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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 255 of 590

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Page 255

सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२५


न च स्वतश्शुभ्रेऽपि शुभ्रकलधौतभृङ्गारगतेऽपि स्वच्छे जले एव नैल्याध्यासः, न मुक्ताफले इति व्यवस्थावत् वस्तुस्वभावादेव शुक्तौ रजताध्यासः नेङ्गालादाविति व्यवस्था, न तु सादृश्यज्ञानापेक्षणादिति वाच्यम् ; स्वतः पटखण्डे पुण्डरीकमुकुलत्वानध्यासेऽपि तत्रैव कर्तनादि-घटिततदाकारे तदध्यासदर्शनेन तदध्यासस्य वस्तुस्वभावमननुरुध्य सादृश्य-ज्ञानभावाभावानुरोधित्वनिश्चयात् । अन्यथाऽन्यदाऽपि तत्र तदध्यास-प्रसङ्गात् ।

उच्यते—सादृश्यज्ञानस्याऽध्यासकारणत्ववादेऽपि विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु

यदि शङ्का की जाय कि जैसे स्वतः शुभ्र, सफेद रजतके पात्र विशेषमें स्थित निर्मल जलमें ही नीलिमाका अध्यास होता है, मोतीमें नहीं होता, इस प्रकार वस्तुके स्वभावविशेषसे व्यवस्था होती है, वैसे ही शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, इङ्गालमें नहीं होता, इस प्रकारकी व्यवस्था भी स्वभावसे हो सकती है, सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षासे नहीं होती है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षात् वस्त्रके खण्डमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास न होनेपर भी कैंचीसे कतर कर कमलाकार बनानेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास देखा जाता है, इससे कमलाध्यासमें—वस्तुस्वभावका अनुरोध न करके † सादृश्यज्ञानके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता—इस प्रकार सादृश्यज्ञके अनुरोधका निश्चय किया जाता है। अन्यथा अर्थात् वस्तुस्वभावको अध्यासके प्रति कारण माननेपर पटमें कतरनेके पूर्व भी कमलकी मुकुलावस्थाके अध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* उक्त शङ्काका समाधान कहते हैं कि सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण है,


‡ अर्थात् कतरनेसे सादृश्यज्ञान होनेपर ही कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है, और उसके न होनेपर नहीं होता, अतः वस्तुस्वभावकी अपेक्षा न करके अन्वयव्यतिरेकसे अध्यास सादृश्यज्ञानकी अपेक्षा करता है, यह भाव है।

* विशेष अध्यासमें कारणरूपसे प्राप्त सादृश्यज्ञान द्वारा समादृत धर्मिज्ञानकी कारणताका परिहार करते हैं—'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थसे। परिहारका तात्पर्य यह है कि विशेषदर्शनसे जिनकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसे 'शुक्तौ इदं रजतम्' इत्यादि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञान कारण है और विशेषदर्शनसे जिन अध्यासोंका प्रतिबन्ध नहीं होता है, ऐसे अध्यासोंमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, इस बातको धर्मिज्ञानकारणवादी अवश्य स्वीकार करेंगे शुक्तिरजतस्थलमें 'रजतत्वाभावव्याप्यशुक्तित्ववान् अयम्' (रजतत्वके अभावसे व्याप्य जो

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