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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 243 of 590

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Page 243

अहंकार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २१३

जन्यतया ज्ञानत्वात्। अंशभेदेन ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्ववत् प्रमात्वा-
प्रमात्ववच्च ज्ञानत्वाज्ञानत्वयोरपि अविरोधादित्याहुः।

इतरे ज्ञानमेवेयं मनसोऽपीन्द्रियत्वतः।
वाह्यार्थेष्वेव वृत्तीनामावृत्याभिभवः फलम् ॥ १०६ ॥

मन भी इन्द्रिय है, अतः अहमर्थाकार मनकी वृत्ति ज्ञान ही है। और आवरणका विनाश करना वृत्तियोंका फल बाह्य अर्थोंमें ही है ॥ १०६ ॥

इतरे तु—अहमाकाराऽपि वृत्तिर्ज्ञानमेव, ‘मामहं जानामि’ इत्यनुभवात्। न च करणासम्भवः, अनुभवानुसारेण मनस एवाऽन्तरिन्द्रियस्य करणत्वस्यापि कल्पनादित्याहुः ॥१०७॥

निश्चित संस्कारसे वह जन्य है। अंशके भेदसे † ज्ञानमें जैसे परोक्षत्व और अपरोक्षत्व माना है, और अंशके भेदसे प्रमात्व और अप्रमात्व माना जाता है, वैसे ही अंशके भेदसे ज्ञानत्व और अज्ञानत्वके एकत्र अवस्थानमें भी कोई विरोध नहीं है।

कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति ज्ञान ही है। कारण कि 'मामहम्०' (मैं अपनेको जानता हूँ) ऐसा अहमर्थाकार वृत्तिमें साक्षात् ज्ञानत्वका अनुभव होता है। परन्तु मनके करणत्वका तो निरास है? नहीं, क्योंकि अनुभवके अनुसार मनमें, जो कि अन्दरकी इन्द्रिय है, ज्ञान-करणत्वकी भी कल्पना की जा सकती है * ॥ १७ ॥


† जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि अनुमितिमें पर्वत अंशमें अपरोक्षत्व है और वह्नि अंशमें परोक्षत्व है, तथा 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशमें प्रामाण्य है और रजत अंशमें अप्रामाण्य है, वैसे ही 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया है, वही मैं इस समयमें उसका स्मरण करता हूँ' इस प्रत्यभिज्ञामें अहमंशमें ज्ञानत्वाभाव और तत्तांशमें ज्ञानत्वका स्वीकार किया जाता है, क्योंकि अनुभव ऐसा ही होता है। प्रत्यभिज्ञा—संस्कार और इन्द्रिय दोनोंसे होनेवाला ज्ञान, यह भाव है।

* इस मतानुयायियोंका कहना है कि पूर्वकी टिप्पणीमें जिस प्रत्यभिज्ञाका उल्लेख किया है, उसको अहमर्थमें भी ज्ञान ही मानना चाहिए। अन्यथा सूत्र और भाष्यमें अन्तःकरणोपहित चैतन्यात्मक अहमर्थ जीवकी प्रत्यभिज्ञाके बलसे जो स्थायिताका साधन किया गया है, वह विरुद्ध होगा। इस अर्थमें प्रमाणभूत ब्रह्मसूत्र भी है—'अनुस्मृतेश्च' [अ० २ पा० २ सू० २५] अनुस्मृति—प्रत्यभिज्ञा। इसी प्रकार इस सूत्रके भाष्यमें कहा है—'य एवाऽहं पूर्वेद्युरद्राक्षम्, स एवाऽद्यमद्य स्मरामि' (जिस मैंने प्रथम दिन देखा था, वही

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