति ही नहीं है, इससे इदमाकार वृत्तिमें अज्ञाननिवर्तकत्वका और अज्ञाननिवर्तकत्वाभावका विचार निरालम्बन ही है—ऐसा मानते हैं ।


हो सकती है। प्रतिबिम्बविभ्रमस्थलमें—जलके किनारेके वृक्षोंका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है वहाँ जो वृक्षका अग्रभाग ऊपर है उसका जलमें नीचे भान होता है, इस स्थलमें—'जलमें वृक्ष नहीं है और वृक्षका अग्रभाग ऊपर ही है' इस प्रकार सर्वांशसे विशेष दर्शन होनेसे विशेषांशका अज्ञान निवृत्त नहीं है और सामान्यांशका निवृत्त है, इस प्रकार विभाग न होनेसे विशेषका अज्ञान उस प्रतिबिम्बाध्यास में कारण है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, इससे इस अध्यासके अनुरोधसे, यह कहना होगा कि एक ही अज्ञानके आवरणांशके निवृत्त होनेपर भी विक्षेपशक्तिवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है और यही अध्यासमें कारण है। इसी प्रकार जीवन्मुक्तिमें भी ब्रह्मतत्त्वके साक्षात्कारसे आवरणांशकी निवृत्ति होती है और विक्षेपशक्तिवाले अंशकी निवृत्ति नहीं होती है। यह मानना चाहिए, इसलिए रजताध्यासमें भी विक्षेपशक्तिसे युक्त इदमंशका अज्ञान ही कारण है, ऐसा मानना चाहिए, यह भाव है।

† इनके मतमें जब पहले इदमाकार वृत्ति होती ही नहीं है, तो व्यभिचार-शङ्का और उसका समाधान करना व्यर्थ ही है, इसलिए पूर्वोक्त विचार निरर्थक है, यही पूर्वोक्त मतमें अरुचि है। पूर्वमतमें इदमाकार वृत्तिके होनेसे उस वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्य ही शुक्तिरजतादि ज्ञान है, वृत्त्यात्मकं ज्ञान नहीं है। और इस मतमें भ्रमसे पहले इदमाकार वृत्तिके न होनेसे वृत्तिरूप ही शुक्तिरजत ज्ञान है, ऐसा समझना चाहिए यह बात विशेषरूपसे आगे स्पष्ट होगी, यह भाव है।

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सकारणे अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहितं २११


तथाहि—न तावत् भ्रमरूपवृत्तित्यतिरेकेण इदमाकारा वृत्तिरनुभवसिद्धा; ज्ञानद्वित्वाननुभवात्। नाप्यधिष्ठानसामान्यज्ञानमध्यासकारणमिति कार्यकल्प्या; तस्यास्तत्कारणत्वे मानाभावात्। न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगाभावे रजताद्यनुत्पत्तिस्तत्र मानम्; ततो दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगस्यैवाऽध्यासकारणत्वप्राप्तेः। न च सम्प्रयोगो न सर्वत्र भ्रमव्यापी, अधिष्ठानस्फुरणं तु स्वतः


कारण कि [ 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रमस्थलमें ] भ्रमवृत्तिसे अलग इदमाकार वृत्तिका अनुभव होता ही नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें 'इदम्' और 'इदं रजतम्' इस प्रकार दो ज्ञानोंका अनुभव नहीं होता है। और अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्यज्ञान कारण भी नहीं है, जिससे कि अध्यासरूप कार्यके बलपर इदमाकार वृत्तिकी कल्पना की जाय, क्योंकि इदमाकार सामान्य वृत्तिको अध्यासके प्रति कारण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। शङ्का—अधिष्ठानके साथ इन्द्रिय आदिका सम्बन्ध न होनेपर रजतकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः यही अनुपपत्ति अध्यासके प्रति अधिष्ठानके सामान्य ज्ञानकी कारणतामें * प्रमाण है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रमाणसे दुष्ट इन्द्रियका सम्बन्ध ही अध्यासके प्रति कारण प्राप्त होता है, अधिष्ठानका सामान्यज्ञान अध्यासके प्रति कारण प्राप्त नहीं होता है। अब शङ्का होती है कि इन्द्रियका सम्प्रयोग सर्वत्र भ्रमव्यापी (भ्रमका अव्यभिचारी कारण) नहीं है [अर्थात् जहाँ जहाँ


* अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान कारण है, इस कार्यकारणभावमें कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा पहले कहा जा चुका, अब शङ्का करते हैं कि उक्त कार्यकारणभावमें प्रमाण है, क्योंकि अधिष्ठानके साथ जबतक चक्षु आदिका सम्बन्ध नहीं होता है, तबतक रजत आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, और सम्बन्ध होनेसे होती है, इसी अन्वय और व्यतिरेकरूप प्रमाणसे अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको अध्यासका कारण मानेंगे। यदि इसपर शङ्का की जाय कि उक्त अन्वय-व्यतिरेकसे इन्द्रियके सम्बन्धमें ही अध्यासकारणताका ग्रह होता है, अधिष्ठान सामान्य ज्ञानमें नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रिय-सम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार होगा ? जो अन्वय और व्यतिरेक सम्प्रयोगमें अध्यासकी कारणताके ग्राहक हैं, उन्ही अन्वय और व्यतिरेकसे शुक्ति-रजत आदि स्थलमें इन्द्रियसम्बन्ध-साध्य धर्मिज्ञानको ही कारण मानते हैं, इस अवस्थामें अधिष्ठानके सामान्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेमें तथा कथित अन्वय और व्यतिरेक प्रमाण हैं, यह प्रकृतमें पूर्वपक्षीका गूढ़ अभिप्राय है, परन्तु इसकी ओर ध्यान न देकर ही 'ततः' इत्यादिसे उत्तर देते हैं। 'ततः' का अन्वय और व्यतिरेकके बलसे, यह अर्थ है।

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१२७सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने प्रत्यगात्मनि अहङ्काराध्यासमपि व्याप्नोतीति वाच्यम्; तस्याऽपि घटाद्यध्यासाव्यापित्वात् । घटादिप्रत्यक्षात् प्राक् तदधिष्ठानभूतनीरूप-ब्रह्ममात्रगोचरचाक्षुषवृत्तेरसम्भवात् । स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवृतत्वात् । आवृतानावृतसाधारण्येनाऽधिष्ठानप्रकाशमात्रस्याऽध्यासकारणत्वे शुक्तीदमंशसम्पयोगात् प्रागपि तदवच्छिन्नचैतन्यरूपप्रकाशस्याऽऽवृतस्य सद्भावेन तदाऽप्यध्यासापत्तेः । न चाऽध्याससामान्ये अधिष्ठानप्रकाशसामान्यं हेतुः, प्रातिभासिकाध्यासेऽभिव्यक्ताधिष्ठानप्रकाश इति नाऽतिप्रसङ्गः, सामान्ये सामा-


भ्रम होता है, वहाँ वहाँ इन्द्रियसम्प्रयोग रहता है, यह बात नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रियसम्प्रयोग नहीं है ] और अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान तो स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्मरूप अधिष्ठानमें अहङ्कार आदि अध्यासको भी व्याप्त करता है, अतः सामान्यतः अधिष्ठानका ज्ञान ही अध्यासके प्रति कारण है, इन्द्रियसम्प्रयोग कारण नहीं है ? यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानका सामान्य स्फुरण भी घटादि-अध्यासका व्यापी नहीं है, कारण कि घट आदिके प्रत्यक्षसे पूर्व घटके अधिष्ठानभूत नीरूप ( रूपरहित ) ब्रह्ममात्रको विषय करनेवाली चक्षुकी वृत्ति [ उक्त स्थलमें ] नहीं होती है । और स्वरूपप्रकाशके आवृत होनेसे [ अधिष्ठानभूत ब्रह्मका स्वतः स्फुरण भी नहीं हो सकता है ] । यदि आवृत और अनावृत साधारण † अधिष्ठानका प्रकाशमात्र अध्यासके प्रति कारण माना जाय, तो भी शुक्तिके इदमंशके साथ इन्द्रियसम्बन्धसे पूर्व आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप प्रकाशके होनेसे उस समयमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी । अब पुनः शङ्का करते हैं कि अध्याससामान्यमें अधिष्ठानका प्रकाशसामान्य कारण मानेंगे और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश कारण मानेंगे, इससे पूर्वोक्त दोष नहीं है ? क्योंकि


† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अध्यासके प्रति अधिष्ठानका प्रकाशमात्र कारण मानते हैं, अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान कारण नहीं मानते हैं, क्योंकि उसके माननेमें लाघव है, इससे 'सन् घटः, सन् पटः' इत्यादि अध्यासोंके अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्मका प्रकाश होनेसे अधिष्ठान प्रकाश है, इसलिए व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके स्वप्रकाश होनेसे उक्त स्थलमें ब्रह्मका प्रकाश तो होता ही है।

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सकारणं अध्यासका विचारं] भाषानुवादसहितं ३२१


न्यस्य विशेषे विशेषस्य हेतुत्वौचित्यादिति वाच्यम्, एवमपि प्रातिभासिकशङ्खपीतिमकूपजलनैल्याद्यध्यासाव्यापनात् । रूपानुपहितचाक्षुषप्रत्ययायोगेन तदानीं शङ्खादिगतशौक्ल्योपलम्भाभावेन चाऽध्यासात् प्राक् शङ्खादिनीरूपाधिष्ठानगोचरवृत्त्यसम्भवात् ।


सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष कारण मानना उचित है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शङ्खमें प्रातिभासिकपीतिमरूपके और कूपजलमें प्रातिभासिक नैल्यके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानके प्रत्यक्षकी व्याप्ति नहीं है, कारण कि रूपरहितकी * चाक्षुषवृत्ति न होनेके कारण और अध्यासके पूर्वकालमें शङ्ख आदिके शुक्लरूपका उपलम्भ न होनेके कारण उस समयमें रूपरहित शङ्ख आदि अधिष्ठानोंकी अपरोक्षवृत्ति नहीं † हो सकती है ।


* रूपरहित जितने पदार्थ हैं, उनकी चाक्षुष वृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि यदि रूपरहितकी चाक्षुषवृत्ति मानी जाय, तो वायुकी भी चाक्षुष वृत्ति प्राप्त होगी और उसका चक्षुसे प्रत्यक्ष होने लगेगा । शंखमें पीत रूपके अध्याससे पूर्वकालमें यदि उसमें शुक्लरूपकी उपलब्धि मानी जाय, तो 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास ही नहीं होगा, इसलिए धर्मीके ज्ञानको जो अध्यासके प्रति कारण मानते हैं, उनका पक्ष अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि उनके मतमें अभिव्यक्त शङ्ख और जल आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पीत और नील आदि रूपोंका अध्यास होता है, इसलिए उनके मतमें पहले 'इदम्' इत्याकारक वृत्तिकी उत्पत्ति होती है, और उस वृत्तिसे अभिव्यक्त पूर्वोक्त पदार्थावच्छिन्न चैतन्यमें पीतादिरूप अध्यस्त होते हैं । परन्तु उनसे (धर्मिज्ञानकारणवादियोंसे) पूछना चाहिए कि उस स्थलमें इदमाकार वृत्ति केवल शंखमात्रको अवलम्बन करती है, या रूपविशिष्ट शंखको ? इनमें प्रथम पक्ष तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि रूपाविषयक चाक्षुषवृत्ति नहीं होती, इसका ऊपर अभी निरूपण किया गया है । द्वितीय पक्षमें भी यह प्रष्टव्य हो सकता है कि क्या शुक्लरूप विशिष्ट शङ्खको वह विषय करती है, अथवा पीतरूपविशिष्ट शंखको ? इसमें द्वितीय पक्षका अवलम्बन करेंगे, तो वह धर्मिज्ञान नहीं है, क्योंकि आरोप्य पीत रूप विशिष्ट शङ्खज्ञान ही तो भ्रान्ति है । और प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वकालमें यदि शुक्ल रूप प्रतीत हो, तो पीत शंखाध्यास ही विलीन हो जायगा, इसलिए व्यभिचार होनेसे धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेवालोंका पक्ष असङ्गत ही है, यह नृसिंहभट्टोपाध्यायका मत है ।

† वस्तुतस्तु अध्याससे पूर्व द्रव्यमात्ररूपसे शङ्खादिविषयक वृत्तिका उदय होता ही है, क्योंकि द्रव्यगोचर चाक्षुषवृत्तिमें रूपविषयकत्व नियम अप्रयोजक है । वायुका चाक्षुषप्रसङ्ग भी नहीं आ सकता है, क्योंकि द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें उद्भूतरूप प्रयोजक है, इससे अध्यासके

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२३२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ प्रथम परिच्छेदे

न च प्रातिभासिकेष्वपि रजताद्यध्यासमात्रे निरुक्तो विशेषहेतुरास्तामिति वाच्यम्; तथा सति सम्प्रयोगात् प्राक् पीतशङ्खाद्यध्यासाप्रसङ्गाय तदध्यासे दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगः कारणमित्यवश्यं वक्तव्यतया तस्यैव सामान्यतः प्रातिभासिकाध्यासमात्रे लाघवात् कारणत्वसिद्धौ, तत एव रजता-


शङ्का करते हैं कि प्रातिभासिक अध्यासोंमें से भी केवल रजत आदि अध्यासमें ही उक्त अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाशविशेष हेतु है, पीतशंख आदि अध्यासोंमें हेतु नहीं है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यदि पीतशंख आदि अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश हेतु न माना जाय, तो इन्द्रियसम्प्रयोगसे पूर्वमें भी पीतशङ्ख आदि अध्यासकी प्रसक्ति हो जायगी, वह न हो, इसलिए उन अध्यासोंमें दुष्ट इन्द्रियोंके सम्प्रयोगको अवश्य कारण कहना होगा, इससे उसी इन्द्रियके सम्प्रयोगमें सामान्यतः प्रातिभासिक अध्यासमात्रके प्रति लाघवसे कारणत्वकी सिद्धि होनेपर उसीसे रजताध्यासके ⁕ कादाचित्कत्व-


पूर्वमें द्रव्यका ग्रहण होनेपर भी दोषविशेषसे जैसे शुक्तित्वका ग्रहण नहीं होता है, वैसे ही दोषविशेषसे शुक्लरूपमात्रका अग्रहण हो सकता है, इसीसे भामतीकारने भी कहा है कि—

'शङ्खश्च दोषाच्छादितशुक्लिमानमननुभवन्' [ पृ० २१ निर्णयसागर भामतीकल्पतरु ]

अर्थात् दोषसे शङ्खके शुक्लरूपका अनुभव न करके, यह उक्त पंक्तिका आशय है । अथवा यह मान भी लिया जाय कि उक्त स्थलमें अध्यासके पूर्वमें शुक्लरूपविशिष्ट शंखका ग्रहण होता है, तो भी अध्यासकी अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि दोषवलसे शुक्लका ग्रहण नहीं होता है, इसीसे उपपत्ति हो सकती है । इससे प्रातिभासिक अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्य-ज्ञान कारण माना जाय, तो भी व्यभिचार नहीं है, अंतः धर्मिज्ञानरूप इदमाकार वृत्ति सिद्ध होती है । उसकी सिद्धि होनेसे उसमें आवरणनिवर्तकत्व शक्ति है या नहीं है, उसका विचार सालम्बन ही है निरालम्बन नहीं है, यही अस्वरस इस मतमें 'उपाध्याया मन्यन्ते' इससे सूचित किया गया है, इसे नहीं भूलना चाहिए ।

⁕ धर्मिज्ञानको कारण माननेवाले कहते हैं कि सर्वदा अध्यासका प्रसङ्ग न हो, इसलिए अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको कारण मानना चाहिए, उसके माननेसे शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अधिष्ठानप्रकाशके आवृत्त होनेसे सदा उसकी अभिव्यक्तिके न रहनेसे सर्वदा अध्यासकी प्रसक्ति नहीं होती है । इसलिए सर्वदा अध्यासके प्रसङ्गका अभाव है । परन्तु यह प्रसङ्ग धर्मिज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेवालोंके मतमें भी नहीं होता है, क्योंकि उसका परिहार पीतशङ्खस्थलमें क्लृप्तसम्प्रयोगसे भी हो सकता है, यह भाव है ।

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२३

ध्यासकादाचित्कत्वस्याऽपि निर्वाहादधिष्ठानप्रकाशस्य सामान्यतो विशेषतो वाऽध्यासकारणत्वस्याऽसिद्धेः।
ननु सादृश्यनिरपेक्षे अध्यासान्तरे अकारणत्वेऽपि तत्सापेक्षे रजताद्य-

की भी उपपत्ति हो सकनेसे सामान्यरूपसे या विशेषरूपसे अधिष्ठानके प्रकाशमें अध्यासके प्रति कारणता †सिद्ध नहीं होती ‡ है ।
-* जिस अध्यासमें सादृश्यकी अपेक्षा नहीं है, ऐसे पीतशङ्ख आदि अन्य अध्यासमें अधिष्ठानसामान्यज्ञान भले ही कारण न हो, परन्तु सादृश्यकी


† तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानका प्रकाशमात्र सम्पूर्ण अध्यासके प्रति कारण है और अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश प्रातिभासिक अध्यासके प्रति कारण है, इस प्रकारके सामान्य और विशेष कार्यकारणभाव सिद्ध नहीं होते हैं ।

‡ यहाँपर कोई विचार करते हैं कि मूलमें जो प्रातिभासिक अध्यासमात्रमें दुष्टेन्द्रियका सम्प्रयोग कारण माना गया है, वह असङ्गत है, क्योंकि अहंकाराध्यासमें और साक्षीमें स्वाप्नाध्यासस्थलमें इन्द्रियसम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार है, यदि इसपर कहें कि अहङ्कार-का अध्यास व्यावहारिक है, प्रातिभासिक नहीं है, अतः व्यभिचार नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अहङ्काराध्यासको प्रातिभासिक मानते हैं, उनके मतमें व्यभिचारका परिहार नहीं हो सकेगा । यदि कहें कि स्वप्नप्रपञ्चके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान ही कारण होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दो कार्यकारणभाव माननेकी अपेक्षा एक कार्यकारणभाव माननेमें लाघव होनेसे अभिव्यक्ताधिष्ठान ज्ञानको कारण मानने हीमें लाघव है, क्योंकि दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगकी ( विषयके साथ दुष्ट इन्द्रियोंके सम्बन्धकी ) अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके उत्पादनमें ही सफलता है, अतः वह अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकता है । और पीतशंख आदि अध्यासॉमें भी अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके सम्भवका पूर्वकी टिप्पणीमें उल्लेख किया गया है, अतः इन सब युक्तियोंका विचार करनेसे यद्यपि धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानना यही पक्ष युक्तियुक्त भासता है तथापि सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करनेपर यही पक्ष ठीक है, किन्तु स्थूल दृष्टिसे लाघवतः इन्द्रियसम्प्रयोग कारण माना गया है, यह जानना चाहिए ।

  • धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिए, इसमें अन्य युक्तिका प्रदर्शन करते हैं-‘ननु, सादृश्य०’ इत्यादिसे । तात्पर्य यह है कि पीतरूपके साथ शंखका सादृश्य न होनेसे 'पीत शंख है' इस अध्यासमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, परन्तु शुक्तिरजतस्थलमें रजतके साथ शुक्ति आदिका रूपविशेषसे अवश्य सादृश्य है, इसलिए उक्त रूपसे विशिष्ट धर्मिज्ञान हो सकता है और उसीसे रजताध्यास होगा, तो शुक्त्यादि अध्यासके प्रति अधिष्ठानज्ञान कारण क्यों न माना जाय ? यदि लाघवसे कहेंगे कि इन्द्रियसम्प्रयोग कारण है, तो इंगालमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।
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३२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


ध्यासे रजतादिसादृश्यभूतरूपविशेषादिविशिष्टधर्मिज्ञानरूपमधिष्ठानसामान्यज्ञानं कारणमवश्यं वाच्यम्, दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगमात्रस्य कारणत्वे शुक्तिवदिङ्गालेऽपि तद्रजताध्यासप्रसङ्गात् ।

न च सादृश्यमपि विषयदोषत्वेन कारणमिति वाच्यम् ; विसदृशेऽपि सादृश्यभ्रमे सत्यध्याससद्भावात् जलधिसलिलपूरे दूरे नीलशिलातलत्वारोपदर्शनात् । न च ‘तद्धेतोरेव’ इति न्यायात् सादृश्यज्ञानसामग्र्येवाध्यासकारणमस्त्विति युक्तम्, ज्ञानसामग्र्या अर्थकारणत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टेः । तत्तस्सादृश्यज्ञानत्वस्यैव लघुत्वाच्च ।


अपेक्षा रखनेवाले रजत आदिके अध्यासमें, रजत आदिके सदृश रूपसे युक्त धर्मिका ज्ञानरूप जो अधिष्ठानसामान्यज्ञान है, उसे कारण अवश्य मानना चाहिए। यदि सादृश्यकी अपेक्षा न करके केवल दुष्ट इन्द्रियके सम्बन्धको ही कारण माना जाय, तो शुक्तिके समान इङ्गालमें—कोयलोंमें—भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* यदि कहो कि विषयके दोषरूपसे सादृश्य भी आध्यासका कारण माना जायगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सादृश्यसे रहित पदार्थोंमें सादृश्यके भ्रमसे अध्यास होता है, कारण कि दूरस्थ समुद्रके जलप्रवाहमें नील शिलातलका आरोप—भ्रम देखा जाता है। यदि कहें कि तद्धेतोरेव † इस न्यायसे सादृश्यज्ञानकी सामग्री ही अध्यासकी कारण हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानकी सामग्रीमें अर्थकी कारणता कहींपर भी नहीं देखी जाती है। और सादृश्यज्ञानकी सामग्रीत्वको कारणतावच्छेदक माननेकी अपेक्षासे सादृश्यज्ञानत्वको अध्यासके प्रति कारणतावच्छेदक माननेमें लाघव भी है।


* इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि सादृश्य अध्यासोंमें अवश्य अपेक्षित है, तथापि वह स्वरूपतः कारण है, ज्ञात कारण नहीं है, अतः इंगालमें रजताध्यासकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, इसलिए धर्मिज्ञानको कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

† इस न्यायका यह स्वरूप है—‘तद्धेतोरेवास्तु तद्धेतुत्वम् मध्ये किं तेन’ अर्थात् जिसको तुम हेतु—कारण मानते हो, उसीके कारणसे यदि कार्य हो सकता है, तो मध्यमें उसको कारण मानना व्यर्थ है, प्रकृतमें सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेकी अपेक्षा उसकी कारण सामग्रीको ही अध्यासके प्रति कारण माननेसे उपपत्ति हो सकती है, फिर उसे बीचमें कारण मानना व्यर्थ ही है, यह भाव है।

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२५


न च स्वतश्शुभ्रेऽपि शुभ्रकलधौतभृङ्गारगतेऽपि स्वच्छे जले एव नैल्याध्यासः, न मुक्ताफले इति व्यवस्थावत् वस्तुस्वभावादेव शुक्तौ रजताध्यासः नेङ्गालादाविति व्यवस्था, न तु सादृश्यज्ञानापेक्षणादिति वाच्यम् ; स्वतः पटखण्डे पुण्डरीकमुकुलत्वानध्यासेऽपि तत्रैव कर्तनादि-घटिततदाकारे तदध्यासदर्शनेन तदध्यासस्य वस्तुस्वभावमननुरुध्य सादृश्य-ज्ञानभावाभावानुरोधित्वनिश्चयात् । अन्यथाऽन्यदाऽपि तत्र तदध्यास-प्रसङ्गात् ।

उच्यते—सादृश्यज्ञानस्याऽध्यासकारणत्ववादेऽपि विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु

यदि शङ्का की जाय कि जैसे स्वतः शुभ्र, सफेद रजतके पात्र विशेषमें स्थित निर्मल जलमें ही नीलिमाका अध्यास होता है, मोतीमें नहीं होता, इस प्रकार वस्तुके स्वभावविशेषसे व्यवस्था होती है, वैसे ही शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, इङ्गालमें नहीं होता, इस प्रकारकी व्यवस्था भी स्वभावसे हो सकती है, सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षासे नहीं होती है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षात् वस्त्रके खण्डमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास न होनेपर भी कैंचीसे कतर कर कमलाकार बनानेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास देखा जाता है, इससे कमलाध्यासमें—वस्तुस्वभावका अनुरोध न करके † सादृश्यज्ञानके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता—इस प्रकार सादृश्यज्ञके अनुरोधका निश्चय किया जाता है। अन्यथा अर्थात् वस्तुस्वभावको अध्यासके प्रति कारण माननेपर पटमें कतरनेके पूर्व भी कमलकी मुकुलावस्थाके अध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* उक्त शङ्काका समाधान कहते हैं कि सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण है,


‡ अर्थात् कतरनेसे सादृश्यज्ञान होनेपर ही कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है, और उसके न होनेपर नहीं होता, अतः वस्तुस्वभावकी अपेक्षा न करके अन्वयव्यतिरेकसे अध्यास सादृश्यज्ञानकी अपेक्षा करता है, यह भाव है।

* विशेष अध्यासमें कारणरूपसे प्राप्त सादृश्यज्ञान द्वारा समादृत धर्मिज्ञानकी कारणताका परिहार करते हैं—'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थसे। परिहारका तात्पर्य यह है कि विशेषदर्शनसे जिनकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसे 'शुक्तौ इदं रजतम्' इत्यादि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञान कारण है और विशेषदर्शनसे जिन अध्यासोंका प्रतिबन्ध नहीं होता है, ऐसे अध्यासोंमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, इस बातको धर्मिज्ञानकारणवादी अवश्य स्वीकार करेंगे शुक्तिरजतस्थलमें 'रजतत्वाभावव्याप्यशुक्तित्ववान् अयम्' (रजतत्वके अभावसे व्याप्य जो

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२२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

रजताद्यध्यासेष्वेव तस्य कारणत्वं वाच्यम् ; न तु तदप्रतिबध्येपु पीत-शङ्खाद्यध्यासेषु, असम्भवात् । विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु च प्रतिबन्धकज्ञानसामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वनियमेन विशेषदर्शनसामग्र्यप्यवश्यं प्रतिबन्धिका वाच्येति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेः, किं सादृश्यज्ञानस्य कारणत्वकल्पनया ?

तथाहि—इङ्गालादौ चक्षुःसम्प्रयुक्ते तदीयनैल्यदिरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वान्न रजताध्यासः शुक्त्यादावपि नीलभागादिव्यापिचक्षुःसम्प्रयोगे


इस वादमें भी विशेषदर्शनसे प्रतिबध्य रजत आदि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञानको कारण मानना चाहिए, विशेषदर्शनसे जो प्रतिबध्य नहीं हैं, ऐसे पीत शङ्ख आदि अध्यासोंमें उसे कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वस्तुतः उन स्थलोंमें सादृश्य है ही नहीं। और विशेषदर्शनसे जिनका प्रतिबन्ध होता है, ऐसे शुक्तिरजत आदि अध्यासोंमें प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके † प्रतिबन्धकत्व-नियमसे विशेषदर्शनसामग्रीको भी अवश्य प्रतिबन्धक मानना चाहिए, इसलिए उसीसे सब व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो सादृश्यज्ञानको क्यों कारण मानना ? अर्थात् उसे कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

चक्षुसे संयुक्त इङ्गाल आदिमें उनके नीलरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीके होनेसे—रजतका अध्यास नहीं होता है। शुक्तिरजत आदि स्थलमें भी, जिसका कि नील भाग चक्षुसे संयुक्त है, विशेषदर्शन सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास


शुक्तित्व तदाश्रय यह है ) इस विशेषदर्शनसे 'इदं रजतम्' यह भ्रम नहीं होता है, किन्तु उसके अभावमें ही होता है, अतः विशेषदर्शनसे वह रजताध्यास प्रतिबध्य कहलाता है, 'पीतत्वाभावव्याप्यशङ्खत्ववान् अयम्' इस प्रकारके विशेषदर्शनके होनेपर भी 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास होता है, अतः विशेष दर्शनसे यह प्रतिबध्य नहीं है, इसलिए धर्मिज्ञान इसमें कारण नहीं होगा, क्योंकि सचमुच पीत पदार्थका सादृश्य शंखमें है ही नहीं, यह भाव है।

† प्रतिबन्धक ज्ञानसे यहां विशेषदर्शनात्मक ज्ञान ही विवक्षित है। जैसे रजतादि अध्यासमें विशेषदर्शन प्रतिबन्धक है, वैसे ही उसकी सामग्री भी प्रतिबन्धक है, दाहकी प्रतिबन्धक मणिकी सामग्री लोकमें दाहके प्रतिबन्धकरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, अतः ज्ञान पदका उपादान किया गया है, जो धर्मिज्ञान है, उसमें प्रतिबन्धकज्ञानत्व नहीं है, अतः उसमें भी प्रतिबन्धकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वह अध्यासका अनुगुण ही है। इसीलिए नैयायिकोंने पक्षमें साध्याभाववत्ता ज्ञानको ग्राह्याभावका अवगाहन करनेसे प्रतिबन्धक माना है। उसमें साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानको प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके रूपसे अनुमितिका प्रतिबन्धक माना है। इस परिस्थितिमें इसी प्रतिबन्धकी सामग्रीके प्रभावसे अध्यासके कादाचित्कत्व

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संकारणं अध्यासका विचार] भाषानुवादसहितं २२७


तत्सत्त्वान्न तदध्यासः। सदृशभागमात्रसम्प्रयोगे तदभावादध्यासः। तदाऽपि शुक्तिस्वरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वादनध्यासप्रसङ्ग इति चेत्, न; अध्यास-समये शुक्तित्वदर्शनाभावेन तत्पूर्वं तत्सामग्र्यभावस्य त्वयाऽपि वाच्यत्वात्। मम सादृश्यज्ञानरूपाध्यासकारणदोषेण प्रतिबन्धात् तदा शुक्तित्वदर्शन-सामग्र्यभावाभ्युपगमः। तव तथाऽभ्युपगमे तु घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त इति

नहीं होता है। केवल समान भागमें ही इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे विशेष-दर्शनकी सामग्रीके न होनेके कारण रजतका अध्यास होता है। इसपर शङ्का होती है कि रजतके सदृश शुक्तिके किसी हिस्सेके साथ संप्रयोगके समयमें भी शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास नहीं होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वमें तुमको भी * शुक्तित्व-रूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव कहना होगा, क्योंकि अध्यासके समयमें शुक्तित्वका ज्ञान नहीं है। यदि शङ्का हो कि हमें † तो सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यासके कारण दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अध्यासकालमें शुक्तित्वदर्शनकी सामग्रीका अभाव है, यदि तुम सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानते हो, तो ‡ घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही हुआ अर्थात्


आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो धर्मिज्ञानरूप इदमाकारवृत्तिको माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

* तात्पर्य यह है कि केवल शुक्तिके रजतसदृश भागके साथ सम्बन्धकालमें जब चक्षुःसंयुक्त तादात्म्यरूप शुक्तित्वदर्शनकी सामग्री रहती है, तब भी अध्यास देखा जाता है, इससे शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक कोई दोष अवश्य कहना चाहिए, वह दोष प्रत्यासत्त्या दूरत्व आदि होगा—सादृश्यज्ञान नहीं होगा, अतः दोषरूपसे भी धर्मिज्ञान अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकेगा। यह सादृश्यज्ञानकी अध्यासकारणताका खण्डन करनेवालेका मन्तव्य है।

† इदमाकारवृत्तिरूप धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणता माननेवालेको।

‡ धर्मिज्ञानकी कारणताके खण्डनमें प्रवृत्त तुम यदि सादृश्यज्ञानको कारण मानोगे, तो घट्टकुटी-प्रभातवृत्तान्त होगा। उक्त वृत्तान्तका आशय यह है—चुंगीके भयसे रात्रिको ही माल लेकर व्यापारी निकल पड़ा, परन्तु उसका जहाँ सवेरा हुआ, वहींपर चुंगीका ऑफिस आ गया, फलतः उसे अपनी मालकी सारी चुंगी देनी पड़ी, वैसे ही सादृश्यज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेमें तो प्रवृत्त हुए, परन्तु प्रकारान्तरसे सादृश्यज्ञानमें कारणता माननी ही पड़ी, अतः घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त उनके ऊपर लागू हुआ। घट्टकुटी कहते हैं चुंगीके ऑफिसको।

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२२८सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

चेद्, न; समीपोपसर्पणानन्तरं रजतसादृश्यरूपे चाकचिक्ये दृश्यमाने एव शुक्तित्वोपलम्भेन तस्य तत्सामग्रीप्रतिबन्धकत्वासिद्धौ दूरत्वादिदोषेण प्रतिबन्धाद्वा व्यञ्जकनीलपृष्ठत्वादिग्राहकासमवधानाद्वा तत्सामग्रयभावस्य वक्तव्यत्वात् ।

एवं जलधिजले नियतनीलरूपाध्यासप्रयोजकदोषेण दूरे नीरत्वव्यञ्जक-


सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे सिद्धान्तका भङ्ग हुआ, तो यह भी ‡ युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिके पास जानेके अनन्तर रजतके सदृश चाकचिक्यके देखनेपर भी शुक्तित्वका ज्ञान होता है, इससे सादृश्यज्ञान शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं होता है और दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अथवा शुक्तित्वको अभिव्यक्त करनेवाले नीलपृष्ठत्व आदिके ग्राहक ✻ साधनोंके न रहनेसे शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव तुम्हें और हमें दोनोंको कहना होगा ।

इसी प्रकार अर्थात् जैसे सादृश्यज्ञानरूप दोषके बिना शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, वैसे ही दूरस्थ समुद्रके जलमें नील शिलातलत्वका अध्यास


‡ प्रकृतमें एक बात और ध्यान देने लायक है—किसी समयमें दूरस्थ पुरुषको भी शुक्तिमें शुक्तित्वग्रहण होता है, अतः सादृश्यज्ञानके समान दूरत्वदोषमें भी व्यभिचार समान ही है, इसी प्रकार रजतके लिए अत्यन्त लालायित पुरुषको समीपमें जानेपर भी शुक्तिकी प्रमा नहीं होती, इसलिए दूरत्व दोष ही नहीं होगा । यदि किसी विशेष अध्यासके प्रति किसी समय कोई दोष होता है, और किसी समयमें नहीं इस प्रकार व्यवस्था करेंगे, तो वही दीपज्वाला है, इस भ्रमकी, सादृश्यज्ञानरूप दोषसे ही लोकमें, प्रसिद्धि होनेसे सादृश्यज्ञानको भी अध्यासके प्रति कारणता अनिवार्य होगी । देवताधिकरणमें भाष्यकारने भी कहा है कि ‘सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विव’ केशोंके समान सादृश्यज्ञानसे प्रत्यभिज्ञा होती है—वही दीपज्वाला है इत्यादि । और बौद्धाधिकरणमें भी ‘सादृश्यनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानम्’ अर्थात् सादृश्यसे ही प्रत्यभिज्ञान होता है—ऐसा कहा गया है । अतः सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारणत्वका निराकरण करना असङ्गत है, यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि प्रकृतमें स्थूल विचार होनेसे—वह दोषावह नहीं है, सूक्ष्मदृष्टिसे तो सादृश्यज्ञानमें अध्यासकारणत्व है ही, यह भाव है ।

✻ ग्राहकसाधनोंसे शुक्ति आदिके नीलपृष्ठ आदि भागोंके साथ चक्षुःसंयोग आदिका ग्रहण करना चाहिए ।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २२९


तरङ्गादिग्राहकासमवधानेन च शौक्ल्यजलराशित्वादिविशेषदर्शनसामग्र्य-भावाञ्छिलातलत्वाद्यध्यासः । विस्तृते पटे परिणाहरूपविशेषदर्शनसामग्री-सत्त्वान्न पुण्डरीकमुकुलत्वाध्यासः; कर्तनादिविघटिततदाकारे तदभावात्तद-ध्यास इति ।

हो सकता है *, क्योंकि अध्यासके कारणभूत नियत नीलरूप दोषसे, और दूर होनेसे नीरत्वके अभिव्यञ्जक तरङ्ग आदिका ग्रहण करनेवाले साधनोंका समवधान न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है † । और विस्तृत वस्त्रमें इसलिए कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास नहीं होता है कि उस समयमें विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्री है, और कतरनेसे कमलाकार हो जानेसे विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके न होनेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है ‡ ।


* तात्पर्य यह है कि जलमें जो नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, उसमें शुक्लरूपात्मक विशेषका परिज्ञान या जलत्वरूप विशेषका परिदर्शन प्रतिबन्धक है, और इन विशेषदर्शनोंकी सामग्री भी प्रतिबन्धक होगी, इसलिए इन विशेषोंके परिज्ञानकी सामग्रीका अभाव होनेसे ही जलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है। पहले जलमें नैल्यका अध्यास होनेके बाद सादृश्यज्ञानके द्वारा होनेसे उसमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, यह बात नहीं है, दूरस्थ समुद्रजलमें तथा समीपस्थ समुद्रके जलमें नैल्यका नियमतः अध्यास होता है, अतः उसमें नैल्यकाभ्यास नियत से शुक्लरूप, जलत्व आदि विशेषके ग्रहणकी सामग्री अप्रतिबद्ध नहीं है, क्योंकि नैल्यके अभ्याससे शुक्ल रूपकी ग्राहक सामग्री प्रतिबद्ध हो गई है और जलत्वके व्यञ्जक तरङ्ग आदिके ग्रहणका भी दूरत्व दोषसे सन्निधान नहीं है, इसलिए जलत्वका भी ग्रहण नहीं होता है, अतः उक्त प्रतिबन्धक दो ज्ञानोंकी सामग्रीका अभाव होनेसे समुद्रजलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास हो सकता है, यह भाव है।

† यहाँपर धर्मिज्ञानमें कारणत्ववादियोंका मत यह है कि समुद्रके जलमें उक्त प्रकारसे विशेषदर्शनसामग्रीका अभाव अपेक्षित है, तथापि उतनेसे ही उसमें वह अध्यास नहीं हो सकता, किन्तु प्रथम जलमें नीलरूपके अध्याससे नीलशिलातलके सादृश्यकी प्रसक्ति होगी और उसके बाद जलमें नीलशिलातलत्वका अध्यास होगा, इसलिए दूरसे समुद्रजलमें उक्त अध्यास करनेवाले समुद्रके पास जाकर कहते हैं कि इस समुद्रके जलमें दूरसे नीलत्व, निश्चलत्व आदिकी समानतासे नीलशिलातलत्वका अध्यास हमें हुआ था, परन्तु अब वह निवृत्त हो गया, इस प्रकारके लोकव्यवहारके देखनेसे सादृश्यज्ञान ही दोषरूपसे अध्यासके प्रति कारण होता है, केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव नहीं।

‡ अध्यासके प्रति विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावको जो कारण मानते हैं, उनके प्रति ‘स्वतः पद्मपुटे’ (पृ० २२५) इत्यादिसे सादृश्यज्ञानके कारणत्वकी सिद्धिके लिए अन्वय और


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