सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| २१४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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एवं सति बाह्यविषयापरोक्षवृत्तीनामेवावरणाभिभावकत्वनियमः पर्यवसन्नः ।
शुक्त्यादौ नन्विदंवृत्त्याऽऽवरणाभिभवो नहि ।
रूप्याध्यासाद्यसंसिद्धेरत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १०७ ॥
परन्तु बाह्यवृत्तियोंका भी आवरणका अभिभव फल नहीं हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतादि स्थलमें इदमाकार बाह्यवृत्तिसे अज्ञानका अभिभव नहीं देखा जाता है, यदि उक्त स्थलमें आवरणाभिभव फलको हठात् मानोगे, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास ही सिद्ध नहीं होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०७ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, शुक्तिरजतस्थले इदमाकारवृत्तेरज्ञानानभिभावकत्वात् । अन्यथोपादानाभावेन रजतोत्पत्त्ययोगादिति चेत् ,
इस अवस्थामें अर्थात् अहमाकार अपरोक्ष वृत्तिके स्वीकार करनेपर यही नियम प्राप्त होता है कि बाह्यके घट आदि विषयाकारोंमें परिणत वृत्तियां ही आवरणकी अभिभावक हैं—विनाशक हैं ।
परन्तु यह भी नियम नहीं हो सकता है—बाह्यविषयगोचर अपरोक्ष-वृत्ति अज्ञानकी विनाशक है, क्योंकि शुक्तिरजतभ्रमस्थलमें इदमाकार (बाह्यगोचर) अपरोक्षवृत्तिके होनेपर भी वहां अज्ञानका विनाश नहीं होता
मैं आज स्मरण करता हूँ) इसलिए प्रत्यभिज्ञाके अहमर्थमें ज्ञातत्वाभावका कथन अयुक्त ही है। 'मैं अपने को जानता हूँ' इसमें अहमर्थ वृत्तिमें अतिस्फुट ज्ञातत्वका अनुभव होता है। 'बुद्धेः करणत्वाभ्युपगमात्' (अन्तःकरण करण माना जाता है) इस (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ४० के) भाष्यके अनुसार मनको करण माननेमें कोई हानि भी नहीं है। इसीसे भाष्यकारने मनमें प्राणपादमें इन्द्रियत्वका साधन भी किया है। इस मतमें 'अज्ञान आदि केवल साक्षीसे भास्य हैं, यह सिद्धान्त भी अहमर्थव्यतिरिक्त अज्ञान, सुख आदि विषयक है। यदि मन इन्द्रिय माना जाय, तो रूपके प्रत्यक्षमें जैसे चक्षु प्रमाण है, वैसे अहमर्थमें यह भी प्रमाण हो जायगा, और वह हो नहीं सकता, क्योंकि अज्ञातज्ञापकत्वरूप (अज्ञात वस्तुका ज्ञापन) प्रमाणका लक्षण मनमें नहीं घटता है, कारण कि अहमर्थके अनावृत साक्षीरूप चैतन्यमें अध्यस्त होनेके कारण अहमर्थ अज्ञात नहीं है? यह शङ्का नहीं हो सकती है, क्योंकि अबाधितानुभवत्व या तद्वति तत्प्रकारकज्ञानत्व ही प्रमात्व है, इस मतके अनुरोधसे मनको अहमाकार ज्ञानके प्रति करण माननेमें विरोध नहीं है, अतः अहमाकार ज्ञानको प्रमा और उसके करण मनको प्रमाण माननेमें हानि नहीं है।