सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextसंकारणं अध्यासका विचार] भाषानुवादसहितं २२७
तत्सत्त्वान्न तदध्यासः। सदृशभागमात्रसम्प्रयोगे तदभावादध्यासः। तदाऽपि शुक्तिस्वरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वादनध्यासप्रसङ्ग इति चेत्, न; अध्यास-समये शुक्तित्वदर्शनाभावेन तत्पूर्वं तत्सामग्र्यभावस्य त्वयाऽपि वाच्यत्वात्। मम सादृश्यज्ञानरूपाध्यासकारणदोषेण प्रतिबन्धात् तदा शुक्तित्वदर्शन-सामग्र्यभावाभ्युपगमः। तव तथाऽभ्युपगमे तु घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त इति
नहीं होता है। केवल समान भागमें ही इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे विशेष-दर्शनकी सामग्रीके न होनेके कारण रजतका अध्यास होता है। इसपर शङ्का होती है कि रजतके सदृश शुक्तिके किसी हिस्सेके साथ संप्रयोगके समयमें भी शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास नहीं होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वमें तुमको भी * शुक्तित्व-रूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव कहना होगा, क्योंकि अध्यासके समयमें शुक्तित्वका ज्ञान नहीं है। यदि शङ्का हो कि हमें † तो सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यासके कारण दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अध्यासकालमें शुक्तित्वदर्शनकी सामग्रीका अभाव है, यदि तुम सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानते हो, तो ‡ घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही हुआ अर्थात्
आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो धर्मिज्ञानरूप इदमाकारवृत्तिको माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।
* तात्पर्य यह है कि केवल शुक्तिके रजतसदृश भागके साथ सम्बन्धकालमें जब चक्षुःसंयुक्त तादात्म्यरूप शुक्तित्वदर्शनकी सामग्री रहती है, तब भी अध्यास देखा जाता है, इससे शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक कोई दोष अवश्य कहना चाहिए, वह दोष प्रत्यासत्त्या दूरत्व आदि होगा—सादृश्यज्ञान नहीं होगा, अतः दोषरूपसे भी धर्मिज्ञान अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकेगा। यह सादृश्यज्ञानकी अध्यासकारणताका खण्डन करनेवालेका मन्तव्य है।
† इदमाकारवृत्तिरूप धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणता माननेवालेको।
‡ धर्मिज्ञानकी कारणताके खण्डनमें प्रवृत्त तुम यदि सादृश्यज्ञानको कारण मानोगे, तो घट्टकुटी-प्रभातवृत्तान्त होगा। उक्त वृत्तान्तका आशय यह है—चुंगीके भयसे रात्रिको ही माल लेकर व्यापारी निकल पड़ा, परन्तु उसका जहाँ सवेरा हुआ, वहींपर चुंगीका ऑफिस आ गया, फलतः उसे अपनी मालकी सारी चुंगी देनी पड़ी, वैसे ही सादृश्यज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेमें तो प्रवृत्त हुए, परन्तु प्रकारान्तरसे सादृश्यज्ञानमें कारणता माननी ही पड़ी, अतः घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त उनके ऊपर लागू हुआ। घट्टकुटी कहते हैं चुंगीके ऑफिसको।