सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 241 of 590
Read in contextअहंकार आदिके अनुसंधानका विचार] भाषानुवादसहित २११
यौगपद्यवद् वृत्तिद्वययौगपद्यस्याप्यविरोधिनाऽन्यज्ञानधाराकालेऽपि अहमाकाराविद्यावृत्तिसन्तानसम्भवादिति ।
उपास्तित्वन्मनोवृत्तिरियं न ज्ञानमिष्यते ।
प्रत्यभिज्ञा स्मृतिज्ञानं तत्तांश इति चापरे ॥ १०५ ॥
यह अहमाकारवृत्ति मनोवृत्ति है और वह उपासनाके समान ज्ञान नहीं है, प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांशमें ही स्मृतिज्ञान है, अहंशमें नहीं, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०५ ॥
कालमें दो वृत्तियाँ नहीं हो सकतीं, नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदक † सिर, पैर आदि देशके भेदसे जैसे सुख और दुःख दोनों एक ही समयमें माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें दो वृत्तियोंका स्वीकार करनेमें किसी प्रकारके विरोधके न होनेसे ज्ञानान्तरकी धाराके समयमें भी अहमाकार अविद्याकी वृत्तिका प्रवाह हो ‡ सकता है ।
होता है' यह नियम माना जाय, तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि अविद्यावृत्तियोंसे, जो कि अहङ्कार और तद्धर्मोंको विषय करती हैं, अहङ्कार आदिमें संस्कारोंक आधान होगा । अविद्यावृत्ति अनुभवके योग्य नहीं है, अतः ज्ञान या संस्कारके लिए अन्य वृत्ति माननी नहीं पड़ेगी, इसलिए पूर्वोक्त अनवस्था भी नहीं होगी । सुषुप्तिमें अज्ञान आदिका अनुभव होनेसे अविद्यावृत्ति माननी भी पड़ती है, अतः यह कल्पना नवीन भी नहीं होगी । अहङ्काराकार अविद्यावृत्तिके स्वीकार करनेसे अहङ्कार आदि केवल साक्षीसे वेद्य हैं, इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा ? नहीं, क्योंकि केवल साक्षीवेद्यत्वका अर्थ है—ज्ञानात्मकवृत्तिसे अनुपहित साक्षीसे वेद्य, फलतः ज्ञानकारणसे जन्य न होनेके कारण अविद्यावृत्तिको ज्ञानरूप नहीं मानते हैं ।
† अवच्छेदकशब्दका प्रकृतमें अर्थ है—सप्तमीविभक्तिसे निर्दिश्य विलक्षण विशेषण । प्रकृतमें 'शिरसि मे वेदना' 'पादे मे सुखम्' (माथेमें मुझे दर्द है, और पैरमें सुख है) । इसमें 'शिरसि' और 'पादे' इस सप्तमी विभक्तिसे विलक्षण अवच्छेदक—विशेषण—कहा जाता है, अतः इन अवच्छेदकोंके भेदसे जैसे एक कालमें सुख और दुःख दोनों माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें अर्थात् अन्य ज्ञानधाराकालमें अन्य वस्तुविषयक अन्तःकरणकी वृत्ति और अहमाकार अविद्याकी वृत्ति प्रमातामें अवच्छेदकभेदसे मानेंगे । इसमें कोई विरोध नहीं है, यह तात्पर्य है ।
‡ अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंका जो प्रवाह है, वही धारा है, इसलिए तत्कालीन अविद्यावृत्ति भी सन्ततिरूप ही होगी, इस सम्भावनामात्रसे मूलमें 'अविद्यावृत्तिसन्तान' कहा गया है, यह भाव है ।