सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context२१२ सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ प्रथम परिच्छेद
अपरे तु—अहमाकारा वृत्तिरन्तःकरणवृत्तिरेव । किन्तु उपासनादिवृत्तिवन्न ज्ञानम्, क्लृप्ततत्करणाजन्यत्वात् । नहि तत्र चक्षुरादिप्रत्यक्षलक्षणं सम्भवति, न वा लिङ्गादिकम् । लिङ्गादिप्रतिसन्धानशून्यस्याऽप्यहङ्कारानुसन्धानदर्शनात् । नाऽपि मनः करणम्, तस्योपादानभूतस्य क्वचिदपि करणत्वाक्लृप्तेः । तर्हि अहमर्थप्रत्यभिज्ञाऽपि ज्ञानं न स्यादिति चेत्, न; तस्या अहमंशे ज्ञानत्वाभावेऽपि तत्तांशे स्मृतिकरणत्वेन क्लृप्तसंस्कार-
कुछ* लोग कहते हैं कि अहमाकार वृत्ति अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, [ अविद्याकी वृत्ति नहीं है ] किन्तु अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति उपासना आदि वृत्तियोंके समान ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि क्लृप्त जो ज्ञानके चक्षुरादि करण हैं, उनसे ( वह वृत्ति ) जन्य नहीं है । क्योंकि न तो उस वृत्तिमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं और न हेतु आदि अनुमानादि प्रमाण हैं । तथा लिङ्गादि-ज्ञानके विरहकालमें भी अहमर्थका अनुसंधान होता है, इससे भी लिंगादि अन्तःकरणवृत्तिके कारण नहीं हैं। और मन भी ज्ञानका करण नहीं है, क्योंकि उसके उपादान होनेके कारण † किसी भी वृत्तिज्ञानका वह करण नहीं हो सकता है । इस परिस्थितिमें शङ्का होती है कि अन्तःकरणसे होनेवाली अहमर्थकी प्रत्यभिज्ञा भी ज्ञानात्मक नहीं होगी ? नहीं, यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञाके 'अहम्' अंशमें ज्ञानत्व न होनेपर भी तत्ता अंशमें ज्ञानत्व है, कारण कि स्मृतिके कारणरूपसे
* इन लोगोंका कहना है कि जब अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही अहमर्थमें संस्कारोंका आधान हो सकता है, तो अविद्याकी वृत्ति क्यों मानना ? यदि शङ्का हो कि सुख और दुःख तो एक कालमें हो सकते हैं, परन्तु एक कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते हैं, अतः अहमर्थगोचर अन्तःकरणवृत्ति अन्य ज्ञानकी धारा कालमें कैसे होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अन्तःकरणकी अहमाकारवृत्ति संस्कारार्थ है, वह ज्ञानरूप नहीं है, अतः दोष नहीं है ।
† जो जिस कार्यका उपादान होता है, वह उस कार्यका करण नहीं होता, क्योंकि करण वही होता है, जो व्यापारवान् होकर असाधारण कारण हो । घटकी उपादान कारण मृत्तिकामें घटकरणत्वका व्यवहार नहीं होता है, अतः अन्तःकरणवृत्तिके प्रति अन्तःकरण, जो उस वृत्तिका उपादान है, करण नहीं होगा, इस अभिमानसे मूलमें 'तस्योपादानभूतस्य' इत्यादिसे मनमें करणत्वका निरास करते हैं, यह भाव है ।