सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| २२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ प्रथम परिच्छेदं |
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चेद्, न; समीपोपसर्पणानन्तरं रजतसादृश्यरूपे चाकचिक्ये दृश्यमाने एव शुक्तित्वोपलम्भेन तस्य तत्सामग्रीप्रतिबन्धकत्वासिद्धौ दूरत्वादिदोषेण प्रतिबन्धाद्वा व्यञ्जकनीलपृष्ठत्वादिग्राहकासमवधानाद्वा तत्सामग्रयभावस्य वक्तव्यत्वात् ।
एवं जलधिजले नियतनीलरूपाध्यासप्रयोजकदोषेण दूरे नीरत्वव्यञ्जक-
सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे सिद्धान्तका भङ्ग हुआ, तो यह भी ‡ युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिके पास जानेके अनन्तर रजतके सदृश चाकचिक्यके देखनेपर भी शुक्तित्वका ज्ञान होता है, इससे सादृश्यज्ञान शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं होता है और दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अथवा शुक्तित्वको अभिव्यक्त करनेवाले नीलपृष्ठत्व आदिके ग्राहक ✻ साधनोंके न रहनेसे शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव तुम्हें और हमें दोनोंको कहना होगा ।
इसी प्रकार अर्थात् जैसे सादृश्यज्ञानरूप दोषके बिना शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, वैसे ही दूरस्थ समुद्रके जलमें नील शिलातलत्वका अध्यास
‡ प्रकृतमें एक बात और ध्यान देने लायक है—किसी समयमें दूरस्थ पुरुषको भी शुक्तिमें शुक्तित्वग्रहण होता है, अतः सादृश्यज्ञानके समान दूरत्वदोषमें भी व्यभिचार समान ही है, इसी प्रकार रजतके लिए अत्यन्त लालायित पुरुषको समीपमें जानेपर भी शुक्तिकी प्रमा नहीं होती, इसलिए दूरत्व दोष ही नहीं होगा । यदि किसी विशेष अध्यासके प्रति किसी समय कोई दोष होता है, और किसी समयमें नहीं इस प्रकार व्यवस्था करेंगे, तो वही दीपज्वाला है, इस भ्रमकी, सादृश्यज्ञानरूप दोषसे ही लोकमें, प्रसिद्धि होनेसे सादृश्यज्ञानको भी अध्यासके प्रति कारणता अनिवार्य होगी । देवताधिकरणमें भाष्यकारने भी कहा है कि ‘सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विव’ केशोंके समान सादृश्यज्ञानसे प्रत्यभिज्ञा होती है—वही दीपज्वाला है इत्यादि । और बौद्धाधिकरणमें भी ‘सादृश्यनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानम्’ अर्थात् सादृश्यसे ही प्रत्यभिज्ञान होता है—ऐसा कहा गया है । अतः सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारणत्वका निराकरण करना असङ्गत है, यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि प्रकृतमें स्थूल विचार होनेसे—वह दोषावह नहीं है, सूक्ष्मदृष्टिसे तो सादृश्यज्ञानमें अध्यासकारणत्व है ही, यह भाव है ।
✻ ग्राहकसाधनोंसे शुक्ति आदिके नीलपृष्ठ आदि भागोंके साथ चक्षुःसंयोग आदिका ग्रहण करना चाहिए ।