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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 247 of 590

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Page 247

सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २१७


अन्ये वृत्त्येदमज्ञानावरणांशपरिक्षयात् ।
विक्षेपांशेन रजतं जीवन्मुक्तौ जगद्यथा ॥ ११० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानके आवरणांशके नष्ट होनेपर भी उसके विक्षेप अंशसे रजतकी उत्पत्ति होती है, जैसे जीवन्मुक्तिमें जगत् ॥ ११० ॥

अपरे तु—'इदं रजतम्' इति इदमंशसम्भिन्नत्वेन प्रतीयमानस्य रजतस्य इदमंशाज्ञानमेवोपादानम् । तस्य चेदमाकारवृत्त्या आवरणशक्तिमात्रनिवृत्तावपि विक्षेपशक्त्या सह तदनुवृत्तेः नोपादानत्वासम्भवः । जलप्रतिबिम्बितवृक्षाधोऽग्रत्वाध्यासे जीवन्मुक्त्यनुवृत्ते प्रपञ्चाध्यासे च सर्वा-


वाला, इस प्रकार अधिष्ठान और आधारका संक्षेपशारीरकमें भी विवेचन † किया गया है ?

‡ 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकार इदमंशके तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान रजतके प्रति इदम् अंशका अज्ञान ही उपादान कारण है । इदमाकार वृत्तिसे उस अज्ञानकी आवरणशक्तिका विनाश होनेपर भी विक्षेप-शक्तिके साथ उसकी निवृत्ति न होनेसे रजत आदिके प्रति वह उपादान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि जलमें प्रतिबिम्बित वृक्षके अधोग्रत्वके (जिसका अग्रभाग नीचे है, ऐसे वृक्षके अधोग्रत्वके) अध्यासमें और जीवन्मुक्तिमें अनुवर्तमान प्रपञ्चके अध्यासमें सर्वांशसे ✻ अधिष्ठानका साक्षात्कार


† संक्षेपशारीरकमें अधिष्ठान और आधारकी भिन्नताका सूचक एक श्लोकार्द्ध है, वह इस प्रकार है—

'संविद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगी-
र्नाधारेऽध्ययनस्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान् संभ्रमः' इत्यादि । [अ० १ श्लोक ३१]

अर्थात् कार्यके युक्त अज्ञानसे आवृत वस्तुमें ही अध्यासके अधिष्ठानका व्यवहार होता है, आधारमें—आरोप्य पदार्थके साथ तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान वस्तुमें—नहीं होता है, यह इस श्लोकार्धका भाव है ।

‡ अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही एक ज्ञानके विषय होते हैं, यही मत भाष्यादि निबन्धोंसे ज्ञात होता है, इसलिए पूर्वोक्त मत सर्वसम्मत नहीं है, इस अरुचिसे 'अपरे तु' का मत कहते हैं ।

✻ रजत आदि भ्रमस्थलमें अधिष्ठानका सर्वात्मना साक्षात्कार नहीं होता है, क्योंकि शुक्तित्व आदि विशेषरूपसे शुक्तिका साक्षात्कार नहीं होता है, इसलिए शुक्तिरजतस्थलमें इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी विशेषांशके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे उसमें अध्यासकी उपादानता

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